अलग गोरखालैंड राज्य आंदोलन चलानेवाले दार्जीलिंग के सबसे बड़े गुट गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) की बदौलत दार्जीलिंग लोकसभा सीट से जीते भाजपा के राजू बिस्टा अब इस मांग को डंप करने में जुट गए हैं । 2024 लोकसभा जैसे-जैसे करीब आता जा रहा है, वैसे-वैसे राजू बिस्टा का सुर बदलता जा रहा है । हालिया चुनावी दौरे के क्रम में एमपी राजू बिस्टा ने दार्जीलिंग में जगह-जगह पहाड़ी गोरखों और डूआर्स के लोगों की समस्या का स्थायी राजनीतिक समाधान निकालने तथा उन्हें ‘न्याय’ दिलाने के प्रति अपनी ‘प्रतिबद्धता’ दुहरायी । लेकिन उन्होंने एक बार भी ‘गोरखालैंड’ का नाम नहीं लिया और यह भी स्पष्ट नहीं किया कि यह प्रतिबद्धता राजू बिस्टा की अपनी है या उनकी पार्टी की । दार्जीलिंग गोरखा पहाड़ी के मतदाताओं की एकमात्र मांग है. ‘अलग गोरखालैंड राज्य’ । इसी के लिए चार दशकों से आंदोलन चल रहा है । इस मांग का समर्थन करने और गोरखों की आवाज संसद में उठाने के वायदे पर दार्जीलिंग से जीतनेवाले भाजपा के तीसरे एमपी हैं राजू बिस्टा । 2009 से लगातार भाजपा दार्जीलिंग लोकसभा सीट जीत रही है ।
अभी 18 से 22 सितंबर तक चले संसद के विशेष सत्र से तीन दिन पहले राजू बिस्टा दार्जीलिंग में घूम रहे थे । इसके बाद संसद का सिर्फ दो सत्र होगा, जो पूरी तरह 2024 आम चुनाव पर केंद्रित होगा । राजू बिस्टा ने स्पष्ट संदेश दे दिया कि उनके लिए और भाजपा के लिए अलग गोरखालैंड कोई मुद्दा नहीं है । गोरखों के लिए दार्जीलिंग पहाड़ी की समस्या का गोरखालैंड राज्य गठन की एकमात्र स्थायी राजनीतिक समाधान है ।
2019 में चुनाव जीतने के लिए राजू बिस्टा अपने वायदे में यहां तक बोल गए हैं कि अगर केंद्र सरकार दार्जीलिंग पहाड़ी और डूआर्स के लोगों को ‘न्याय’ दिलाने में विफल रही तो वे राजनीति छोड़ देंगे । नरेंद्र मोदी सरकार का दूसरा कार्यकाल समाप्त होने का समय करीब आने पर राजू बिस्टा के बदले सुर से मतदाता दिग्भ्रमित हैं । अब राजू बिस्टा उन ‘न्याय’ की बात नहीं कर रहे हैं, जो गोरखालैंड राज्य गठन प्रक्रिया से मिलना है ।
सारे गोरखा गुट राज्य आंदोलन से ही निकले हैं और आपसी फूट के कारण बिखरे हुए हैं । इसमें केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार की एक समान भूमिका है । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) शुरू से ही भावनात्मक कार्ड खेल रही है । तृणमूल कांग्रेस 2011 से लगातार सत्ता में है और इसकी प्रमुख दीदी हमेशा से कहती रही है कि ‘दार्जीलिंग के गोरखे मेरे भाई हैं, कोई बहन यह कैसे चाहेगी कि भाई उससे अलग हो जाए ।’ सत्ता में आने से पहले भी दीदी के लिए दार्जीलिंग का राजनीतिक संकट और गोरखालैंड कोई मुद्दा नहीं था । दार्जीलिंग में आंदोलनकारी गोरखा गुटों में यहां के मतदाताओं पर सबसे प्रभावशाली पकड़वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) ने उसके बाद भाजपा की ओर रुख किया । भाजपा भी इस मौके की तलाश में थी । 2009 लोकसभा चुनाव के समय भाजपा को पश्चिम बंगाल की सत्ता जोड़ी वाममोर्चा सरकार और विपक्षी कांग्रेस के गढ़ में सेंध लगानी थी । जीजेएम को अपनी हैसियत का सबूत देना था । क्योंकि 2 साल पहले 2007 में ही बिमल गुरूंगा और रोशन गिरि ने अपने नेता सुभाष घीसिंग के गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) से अलग होकर जीजेएम नामक नया गुट बनाया था । गोरखालैंड आंदोलन के संस्थापक सुभाष घीसिंग ने पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा शासनकाल के 37 वर्षों तक दार्जीलिंग में लगभग समानान्तर सरकार चलायी । भूमिगत रहकर सिर्फ हिंसा की बदौलत गोरखालैंड आंदोलन चलानेवाले सुभाष घीसिंग का वह दबदबा था कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को कानून व व्यवस्था सुभाष घीसिंग की शर्तों पर कायम रखनी पड़ती थी । कांग्रेस और वाममोर्चा दोनों को 2009 से पहले तक दार्जीलिंग की एक लोक सभा सीट और तीन विधान सभा सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए सुभाष घीसिंग की मदद लेनी पड़ती थी । उस समय तक दार्जीलिंग पहाड़ी की राजनीतिक हवा को हमेशा गर्म रखनेवाला एकमात्र शक्तिशाली गुट था. जीएनएलएफ । घीसिंग के दाहिने हाथ बिमल गुरूंगा और रोशन गिरी ने घीसिंग की दबंगता का विकल्प तैयार करने के लिए अलग मोर्चा जीजेएम बनाया । सुभाष घीसिंग को चुनाव पर विश्वास नहीं था । वे सिर्फ हिंसा की बदौलत अपनी बात सरकार से मनवाने की निजी स्वार्थ की राजनीति करते थे । दार्जीलिंग के मतदाता भी सुभाष घीसिंग से आतंकित रहते थे । इससे सुभाष घीसिंग तो दबंग बने रहे, मगर गोरखालैंड आंदोलन कमजोर पड़ता गया । घीसिंग के दबाव में दार्जीलिंग गोरखा पहाड़ी स्वायत्त परिषद का गठन तो हुआ और चुनाव भी हुआ । एक बार चुनाव में जीतने के बाद घीसिंग दोबारा चुनाव नहीं होने दिया । कई वर्षों तक बिना चुनाव के ही दार्जीलिंग गोरखा पहाड़ी स्वायत्त परिषद(डी जी एच ए सी) पर कब्जा जमाए उसके विकास फंड के राज्य और केंद्र सरकारों से मिलने वाले 100 करोड़ से ज्यादा पैसे अपने ऐशो-आराम तथा हिंसा के इंतजाम पुख्ता रखने पर खर्च करते रहे । जीजेएम ने आंदोलन का तौर-तरीका बदल दिया । बिमल गुरूंगा ने हिंसा नहीं छोड़ी, लेकिन साथ-साथ राजनीतिक हथकंडे भी अपनाए । जीजेएम ने गोरखालैंड झंडा को ऊपर रखकर उसके बैनर तले दार्जीलिंग से दिल्ली तक बंद, धरना, प्रदर्शन, अनशन इन सारे राजनीतिक तरीके का सहारा लेकर अपनी नींव मजबूत की । इसका लाभ भाजपा ने उठाया और 2009 लोकसभा चुनाव में दार्जीलिंग से जसवंत सिंह जीजेएम के समर्थन से जीते । वाममोर्चा और कांग्रेस ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को कभी तरजीह नहीं दी । तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो दीदी(ममता बनर्जी) अपने तीसरे कार्यकाल तक 13 वर्षों में गोरखालैंड आंदोलन को डंप कर चुकी हैं । भाजपा की नीतियां गोरखालैंड के मामले में सिर्फ इसकी चुनावी लाभ उठाने तक सीमित है । केंद्र में भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ सरकार का दूसरा कार्यकाल कुछ महीनों में समाप्त होनेवाला है । जसवंत सिंह जब 2009 में दार्जीलिंग से जीते उस समय केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी और पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा की । राज्य में भाजपा का कोई अस्तित्व नहीं था । 2014 में केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार बनने तक जसवंत सिंह ने गोरखालैंड का मुद्दा नाम लेकर उठाया । उसके बाद से ‘गोरखालैंड’ दार्जीलिंग में सिर्फ गोरखा नेताओं के मुंह से ही सुनने को मिलता है । अभी 2024 लोकसभा चुनाव करीब है और भाजपा तीसरा कार्यकाल शुरू करने की तैयारी में जुटी अभी 2024 लोकसभा चुनाव करीब है और भाजपा तीसरा कार्यकाल शुरू करने की तैयारी में जुटी है । ऐसे समय में चुनावी दौरे के क्रम में दार्जीलिंग के एमपी राजू बिस्टा के गोरखालैंड को डंप करनेवाले बयानों से सारे गोरखा गुटों को धक्का लगा है । पहाड़ी इलाकों में मतदाता जगह-जगह चाय, मोमो के
स्टालों पर यह कहते पाए गए कि राजू बिस्टा का यू-टर्न गोरखालैंड का वायदा पूरा करने में भाजपा की विफलता का परिचायक है । हताशा की स्थिति में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने संसद के विशेष सत्र को ध्यान में रखकर 20 और 21 सितंबर को दिल्ली में गोरखालैंड मांग को लेकर धरना का कार्यक्रम बना लिया ।
राजू बिस्टा को भाजपा की नीतियों पर चलना है । इसलिए वे लोकसभा में गोरखालैंड मांग के समर्थन में कुछ बोल नहीं सकते । गत सप्ताह दार्जीलिंग में गोरखों को ‘न्याय’ दिलाने का उनका वायदा वही है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह 2021 विधान सभा चुनाव रैलियों में कर चुके हैं ।
अभी भाजपा पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल है और तृणमूल कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा मजबूत पार्टी है । दोनों दलों की राजनीति में इस विंदु पर समानता है कि गोरखा गुटों को एकजुट न होने दिया जाए ।
राजू बिस्टा 15 अक्टूबर को जब दार्जीलिंग में थे, उस दिन दीदी स्पेन में थी । पूछे जाने पर उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया । वही नीति भाजपा की नीति है और वही कांग्रेस तथा वाममोर्चा की भी रही है ।
दीदी के सत्ता में आने के बाद जीजेएम, केंद्र और राज्य सरकार के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के अंतर्गत गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन(जीटीए) का गठन हुआ । ‘गोरखालैंड’ नाम जुड़ जाने से जीजेएम नेता विमल गुरूंगा ने इसे गोरखालैंड राज्य गठन की दिशा में एक कदम आगे बताया । लेकिन अब कई कदम पीछे हटने की नौबत है । बिमल गुरूंगा के खिलाफ हिंसा के इतने मामले दर्ज हैं कि वे सार्वजनिक रूप से अपने समर्थकों के बीच कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है । दीदी राज्य में बिमल गुरूंगा ने लंबे समय तक दार्जीलिंग बंद आयोजित करके हिंसा का इतिहास दुहराया । उसका जवाब दीदी ने हिंसा और पुलिस चौकसी अभियान साथ चलाकर दिया । बिमल गुरूंगा को पुलिस से बचने के लिए सिक्किम के मुख्यमंत्री गोरखालैंड समर्थक पवन कुमार चामलिंग की पनाह लेनी पड़ी । आज जीजेएम समेत सारे गोरखा गुट के जनाधार में तृणमूल कांग्रेस गहराई तक प्रवेश कर चुकी है । बंद पर भी गुटीय राजनीति हावी है ।
जीजेएम के गढ़ सिलिगुड़ी के मेयर गौतम देव तृणमूल कांग्रेस के हैं । जीजेएम का बिमल गुरूंगा विरोधी गुट दीदी के साथ है । एक गोरखा पहाड़ी लड़की के साथ रेप और हत्या के प्रयास के विरोध में 26 अगस्त, 2023 को आयोजित 24 घंटे के दार्जीलिंग, कलिम्पोंग, कुर्सीओंग बंद में भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद शामिल थी । राजू बिस्टा ने सीबीआई जांच की मांग की । सिलिगुड़ी के मेयर बंद के खिलाफ थे । 2019 में भाजपा ने जीएनएलएफ को फोड़कर उसके नेता नीरज जिम्बा को अपना उम्मीदवार बनाया और राजू बिस्टा उनके लिए चुनाव प्रचार करने पहुंचे । 170502019 को दार्जीलिंग विधान सभा उपचुनाव के दौरान राजू बिस्टा ने ‘गोरखालैंड’ का नाम लिया और फिर 25.02.2022 को दार्जीलिंग नगरपालिका चुनाव प्रचार में ‘न्याय’ की बात करने लगे. ‘दार्जीलिंग, तराई, डूआर्स के लोगों को अगर मैं 2024 तक ‘न्याय’ नहीं दिला पाया तो राजनीति छोड़ दूंगा और भविष्य में कोई चुनाव नहीं लडूंगा ।’
जीजेएम ने अलग कामतापुर और अलग राजवोंग्शी राज्य की मांग करनेवाले तराई, डूआर्स, कूचबेहार में पसरे आंदोलनकारियों से अपने 20.21 सितंबर दिल्ली धरने में साथ देने की अपील की ।
इन संगठनों ने नोटिस नहीं लिया । संसद में सर्वसम्मति से पारित महिला आरक्षण बिल चर्चा के आगे गोरखालैंड की आवाज सुनने की फिक्र कौन करता ।