2011 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव से पहले तक दीदी ने दार्जीलिंग से कोई नाता नहीं जोड़ा था । ठीक उसी तरह मौजूदा हिंसा को उन्होंने दो महीने तक नोटिस ही नहीं लिया । 15 जून से जीजेएम के नेतृत्व में गोरखालैंड राज्य आंदोलन चल रहा है, जिसमें दार्जीलिंग की कई पार्टियां शामिल हैं । इस आंदोलन की असली वजह है, दार्जीलिंग में नेपाली हटाकर बंगला अनिवार्य करने का फैसला, ताकि यह पूरी तरह बंगाल का हिस्सा बन जाए ।

दीदी जानती थी कि आंदोलन होगा और हिंसा भड़केगी । इसका निदान पहले से ही दीदी ने सोचा हुआ था । ज्योंही दीदी को हिंसक आंदोलन की तैयारी की गंध मिली, उन्होंने आठ जून को दार्जीलिंग स्थित राजभवन में मंत्रिमंडल की बैठक कर डाली । 44 वर्षों में पहली बार राज्य मंत्रिमंडल की बैठक दार्जीलिंग में हुई । जब हिंसक झड़पों में उफान आया, पुलिस पर हमले हुए, तब दीदी ने वार्ता के लिए आमंत्रण का पर्चा खोला ।

अब 12 सितंबर को वार्ता / सर्वदलीय बैठक होना तय है और जीजेएम नेता उस बैठक में चाहकर भी शामिल नहीं हो सकते । जीजेएम अध्यक्ष विमल गुरूंग फरार हैं । बंगाल पुलिस को शक है कि उन्हें सिक्किम पुलिस ने ‘संरक्षण’ दे रखा है । दार्जीलिंग के मुख्य मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट ने छह सितंबर को विमल गुरूंग, उनकी पत्नी आशा गुरूंग और छह अन्य गोरखा नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया । उन पर आठ जून को मंत्रिमंडल की बैठक के दौरान पुलिस टुकड़ी पर हमले और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप है । सितंबर के पहले सप्ताह में हिंसा और तोड़फोड़ के दौरान पुलिस पर हमले के जुर्म में दर्ज एफआईआर लिए दार्जीलिंग पुलिस पहले से विमल गुरूंग को पकड़ने के लिए ढूंढ़ रही है । फिर जीजेएम कार्यालय में बम बनाने का कारखाना मिला । विमल गुरूंग की गिरफ्तारी भी तय है और 12 सितंबर की वार्ता भी ।

सिक्किम सरकार अलग गोरखालैंड की समर्थक है । गोरखा आंदोलनकारियों के धर-पकड़ अभियान के कारण बंगाल और सिक्किम पुलिस की आपस में ही ठनी हुई है । दो सितम्बर को बंगाल पुलिस ने सिक्किम की सीमा में घुस कर उस जगह छापेमारी की, जहां विमल गुरूंग के जीजेएम केंद्रीय कमिटी बैठक में शामिल होने की खुफिया सूचना मिली थी । एक जीजेएम कार्यकर्ता के मारे जाने के विरोध में सिक्किम पुलिस ने बंगाल पुलिस के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया ।

दीदी द्वारा कोलकाता में 29 अगस्त को बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में विमल गुरूंग ने आंदोलन वापस लेने से इंकार कर दिया, दीदी ने गोरखालैंड पर वार्ता से इंकार कर दिया । उसके बाद से ही विमल गुरूंग फरार चल रहे हैं । दीदी को गोरखा भाइयों में वैसी एकजुटता नहीं चाहिए, जो हिंसा के लिए कायम की गयी हो । 29 जून को गोरखालैंड आंदोलन तेज करने के लिए सभी गोरखा गुटों को बुलाकर बनी गोरखालैंड आंदोलन समन्वय समिति में फूट पड़ चुकी है । आंदोलन जारी रखा जाय या नहीं, इस पर भी मतभेद हो चुका है। इसी क्रम मं चार सितम्बर को दार्जिलिंग की तृणमूल कांग्रेस यूनिट ने बंद के विरोध में शांति मार्च निकाला । उनके बैनर पर नेपाली भाषा में लिखा हुआ था - ‘हामी दार्जिलींगमा सान्ती’ । विदित हो कि मौजूदा आंदोलन दार्जिलिंग में बंगला थोपने के विरोध में शुरू हुआ है । दीदी को विमल गुरूंग के विरोधियों से यह भी सूचना मिली कि वर्तमान आंदोलन 90 दिनों तक लगातार खींचने की योजना है, ताकि केंद्र सरकार को हस्तक्षेप के लिए आमंत्रित किया जाय और केंद्रीय शासन के अन्तर्गत गोरखालैंड आंदोलन तेज किया जाय । 90 दिन पूरा होने से पहले ही दीदी ने दूसरी सर्वदलीय बैठक 12 सितम्बर को सिलीगुड़ी में ही आयोजित कर डाली । जीजेएम के शीर्ष नेताओं को पुलिस खोज रही है ।

देखना है कि कैसे वे बैठक में शामिल हो पाते हैं । दीदी ने साबित कर दिया कि गोरखालैंड में ऐसी तरकीब निकालने में उनका सानी नहीं, जो शांति के लिए संकट खड़ा करे और धन-जन का नुकसान हो ।

इस आंदोलन से दार्जीलिंग पहाड़ी में आयी गर्मी को दीदी ने गोरखालैंड पर वार्ता का कोई नतीजा निकलने से पहले ही ठंडा कर दिया । गोरखालैंड आंदोलन को लेकर दार्जीलिंग में चली स्थानीय दलों से लेकर सभी राष्ट्रीय दलों की क्षेत्रीय यूनिट को दीदी ने दाएं-बाएं कर दिया जा अपने-अपने राजनीतिक मतलब के हिसाब से आंदोलन का समर्थन/विरोध कर रहे थे । दीदी ने दोबारा अपनी कूटनीतिक और भावनात्मक दांव पेंच का परिचय देकर साबित कर दिया कि गोरखालैंड संकट का ‘हल’ निकालने की क्षमता सिर्फ उन्हीं के पास है । इसमें दार्जीलिंग और इससे सटे गोरखा बहुल आबादी वाले इलाकों को मिलाकर अलग गोरखालैंड राज्य बनाने की मांग तथा उसको लेकर आंदोलन दीदी के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है । दीदी सिर्फ दार्जीलिंग पहाड़ी और उससे सटे डूआर्स के मैदानी इलाकों में अलगाववादी हिंसा से उपजे संकट का निदान जानती हैं । दीदी के राजनीतिक विरोधियों को भी मानना पड़ेगा कि लगभग 40 वर्षों से हिंसा का पर्याय बने दार्जीलिंग जैसे पर्यटक स्थल में शांति स्थापित करने में वाममोर्चा सरकार को सफलता नहीं मिली । पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार 37 वर्ष चली । राज्य सरकार समेत केंद्र की किसी भी पार्टी या गठजोड़ सरकार की दार्जीलिंग में ऐसी कोई नीति नहीं चली जो स्थायी शांति में कामयाब हो ।

केंद्र में इस अवधि में सबसे ज्यादा समय तक कांग्रेस अकेले या गठजोड़ करके सत्ता में रही । पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार और केंद्र सरकारें मिलकर दार्जीलिंग में शांति बहाली तो नहीं कर पायी, उल्टे हिंसा की राजनीति में शामिल होकर दोनां पार्टियों ने अपनी राजनीतिक रोटी सेंकी ।

दीदी के मोर्चा संभालने से पहले तक सुभाष घीसिंग के नेतृत्ववाले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जीएनएलएफ) का पतन हो चुका था । दार्जीलिंग में 1980 के दशक में हिंसा और बम धमाके पर टिकी ब्लैकमेल राजनीति की नींव सुभाष घीसिंग ने रखी । जीएनएलएफ से ही निकलकर एक नया गुट गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) 2007 में अस्तित्व में आया, जिसके दो शीर्ष नेता उभरे - विमल गुरूंगा और रौशन गिरि । सुभाष घीसिंग के दाहिने हाथ माने जाने वाले इन दोनों नेताओं ने अपने किंगमेकर घीसिंग और उनकी हिंसा राजनीति को भी बैकफुट पर डाल दिया । जीजेएम ने गोरखालैंड राज्य गठन के लिए केंद्र व राज्य सरकार पर एक साथ वार्ता का दबाव बनाया और हिंसा की जगह धरना, प्रदर्शन, अनशन जैसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके अपनाए ।

2009 लोकसभा चुनाव तक दीदी की नजर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर तो थी, मगर दार्जीलिंग को वे राज्य का ऐसा हिस्सा नहीं मानती थी जहां के मतदाताओं को विश्वास में लेने के लिए सिलीगुड़ी को दौरा किया जाये । भाजपा, कांग्रेस, वाममोर्चा के नेताओं ने दार्जीलिंग में चुनावी रैलियां की । कांग्रेस और वाममोर्चा से गोरखा नेता पहले से ही खार खाए हुए थे । इसलिए जीजेएम ने दार्जीलिंग लोकसभा सीट से भाजपा के जसवंत सिंह को इस उम्मीद में जिताया कि वे अलग गोरखालैंड गठन का मामला संसद में जोरदार तरीके से उठाएंगे और उन्होंने उठाया भी ।

लेकिन 2009 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की भारी जीत से ही अंदाजा लग गया था कि दीदी 2011 विधानसभा चुनाव में वाममोर्चा का पटखनी देंगी ।

दीदी ने 2011 में दार्जीलिंग की सुधि ली । चुनाव अधिसूचना से पहले ही तीन दिनों तक सिलीगुड़ी में डेरा जमाकर विमल गुरूंगा, रौशन गिरि, हरका बहादुर छेत्री जैसे शीर्ष नेताओं को ‘भाई’ बनाकर भरोसे में लिया ।

मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद दीदी ने जुलाई, 2011 में ऐसा क्षेत्रीय प्रशासन गठित किया, जिसमें सिर्फ नाम के लिए गोरखालैंड हो । गोरखा नेताओं के हस्ताक्षर हो जाने के बाद दीदी इस इंतजाम में जुट गयीं कि दार्जीलिंग में दोबारा हिंसा की नौबत न आए । इसके लिए सिलीगुड़ी में दीदी ने अपना मिनी सचिवालय बनाया और गोरखालैंड को डंप करते हुए दार्जीलिंग में शांति कायम रखी, जो उसके पहले नहीं आ पायी थी ।

2014 लोकसभा चुनाव तक जीजेएम नेताओं का मोहभंग हो चुका था, इसलिए दार्जीलिंग से उनलोगों ने भाजपा के ही एस. एस. अहलूवालिया को जिताया । केंद्रीय मंत्री बनने के बावजूद अहलूवालिया ने अपनी सरकार को यह नहीं बताया कि उन्हें जीत किस आधार पर मिली है । इस आलोक में ताजा घटनाक्रम देखिए । दार्जिलिंग की राजनीतिक ‘प्राप्ति’ भी छिन्न-भिन्न है । लोकसभा सीट भाजपा ने जीती हुई है । दार्जिलिंग की विधान सभा सीटें तृणमूल और जीजेएम में बंटी हुई है। सिलीगुड़ी के मेयर मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के हैं ।