केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दशहरे के बीच में ही दार्जीलिंग पहाड़ी के गोरखा नेताओं की बैठक बुला ली, जो काफी समय से अलग गोरखालैंड राज्य की मांग कर रहे हैं । गोरखालैंड का मतलब पश्चिम बंगाल से अलग करके दार्जीलिंग और उससे सटे जिलों को मिलाकर राज्य का गठन ।
दिल्ली में आयोजित हालिया वार्ता त्रिपक्षीय थी । लेकिन तीसरे पक्ष पश्चिम बंगाल सरकार ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ली और अमूमन उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया । केंद्र सरकार और दार्जीलिंग समेत उत्तरी बंगाल के गोरखा तथा अन्य आदिवासी गुटों के प्रतिनिधि तो मौजूद थे । लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण तीसरे पक्ष राज्य सरकार ने कोलकाता से अपना प्रतिनिधि नहीं भेजा । कहने भर के लिए महज खानापूरी की गयी । पश्चिम बंगाल सरकार के दिल्ली स्थित रेजीमेंट कमिश्नर कृष्णा गुप्ता ने बैठक में शामिल होने की औपचारिकता निभा दी ।
वैसे इस वार्ता से कुछ निकला नहीं, जैसा कि पहले से ही अंदाजा था । लेकिन केंद्र सरकार अपनी पूरी टीम के साथ मौजूद थी । दार्जीलिंग लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर जीते राजू बिस्टा और तीनों विधायकों के अलावे कई गोरखा व आदिवासी नेता भी बैठक में शामिल हुए । गृहमंत्री अमित शाह के साथ केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री बंगाल के सांसद जॉन बारला, गृह सचिव अजय भल्ला और आदिवासी मामला मंत्रालय में सचिव अनिल कुमार झा भी बैठे थे ।
केंद्रीय गृह मंत्रालय(एमएचए) की ओर से बैठक के बाद जारी वक्तव्य में कहा गया कि गृह मंत्री अमित शाह ने सभी संबद्ध पक्षों को सुना और तय किया कि दूसरे दौर की वार्ता पश्चिम बंगाल सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में अगले महीने नवंबर, 2021 में होगी ।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के वक्तव्य में इसी बात पर बल दिया गया । बल्कि यों समझा जाए कि इसी पर केंद्रित था । गृह मंत्रालय का वक्तव्य ज्यों-का-त्यों प्रस्तुत है - ‘पश्चिम बंगाल सरकार से खास तौर पर कहा गया है कि अगले दौर की वार्ता के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा जाय ।’
जाहिर है कि केंद्र सरकार का दार्जीलिंग के नेताओं से अलग राज्य की मांग पर बात करना राज्य सरकार को मंजूर नहीं है और केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल का उपेक्षापूर्ण रवैया अच्छा नहीं लगा । गृह मंत्रालय के वक्तव्य में राज्य की मांग पर कोई चर्चा नहीं की गयी । सिर्फ इतना कहा गया कि दार्जीलिंग, तराई और डूआर्स क्षेत्र के सर्वांगीन विकास तथा समृद्धि नरेंद्र मोदी सरकार की उच्च प्राथमिकता है। इसमें दार्जीलिंग नहीं उत्तरी बंगाल के गोरखा बहुल समुदाय की बात की गयी है ।
12 अक्टूबर की इस वार्ता में सांसद राजू बिस्टा अपने साथ तीन विधायक समेत वैसे नेताओं को लेकर आए, जिनका भाजपा से कोई कड़ा विरोध नहीं है । निर्वाचित जनप्रतिनिधियों में - दार्जीलिंग विधायक नीरज जिम्बा, कर्सीऑंग विधायक बी पी बाजगेन, कलछीनी विधायक बिशाल लामा थे । गोरखा प्रतिनिधिमंडल में शामिल अन्य नेता थे - गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जीएनएलएफ) प्रमुख मान घीसिंग, कम्यूनिस्ट पार्टी रिवोल्यूशनरी मोर्चा के आर बी राय, गोरखा राज्य निर्माण मोर्चा के दावा पखरीन, अखिल भारतीय गोरखा लीग के प्रताप खाटी आर एक अन्य नेता बिकाश राय । इसी वर्ष अप्रील-मई में संपन्न पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के बाद यह पहली गोरखालैंड वार्ता थी । गोरखालैंड मुख्य रूप से हिंसा से उपजा राज्य आंदोलन है । हिंसा दार्जीलिंग को छोड़कर राज्य के अन्य हिस्सों में फैल गयी है और उसका राजनीतिक तेवर भी बदला हुआ है । यह राजनीतिक हिंसा वो नहीं है जो गोरखालैंड राज्य आंदोलन के समय में था । दार्जीलिंग की सर्द हवा को हर मौसम में गर्म रखनेवाली राज्य आंदोलन की हवा में गति नहीं है । आंदोलन के माध्यम से मजबूत जनाधार बनानेवाले बंटे हुए हैं ।
दार्जीलिंग में गोरखालैंड को चुनावी मुद्दा बनानेवाले सभी दलों के नेताओं ने अपने दिग्भ्रमित रवैए से गोरखालैंड राज्य आंदोलन को बैकफुट पर ला दिया ।
विधान सभा चुनाव से पहले अक्टूबर, 2020 में केंद्रीय गृह मंत्रालय की गोरखा वार्ता का मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) ने बायकाट किया । उसके ठीक साल भर बाद अक्टूबर, 2021 की वार्ता के प्रति भी दीदी का लगभग वही रवैया रहा ।
लोकसभा चुनाव, 2019 में दार्जीलिंग में गोरखालैंड कोई मुद्दा नहीं था । जबकि गोरखालैंड राज्य के वायदे और इस आंदोलन से उपजे सबसे प्रभावशाली गुट गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) नेता बिमल गुरूंगा के समर्थन से भाजपा ने लगातार तीसरी बार दार्जीलिंग लोकसभा सीट जीती ।
विधान सभा चुनाव, 2021 में दार्जीलिंग समेत पूरे उत्तर बंगाल के अलगाववादी आंदोलन की समस्या का हल निकालने का वायदा भाजपा उम्मीदवारों ने जरूर किया, मगर अलग राज्य गठन का स्पष्ट जिक्र नहीं किया । चुनाव से पहले ही कुछ घटनाएं ऐसी हुई, जिससे दार्जीलिंग पहाड़ी और उत्तरी बंगाल का राजनीतिक रंग बदला हुआ था । सबसे बड़ी बात तो ये हुई कि जीजेएम(गोरखा जनमुक्ति मोर्चा) नेता बिमल गुरूंगा ने भाजपा से रिश्ता तोड़ लिया और दीदी का साथ देने का एलान कर दिया । तीन साल तक फरार(लापता) रहे बिमल गुरूंगा ने 21 अक्टूबर, 2020 को कोलकाता में जनता के बीच आते ही कहा कि जीजेएम अब भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ से अलग है और वे विधान सभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस का साथ देंगे । बिमल गुरूंगा ने इसका कारण यह बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने अपना वायदा पूरा नहीं किया, जबकि जीजेएम गोरखालैंड राज्य के वायदे के कारण ही भाजपा गठजोड़ का घटक बनी थी । बिमल गुरूंगा ने कहा कि ‘दीदी ने जो बोला वो किया ।’ अक्टूबर, 2020 में उसी समय ममता बनर्जी ने गोरखालैंड वार्ता के लिए केंद्र के बुलावे का बायकाट किया । दीदी शुरू से ही राज्य के विभाजन के खिलाफ हैं । उन्होंने कई बार सिलीगुड़ी में कुछ-कुछ दिन रहकर गोरखों को ‘अपना भाई’ बताकर भावनात्मक कार्ड खेला है कि ‘कोई बहन भाई को अपने से अलग कैसे कर सकती है ।’ 2017 में जीजेएम नेताओं को भाजपा पर ‘भरोसा’ था और दीदी को वे गोरखालैंड विरोधी मानते थे । दीदी पर दबाव बनाने के लिए जीजेएम ने 2017 में लगातार कई महीनों तक दार्जीलिंग में चक्का जाम हिंसक आंदोलन चलाया । 104 दिनों तक लगातार चले उस ऐतिहासिक बंद, हड़ताल ने पूरे दार्जीलिंग को तबाह कर दिया । बिमल गुरूंगा पर गैरकानूनी गतिविधियां रोक कानून(यूएपीए) के तहत हत्या, तोड़फोड़ और उपद्रव के 150 मामले दर्ज किए गए । बिमल गुरूंगा लापता हो गए । चर्चा थी कि वे नेपाल या सिक्किम में छिपे हैं । लेकिन बिमल गुरूंगा ने दावा किया कि वे दिल्ली में हैं । तीन साल में जीजेएम नेता का भाजपा से मोहभंग हो गया । उसके बाद तृणमूल कांग्रेस समर्थक बनकर उभरे । गोरखालैंड राज्य पर दीदी के दो टूक रुख के बाद जीजेएम ने भाजपा का पुछल्ला पकड़ा था । बिमल गुरूंगा के तीन साल की फरारी में दीदी को जीजेएम में फूट डालने के अलावे गोरखालैंड आंदोलन को भी छिन्न-भिन्न करने में सहूलियत हुई ।
अभी जो केंद्र सरकार ने वार्ता आयोजित की, उसमें जीजेएम का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं था । या तो उन्हें बुलाया नहीं गया, अथवा वे दीदी की नीति पर चल रहे हैं ।
विधान सभा चुनाव के बाद अचानक दो राज्यों के गठन की आवाज भाजपा के दो संसद सदस्यों ने कर डाली । गोरखालैंड का नाम गोल हो गया, जिसके पक्ष में भाजपा की बंगाल यूनिट नहीं है । भाजपा के टिकट पर अलीपुरद्वार लोकसभा सीट से जीते जॉन बारला ने उत्तर बंगाल में अलग राज्य या संघशासित क्षेत्र की 13 जून, 2021 को मांग की । और फिर 21 जून को विष्णुपुर सीट से सांसद सौमित्र खान ने जंगलमहल क्षेत्र को भी राज्य का दर्जा देने की मांग कर डाली ।
भाजपा के प्रदेश से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक ने अपने दोनों सांसदों के बयानों को निजी वक्तव्य बताकर इससे खुद को अलग कर लिया । लेकिन सांसदों के उस तेवर का असर हुआ जरूर । 12 अक्टूबर की दिल्ली बैठक में जॉन बारला अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्री की हैसियत से शामिल थे । जंगलमहल क्षेत्र नक्सलियों का पुराना गढ़ रहा है जो उत्तर बंगाल में नहीं है । जंगलमहल लोकसभा सीट से भाजपा की जीत बड़ी उपलब्धि मानी गयी ।
उत्तर बंगाल में गोरखालैंड के अलावे अनुसूचित जाति समुदाय कोच राजबोंगशियों का कामतापुर राज्य आंदोलन 1955 से चल रहा है । उसमें उत्तर बंगाल के 8 जिलों के अलावे असम के भी तीन जिले प्रस्तावित है । 1998 से ग्रेटर कूच बेहार राज्य आंदोलन जारी है । उसमें भी उत्तर बंगाल के कामतापुर में आनेवाले सात जिलों के अलावे असम के तीन जिले हैं ।
इन आंदोलनों के प्रेरक थे गोरखा नेता सुभाष घीसिंग, जिन्होंने 1980 के दशक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट का गठन करके तूफानी हिंसा की नींव डाली । 5-7 वर्षों तक पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार और केंद्र सरकारों को दार्जीलिंग में हिंसा पर काबू पाने के लिए सुभाष घीसिंग की शर्तें माननी पड़ी । 1988 में केंद्र सरकार को दार्जीलिंग गोरखा पहाड़ी परिषद का गठन करना पड़ा, जिसके सुभाष घीसिंग 23 वर्षों तक बिना चुनाव कराए सर्वेसर्वा बने रहे ।
सुभाष घीसिंग के दाहिने हाथ बिमल गुरूंगा ने 2007 में अलग गोरखा जनमुक्ति मोर्चा बनाया और उनके हिंसक आंदोलन के चलते दूसरा समझौता 2011 में गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन गठन का हुआ । 2011 में ममता बनर्जी मुख्यमंत्री बन चुकी थी । यह त्रिपक्षीय समझौता है ।
जीएनएलएफ के उत्तराधिकारी के रूप में सुभाष घीसिंग के पुत्र मान घीसिंग 12 अक्टूबर की वार्ता में शामिल हुए । गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन के पहले चुनाव में 2012 में भारी जीत हासिल करने के बाद प्रशासक पद से इस्तीफा देकर गोरखालैंड राज्य के लिए दीदी से पंगा लेनेवाले बिमल गुरूंगा हाशिए पर हैं ।