कम्यूनिस्ट शासनवाले चीन में मानवाधिकार जेहादी और बहुदलीय लोकतंत्र बहाली के लिए संघर्षरत कैदी नोबेल शांति पुरस्कार विजेता लू शियाओबो की दर्दनाक मौत पर भारत समेत दुनिया के किसी भी कम्यूनिस्ट नेता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । ऐसे चुप लगा गए मानो यह ‘नोटिस’ लेने लायक घटना हो ही नहीं ।

दुनिया भर के मानवाधिकार और लोकतंत्र समर्थकों ने इस दिल दहलानेवाली घटना पर आंसू बहाए, चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की ‘बंदूक की नली’ से चलनेवाली सरकार को कोसा । इसे मानवाधिकार पर काला दाग बताया । मगर किसी भी कम्यूनिस्ट शासन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा । इस खबर की ऐसी अनदेखी की, पूरे प्रकरण को इस तरह अनसुना किया मानो लू शियाओबो के साथ ऐसा अमानवीय और निर्मम रवैया अपनाना उचित था । क्योंकि उन्होंने ऐसे निरंकुश कम्यूनिस्ट चीन में लोकतंत्र बहाली के लिए आवाज उठायी, जहां कम्यूनिस्ट पार्टी का विकल्प हो ही नहीं सकता । चीन के कानून में ऐसी आवाज उठानेवाले को ‘देशद्रोह’ माना जाता है, जिस अपराध में 11 साल की सजा काटते हुए इस जुझारू निर्भीक जेहादी ने प्राण त्याग दिए । विदेशी प्रतिक्रियाओं के जवाब में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जेंग शुआंग ने इसे ‘कानून का शासन’ के तहत की गयी कार्रवाई बताते हुए सफाई दी कि लू शियाओबो कैदी थे और कानून के अनुसार ही सजा सुनाई गई थी ।

इन सफाइयों से अपना दागदार चेहरा ढंकने की असफल कोशिश चीनी राजनयिकों ने तब की, जब लू शियाओबो के विषय में यह खबर चीन के दबाने के बावजूद फैल गयी कि कैंसर पीड़ित शियाओबो की मौत उचित इलाज के अभाव में हुई ।

लू शियाओबो के कैंसर पीड़ित होने की सूचना चीन से बाहर न जाने देने का इंतजाम चीन सरकार ने लगाया था । चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हवा को मई के अंतिम सप्ताह में यह सूचना दबाने में कामयाबी नहीं मिल पायी कि अब लू का बचना मुश्किल है । उसके बाद शियाओबो को जून में पेरोल जेल से छोड़ा गया । उत्तर पूर्वी शेनयांग शहर के जिस अस्पताल में लू शियाओबो को भर्ती कराया गया वहां के डॉक्टर सब कुछ समझते हुए भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे । उस अस्पताल के बारे में चीन से बाहर निकली रिपोर्ट के अनुसार शियाओबो के वार्ड के चारों तरफ डॉक्टरों और नर्सों से ज्यादा चीनी लाल सेना के सुरक्षा गार्ड तैनात थे । जबकि उनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया था । लू के समर्थन में तिब्बती शरणार्थियों ने शिमला धर्मशाला में प्रदर्शन किया तो चीन ने तिब्बत कब्जे की फौजी चौकसी बढ़ा दी ।

61 वर्षीय लू शियाओबो की ओर से उनकी पत्नी लू शिया की बेहतर इलाज के लिए बाहर जाने की गुहार चीन सरकार ने ठुकरा दी । चीनी कानून के अंतर्गत लू शिया भी जेल में बंद थी । काफी जद्दोजहद के बाद पति की जानलेवा बीमारी के जान लेने की स्थिति में आ जाने के समय लू शिया को जेल में पति के साथ रहने की इजाजत मिली थी । उनका भी अपराध यही था । लू शिया भी अपने पति की तरह मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रही थी । यहां तक कि पति की मौत के बावजूद चीन सरकार लू शिया को जेल से छोड़ने और देश से बाहर जाने की अनुमति देने को तैयार नहीं है । आए दिन दिग्भ्रमित करनेवाली गोलमटोल खबरें प्रचारित की जा रही है । शियाओबो की पत्नी और परिवारजनों को अंत्येष्टि की जगह और समय के लिए इजाजत लेनी पड़ी । तीन बार सिर झुकानेवाली अंत्येष्टि रस्म भी पुलिस निगरानी में निभायी गयी ।

लू शियाओबो को 2009 में ‘देशद्रोह’ के जुर्म में 11 साल की ऐसी कड़ी सजा हुई कि 2010 में नोबेल शांति पुरस्कार लेने के लिए उन्हें नॉर्वे जाने देने में चीन को खतरा था । चीन सरकार को उनकी पत्नी लू शिया से भी उतना ही ‘खतरा’ था । शिया को भी नॉर्वे नोबेल अकादेमी के बार-बार आग्रह के बावजूद पति की ओर से पुरस्कार ग्रहण के लिए जेल से नहीं छोड़ गया । शियाओबो के लिए रखी गयी खाली कुर्सी को प्रतीक मानकर उनके नाम पर नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया । अभी भी उनकी पत्नी मरहम पति की ओर से नॉर्वे जाकर पुरस्कार ग्रहण करने की स्थिति में नहीं हैं । चीनी अधिकारियों ने शियाओबो को नोबेल पुरस्कार देना उल्टे नोबेल पुरस्कार का ही ‘अपमान’ बताया और विश्वभर की प्रतिक्रियाओं को चीन की ‘न्यायिक संपभुता’ तथा अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप करार दिया ।

चीनी कम्यूनिस्ट नेताओं को इस बात से ‘संतोष’ है कि सबसे ज्यादा गहरे ताल्लुकात वाले भारत और दक्षिण एसिया के माओवादी कम्यनिस्ट तथा नक्सल पार्टियों ने बिल्कुल चुप्पी साधे रखी । ये वही वाम नेता हैं जो भारत और अन्य देशों में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर गैर-कम्यूनिस्ट सरकारों पर हमले के खिलाफ आम नागरिकों को खून-खराबे के लिए उकसाते हैं । ‘बंदूक की नली से क्रांति’ वाले गॉडफादर माओ सिद्धांत के अंध समर्थक कम्यूनिस्टों को चीन का अमानवीय रवैया ही मानवाधिकार लगता है ।

लू शियाओबो के साथ तो ये होना ही था । क्योंकि उन्होंने 1989 में लोकतंत्र बहाली के लिए चीन में भड़के व्यापक छात्र आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी । लू शियाओबो ने मशहूर थ्येनआनमेन चौक पर छात्रों के प्रदर्शन का नेतृत्व किया । पूरी दुनिया का रोम-रोम शिहर उठा, जब यह पता चला कि चीनी शासकों ने अपने ही छात्रों की आवाज बंद करने के लिए किसी शत्रु देश के फौज की तरह बेरहम टैंकों से रौंदकर कुचल दिया ।

चीन की देखादेखी यही बेरहमी कम्यनिस्ट तानाशाही वाले बर्मा(म्यांमार) ने अपनायी । 1990 में औंग सान सूकी के नेतृत्व में उस समय म्यांमार में छात्र आंदोलन भड़का जब लोकतंत्र कुचलने के लिए दुनिया से कट चुके म्यांमार का एकमात्र सहयोगी और मददगार कम्यूनिस्ट चीन था । म्यांमार शासन ने जमकर गोलियां बरसायी और औंग सान सूकी समेत सारे छात्र तथा राजनीतिक कार्यकर्ताआं को जेलों में ठूंस दिया । कैदियों को भीषण यातनाएंं दी गयीं ।

औंग सान सूकी को भी 1991 में नोबेल शांति पुरस्कार लेने के लिए जेल से रिहा नहीं किया गया । सूकी की ओर से उनके ब्रिटिश पति माइकेल एरिस ने और पुत्र ने पुरस्कार ग्रहण किया । पत्नी को अंतिम बार देख लेने की आस लिए कैंसर पीड़ित माइकेल ने लंदन में प्राण त्याग दिए, म्यांमार सरकार ने सूकी को जेल से बाहर नहीं जाने दिया ।

बहरहाल, भारत समेत पश्चिमी देशों के दबाब में ही सही, लोकतंत्र बहाली का सूकी का सपना पूरा हुआ और 2012 में जेल से रिहाई के बाद सूकी नॉर्वे जाकर अपनी नोबेल कुर्सी पर बैठी । आज वे सेना का वर्चस्व होने के बावजूद सरकार चला रही हैं। भारत समेत किसी कम्यूनिस्ट देश के नेता ने सूकी के समर्थन में नहीं बोला ।

आश्चर्य है कि चीन का कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन की बड़ी ‘चिन्ता’ है । इसको कम्यूनिस्ट नेता भारत के अंदरूनी मामले में हस्तक्षेप नहीं मानते । लू शियाओबो के बारे में प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक नाजी जर्मनी के बाद से यह पहली घटना है, जब किसी नोबेल पुरस्कार विजेता की कैद में मौत हुई है । नोबेल अकादमी ने संवदेनशील लहजे में कहा - ‘लू की कुर्सी हमेशा के लिए खाली रह गयी ।’ नाजीवाद और फासीवाद कम्यूनिस्ट नेताओं का बहुप्रचारित अत्याचार का प्रतीकवाद है । आज वही जर्मनी है, जिसने लू शियाओबो के इलाज के लिए सबसे पहले ऑफर भेजा फिर ‘साम्राज्यवादी’ अमेरिका ने भेजा । जर्मनी आज बदला हुआ है । लेकिन कम्यनिस्ट अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं हैं । मानवाधिकार उल्लंघन जब होगा, अमेरिका और पश्चिम युरोप में ही होगा । उसी के खिलाफ हल्ला बोल चलाना है । चीन और कम्यूनिस्ट रूस में मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाना ‘सही’ होता है ।