दार्जिलिंग और उससे सटे उत्तरी बंगाल के डुआर्स तथा कुछ मैदानी इलाकों को मिलाकर अलग गोरखालैंड राज्य को बनाने की मांग को लेकर हिंसक आन्दोलन कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) और केन्द्र के बीच छठवें दौर की वार्ता भी किसी नतीजे पर पहुंचे बिना समाप्त हो गयी ।

गत सप्ताह दिल्ली में हुई इस त्रिपक्षीय वार्ता में केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय माकन ने जीजेएम प्रतिनिधिमंडल के नेता बिमल गुरूंग और पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से बातचीत में शामिल हुए स्वास्थ्य मंत्री सूर्यकांत मिश्र को दार्जिलिंग के लिये एक अंतरिम क्षेत्रीय प्राधिकार गठन के नये प्रस्ताव का फार्मूला दिया । केन्द्रीय गृह सचिव जी.के.पिल्लई ने बताया कि दोनों पक्ष केन्द्र को अपनी राय से 15 दिनों में अवगत कराएंगे । अगले दौर की वार्ता संसद के मानसून सत्र के बाद संभवतः 17 अगस्त को होगी ।

गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने हिंसा का दबाव बनाकर हरबार यही डेडलाइन देकर केन्द्र और राज्य सरकार को वार्ता के लिए मजबूर किया कि ‘अलग गोरखालैंड’ राज्य का गठन छोड़ किसी अन्य प्रस्ताव पर बातचीत नहीं होगी । लेकिन दिल्ली से कोलकाता तक हुई पांच दौर की वार्ता में भी केन्द्र और राज्य सरकार ने गोरखा नेताओं को ‘असली मुद्दे’ पर नहीं आने दिया है । 24 जुलाई की बातचीत को भी जीजेएम प्रमुख बिमल गुरूंगा ने ‘सौहार्दपूर्ण’ बताया और ये भी कहा कि किसी बिन्दु पर सहमति नहीं हो पायी । उन्होंने भी गृह सचिव की हां में हां मिलाते हुए जल्द ही संकट का हल निकल आने की ‘उम्मीद’ जाहिर की । 18 मार्च(पिछली वार्ता) से 24 जुलाई तक दार्जिलिंग में इस तरह की वारदातें हो गयी और माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया है कि अब अगली वार्ता का समय करीब आने तक राज्य सरकार और केन्द्र सरकार को किसी एक गुट के दबाव के आगे झुकने से पहले यह तय करना होगा की प्रस्तावित अलग गोरखालैंड राज्य के किस दावेदार को ‘असली’ माना जाय । फिलहाल तो यह मुद्दा ही पूरी तरह गोलमटोल बना हुआ है कि दार्जिलिंग को राज्य का दर्जा देने की जगह क्या देकर केन्द्र और राज्य सरकार गोरखा आन्दोलनकारियों को सन्तुष्ट कर पायेगी ।

गोरखा नेताओं को भी 1980 के दशक में आन्दोलन की नींव रखनेवाले सुभाष घीसिंग के समय से अबतक इतना तो अंदाजा लग ही गया है कि अलग राज्य बनाने का मामला केन्द्र और राज्य सरकार टाल रही है । दूसरी ओर गोरखा नेता और उनके गुट वर्चस्व की आपसी लड़ाई में इस बुरी तरह उलझ गये हैं कि इनके सामने एक-दूसरे को रास्ते से हटाकर अपना वजूद कायम रखने पर ही संकट उपस्थित हो गया है । हर गुट अपने प्रतिद्वंद्वी पर गोरखालैंड आंदोलन को कमजोर करने के लिये जिम्मेदार ठहराकर हिंसा की बदौलत दार्जिलिंग के लोगों पर अपनी नेतागिरी थोपने की कोशिश में जुटा है ।

18 मार्च को हुई पांचवें दौर की बातचीत में जीजेएम नेताओं ने गोरखालैंड समस्या का हल निकालने के लिये केन्द्र को एक अपने ढंग का अलग फार्मूला दिया । उसके सारे प्रावधान अव्यावहारिक और संवैधानिक प्रावधानों के प्रतिकूल होने के बावजूद केन्द्र तथा पश्चिम बंगाल सरकार ने विचारार्थ रख लिया । जीजेएम ने केन्द्र के सामने दार्जिलिंग, डुआर्स और तराई के मैदानी इलाकों के लिये तत्काल एक गोरखालैंड क्षेत्रीय प्राधिकार गठन का प्रस्ताव रखा । जीजेएम नेताओं की ओर से केन्द्र को सौंपे गये फार्मूले की ब्लूप्रिंट के मुताबिक यह अंतरिम व्यवस्था सिर्फ 31 दिसम्बर, 2011 तक के लिये होगी, यानो कि गोरखालैंड राज्य गठन और पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव तक के लिये होगी । जीजेएम के सपनों के गोरखालैंड में ऐसे प्रावधान हैं, जो देश में अन्यत्र लागू नहीं है । इस अनूठे गोरखालैंड के लिये विधान सभा टाइप व्यवस्था, सीधा केन्द्र से ताल्लुक(जिसमें पश्चिम बंगाल सरकार की कोई दखलंदाजी न हो), कानून और व्यवस्था इसके अधीन हो और इसकी अपनी हाईकोर्ट हो - अर्थात सारा कुछ पूर्ण राज्य का दर्जा वाला हो ।

‘ठोस मुद्दे’ पर वार्ता के लिये मई का अंतिम सप्ताह तय हुआ । लेकिन उस समय तक दार्जिलिंग और डुआर्स में इतनी बड़ी-बड़ी घटनायें हो गयी की पूरे शहर में राजनीतिक अस्त-व्यस्तता का वातावरण बन गया और जीजेएम सुप्रीमो बिमल गुरूंग खुद कटघरे में खड़े हैं । अलग गोरखालैंड राज्य का अपने को प्रबल दावेदार बतानेवाले अखिल भारतीय गोरखा लीग(एबीजीएल) अध्यक्ष मदन तमांग की दार्जिलिंग के मुख्य चौराहे पर 21 मई को दिनदहाड़े छूरा घोंपकर हत्या कर दी गयी । गुरूंग की तरह सुभाष घीसिंग के समय से गोरखालैंड आंदोलन के शीर्ष नेताओं में गिने जानेवाले प्रभावशाली तमांग पर कातिलाना हमला उस समय हुआ, जब उन्हें एक जनसभा को यह बताना था कि किस प्रकार जीजेएम अलग गोरखालैंड राज्य के लक्ष्य से भटक कर घीसिंग की तरह अपनी नेतागिरी सेंकने में जुट गया है । हत्या के दिन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम.के. नारायणन कानून और व्यवस्था की महीनों से बिगड़ी हालत का जायजा लेने दार्जिलिंग में ही कैम्प कर रहे थे । मदन तमांग की हत्या में बिमल गुरूंग का हाथ होने की चर्चा अपने को बेकसूर बताने की उनकी बार-बार की सफाई के बावजूद दबी नहीं है । तमांग की पत्नी भारती तमांग और उनके संगठन के महासचिव प्रह्लाद प्रधान ने बिमल गुरूंग, उनकी पत्नी तथा जीजेएम महासचिव रौशन गिरी को हत्या का दोषी ठहरा कर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी । उसके बाद भारती ने राज्यपाल से मुलाकात करके उनसे न्याय की गुहार लगायो । पुलिस और जिला प्रशासन को भी जीजेएम नेताओं पर ही शक है । दार्जिलिंग पहाड़ी गोरखा परिषद के प्रशासक बी.एल.मीना ने पुलिस को वे सारे बंगले खाली कराने को कहा जिनमें जीजेएम नेता रह रहे हैं । भारती तमांग पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से दो-दो बार मिलकर अपने पति की हत्यारों को पकड़ने का आग्रह कर चुकी हैं । दूसरी तरफ बिमल गुरूंग और रौशन गिरी हिंसा, बन्द, अनशन, हड़ताल के जरिये सामान्य जनजीवन अस्तव्यस्त करने का सिलसिला लम्बे समय तक जारी रखने की धमकी देकर केन्द्र व राज्य सरकार पर छठवें दौर की बातचीत के लिये दबाव डालते रहे । अबकी उन्हें ज्यादा जोरदार रवैया अपनाना था, क्योंकि तराई और डुआर्स के आदिवासियों की ओर से भी झटका मिल चुका था । जून में तो नौबत ये आ गयी कि सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा । राष्ट्रीय राजमार्ग 31ए को जाम करने के कारण पड़ोसी सिक्किम में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति ठप्प हो गयी । डुआर्स के गोरखालैंड विरोधी गुट बांग्ला ओ बांग्ला भाषा बचाआ समिति के संयोजक मुकुंद मजुमदार ने भी सिक्किम सीमा पर सामानान्तर आन्दोलन छेड़ रखा था, जिसको अप्रत्यक्षरूप से सत्तारूढ़ वाममोर्चा का समर्थन प्राप्त है । सिक्किम सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया ।

फिर जून के ही अन्तिम सप्ताह में दार्जिलिंग पुलिस ने तमांग के हत्यारों को पकड़ने के लिये जीजेएम नेताओं और उनके समर्थकों के खिलाफ ज्योंही धरपकड़ अभियान तेज किया कि आंदोलनकारियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की धमकी दे डाली । मगर यह धमकी दूसरे ही दिन वापस लेनी पड़ गयी, क्योंकि उनके अपने ही संगठन के आदिवासी प्रतिनिधियों ने अपने लिये अलग राज्य आंदोलन छेड़ने का बिगुल बजा दिया । मदन तमांग के ही तर्ज पर अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद गठित हो गया, जिसके नेता जीजेएम केन्द्रीय समिति में आदिवासी प्रतिनिधि के रूप में शामिल हरका बहादुर छेत्री बने । इन्हीं के दबाव में प्रस्तावित गोरखालैंड राज्य का नाम ‘गोरखा आदिवासी प्रदेश’ करने का प्रस्ताव केन्द्रीय समिति की 28 जून की बैठक में रखा गया । लेकिन इस पर सहमति नहीं बनी । जीजेएम के दोनों नेता - बिमल गुरूंग और रौशन गिरी अलग बैनर तले या मिलकर आदिवासी प्रदेश की मांग का आंदोलन चलाने पर राजी नहीं हुए । गोरखालैंड आंदोलन का तीसरा गुट उभरकर सामने आ गया जिसके नेता छेत्री ने जीजेएम केन्द्रीय समिति के सदस्य के रूप में 24 जुलाई को केन्द्र से बातचीत के लिये दिल्ली जाने के लिये गठित 14 - सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल होने से इंकार कर दिया । 28 जून को जीजेएम केन्द्रीय समिति की बैठक में भी मदन तमांग की हत्या का मामला उठा और 24 जुलाई को दिल्ली बातचीत में भी इसकी चर्चा रही । लेकिन जीजेएम नेता रौशन गिरी दोनों ही बैठकों के बाद इस संबंध में पूछे गये सवालों का जवाब देने से कतराये ।

गिरी को अच्छी तरह याद होगा कि गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट(जीएनएलएफ) में घीसिंग के नेतृत्व को चुनौतो देने वाले दीपक गुरूंग की घीसिंग के इशारे पर 2006 में करायी गयी हत्या के समय से ही उनका मतभेद शुरू हुआ । और आखिरकार 2007 के अक्टूबर आते-आते दीपक गुरूंग की हत्या के विरोध में उनके भाई बिमल गुरूंग ने रौशन गिरी को साथ लेकर फ्रंट से अलग अपना गुट जीजेएम बनाया । बिमल गुरूंग और रौशन गिरी दोनों घीसिंग के दाहिना बायां हाथ हुआ करते थे । लेकिन इन दोनों ने भी रास्ता वही अपना रखा है जिस वजह से सुभाष घीसिंग का पतन हुआ । अब इनकी भी उल्टी गिनती चल रही है । इसका संकेत बिमल गुरूंग को मार्च में ही मिल गया, जब बातचीत के लिये दिल्ली जाने से पहले दार्जिलिंग में हुई जीजेएम बैठक में घीसिंग की ओर से उसी समय जारी चेतावनी को गंभीरता से लिया गया और गुरूंग को साथियों ने अपने वायदे की याद दिलायी । 11 मार्च की उस बैठक में गुरूंग को अक्टूबर 2007 में जीजेएम गठन के बाद कलिम्पोंग में आयोजित रैली की याद दिलायी गयी जिसमें उन्होंने जोर देकर कहा था कि ‘10 मार्च, 2010 तक अलग गोरखालैंड राज्य अगर नहीं बना तो मैं अपनी जान दे दूंगा’ और आज इसी तारीख तक की प्रगति का आलम ये है कि 31 दिसम्बर, 2011 तक के लिये अन्तरिम प्राधिकरण भी गठित होने के आसार नहीं हैं । बिमल गुरूंग को हिंसा की राजनीति और छापामार युद्ध सिखाने वाले सुभाष घीसिंग ने उस बैठक से हफ्ताभर पहले चेतावनी दी कि संविधान की छठी अनुसूची के तहत स्वायत्त स्वशासी परिषद या अलग राज्य से कम कुछ भी स्वीकार करने का खामियाजा भुगतना पड़ेगा । बैठक में इस बिन्दु पर गरमा-गरम बहस हुई कि घीसिंग स्वशासी परिषद पर राजी हो गये तो उनके विरोध में फ्रंट से अलग मोर्चा यह कहकर बना कि घीसिंग ने धोखा दिया है, गोरखों को अलग राज्य से कम कुछ भी मंजूर नहीं है । यहां तक कि जुलाई 2008 से घीसिंग को दार्जिलिंग में घुसने भी नहीं दिया जा रहा है । ठीक उसी तरह बिमल गुरूंग को तमांग की हत्या के बाद दार्जिलिंग प्रवेश पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा । घीसिंग का भी अस्तित्व अभी समाप्त नहीं हुआ है ।

1980 के दशक में सुभाष घीसिंग ने जीएनएलएफ बनाकर हिंसा की बदौलत अपने स्वार्थ की ब्लैकमेल राजनीति का सूत्रपात किया । 1988 में उन्होंने राज्य व केन्द्र सरकार को दार्जिलिंग गोरखा पहाड़ी परिषद बनाने पर मजबूर किया और उसके अध्यक्ष बने । उसके बाद से दो दशक तक जनसमर्थन का नाजायज फायदा उठाकर परिषद को विकास मद में केन्द्र से राज्य सरकार के जरिये मिलने वाले सलाना 100 करोड़ की राशि अपना रक्षा कवच(हिंसा) मजबूत करने और गुलछरें उड़ाने में उपयोग करते रहे । यह सिलसिला अक्टूबर 2007 के बाद समाप्त हुआ, जब जीएनएलएफ से निकलकर जीजेएम अस्तित्व में आया और सुभाष घीसिंग को बीते दिनों का नेता घोषित करके राज्य सरकार ने परिषद का अध्यक्ष पद उनके हाथ से छीन लिया । अब गोरखालैंड आंदोलन का तीसरा प्रभावशाली नेतृत्व एबीजीएल तैयार है, जिसने जीजेएम विरोधी सात गुटों के समर्थन का दावा किया है 24 जुलाई की बातचीत से पहले मदन तमांग की पत्नी भारती तमांग ने पति के उत्तराधिकारी के रूप में एबीजीएल का अध्यक्ष बनने के बाद राज्य और केन्द्र सरकार दोनों को लोगों का ध्यान हटाने के लिये बातचीत का सिलसिला जारी रखने की जीजेएम की ‘साजिश’ के बारे में पत्र लिखकर बताया और हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग को लेकर आमरण अनशन करने की धमकी दी । जीजेएम नेताओं ने भी आमरण अनशन की धमकी देकर केन्द्र पर बातचीत के लिये बुलाने का दवाब डाला ।

सिर्फ हिंसा की राजनीति करनेवाले नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड(एनएससीएन - आइसाकमुइवा) नेता एन.मुइवा उसी समय दिल्ली में केन्द्रीय गृह मंत्री पी.चिदंबरम से मिले । और जेल में बन्द युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम(उल्फा) नेताओं से मिलने केन्द्र की ओर से बातचीत शुरू करने के लिये नियुक्त वार्ताकार पूर्व खुफिया अधिकारी पी.सी.हल्दर गुवाहाटी गये । मुइवा नागालैंड और पड़ोसी राज्यों के नागा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’ राज्य गठन की मांग केन्द्र से मनवाने के लिये 13 वर्षों में 67 दौर की वार्ता कर चुके हैं । उल्फा चेयरमैन अरबिंद राजखोवा को भी हिंसा की ही बदौलत ‘स्वतंत्र संप्रभु असोम’ चाहिये, जिसके लिये केन्द्र सरकार ने उन्हें ढाका से ‘बातचीत’ के लिये रहस्यमय तरीके से मंगवा कर जेल में डाला । यह मामला गोलमटोल है कि उनसे वार्ता जेल में ही होगी या रिहा करके, जिस सिलसिले में हल्दर गुवाहाटी गये ।