अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन चला रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) की केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम से आठवें दौर की वार्ता भी किसी ‘ठोस’ नतीजे पर पहुंचे बिना समाप्त हो गयी । यह बातचीत अब तक की वार्ताओं से कई मायने में अलग किस्म की थी । क्योंकि गोरखा नेताओं ने अपनी मांग मनवाने के लिए लगभग महीने भर तक चलनेवाले चरणबद्ध आंदोलन को दो दिन का अंतराल सिर्फ केन्द्रीय गृहमंत्री की ओर से बातचीत का न्योता मिलने के बाद ही दिया । जैसा कि जीजेएम प्रवक्ता हरका बहादुर छेत्री का कहना है । इस बार का अल्टीमेटम भी पहले से अलग था, जिसमें केन्द्र और पश्चिम बंगाल सरकार को चेतावनी दी गयी थी कि अलग गोरखालैंड राज्य पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करें । इसमें जीजेएम नेताओं ने मुख्य रूप से केन्द्र पर निशाना साधा और यह भी चेता दिया कि गोरखालैंड को तेलंगाना की तरह लटकाए रखने की नीति नहीं चलने दी जाएगी । इसलिए नए सिरे से गोरखालैंड आंदोलन शुरू करने का फैसला 6 जनवरी को दिया गया, जब केन्द्र की ओर से तेलंगाना पर गठित श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक की गयी और गोरखा नेताओं को पता चला कि इसमें तेलंगाना राज्य गठन का स्पष्ट उल्लेख नहीं है ।

जीजेएम(गोरखा जनमुक्ति मोर्चा) अध्यक्ष विमल गुरूंगा और महासचिव रोशन गिरि को केन्द्रीय गृहमंत्री से दिसंबर में हुई सातवें दौर की वार्ता के बाद से श्रीकृष्ण कमिटि की रिपोर्ट का इंतजार था । उसके पहले ये दोनों अपने 31 दिसंबर अल्टीमेटम पर अड़े थे जिसके तहत केन्द्र सरकार को इस तारीख तक अंतरिम दार्जिलिंग क्षेत्रीय परिषद का गठन कर देने को कहा गया था, ताकि अलग राज्य की दर्जा हासिल करने का रास्ता खुले । केन्द्रीय गृह सचिव जी. के. पिल्लई ने ‘भरोसा’ दिलाया कि जल्द ही इस संबंध में केन्द्र अपना रवैया स्पष्ट करेगा, लेकिन इसकी कोई निश्चित तारीख नहीं बतायी गयी । गोरखा नेताओं को तेलंगाना वाली श्रीकृष्ण समिति की रिपोर्ट 31 दिसंबर तक केन्द्र को सौंप जाने की जानकारी थी ही । इस चक्कर में यह तारीख टल गयी और एक नयी चेतावनी जुड़ गयी कि केन्द्र सरकार विधान सभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले अंतरिम परिषद का गठन कर दे, वर्ना दार्जिलिंग में चुनाव नहीं होने दिया जाएगा । उस समय तक गोरखालैंड आंदोलन को ढोला करने में केन्द्र को थोड़ी बहुत सफलता मिल चुकी थी, क्योंकि गोरखा नेता इस बात पर सहमत हो गये कि अंतरिम क्षेत्रीय परिषद का गठन अगर जल्द हो जाए तो वे अलग राज्य का दर्जा पर ज्यादा जोर(फिलहाल) नहीं देंगे ।

श्रीकृष्ण कमिटि की रिपोर्ट आ गयी और पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव की तैयारी भी शुरू हो गयी । उधर आंध्रप्रदेश में सत्तारूढ़ कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने तेलंगाना राष्ट्र समिति की तरह श्रीकृष्ण कमिटि की रिपोर्ट ठुकराकर नए सिरे से आंदोलन छेड़ दिया ।

अब गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की पारी थी, जिसके लिये सभी नेता जनवरी के पहले सप्ताह में श्रीकृष्ण कमिटि की रिपोर्ट आने के तुरंत बाद जुट गए । शुरूआत 12 जनवरी को दार्जिलिंग बंद और हड़ताल से हुई । फिर थोड़ी सी ढील देकर पदयात्रा भी उसमें शामिल किया गया, जिसका नेतृत्व दोनों शीर्ष नेता विमल गुरूंग और रोशन गिरि कर रहे थे । इस बार का अल्टीमेटम था कि अलग गोरखालैंड राज्य की उनकी मांग पर केन्द्र अपना नजरिया स्पष्ट करे, वर्ना आंदोलन जारी रहेगा । जीजेएम केन्द्रीय समिति के वरिष्ठ नेता सह प्रवक्ता हरका बहादुर छेत्री ने 17 दिसंबर को एक हफ्ते के दार्जिलिंग बंद का ऐलान कर दिया । पुलिस की कोशिशों के बावजूद पूरे 7 दिनों तक जब जन-जीवन सामान्य नहीं हो पाया तो केन्द्रीय गृहमंत्री ने गोरखा नेताओं को वार्ता का बुलावा भेजा, जिसे तुरंत स्वीकार करके जीजेएम प्रतिनिधिमंडल दिल्ली पहुंचा ।

25 जनवरी को आठवें दौर की त्रिपक्षीय वार्ता पी. चिदंबरम से करके गोरखा नेताओं ने संवाददाताओं के सवालों का वही गोलमटोल जबाव दिया, जो अब तक देते रहे हैं और जहां से केन्द्र उन्हें निकलने नहीं दे रहा है।

दार्जिलिंग लोकसभा सीट से जीजेएम के समर्थन से जीते भाजपा नेता जसवंत सिंह पहली बार प्रतिनिधिमंडल के साथ गृहमंत्री से मिलने गये, लेकिन उन्होंने संवाददाताओं से मिलने में परहेज किया । पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य वार्ता में शामिल हुए और उन्होंने भी बातचीत का नतीजा बताने से इन्कार कर दिया । दोनों पक्षों ने चिदंबरम से अलग-अलग मुलाकात की । गृहमंत्री ने अलग राज्य की ‘औपचारिकताएं’ पूरी करने के लिए एक अंतरिम परिषद का पुराना प्रस्ताव फिर से दुहरा दिया । यह परिषद दो साल तक काम करेगा और 2007 से निष्क्रिय चल रहे दार्जिलिंग गोरखा पहाड़ी परिषद की जगह लेगा, जिसका गठन करने के लिए गोरखालैंड आंदोलन की नींव रखने वाले सुभाष घिसिंग ने केन्द्र और राज्य सरकार को 1988 में मजबूर कर दिया था । अब वर्तमान प्रस्ताव पर ‘अमल’ फरवरी के पहले सप्ताह तक हो जाने की ‘उम्मीद’ लेकर गोरखा नेता दार्जिलिंग लौटे हैं । परिषद के सदस्य मनोनीत होंगे या निर्वाचित और गठित होने तक आंदोलन जारी रहेगा या नहीं, यह भी तय नहीं है । पश्चिम बंगाल सरकार अलग गोरखालैंड की मांग पहले ही ठुकरा चुकी है और प्रस्तावित अंतरिम परिषद में भी मनोनीत सदस्य की जीजेएम की मांग भी मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को मंजूर नहीं है ।

तयशुदा कार्यक्रम के तहत दार्जिलिंग बंद के साथ-साथ आमरण अनशन गोरखा नेताओं के आंदोलन का अगला चरण है, ताकि केन्द्र सरकार को तेलंगाना की तर्ज पर कुछ ‘ठोस’ एलान करना पड़ जाए । संसद का बजट सत्र उस समय चलता रहेगा । लेकिन उनके सांसद जसवंत सिंह ने 2009 के आम चुनाव के बाद से आजतक गोरखालैंड मामले में कोई रुचि नहीं ली, जबकि वे इसी को जोरदार तरीके से उठाने के वायदे पर चुनाव जीते । इसलिए उम्मीद कम है कि जसवंत सिंह दार्जिलिंग में या दिल्ली में अनशन पर बैठेंगे और तेलंगाना की तर्ज पर लोकसभा की सीट से इस्तीफा देंगे । अगर वे इस्तीफा दे भी दें तो भी उस एकमात्र लोकसभा सीट के खाली होने का कांग्रेस और वाममार्चा तो क्या भाजपा के भी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा । पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ वाममोर्चा को विधान सभा चुनाव में पटखनी देने के लिए गोरखा वोट मांगने सितंबर में दार्जिलिंग जाकर दो दिन रूकी तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष रेलमंत्री ममता बनर्जी के पास गोरखालैंड समस्या का ‘हल’ है, मगर यह तभी निकलेगा जब जीजेएम उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को जिताए । ममता बनर्जी और उनके साथी लोकसभा सदस्य भी गोरखालैंड के समर्थन में तेलगांना की तरह इस्तीफा देंगे तथा अनशन पर बैठेंगे, इसकी भी कोई संभावना नहीं है । ममता बनर्जी ने इस विधान सभा चुनाव से पहले किसी भी चुनाव में दार्जिलिंग के मामले में कोई रुचि नहीं ली ।

गोरखालैंड विरोधी गुट सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समर्थित ‘बांगला ओ बांगला भाषा बचाओ’ आंदोलन के विरोध के चलते विमल गुरूंगा और रोशन गिरि को जिला प्रशासन ने न्यूजलपाईगुड़ी के जलगांव में पदयात्रा नहीं करने दिया । जीजेएम विरोधी डेमोक्रेटिक फ्रंट में शामिल पांच गुट परिषद गठन के मुद्दे पर राज्य सरकार के साथ है, जिसकी बातचीत में शामिल करने की मांग अभी तक नहीं सुनी गयी है। इस गुट का अखिल भारतीय गोरखा लीग मुख्य घटक है, जिसके नेता मदन तमांग की गत वर्ष मई में कथित रूप से जीजेएम समर्थकों ने हत्या कर दी । मुख्य अभियुक्त निकोल तमांग गिरफ्तार होने के बाद जब जेल से छूट गया तो राज्य सरकार ने मामला केन्द्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दिया । जांच की मॉनिटिरिंग कर रहे कोलकाता हाईकोर्ट ने सीबीआई से इसी पखवाड़े अबतक की प्रगति की रिपोर्ट मांगी है, जब जीजेएम नेता ‘व्यापक प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार’ प्राप्त अंतरिम परिषद का सर्वेसर्वा बनने के इंतजार में रहेंगे ।

ऐसे परस्पर विरोधाभासों वाले माहौल में जीजेएम नेता हिंसा की बदौलत अपने आंदोलन का तेलंगाना वाला हश्र न होने देने के प्रयास के बावजूद कमोवेश उसी दिशा में बढ़ रहे हैं । दिसम्बर में वे राहुल गांधी, केन्द्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी से भी मिले । जीजेएम नेताओं को मालूम होगा कि तेलंगाना राष्ट्रसमिति के नेता चन्द्रशेखर राव की हालत आमरण अनशन से चिंताजनक होने के बाद गृहमंत्री ने संसद में तेलंगाना बनाने की घोषणा की(9 दिसम्बर 2010)। उसके बाद सांसदों, विधायकों के सामूहिक इस्तीफे का सिलसिला चला, जिसमें सत्तारूढ़ कांग्रेस के भी थे । कांग्रेस ने आन्ध्रप्रदेश में दो आम चुनाव और विधान सभा चुनाव तेलंगाना बनाने के वायदे पर लड़ा है ।