दार्जीलिंग पहाड़ी और उसके आसपास के जनजातीय इलाके में अशांति का कारण गोरखालैंड राज्य आंदोलन एक बार फिर उसी हालत में पहुंच गया है, जब सुभाष सिंह के पतन के समय बिमल गुरूंगा ने इसमें नयी जान फूंकी । सुभाष घीसिंग ने 1980 के दशक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जीएनएलएफ) के जरिए हिंसक आंदोलन की नींव रखी । इसके लिए उन्होंने शांति स्थापित करने वाली फौजी जवान की और फिर स्कूली शिक्षक की नौकरी छोड़ी ।
सुभाष घीसिंग के 27 वर्षों के आतंकवादज को उन्हीं के दाहिने हाथ बिमल गुरूंगा और रौशन गिरि ने चुनौती दी । 2007 में सुभाष घीसिंग को ‘अपदस्थ’ करके बिमल गुरूंगा और रौशन गिरि ने नया संगठन गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) बनाकर खुद को दार्जीलिंग पहाड़ी का भाग्य विधाता घोषित कर दिया ।
बिमल गुरूंगा ने सिर्फ हिंसा को हथियार बनाकर दार्जिलिंग में भय और आतंक की ब्लैकमेल राजनीति वाला सुभाष घीसिंग का तरीका बदल दिया । जीजेएम को बिमल गुरूंगा ने एक राजनीतिक मंच का रूप देकर दार्जीलिंग को ‘गोरखालैंड’ के नाम से अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए धरना, प्रदर्शन, अनशन वाली अहिंसक नीति अपनायी ।
दार्जीलिंग का कद तो बढ़ा । जीजेएम के आंदोलन के ही चलते दार्जीलिंग पर पश्चिम बंगाल सरकार, केंद्र सरकार और जीजेएम के बीच 18 जुलाई, 2011 को त्रिपक्षीय समझौता हुआ । उस समझौते के तहत गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन(जीटीए) का गठन हुआ । उसका चुनाव जीतकर बिमल गुरूंगा जीटीए अध्यक्ष बने । उन्होंने सिर्फ ‘गोरखालैंड’ नाम देकर जीटीए को मंजिल नहीं माना और राज्य का दर्जा पाने के लिए आंदोलन जारी रखा । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) स्पष्ट रूप से कहती रही कि गोरखालैंड पश्चिम बंगाल का हिस्सा है और बना रहेगा । दीदी आज भी इस बात पर कायम हैं कि अलग राज्य का सवाल ही नहीं उठता । बिमल गुरूंगा के नेतृत्व में जीजेएम नेताओं ने दिल्ली तक दौड़ जारी रखी और अपने गोरखा भाइयों को ‘आश्वस्त’ करते रहे कि जीटीए अलग राज्य की पहली सीढ़ी है । बिमल गुरूंगा को चुनौती देनेवाला पूरे दार्जीलिंग में दूसरा कोई गोरखा नेता नहीं था ।
दस साल बाद 2017 में बिमल गुरूंगा की सुभाष घीसिंग जैसी उल्टी गिनती शुरू हो गयी । आज बिमल गुरूंगा पहली सीढ़ी के निचले पायदान पर भी खड़े होने की स्थिति में नहीं हैं । जीटीए अध्यक्ष पद पर बिमल गुरूंगा के साथी विनय तमांग विराजमान हैं । बिमल गुरूंगा के खिलाफ 104 दिनों के दार्जीलिंग बंद के दौरान हिंसा के मामले दर्ज हैं । बिमल गुरूंगा, उनकी पत्नी आशा गुरूंगा समेत कई जीजेएम आंदोलनकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट लिए पुलिस उन्हें खोज रही थी । बिमल गुरूंगा फरार और लापता हैं । बिमल गुरूंगा के नेतृत्व में 15 जून 2017 से सितम्बर के पहले अंतिम सप्ताह तक चले राज्य आंदोलन के दौरान ही जीजेएम के अंदर फूट पड़ गयी । मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिमल गुरूंगा का साथ छोड़नेवाले नेताओं का स्वागत किया । बिमल गुरूंगा ने जीटीए अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया । दीदी ने बिमल गुरूंगा के सहयोगी विनय तमांग को अध्यक्ष बना दिया ।
विनय तमांग दार्जीलिंग में 19 नवंबर को विशाल जनसभा की तैयारी में जुटे हैं, जिसमें उन्हें साबित करना है कि वे ही जीजेएम के असली और सबसे ज्यादा समर्थन वाले नेता हैं । 21 नवंबर को मुख्यमंत्री सिलीगुड़ी जा रही हैं । दीदी को दार्जीलिंग बंद समाप्त होने के डेढ़ महीने बाद की स्थिति का जायजा लेना है और जीटीए (गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन) के प्रशासक बोर्ड के साथ विकास के मुद्दे पर बैठक करनी है। उत्तर बंगाल विकास मंत्रालय के मंत्री रवीन्द्रनाथ घोष ने 22 जनवरी से होने वाले उत्तर बंग उत्सव की भी तैयारी शुरू कर दी है । दार्जीलिंग को पूरी तरह बंगालमय बनाने के लिए इस गोरखा पहाड़ी जिले में उत्तर बंग उत्सव का आयोजन दीदी ने मुख्यमंत्री बनने के कुछ दिन बाद ही शुरू कर दिया था । दार्जीलिंग की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए दीदी ने सिलीगुड़ी में अपना मिनी मुख्यमंत्री सचिवालय बनाया ।
दीदी ऐसे समय में दार्जीलिंग की स्थिति का जायजा लेने और गोरखा नेताओं से द्विपक्षीय वार्ता करने जा रही हैं जब गोरखालैंड कहीं पिक्चर में है ही नहीं । आंदोलन तहस-नहस हो चुका है और आंदोलन में शामिल बिखरे नेता अपना वजूद तलाशने के लिए बगलें झांक रहे हैं ।
केंद्र और राज्य सरकार के बीच दार्जीलिंग से जुड़े सभी मुद्दों पर मतभेद है । लोकसभा सीट जीतने के लिए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का समर्थन लेने को छोड़ अन्य किसी मामले में केंद्र की भाजपा सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं है ।
दशहरा और दिवाली को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 26 सितंबर को जीजेएम नेता बिमल गुरूंग से हड़ताल वापस लेने की अपील की । साथ में यह संदेश भी भिजवाया कि केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौवा से एक पखवाड़े के अंदर आधिकारिक स्तर की वार्ता आयोजित करने कहा गया है, जिसमें राज्य सरकार भी शामिल हो । उस वक्त भी बिमल गुरूंग पुलिस से छिपकर रह रहे थे । क्योंकि उनके खिलाफ आठ जून को दार्जीलिंग स्थित राजभवन में आयोजित राज्य मंत्रिमंडल की बैठक के दौरानन पुलिस टुकड़ी पर हमले और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला दर्ज है । उसमें उनकी पत्नी आशा गुरूंग भी अभियुक्त हैं ।
कई पखवाड बीत गए । वार्ता का कोई सुराग नहीं मिल रहा है। वार्ता की कोई पहल होती तभी तो पता चलता कि राज्य सरकार शामिल होगी या नहीं अथवा गोरखालैंड पर कोई चर्चा होनी है या नहीं । बिमल गुरूंगा की उसके पहले 29 अगस्त की दीदी से वार्ता विफल हो गयी, क्योंकि उन्होंने गोरखालैंड पर आश्वासन के बगैर हड़ताल वापस लेने से इंकार कर दिया । उसके बाद से ही गोरखा गुटों और नेताओं में बिखराव शुरू हो गया । दार्जिलिंग से करीब 27 कि.मी. हटकर छोटा रंजीत नदी के पास पुलिस टुकड़ी पर हमले में एक सब इंस्पेक्टर अमिताभ मल्लिक के मारे जाने और चार पुलिसकर्मियों के घायल होने के बाद बिमल गुरूंगा के खिलाफ राज्य सरकार का रवैया कड़ा हो गया । पुलिस के डायरी में बिमल गुरूंगा समर्थक जीजेएम गोरखों के खिलाफ कातिलाना हमले का मामला दर्ज हुआ । बिमल गुरूंगा के वहां छिपे होने की गुप्त सूचना पाकर पुलिस वहां छापा मारने गयी थी ।
12 सितंबर को दीदी ने जो द्विपक्षीय वार्ता आयोजित की, उसमें मात्र तीन गुट शामिल हुए । जबकि 15 जून को बंद का एलान करने के बाद 29 जून को 13 गुटों को मिलाकर गोरखालैंड आंदोलन समन्वय समिति (जीएमसीसी) बनी थी । वार्ता में बिमल गुरूंग चाहकर भी शामिल नहीं हो सकते थे । क्योंकि पहले ही पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर लेती और दूसरे उस बैठक में गोरखालैंड एजेंडा नहीं था ।
जीएमसीसी में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जीएनएलएफ) बिमल गुरूंगा के जीजेएम के बाद दूसरा सबसे बड़ा गुट था ।
सुभाष घीसिंग को सीन से जबरन उस समय हटाया गया, जब वे राज्य का दर्जा छोड़कर संविधान की छठी अनुसूची वाली स्वायत्तता के लिए राजी हो गए । बिमल गुरूंग ने नया गुट बनाया, लेकिन जीएनएलएफ का अस्तित्व बरकरार रहा । अभी जीएनएलएफ अध्यक्ष मान घीसिंग ने राज्य सरकार को छठी अनुसूची वाली व्यवस्था पर त्रिपक्षीय वार्ता आयोजित करने का आग्रह किया है । 21 नवंबर को सिलीगुड़ी के पिनटेल गांव में तय बैठक में दीदी को यह प्रस्ताव देने का फैसला जीएनएलएफ ने किया है और इसके लिए मान घीसिंग ने खुद को जीएमजीसी से अलग कर लिया है । बिमल गुरूंग अपने अज्ञात स्थान से साथियों को संदेश भेज रहे हैं कि जल्द ही केंद्र सरकार गोरखालैंड पर अपने सार्थक रुख का एलान करेगी । भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष विश्वप्रिय रॉय चौधुरी ने कहा है कि अभी तो सबको गुजराज चुनाव के परिणाम का इंतजार है । केंद्र तभी त्रिपक्षीय वार्ता बुला सकती है, जब राज्य सराकर वैसा प्रस्ताव भेजे । जीएनएलएफ ने यह कहकर छठी अनुसूची पर वार्ता के लिए केंद्र को बुलाने का आग्रह राज्य सरकार से किया है कि गोरखालैंड को राज्य का दर्जा देने की मांग पूरी होने की अब उम्मीद नहीं लगती । ममता बनर्जी की पाटी तृणमूल कांग्रेस की पहाड़ी यूनिट के प्रवक्ता बिन्नी शर्मा इसे दीदी की ‘उपलब्धि’
बता रहे हैं । किस त्रिपक्षीय वार्ता में कौन शामिल होंगे, यह भी गोलमटोल है । बिमल गुरूंग का जीजेएम से अपदस्थ करने पर तुले विनय तमांग और अनित थापा गोरखालैंड आंदोलन को ठंढे बस्ते में नहीं डाल सकते, क्योंकि उसी पर संगठन का अस्तित्व टिका है । वे इतना जोरदार आंदोलन भी नहीं चला सकते कि दीदी गरम हो जाएं । विनय तमांग ने छठी अनुसूची प्रस्ताव से अपने को अलग रखा हुआ है और दीदी गोरखालैंड पर बात करेंगी नहीं । एक और गोरखा संगठन ऑल इंडिया गोरखा लीग(एआईजीएल) नेता सुदर्शन राय है और मान घीसिंग पर सिर्फ कुर्सी की राजनीति करने का आरोप लगाया है ।
एआईजीएल के तगड़े नेता थे मदन तमांग, जिन्हें सुभाष घीसिंग ने उभरने नहीं दिया और 21 मई, 2010 का बिमल गुरूंगा ने कथित रूप से दार्जीलिंग के मुख्य चौराहे पर उनकी दिनदहाड़े छूरा घोंपकर हत्या करवा दी । मदन तमांग की पत्नी भारती तमांग न्याय की गुहार लगाती रह गयीं । 2011 में विधान सभा चुनाव में बिमल गुरूंगा से तालमेल के बाद दीदी ने बिमल गुरूंगा के खिलाफ हत्या का मुकदमा वापस ले लिया ।
लेकिन अभी दीदी के ही इशारे पर सीआईडी ने बिमल गुरूंग और उनके साथियों पर नेपाल के माओवादियों से और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड के केंद्र से वार्ता विरोधी खपलांग गुट से हथियार और प्रशिक्षण लेने का मामला तैयार किया है ।
सबसे बड़ा झमेला तो केंद्र और राज्य सरकार के बीच गोरखालैंड से जुड़े कानून और व्यवस्था को लेकर है । बिमल गुरूंग ने आंदोलन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नहीं छोड़ा और सुभाष घीसिंग ने कभी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नहीं अपनाया । सुभाष घीसिंग के जमाने में कानून और व्यवस्था की बागडोर उन्हीं के हाथ में रहती थी । उन्होंने इस कबीलाई राज का विरोध करनेवाले जांबाज साथी दीपक गुरूंग की 2006 में हत्या करवा दी । उसी समय बिमल गुरूंग ने अलग मोर्चा खोला ।
बंद के दौरान केंद्र सरकार ने कानून व व्यवस्था में मदद के लिए अर्द्धसैनिक बलों की 15 कंपनियां तैनात की । बंद समर्थकों ने उन जवानों पर कोई हमला नहीं किया । जवानों ने भी बिमल गुरूंगा की तलाशी में स्थानीय पुलिस का साथ नहीं दिया । बंद वापस होने के बाद जीजेएम ने केंद्र को अर्द्धसैनिक बल हटा लेने के लिए लिखा । राज्य सरकार इन बलों को तैनात रखना चाहती थी । केंद्र और राज्य में ठन गयी । राज्य सरकार कलकता हाईकोर्ट गयी । हाईकोर्ट न अद्धसैनिक बलों की वापसी पर रोक लगा दी । केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट गयी । सुप्रीम कोर्ट ने रोक आदेश को स्टे करके केंद्र सरकार को अर्द्धसैनिक बलों की 15 में से सात कंपनियों की वापसी की इजाजत 26 अक्टूबर को दे दी । इसका सिर्फ भाजपा ने स्वागत किया । पश्चिम बंगाल के सभी दल ममता बनर्जी सरकार की ओर से केंद्र को लिखे गए इस पत्र से सहमत थे कि 25 दिसंबर तक केंद्रीय बल रहने दिया जाए ।
13 अक्टूबर को दार्जीलिंग पुलिस का एक सब-इंस्पेक्टर कथित जीजेएम हमले में मारा गया और चार पुलिसकर्मी घायल हुए । 15 अक्टूबर को केंद्र ने 10 कंपनी वापस बुलाने का फैसला लिया । 14 अक्टूबर को जीजेएम नेता लोपसांग लामा ने केंद्रीय गृहमंत्री को इसके लिए लिखा था । यह पेंच उलझन में डालनेवाला है । 15 अक्टूबर को ही दीदी ने नबन्ना(कालकाता) में वार्ता की, जिसमें विनय तमांग के अलावे पुराने बिमल गुरूंगा विरोधी और दीदी समर्थक हरका बहादुर छेत्री शामिल हुए । उन्होंने जीजेएम से अलग होकर जन आंदोलन पार्टी बनायी हुई है । दीदी ने बैठक में मुख्य रूप से अर्द्धसैनिक बल बरकरार रखने पर बल दिया ।
एक और संगठन गोरखा राष्ट्रीय कांग्रेस नेता अमर कुमार लेपचा ने गोरखालैंड राज्य बनाने की नाउम्मीदी जताकर दार्जीलिंग का सिक्किम में विलय की मांग उठायी है । लेपचा के अनुसार उन्होंने गत हफ्ते राजनाथ सिंह और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को इस संबंध में ज्ञापन सौंपा है । सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग पुराने गोरखालैंड समर्थक हैं ।