कश्मीर की अनंतनाग लोकसभा सीट की चर्चा उतनी ही है, जितनी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के स्टार प्रचारक नेता देश भर में हर चुनाव रैली में पुलवामा हमले, सर्जीकल स्ट्राईक, कश्मीर को विशेष दर्जा खत्म करनेवाली बातें जोर-शोर से कर रहे हैं । पुलवामा हमले की निंदा सर्वत्र हुई और इसका सबसे ज्यादा चुनावी लाभ उठाने की कोशिश भाजपा कर रही है । पुलवामा अनंतनाग लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहां आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए । अनंतनाग में असामान्य हालात के मद्देनजर चुनाव आयोग ने सिर्फ इसी सीट पर तीन चरणों में जिलास्तरीय मतदान कराने का फैसला किया । पहले चरण के मतदान के दिन 23 अप्रील को अनंतनाग से जो रिपोर्ट आयी, वो पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है । कश्मीर के क्षेत्रीय दल पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) प्रमुख महबूबा मुफ्ती और नेशनल कांफ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने चिंता जतायी है । कांग्रेस ने भी इससे इत्तेफाक रखा । कश्मीर से आनेवाले वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला के साथ बैठकर इस स्थिति को चिंताजनक बतायी ।

इन नेताओं की चिंता का सबब ये है कि अनंतनाग लोकसभा सीट के लिए पहले चरण के मतदान के दिन लगभग एक दर्जन बूथों पर एक भी वोट नहीं पड़ा । इन बूथों में सबसे ज्यादा बिजबेहरा के थे, जो महबूबा मुफ्ती का गृहक्षेत्र है । महबूबा अनंतनाग सीट से अपनी पार्टी की उम्मीदवार हैं । चुनाव आयोग ने बिजबेहरा में अभी तक का सबसे कम मात्र 2.04 प्रतिशत वोटिंग बताया । कुछ बूथों पर तो पूरे दिन मतदान अधिकारी बैठे रह गए, एक भी वोटर नहीं पहुंचे ।

भाजपा के लिए यह सवाल न चर्चा का विषय है, न चिंता का । भाजपा एकमात्र पार्टी है, जो कश्मीर में चुनाव प्रचार को लेकर अपने रवैए को लेकर सवालों के घेरे में है । मतदान प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी एक सवाल का जवाब दूसरे सवालों से घिर जाता है । अनंतनाग सीट से भाजपा ने सोफी यूसुफ को उम्मीदवार बनाकर अल्लाह के बंदे को ‘राम’ के रहमोकरम पर छोड़ दिया ।

भाजपा नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह में से कोई भी अपने उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार करने नहीं गए । अनंतनाग ही नहीं, कश्मीर की बाकी दो लोकसभा सीटों के लिए भी चुनाव प्रचार में जाने से परहेज किया । इन सभी भाजपा नेताओं ने सभी राज्यों में हर चुनाव रैली में कश्मीर में बेकाबू हो रहे आतंकवाद का जिक्र जरूर किया, सर्जीकल स्ट्राईक को सही ठहराया और साथ में लोगों को ज्यादा संख्या में जुटकर मतदान में हिस्सा लेने की अपील की। लेकिन कश्मीर के मतदाताओं के बीच जाकर यह बात नहीं कही । कश्मीरियों को उनके घर में जाकर नहीं बताया कि कश्मीर भारत का ‘अभिन्न’ अंग है और इसके टुकड़े नहीं होने देंगे । यह बात जम्मू में जाकर तो प्रधानमंत्री ने मतदाताओं को समझाया, मगर कश्मीर में कदम नहीं रखा । भाजपा के अन्य नेताओं ने भी जम्मू की दो लोकसभा सीटों तक ही अलगाववादियों को ‘माकूल’ जवाब देनेवाला अपना चुनाव प्रचार केंद्रित रखा । ऊधमपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत आनेवाले कठुआ में 14 अप्रील को एक चुनाव रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उमर अब्दुल्ला की कश्मीर के लिए अलग ‘प्रधानमंत्री’ की मांग पर उन्हें आड़े हाथों लिया और कहा कि देश को बांटने की अब्दुल्ला तथा मुफ्ती वंशवाद की योजना कामयाब नहीं होने दी जाएगी । नरेंद्र मोदी वहां अपने कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह के चुनाव प्रचार में गए । लेकिन प्रधानमंत्री कश्मीर के अनंतनाग नहीं गए, जहां भाजपा उम्मीदवार अपने ही बलबूते लुटिया बचाने में जुटे रहे । नरेंद्र मोदी श्रीनगर भी नहीं गए, जहां से फारूक अब्दुल्ला उम्मीदवार हैं । अलगाववाद का कारखाना कश्मीर है, जम्मू नहीं । यह राज्य जम्मू व कश्मीर कहलाता है । लेकिन प्रधानमंत्री समेत भाजपा नेताओं ने इसमें फर्क किया । इसलिए अनंतनाग सीट के मजबूत उम्मीदवार के गृहक्षेत्र बिजबेहरा के कुछ बूथों पर एक भी वोट नहीं डालने से भाजपा नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ा । कश्मीर में वैसे तो कांग्रेस के भी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी जैसे कई प्रचारक नजर नहीं आए । राज्य सभा में विपक्षी नेता गुलाम नबी आजाद अकेले भी संभालने में सक्षम हैं ।

लेकिन भाजपा के शीर्ष नेताओं का खास तौर से कश्मीर में चुनाव प्रचार से खुद को अलग रखना इनकी कश्मीर नीति पर ऊंगली उठाता है । अलगाववादी नेताओं का मतदान बायकाट एलान कोई नया नहीं है । वे हर चुनाव में करते हैं और तब भी लोग वोट डालने निकलते हैं । लेकिन इस बार कई बूथों का बिल्कुल नील जाना अलगाववादी बायकाट से ढंकनेवाला नहीं है । अनंतनाग के कुलगाम जिले में 29 अप्रील को दूसरे चरण के मतदान से दो दिन पहले भाजपा के जम्मू कश्मीर प्रभारी राम माधव एक चुनाव रैली को संबोधित करने गए । वहां दूसरा ही किस्सा हो गया । जो सुरक्षा वाहन पुलिस ने भाजपा उम्मीदवार सोफी यूसुफ के सुरक्षाकर्मियों को लाने ले जाने के लिए दिया था, उस वाहन का इस्तेमाल पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भोजन पैकेट बांटने के लिए किया गया । इसका एक वीडियो वायरल हो जाने के बाद जम्मू कश्मीर पुलिस को जांच के आदेश देने पड़े । वो पुलिस गाड़ी जब्त कर ली गयी, ड्राइवर को हटा दिया गया । राम माधव यह कहकर चलते बने कि भाजपा की ‘विकास राजनीति’ में कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियां बाधक हैं । जिस वक्त राम माधव रैली संबोधित कर रहे थे, जिसमें उन्होंने मतदाताओं की नाराजगी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, ज्यादा संख्या में जुटकर वोट डालने की अपील भी नहीं की, उसी समय फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती और कांग्रेस नेता मतदाताओं से 29 अप्रील को अपनी ताकत दिखाने का आग्रह कर रहे थे ।

28 अप्रील की चुनाव रैलियों में महबूबा मुफ्ती ने सांप्रदायिक रंग देकर अपने मतदाताओं को रिझाने का प्रयास किया और अमरनाथ न्यास बोर्ड को 2008 में जमीन देने का मामला उठा दिया, जब इसे लेकर आंदोलन हुआ । उस वक्त महबूबा मुफ्ती की पीडीपी गुलाम नबी आजाद की कांग्रेस सरकार में शामिल थी । गठजोड़ सरकार में गुलाम नबी आजाद जब मुख्यमंत्री थे, तभी अमरनाथ न्यास बोर्ड को जमीन दी गयी और उसका बेस कैंप अनंतनाग जिले में रखा गया । आज महबूबा मुफ्ती इसका ठीकरा गुलाम नबी आजाद के मत्थे मढ़ रही हैं । जबकि उसी सरकार में उनके पिता ने भी मुख्यमंत्री की पारी खेली ।

महबूबा की अपीलों का उनके मतदाताओं पर कोई असर नहीं पड़ा । 29 अप्रील को कुलगाम जिले में भी बड़ी खींचतान से 10 प्रतिशत वोट पड़े । जबकि महबूबा ने धारा 370 और 35ए को उछालकर कश्मीर का ‘विशेष दर्जा’ खत्म करने की भाजपा मुहिम की निंदा की ।

महबूबा मुफ्ती ने 2015 में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनायी और मुख्यमंत्री बनी । जून, 2018 में भाजपा के समर्थन वापस लेने से सरकार गिर गयी । उसके पहले छह महीने तक राज्यपाल शासन और फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने फिर विधान सभा भंग कर दी । यह विवाद का विषय बना । हाल में हुए शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में लोगों ने हिस्सा नहीं लिया । तब भी भाजपा ने 100 वार्ड में जीत हासिल करने का दावा किया । भाजपा को छोड़ सभी पार्टियां लोकसभा के साथ ही विधान सभा चुनाव कराने के पक्ष में थी । चुनाव आयोग फंसा हुआ है, नवंबर-दिसंबर में भी चुनाव कराने की अनुकूल परिस्थितियां नहीं बन रही हैं । सवाल है कि अगर विधान सभा का भी चुनाव होता तो वो जनादेश कैसा होता, जिसमें मतदाताओं की भागीदारी नगण्य हो । लोकसभा चुनाव तारीखों के एलान के बाद केंद्र ने जम्मू व कश्मीर के लिए एक ‘आतंकी मानीटरिंग ग्रुप’ बनाया । उसके बाद केंद्रीय एजेंसियों ने सैय्यद अली शाह गिलानी और शब्बीर शाह जैसे हुर्रियत नेताओं की संपत्ति कुर्क कर ली ।

अनंतनाग आतंकवादियों का गढ़ बना हुआ है । मतदान प्रक्रिया के दौरान हुर्रियत नेताओं से एनआईए को पूछताछ जारी रही । 22 अप्रील को महबूबा मुफ्ती ने प्रतिबंधित जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट नेता यासीन मलिक को स्वास्थ्य कारण बताकर दिल्ली से श्रीनगर लाने की मांग उठायी । उसके बावजूद महबूबा के क्षेत्र में मतदाताओं की भागीदारी नहीं रही । तीसरे चरण में 6 मई को भी कोई उत्साहवर्धक रिपोर्ट मिलने की उम्मीद नहीं है ।

चुनाव आयोग के अनुसार 15 वर्षों में वोटों का इतना कम प्रतिशत पहले कभी नहीं रहा । नरेंद्र मोदी समेत भाजपा नेता पीडीपी, नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस तीनों को आतंकवादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने का आरोप लगाते हैं । 24 अप्रील को जब प्रवर्तन निदेशालय ने शब्बीर शाह को पूछताछ के लिए बुलाया तो उसकी 19 वर्षीया बेटी समा शब्बीर शाह ने बताया कि 2005 में जब प्रवर्तन निदेशालय ने दो बार बुलाया तो वह पांच साल की थी । केंद्र में उस वक्त कांग्रेस की सरकार थी ।

कांग्रेस की तरह ‘वंशवाद’ वाली पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस दोनों से भाजपा भी गठजोड़ कर चुकी है । भाजपा शासनकाल(2004 और 2019) में जम्मू कश्मीर में वोटों का प्रतिशत कम रहा ।