दार्जीलिंग पहाड़ी और उससे सटे गोरखा आबादी वाले डूआर्स के मैदानी इलाकों में अलग गोरखालैंड राज्य आंदोलन को लेकर अनिश्चितकालीन बंद अपने उफान पर है । आंदोलन का संचालन करनेवाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा प्रमुख बिमल गुरूंगा केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार को बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि गोरखालैंड राज्य गठन पर ठोस आश्वासन के बगैर आंदोलन नहीं थमेगा । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) से उनका मोहभंग हो चुका है । राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही हालात बेकाबू होने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रही है । दोनों ही सरकारें आंदोलन पर काबू पाने के लिए गरम और नरम दोनों रवैया अपना रही हैं, मगर गोरखा नेताओं से वार्ता करने को तैयार नहीं हैं ।

तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का साम-दाम काम नहीं कर रहा है । दंड वाली नीति अपनाने से दीदी डर रही हैं, भेदवाली कार्रवाई से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। दीदी ने गोरखा नेताओं के समर्थन से 2011 और 2016 दोनों ही विधान सभा चुनावों में दार्जीलिंग और आसपास के इलाकों में कुछ सीटें जीती हैं । भाजपा ने गोरखालैंड गठन के वायदे पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) की बदौलत 2009 और 2014 आम चुनाव में दार्जीलिंग लोकसभा सीट जीती है । दोनों ही पार्टियां असमंजस में हैं । इसमें भाजपा सीधे तौर पर जीजेएम के निशाने पर है । क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान गोरखालैंड का वायदा कर आए । उसी उम्मीद में जीजेएम नेताओं ने एस. एस. अहलूवालिया को जिताया । उसके पहले दार्जीलिंग में उन्होंने कभी कदम नहीं रखा, दार्जीलिंग की गोरखा जनता भी अहलूवालिया का नाम नहीं जानती थी । अहलूवालिया ने और उनकी पार्टी ने साबित कर दिया कि उन्हें फौरी वायदा करके सिर्फ चुनाव जीतने से मतलब था ।

15 जून से अहलूवालिया के क्षेत्र में जन-जीवन अस्त-व्यस्त है, सारे सामान्य कामकाज ठप्प हैं । सारे लोग सड़कों पर उतरे हुए हैं । हिंसा रूकने का नाम नहीं ले रहो है । संसद का मानसून सत्र चल रहा है । अहलूवालिया अपने क्षेत्र के मतदाताओं का हाल-चाल भी लेने नहीं गए । दार्जीलिंग एमपी ने लोकसभा में मामला तक नहीं उठाया । उनके मतदाता पुलिस हिंसा के शिकार हुए । दार्जीलिंग के मतदाता चुनावी वायदे की याद दिला रहे हैं । अहलूवालिया ने प्रधानमंत्री का ध्यान इस ओर आकृष्ट नहीं किया । गृहमंत्री राजनाथ सिंह से भी आग्रह नहीं किया कि गोरखा नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया जाए । जीजेएम अध्यक्ष बिमल गुरूंग ने वार्ता के लिए आठ अगस्त का अल्टीमेटम दिया है और धमकी दी है कि उस समय तक बात नहीं हुई तो आंदोलन तेज किया जाएगा ।

गोरखालैंड आंदोलन समन्वय समिति और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट का 13-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में है । ये नेता इस बात पर अड़े हैं कि गोरखालैंड को छोड़ अन्य किसी एजेंडे पर बात नहीं होगी । गृहमंत्री से गोरखा नेताओं की मुलाकात हो, इसमें भी दार्जीलिंग एमपी ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी ।

28 जुलाई को जीजेएम नेताओं ने केंद्र सरकार को अल्टीमेटम भेजा और दिल्ली कूच करने के लिए प्रतिनिधिमंडल तैयार किया । उसी समय दीदी ने भी सिलीगुड़ी का प्रोग्राम बना लिया । उस समय तक अनशन पर बैठे आंदोलनकारियों में से कइयों की हालत खराब हो चुकी थी । दीदी के सिलीगुड़ी पहुंचने से पहले दार्जीलिंग जिला प्रशासन की ओर से दार्जीलिंग पहाड़ी के 80 प्रतिशत कर्मचारियों के जुलाई का वेतन काटने का आदेश जारी किया जा चुका था । लगभग सारे कर्मचारी अनिश्चितकालीन बंद, हड़ताल में शामिल हैं और 15 जून से कोई कार्यालय नहीं जा रहे हैं । मुख्यमंत्री वैसे समय में सिलीगुड़ी गयीं जब गोरखालैंड आंदोलन डूआर्स के मैदानी इलाकों में भी जोर पकड़ चुका है । दीदी मुख्यरूप से प्रशासनिक बैठक करने गयी । गोरखा नेताओं का बैंक खाता पहले ही सील किया जा चुका है । दीदी से न तो गोरखा नेता बात करना चाहते हैं, न ही दीदी गोरखा नेताओं से बात करना चाहती हैं । वे अभी भी इस बात पर कायम हैं कि बंगाल का विभाजन नहीं होने दिया जाएगा । दीदी की नजर राज्य में भाजपा की राजनीतिक गतिविधियों पर है और भाजपा नेता भी दीदी के खिलाफ मोर्चाबंदी में जुटे हैं । दीदी ने उत्तरी दिनाजपुर जिले में उस जगह प्रशासनिक बैठक की, जहां भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अपनी पार्टी के चोप्रा प्रखंड सचिव हरेन सिंघा के मारे जाने के कारण गए । इन भाजपा नेताओं ने भी स्वयं को गोरखालैंड से इस तरह अलग रखा हुआ है, मानो वहां कुछ हो ही नहीं रहा हो । जीजेएम के समर्थन से मैदानी इलाके की मदारीहाट विधानसभा सीट से जीते मनोज टिग्गा ने आरोप लगाया कि जीजेएम डूआर्स में दार्जीलिंग की तरह झड़पें उकसा रहे हैं । भाजपा के प्रदेश महासचिव संयतन बसु दार्जीलिंग में अशांति और उपद्रव के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं ।

तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों की ही सफाई पल्ला झाड़नेवाली है । दोनों पार्टियां मतलब की राजनीति को ध्यान में रखकर कानून और व्यवस्था सिर्फ सुरक्षा बलों के जिम्मे छोड़कर बातचीत टालना चाहती हैं । इससे दार्जीलिंग का संकट बढ़ता जा रहा है । सेना भेजी गयी तो भाजपा से ज्यादा दीदी डर गयीं और हटा देने का केंद्र से आग्रह किया । केंद्र ने माना, क्योंकि भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि दो साल बाद होनेवाले लोकसभा चुनाव में दार्जीलिंग सीट उसके हाथ से निकले । जीजेएम विधायक सरिता राय ने अफसोस के साथ कहा - ‘इंटरनेट बंद है, स्थानीय चैनल बंद हैं । कई लोगों की जान जा चुकी है, कई भूख हड़ताल से दम तोड़ने की हालत में है । दोनों सरकारें मौन हैं, हमारे एमपी मौन हैं, हमें अब आगे सोचना होगा ।’ पर्यटन मंत्री ओर उत्तर बंगाल प्रभारी गौतम देब सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग से नाराज हैं कि वे दार्जीलिंग संकट को लेकर प्रधानमंत्री से मिलने क्यों गए । पवन कुमार चामलिंग सिक्किम विधान सभा में काफी पहले गोरखालैंड राज्य गठन का सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर चुके हैं । सिक्किम की सीमा पर चीन को लेकर तनाव बना हुआ है । गोरखा बहुल आबादी वाले सिक्किम की जनता पड़ोसी गोरखालैंड के समर्थन में खुलकर सामने आ गयी है । नेपाल के माओवादियों की सहानुभूति गोरखों के साथ है ।

स्थिति गंभीर बनी हुई है । राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही इसे हल्के ढंग से ले रही है । वार्ता टालने से स्थिति सामान्य होने के आसार नहीं लगते । केंद्र की भाजपा सरकार और राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार इसे सिर्फ हिंसा, उपद्रव की तरह से लेकर दार्जीलिंग की जनता के सामने ऐसी तस्वीर पेश करना चाहती है ताकि गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के प्रति ही लोगों के मन में आक्रोश पैदा हो । यह असलियत को जानबूझकर नकारने की असफल कोशिश है, क्योंकि दोनों ही जीजेएम की मजबूत पकड़ का चुनावी लाभ उठा चुके हैं ।

अभी दार्जीलिंग में जनान्दोलन चल रहा है । इसकी तुलना सुभाष घीसिंग के समय में चले आंदोलन से नहीं की जा सकती । 29 साल पहले भगोड़ा सैनिक और नेपाली शिक्षक सुभाष घीसिंग ने गोरखालैंड आंदोलन की नींव हिंसा की बदौलत ब्लैकमेल राजनीति के लिए रखी । 2007 में उन्हें ‘अपदस्थ’ करके घीसिंग के ही दाहिने हाथ बिमल गुरूंग और रौशन गिरी ने घीसिंग के गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट की जगह गोरखा जनमुक्ति मोर्चा बनाया । घीसिंग को जनप्रतिनिधि बनने और गोरखालैंड राज्य गठन में कोई दिलचस्पी नहीं थी । वे सिर्फ दार्जिलिंग पर ऐसा कब्जा चाहते थे जहां संविधान और ‘कानून’ काम न करे । 1988 में घीसिंग ने सरकार को दार्जीलिंग क्षेत्रीय परिषद गठन करने को मजबूर किया और फंड खाते रहे । राज्य की वाममोर्चा सरकार और केंद्र की कांग्रेस सरकार घीसिंग की मदद से दार्जीलिंग की लोकसभा सीट और विधान सभा सीटें बारी-बारी से जीतती रही । कानून और व्यवस्था दार्जीलिंग के रहमो-करम पर छोड़ दिया ।

जीजेएम नेताओं ने दार्जीलिंग को गोरखालैंड बनाने के लिए आंदोलन का कलेवर बदल दिया । बाजाप्ता लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाकर विधान सभा चुनाव लड़ा । विधायक बने । लेकिन गोरखालैंड से समझौता नहीं किया ।

भाजपा नेताओं और दीदी की मतलबी नीतियों ने दार्जीलिंग में पुनः हिंसा भड़कायी है, जहां दीदी को शांति स्थापित करने में सफलता मिल चुकी थी । उसी का फायदा उठाकर मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी ने पूर्व मंत्री अशोक मट्टाचार्य ने सिलीगुड़ी मेयर का चुनाव जीता ।

दीदी भयभीत भी हैं और आंदोलन को कमजोर करने का उपाय किए जा रही हैं । जीजेएम ने दार्जीलिंग से बाहर डूआर्स, जलपाईगुड़ी तक गोरखालैंड की लहर जगा दी है । 2013 में जब आंदोलन शुरू हुआ, तब भी दार्जीलिंग में सरकारी कर्मचारियों का वेतन काटने का आदेश जारी किया गया, मगर वापस ले लिया गया । अभी 15 जून को आंदोलन शुरू होने के समय दीदी सुकना में ही ठहरीं, जहां वे हमेशा रात्रि विश्राम करती थी । लेकिन अभी एक अगस्त को वे मिनी सचिवालय उत्तरकन्या में रूकीं । वहां भी दीदी जनभावनाओं की उपेक्षा करके आदिवासी सलाहकार परिषद नेता बिरसा टिर्की ने मिली । आदिवासी भाषा अल्चीकी का एक नया शब्दकोश जारी किया, संथाली भाषा के उत्थान की भी योजना शुरू की । गोरखों के लेपचा समुदाय के लोग और आदिवासी भी गोरखालैड के समर्थन में आ गए हं । इनके अलग आंदोलन को दीदी विकास बोर्ड बनाकर तोड़ चुकी हैं । एक संवाददाता के सवाल के जवाब में दीदी ने झिड़क दिया - ‘दार्जीलिंग स्थिति की चर्चा न करें ।’

अभी का आंदोलन गोरखों पर नेपाली की जगह बंगाली थोपने के कारण जगा है । दीदी दार्जीलिंग को बंगाल का ऐसा अंग बनाने की राजनीति कर रही हैं, जहां गोरखों की पहचान बंगाली के रूप में हो । इसलिए वे बार-बार सिलीगुड़ी जाती हैं । भाजपा नेता सिर्फ चुनाव के समय जाते हैं । दीदी से नाराजगी के कारण जीजेएम ने दार्जीलिंग सीट से भाजपा को जितायीं ।

2011 विधान सभा चुनाव के समय पहली बार दीदी दार्जीलिंग पहुंची और सिलीगुड़ी में तीन रहकर जीजेएम नेताओं को अपना ‘भाई’ बनाया । राजनीतिक ‘भाइचारे’ से दीदी को मुख्यमंत्री बनने के बाद हिंसाग्रस्त दार्जीलिंग में अमन चैन स्थापित करने में कामयाबी मिली । इसलिए उन्होंने सिलीगुड़ी में अपने मिनी सचिवालय बनाया । लेकिन उसके बाद से दीदी की बेचैनी का कारण है, गोरखालैंड और गोरखों की अलग पहचान समाप्त करने के प्रयास में कामयाबी न मिलना । दीदी के इरादे ने दार्जीलिंग के अलावे उत्तरी बंगाल में नेपाली मूल के गैर-गोरखा समुदायों को भी गोरखालैंड झंडे के नीचे ला दिया है । सारे गोरखा गुट समेत 17 संगठन इस आंदोलन में शामिल हैं । अपने ‘भाइयों’ को खुराफाती बताकर दो महीने से दीदी पुलिस बल के जरिए उनसे निबटने में जुटी हैं ।