दार्जीलिंग विधान सभा सीट के लिए 19 मई को हो रहे उपचुनाव में किस्मत आजमा रहे सारे उम्मीदवार गोरखालैंड राज्य आंदोलन की उपज हैं, मगर किसी के एजेंडे और चुनाव घोषणापत्र में अलग गोरखालैंड का मुद्दा नहीं है । ऐसा पहली बार देखा जा रहा है । दार्जीलिंग लोकसभा सीट के लिए 18 अप्रील को हुए मतदान के समय भी गोरखालैंड राज्य गठन किसी भी पार्टी के लिए मुद्दा नहीं था । भाजपा ने 2009 और 2014 लोकसभा चुनाव में गोरखालैंड राज्य गठन के वायदे पर दार्जीलिंग सीट जीता । गोरखालैंड राज्य आंदोलन से उपजे दार्जीलिंग के सबसे मजबूत संगठन गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) नेता बिमल गुरूंगा की बदौलत भाजपा को यह जीत हासिल हुई । पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी(दीदी) ने 2011 में सत्ता हासिल करने के बाद से गोरखालैंड राज्य आंदोलन को बैकफुट पर लाने की ठानी । दीदी अपने उद्देश्य में सफल रहीं । 2016 में दीदी के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद से पश्चिम बंगाल के अन्य इलाकों में भले अशांति और अराजकता का साम्राज्य कायम हुआ हो, दार्जीलिंग से हिंसाराज समाप्त करने में दीदी को कामयाबी हासिल हुई । दीदी बिमल गुरूंगा समेत तमाम गोरखा नेताओं को ‘विश्वास’ में लेकर ‘भाई’ बनाकर उन्हें आपस में तोड़ने में सफल हुई । उसी जोड़तोड़ के कारण दार्जीलिंग विधान सभा सीट के लिए भी उपचुनाव कराने की नौबत आ गयी । यह पहला उपचुनाव है, जिसमें गोरखालैंड को भुनानेवाली क्षेत्रीय पार्टियों के अधिकृत उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं हैं । सबसे ज्यादा गौर करने लायक ये है कि गोरखालैंड राज्य आंदोलन से अपनी राजनीतिक पहचान बनानेवाले से लेकर गोरखालैंड विरोधी तृणमूल कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार ने भी निर्दलीय पर्चा भरा है । कुल नौ उम्मीदवारों में से किसी के भी चुनाव वायदे में गोरखालैंड राज्य आंदोलन को मजबूत करना नहीं है । दार्जीलिंग पहाड़ी की चुनावी राजनीति में एकमात्र गोरखालैंड राज्य आंदोलन ही हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाती है । 2011 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने दार्जीलिंग लोकसभा क्षेत्र की तीनों विधान सभा सीटें जीतने के बाद गोरखालैंड राज्य आंदोलन को तेज करके केंद्र की कांग्रेस गठजोड़ सरकार और दीदी पर दबाव बनाया । क्षेत्रीय प्रशासन का मसौदा तैयार हुआ और दार्जीलिंग की जगह गोरखालैंड नाम देकर जीटीए(गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन) का त्रिपक्षीय समझौता 18 जुलाई, 2011 को हो गया । जीटीए के लिए 2012 में हुए चुनाव में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने सारी 45 सीटें जीती और बिमल गुरूंगा इसके प्रमुख बने । 2016 विधान सभा चुनाव में दीदी ने जीजेएम को फोड़ा और दार्जीलिंग विधान सभा सीट से जीजेएम के अमरसिंह राय तृणमूल कांग्रेस के विधायक बने । 2017 में 105 दिनों के ऐतिहासिक दार्जीलिंग बंद के दौरान बिमल गुरूंगा पर गैरकानूनी गतिविधियां(रोक) कानून के अंतर्गत हिंसा भड़काने के कई मामले दर्ज हुए । उसके बाद से वे लापता और फरार चल रहे हैं । दार्जीलिंग आते ही बिमल गुरूंगा गिरफ्तार हो जाएंगे । ऐसा करने के पीछे एकमात्र मकसद था राज्य आंदोलन के सबसे दबंग नेता बिमल गुरूंगा को दार्जीलिंग और गोरखा राजनीति से निकाल बाहर करना । ऐसे बिमल गुरूंगा अभी भी भाजपा समर्थक हैं, लेकिन भाजपा ने अब उनसे दूरी बना ली है । बिमल गुरूंगा ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी । उन्होंने सिलीगुड़ी सर्किट बेंच में जमानत की अर्जी दी है। मगर अभी तक उनके दार्जीलिंग में कदम रखने का रास्ता नहीं निकला है ।
दीदी ने जीजेएम को तोड़कर दूसरे आंदोलनकारी बिनय तमांग को बिमल गुरूंग की जगह गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन का प्रमुख नियुक्त कर दिया और चुनाव लंबित कर दिया । अभी बिनय तमांग ने जीटीए से इस्तीफा देकर दार्जीलिंग विधान सभा सीट के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भरा है । इस सीट से विधायक अमरसिंह राय को दीदी ने लोकसभा का उम्मीदवार बनाया । जीजेएम के बिनय तमांग गुट से दीदी ने इस वायदे पर लोकसभा सीट के लिए समर्थन मांगा कि ‘यह मेरे को दे दो तो विधान सभा चुनाव में तीनों सीट मैं छोड़ दूंगी’ । उस आश्वासन पर बिनय तमांग ने जीटीए प्रमुख पद छोड़कर पर्चा तो भर दिया, मगर उनके भाग्य को लेकर मतदाता चिंतित हैं । इसी से गोरखालैंड राज्य आंदोलन का भी भविष्य जुड़ा है । बिनय तमांग ने अभी तक गोरखालैंड राज्य आंदोलन को पूरी तरह बैकफुट पर जाने नहीं दिया है, क्योंकि उसी पर उनका राजनीतिक वजूद टिका है । बिनय तमांग के नेतृत्ववाली जीजेएम केंद्रीय कमिटी ने मतदाताओं को आश्वस्त किया है कि बिनय तमांग का मंत्री बनना निश्चित है और उन्हें पहाड़ी मामलों का मंत्रालय मिलेगा, जिससे दार्जीलिंग के विकास कार्यों में तेजी आएगी । अपने आठ वर्षों के शासनकाल में दीदी गोरखालैंड राज्य आंदोलन को दार्जीलिंग के सीन से हटाने और जीजेएम को कमजोर करके तृणमूल कांग्रेस की जमीन तैयार करने में जुटी रही । तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने से पहले भी किसी भी प्रमुख पार्टी की दार्जीलिंग में अपनी जमीन नहीं थी । गोरखालैंड के नाम पर ही सबों को वोट मिले और वो भी गोरखा नेताओं से सौदेबाजी करके । दीदी को अपने प्रयास में कितनी सफलता मिली, उसका खुलासा उनकी अपनी ही पार्टी की पहाड़ी शाखा की प्रभारी सारदा राय सुब्बा ने चुनाव से पहले ही कर दिया। दीदी को वायदे के मुताबिक बिनय तमांग का समर्थन करना था, जो निर्दलीय प्रत्याशी हैं । सारदा राय सुब्बा के विरोध के कारण उन्हें तृणमूल कांग्रेस से निकाल दिया गया । उसके जवाब में सारदा राय सुब्बा ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में दार्जीलिंग विधान सभा सीट से पर्चा भर दिया । सुब्बा जिस मुद्दे को उठाकर बागी उम्मीदवार बनी हैं, उससे बिनय तमांग को कोई फायदा हो या न हो, दीदी का नुकसान तो निश्चित है । सारदा राय सुब्बा ने कहा है कि बिनय तमांग ने अपनी पार्टी जीजेएम के आगे तृणमूल कांग्रेस को जमीन तैयार करने ही नहीं दिया । सुब्बा ने दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता इससे खुश नहीं हैं कि दीदी बिनय तमांग को समर्थन दें और अपना उम्मीदवार न खड़ा करें । क्योंकि बिनय तमांग ने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी कि तृणमूल कांग्रेस को पहाड़ी में ‘फिनिश’ कर दिया जाए । इसका लाभ अगर मिल भी जाए तो भी बिनय तमांग गोरखालैंड राज्य आंदोलन को जीवित कर पाएंगे, इसकी उम्मीद कम लगती है । उधर बिमल गुरूंगा के साथी जीजेएम नेता रोशन गिरी ह्वाटस अप संदेश लगातार भेज रहे हैं कि बिनय तमांग नहीं जीत सकते, क्योंकि गोरखालैंड राज्य आंदोलन को 2017 में बेच दिया, जो मतदाताओं ने पसंद नहीं किया । बिनय तमांग ने आंदोलन वापस ले लिया था, जिसका फायदा वे उठाना चाहते हैं । लेकिन तमांग यह नहीं चाहते कि उनके नेतृत्ववाले जीजेएम पर तृणमूल कांग्रेस हावी जो जाए । जन आंदोलन पार्टी उम्मीदवार अमर थापा का कांग्रेस समर्थन कर रही है । सभी गोरखा नता इस बात के लिए चिंतित हैं कि ‘बाहरी’ लोगों ने आकर गोरखा संगठनों में फूट डालकर गोरखालैंड राज्य आंदोलन को बैकफुट पर ला दिया । गैर-राजनीतिक संगठन नेशनल गोरखालैंड कमिटी के अध्यक्ष मेजर जनरल(सेवानिवृत्त) शक्ति गुरूंगा ने नए सिरे से गोरखों को एकजुट करना शुरू किया है । जन आंदोलन पार्टी नेता अमर लामा ने इससे सहमति जतायी है । जबकि अमर लामा दार्जीलिंग विधान सभा सीट के लिए पर्चा भरने के बाद से चुनाव प्रचार में गोरखालैंड राज्य मुद्दे को निचले पायदान पर लेकर चल रहे हैं । लेकिन अमर लामा मतदाताओं का यह भी बता रहे हैं कि ‘हम गोरखा लोग सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से एकजुट हैं, मगर आपस में हमारी राजनीतिक एकता नहीं है । हमेशा बाहरी लोग हमारी राजनीतिक एकता को खंडित करके गोरखालैंड मुद्दे को कमजोर कर देते हैं ।’ नेशनल गोरखालैंड कमिटी नेता शक्ति सिंह ने जोर देकर कहा कि गोरखालैंड राज्य आंदोलन और विकास दोनों दो छोर हैं । कुछ अन्य नागरिकों ने भी कहा कि दार्जीलिंग में चुनाव पर्व नहीं है, जैसा कुछ उम्मीदवार प्रचार कर रहे हैं । 1980 के दशक में भगोड़े सैनिक सुभाष घीसिंग न गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जीएनएलएफ) के नाम से बम धमाके के साथ गोरखालैंड राज्य आंदोलन की नींव रखी । सुभाष घीसिंग की दबंग हैसियत का चुनावी लाभ बारी-बारी से पश्चिम बंगाल की वाममोर्चा सरकार और केंद्र की कांग्रेस तथा अन्य गठजोड़ सरकारों ने उठाया । 1988 में दार्जीलिंग हिल स्वायत्त पहाड़ी परिषद गठित करके उसका प्रमुख बनकर केंद्र और राज्य सरकारों ने दार्जीलिंग को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य 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। घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे और हिंसक राज्य आंदोलन को सुभाष घीसिंग के हवाले कर दिया । घोषिंग फंड से गुरछर उड़ाते रहे 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से बचाने के लिए घीसिंग की पार्टी जीएनएलएफ से ही निकलकर बिमल गुरूंगा ने 2007 में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा बनाया और गोरखालैंड राज्य आंदोलन में नयी जान फूंकी । सुभाष घीसिंग ‘राज’ में उन्हीं की मर्जी से हिंसा और शांति कायम होती था । बिमल गुरूंगा से हाथ मिलाकर दीदी ने दार्जीलिंग में शांति की राजनीति शुरू की । बिमल गुरूंगा ने गोरखालैंड राज्य की आवाज उठाने के लिए दीदी विरोधी भाजपा को दो बार लोकसभा सीट से जिताया । आज एक बार फिर गोरखालैंड राज्य आंदोलन उल्टी सीढ़ियां गिन रहा है, जब कि दार्जीलिंग में सभी पार्टियां इसे भुनाती रही है ।
लोकसभा सीट के लिए चुनाव प्रचार में सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने अपने उम्मीदवार समन पाठक के समर्थन में संविधान की 6वीं अनुसूची के तहत स्वायत्तता देने का वायदा किया । कांग्रेस उम्मीदवार शंकर मलाकार के समर्थन में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर वायदा खिलाफी का आरोप लगाया । भाजपा उम्मीदवार राजू सिंह बिस्ट ने गोरखालैंड का नाम ही नहीं लिया । जीएनएलएफ नेता नीरज जिम्बा दार्जीलिंग विधान सभा सीट से भाजपा उम्मीदवार हैं, जिसका समर्थन बिमल गुरूंगा कर रहे हैं। अन्य गोरखा नेता अब नरेंद्र मोदी का 2014 का वायदा याद नहीं करते कि गोरखों का ‘सपना’ सिर्फ भाजा ही ‘पूरा’ कर सकती है । मोदी और दीदी की एक-दूसरे को ‘फिनिश’ करने की मुहिम में दोनों ने गोरखालैंड मुद्दे को फिनिश कर दिया ।