अमरनाथ तीर्थयात्रियों पर जानलेवा आतंकी हमले की टीस अभी गयी नहीं । सुरक्षा व्यवस्था म चूक कोई नयी बात नहीं है, जबकि जम्मू व कश्मीर में बढ़तो हिंसा लगातार चुनौती बनी हुई है। लोग अभी भूले नहीं हैं कि नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के सुकमा में खुफिया एजेंसियों की सुरक्षा अलर्ट की चूक ने 25 जवानों की जान ले ली । उसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा बुलायी गयी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक इसी चूक पर केंद्रित रही । लेकिन फिर सारी सुरक्षा व्यवस्था उसी स्थिति में है, ताकि अगली चूक के कारण किसी हमले की खबर मिले ।
जम्मू व कश्मीर में तो पूरी सुरक्षा व्यवस्था सेना के हाथ में है । कहने का ये तात्पर्य नहीं कि सेना अपनी ड्यूटी में लापरवाही बरत रही है, अथवा सेना की वजह से कोई चूक हुई है ।
जम्मू व कश्मीर में एक बार फिर 1990 के दशक जैसे हालात बन गये हैं, जब वहां का शासन केंद्र को सीधे अपने हाथ में लेने पड़े और तनाव के कारण कई वर्षों तक चुनाव कराने का माहौल नहीं तैयार हो पाया । कांग्रेस के नेतृत्व में सभी विपक्षी दलों ने मृतकों के लिए दो मिनट का मौन रखकर राज्यपाल शासन की मांग कर ही डाली ।
जम्मू व कश्मीर के प्रति अंतरराष्ट्रीय नजरिए की बारीकी पर गौर किया जाए । इसे समझने में चूक हो रही है और यह भारत से ज्यादा पाकिस्तान के पक्ष में जा रहा है । अमेरिका, चीन, रूस, इंगलैंड समेत दुनिया के कोई भी देश कश्मीर का भारत का अभिन्न अंग नहीं मानते । सारे देश कश्मीर को एक विवादित क्षेत्र मानते हैं और उनकी नजर में भारत और पाकिस्तान बातचीत से या छद्म युद्ध से इस विवाद का हल नहीं निकाल रहे हैं, इसलिए मध्यस्थता के लिए बताब हैं । भारत में जम्मू व कश्मीर आजाद देश का एक राज्य ह, जैसे भारतीय संघ के अन्य राज्य हैं । लेकिन कश्मीर का जो हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में है, उसे पाकिस्तान ‘आजाद कश्मीर’ कहता है । भारत उस हिस्से को ‘पीओके’(पाक कब्जेवाला कश्मीर) मानता है, जिससे दुनिया के अन्य देश सहमत नहीं है । पीओके को अड्डा बनाकर पाकिस्तान का जम्मू व कश्मीर नियंत्रण रेखा पर आतंकी हमले को वे अंतरराष्ट्रीय आतंकी संकट से नहीं जोड़ते । भारत के इस दावे को कोई देश मान्यता नहीं देता कि जम्मू व कश्मीर संकट उसका अंदरूनी मामला है, क्योंकि यह भारत का अभिन्न अंग है । लेकिन अन्य देश पाकिस्तान की तरह जम्मू व कश्मीर को भिन्न अंग मानते हैं । इसलिए लगभग सभी देश पाकिस्तान के बुलावे पर मध्यस्थता करने का आतुर हैं । भारत के बार-बार इन्कार करने पर भी कई देश अपना ‘आंफर’ दुहराते रहते हैं और कश्मीर संकट की तुलना फिलस्तीन से करते हैं ।
अमरनाथ यात्रियों पर हमले के तुरंत बाद चीन ने अपना ‘ऑफर’ भेजा । चीन ने अन्य देशों की तरह आतंकी हमले में सात तीर्थयात्रियों के मारे जाने की निंदा तो नहीं, लेकिन मध्यस्थता की पेशकश की । चीन ने भारत-पाक संबंध सुधारने में रचनात्मक भूमिका निभाने की इच्छा जतायी । इसका सीधा तात्पर्य जम्मू व कश्मीर से है, जहां सीमापार से पाकिस्तान आतंकी हमला करवा रहा है । चीन से बेहतर इस समस्या को कोई दूसरा देश नहीं जानता । क्योंकि चीन भारत का ऐसा खुराफाती पड़ोसी है, जिसकी करतूतों के चलते सीमावर्ती इलाके में हमेशा तनाव की स्थिति बनी रहती है । पाकिस्तान का समर्थन करते रहना चीन का राजधर्म है और वो कश्मीर पर पाकिस्तानी रवैया का साथ देते हुए मध्यस्थता करना चाहता है । पाकिस्तान न अपने आजाद कश्मीर का एक हिस्सा चीन को दे रखा है, जहां आतंकी हमले की योजनाएं बनती है । दूसरी ओर चीन सिक्किम पर डोकलम के बहाने भारत को दाब हुए है, उधर अरूणाचल में चीन ने भारत के लिए पहले से ही सिरदर्द पैदा कर रहा है । सिक्किम के डोकलम क्षेत्र पर चीनी गतिरोध ताजा है। ऐसा ‘हितैषी’ चीन इसलिए मध्यस्थता करना चाहता है, ताकि दक्षिण एसिया में शांति बनी रहे । जैसे अमेरिका खुद को विश्व का ‘चौधरी’ हमेशा से समझता आया है, ठीक वैसे ही चीन अपने दक्षिण एसिया का स्वयंभू चौधरी समझता है और भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानकर दक्षिण एसिया नीति तैयार करता है ।
जून के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलकर लौटे हैं।
चीन के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने मध्यस्थता के साथ-साथ यह भी साफ कह दिया कि ‘अगर भारतीय सेना ने चीन को डोकलम में सड़क बनाने से रोका तो कोई विदेशी फौज कश्मीर में प्रवेश कर सकती है ।’
भारत लाख सफाई दे, कश्मीर अब भारत का अपना अंदरूनी या राष्ट्रीय मुद्दा रहा ही नहीं । इसका अंतरराष्ट्रीयकरण हो चुका है, जिसमें भारतीय पक्ष का समर्थन करने का तो सवाल ही नहीं उठता । इस पेचीदे मसले की सीमा सिर्फ यहीं तक नहीं है कि कश्मीर के अलगाववादी हुर्रियत नेता पाकिस्तान को शामिल किए बगैर वार्ता में शामिल होने को तैयार नहीं है । पाकिस्तान बिना चीन को साथ लिए कश्मीर वार्ता को टालता रहेगा ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ऐतिहासिक मुलाकात के पंप एंड शो में यह बात भूलनी नहीं चाहिए कि डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के समय अपने प्रचार अभियान में कहा कि ‘अगर निर्वाचित हुए तो कश्मीर मसले का हल निकलेंगे ।’ डोनाल्ड ट्रंप ने जीतने के बाद अपने कार्यालय हवाईट हाउस में कश्मीर पर पेशकश फिर दुहराया । संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली ने हाल ही में कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर पर तनाव कम करने की कोशिश की जाएगी ।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने अमरनाथ हमले के बाद भारत और पाकिस्तान को आपस में बातचीत शुरू करने के आग्रह के साथ-साथ यह भी कहा कि वे कश्मीर के हालात पर नजर रखे हुए हैं ।
यह तो कल्पना ही बेकार है कि भारत पाक द्विपक्षीय मुद्दे पर मध्यस्थता में अमेरिका कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानकर बातचीत करवाएगा । उसके पहले एक मई को भारत के दौरे पर आए तुर्की के राष्ट्रपति रीसीप तेईप एडोंगन ने भारतीय नेताओं को यह कहकर अचरज में डाल दिया कि भारत और पाकिस्तान को कश्मीर में हिंसा शांत करनी चाहिए तथा वे दोनों के बीच मध्यस्थता करने को तैयार हैं। संयुक्त राष्ट्र और इस्लामी देशों के संगठन(ओआईसी) कश्मीर स्थिति को दक्षिण एसिया शांति व सुरक्षा के लिए खतरा मानकर इसका शीघ्र हल निकालने की बात बार-बार कह रहे हैं । इस्लामी देश ‘आजाद कश्मीर’ को सही और जम्मू व कश्मीर के आजाद भारत का अंग होना गलत मानता है ।
रीसीप तेईप एडोंगन ने नरेंद्र मोदी को समझाने का प्रयास किया कि पाकिस्तान से कश्मीर पर उनकी विस्तृत बातचीत हो चुकी है ।
ताज्जुब यह देखकर होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दुनिया भर में भारत का आर्थिक और व्यापारिक रिश्ता मजबूत करने में कोई दिक्कत नहीं होती है, सभी देश स्वागत को तत्पर रहते हैं । लेकिन आंतकवाद के खिलाफ चल रहे अंतरराष्ट्रीय युद्ध में प्रधानमंत्री के इस सटीक बात पर सभी देश चुप लगा जाते हैं कि आतंकवाद को कुछ देश अपने मतलब से देख रहे हैं, जो पड़ोसी के लिए संकट है, वो उनके लिए नहीं है ।
राजनीतिक मसले पर तनाव कम करने में हाथ मिलाने से परहेज है । सिक्किम पर गतिरोध के बावजूद भारत शंघाई सहयोग संगठन(एससीओ) में शामिल होने चीन गया । रूस के समर्थन से भारत और पाकिस्तान के समर्थन से भारत इस संगठन का पूर्ण सदस्य बना । रूस यों भी कश्मीर पर कभी खुलकर सामने नहीं आता । उस बैठक में भी सीमा पर नियंत्रण और आतंकवाद पर पहले से तय एजेंडे के बावजूद चर्चा नहीं हुई । अगर चर्चा होती तो कश्मीर का मामला आता ही ।
कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन विश्व चर्चा का विषय बना हुआ है । भारत में सभी विपक्षी पार्टियां लगातार जम्मू व कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाना ही कश्मीर में हिंसा पर काबू न पाने का कारण बता रही हैं ।
अब तो लगता है कि विपक्षी दलों के नेताओं की तरह विश्व नेताओं को भी कश्मीर पर ताजा स्थिति की जानकारी देनी होगी । विदेशी अखबारों में भारत के दंगा-फसाद मामले उछलते हैं । मारे गये अमरनाथ तीर्थ यात्रियों का गुजराती होना इसलिए चर्चा में आया कि प्रधानमंत्री गुजराती हैं । ऐसे में विश्व हिंदू परिषद का यह बयान सीधे तौर पर उकसाने वाला है कि अगले साल 50 हजार गुजराती अमरनाथ जाएंगे । क्या वे भूल गए कि जिस नरेंद्र मोदी के शासनकाल में गुजरात में दंगे हुए और जिस वजह से अमेरिका ने उन्हें अपने आने से रोका, उसी अमेरिका ने आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया ।
24 फरवरी, 2015 को पीडीपी-भाजपा गठजोड़ पर सहमति के दिन संवाददाता सम्मेलन में राम माधव की मौजूदगी कश्मीर की जनता ने पसंद नहीं किया । श्रीनगर के अखबार ‘कश्मीर टाइम्स’ ने यही सम्पादकीय टिप्पणी की । उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिका में दिया गया भाषण याद कर लेना चाहिए कि आतंकवादी गुट सब एक हैं, सिर्फ नाम अलग-अलग है । आतंकवाद ही उनका जात, धर्म है । अमरनाथ हमले के समय मुजफ्फरनगर में एक हिंदू आतंकवादी पकड़ाया, जो लश्कर-ए-त“यबा से संबद्ध बताया गया है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब एक हिंदू आतंकवादी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से पकड़ाया है, जहां पहले दंगा हो चुका है ।
हिजबुल मुजाहिदीन आतंकी बुरहान बानी को गत वर्ष जुलाई में सेना ने मार गिराया था, जिसके बाद से भड़की हिंसा बेकाबू हो रही है । उसकी बरसी आयोजन के समय सेना ने कहा कि इतने दिनों में 100 नए आतंकी तैयार हैं और 400 पीओके में ट्रेनिंग ले रहे हैं ।
26 जून को अमेरिका में ट्रंप-मोदी मुलाकात के दौरान जब हिजबुल मुजाहिदीन सरगना सैय्यद सलाहुद्दीन को ग्लोबल आतंकी घोषित किया गया, उसी दिन ‘आजाद कश्मीर’ के ‘राष्ट्रपति’ सरदार मुहम्मद मसूद खाँ ने अमेरिकी निर्णय के औचित्य पर सवाल उठाया । पीओके राजधानी मुजफ्फरनगर में बुरहान बानी चौक का नाम हिजबुल रखा गया और वहां दो किशोरों को भारतीय तिरंगा पर खड़े दिखाया गया । फिर आजादी के नारे लगाते हुए तिरंगा जलाते हुए तस्वीर न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी ।
लेकिन उसी अखबार ने पाक विरोधी पीओके नेता लियाकत हयात खान का यह बयान नहीं छापा कि पीओके में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आतंकी भेजना बंद करें ।
घटनाक्रम का तारतम्य देखिए कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक महीने बाद जून, 2014 में इराक के मोसुल पर इस्लामी आतंकी गुट(आईएसआईएस) के कब्जे के समय गुम 39 भारतीयों को अमरनाथ हमले के समय मुक्ति की उम्मीद बंधी, जब इराक सरकार ने मोसुल को मुक्त किया । विदेश राज्यमंत्री जनरल(रिटायर्ड) वो. के. सिंह उन्हें खोजने इराक रवाना हुए ।
अमेरिका फिलस्तीन पर इजराइल का विरोध कर नहीं सकता और कश्मीर पर भारतीय पक्ष का समर्थन नहीं करेगा । नरेंद्र मोदी ने इजराइल से जो दोस्ती बढ़ायी है उसका असर कश्मीर पर पड़ेगा ।