चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे एसआईआर(प्न. स्पेशल इन्टेसिव रिवीजन. विशेष गहन पुनरीक्षण) पर संसद के शीतकालीन सत्र में दो दिन हंगामे के बाद सरकार चर्चा को तैयार हुई । सत्र शुरू होने के पहले दिन 01 दिसंबर और 02 दिसंबर को संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित करने की नौबत आ गयी । उसके बाद सरकार और इस मुद्दे पर एकजुट विपक्ष के बीच सहमति बनी, जिसे चुनाव सुधार पर चर्चा का नाम दिया गया । विपक्षी सदस्य एसआईआर(प्न) के काम में लगे बूथ स्तरीय अधिकारी(ठरू. बीएलओ) की मौतों पर चर्चा की मांग कर रहे हैं । इसको लेकर 03 दिसंबर को कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठजोड़ घटकों ने संसद भवन में प्रदर्शन भी किया ।

एसआईआर की चुनाव आयोग द्वारा तय समय.सीमा और मतदाता सूची के शुद्धीकरण के लिए अपनायी गयी प्रक्रियाको लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद में विपक्ष और सरकार आपने.सामने है । सरकार सुप्रीम कोर्ट से लेकर सार्वजनिक ढांचों पर चुनाव आयोग का बचाव कर रही है। इसी बजट से संसद का मानसून सत्र भी लगातार बाधित रहा ।

24 जून को चुनाव आयोग ने एसआईआर आदेश जारी किया, उसी समय से सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है ।

सरकार ने 09 दिसंबर को चुनाव सुधार चर्चा की तारीख तय की है, उसके पहले वंदे मातरम पर चर्चा होगी । लेकिन गतिरोध समाप्त होने या कम होने के लक्षण नहीं लगते ।

01 दिसंबर को संसद में जिन 40 बीएलओ की मौतों पर हंगामा हुआ, वे सभी स्कूल शिक्षक थे और जो काम कर रहे हैं, वे भी नहीं है ।

01 दिसंबर को ही सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की आंगनबाड़ी सेविकाओं की शिकायत सुनवाई के लिए मंजूर की । आंगनबाड़ी संगठन ज्ट्ज(टीवीके. तमिलगा नेत्री कक्षगम) की ओर से अर्जी लगानेवाले सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकर नारायण भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकान्त को बताया कि आंगनबाड़ी सेविकाओं को ‘अत्यधिक दबाव’ डालकर बीएलओ के काम में धकेला जा रहा है । इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 के सेक्शन 32 का हवाला देकर तीन महीनों की कैद और नौकरी से निकाले जाने की धमकी दी गयी है, जो समय.सीमा के अंदर लक्ष्य पूरा नहीं होने पर लागू होंगे । अभी तक तमिलनाडु में 21 बीएलओ की मौत हो चुकी है । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने कहा कि अगले हफ्ते एसआईआर पर अन्य याचिकाओं के साथ आंगनबाड़ी की शिकायत भी सुनी जाएगी । संसद में चर्चा भी अगले हफ्ते होनी है ।

2 दिसंबर को ही उत्तर प्रदेश के हातरस जिले से 45 वर्षीय बीएलओ के मौत की खबर आयी, उसे लगाकर विगत 11 दिनों के अंदर इस राज्य में बीएलओ मौतों की संख्या 9 तक पहुंच गयी है । उत्तर प्रदेश में 2027 में चुनाव होना तय है ।

तमिलनाडु के साथ पश्चिम बंगाल, असम, केरल और पुडुचेरी में अप्रील.मई, 2026 में चुनाव होंगे ।

मतदाता की नागरिकता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने जो प्रक्रिया अपनायी है, वही विवाद का असली बिंदु है । सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने जो अपना पक्ष रखा है, उसका फोकस नागरिकता की पहचान के लिए चुनाव आयोग द्वारा रखे गए मानदंडों पर है । सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु संघवी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि नागरिकता सुनिश्चित करने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं है । इस मसले पर चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त नहीं कर पा रहा है ।

एसआईआर पर अर्जियां राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस और एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफोर्मस( एडीआर) ने लगा रखी है ।

बीएलओ की मौतों के संबंध में घटनास्थल से जो रिपोर्ट आ रही है, उसमें मौत का कारण काम का अत्यधिक बोझ और निर्धारित समय में गहन मतदाता पहचान का काम पूरा करने के लिए चुनाव आयोग के दबाव से तनाव बताया गया है ।

पश्चिम बंगाल में इन मौतों को लेकर राज्य सरकार, राज्य चुनाव अधिकारीए केन्द्रीय चुनाव आयोग में टकराव और एसआईआर तथा चुनाव तैयारियों में जुटे अधिकारियों में तनाव साथ.साथ चल रहा है ।

पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़़ दल टीएमसी(ज्डब्. तृणमूल कांग्रेस) के 10 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की । उनमें अधिकांश संसद सदस्य थे, जिन्होंने चुनाव आयोग की पूर्ण पीठ से कहा कि मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के कारण कम.से.कम 40 बीएलओ की मौतें हुई हैं । चुनाव आयोग ने आरोपों को तो खारिज कर दिया । लेकिन इस गंभीर समस्या को आयोग ने सिर्फ राज्यों में काम कर रहे एसआईआर कर्मियों और राज्य सरकारों पर ही छोड़ा हुआ है ।

28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर पर सुनवाई चल रही थी और उसी दिन तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधिमण्डल निर्वाचन आयोग की टीम से मिले । उधर गहन पुनरीक्षण के गणना फार्म वितरण और उसके डिजीटलाइजेशन के काम में जुटे बूथ स्तरीय अधिकारियों(बीएलओ) के मौतों की खबरें भी आ रही थीं । पश्चिम बंगाल के बाद गुजरात से भी ऐसी खबर आयी । कोलकाता से प्राप्त सूचना के अनुसार 24 परगना जिले में एक बीएलओ जाहिर हुसैन का दिल का दौरा पड़ने के कारण अस्पताल में इंतकाल हो गया । 28 नवंबर तक पश्चिम बंगाल में अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती बीएलओ की संख्या 14 और मरनेवालों की संख्या बढ़कर 4 हो चुकी थी । इसका उल्लेख मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) ने भी एक दिन पहले किया और बीएलओ लोगों को बेहद तनाव के बावजूद आत्महत्या जैसे कदम न उठाने कहा ।

गुजरात के मेहसाना जिले में एसआईआर के काम में लगाए गए एक 50 वर्षीय स्कूल शिक्षक की भी दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गयी । गुजरात में विपक्षी दल कांग्रेस और शिक्षा संगठनों ने दावा किया कि चुनाव आयोग द्वारा दी गयी डेडलाईन पूरी करने के लिए सुबह से देर रात तक तनाव में काम करने के कारण गुजरात में मरनेवाले दिनेश रावत तीसरे बीएलओ हैं । विपक्ष और शिक्षक संगठनों का कहना है कि गुजरात में अभी चुनाव में देर है, उसके बावजूद शिक्षकों को स्कूल कक्षाएं छोड़कर चुनाव आयोग के दबाव में काम करना पड़ रहा है । इससे बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है, पाठ्यक्रम पूरा करना मुश्किल हो रहा है और स्कूलों की वार्षिक परीक्षा करीब है ।

जब मौत की खबरें एसआईआर के दूसरे चरण के एलान के बाद से शुरू हुई उसी समय चुनाव आयोग ने यह कहकर पल्ला छाड़ लिया कि बीएलओ लोगों में जल्दी काम पूरा करने की आपस में ‘होड़’ मची है, इसलिए ज्यादा देर तक काम करके तनाव ‘बढ़ा’ लिया है ।

संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने की तारीख करीब आ गयी और केंद्र सरकार के साथ.साथ चुनाव आयोग ने भी उसी हिसाब से तैयारी कर ली । पूरे देश में भाजपा विरोधी सभी राष्ट्रीय क्षेत्रीय दलों का आरोप है कि संवैधानिक संस्था होने के बावजूद चुनाव आयोग केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार के राजनीतिक एजेंडे के आधार पर मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम कर रहा है । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने यह तो हर सुनवाई में कहा कि चुनाव आयोग संविधान से प्राप्त अधिकार के तहत अपना काम कर रहा है, लेकिन अनियमितता और कोई कानूनी गड़बड़ी की शिकायत मिलने पर कोर्ट हस्तक्षेप करेगा । चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट को चुनौती दे चुका है कि शीर्ष कोर्ट को चुनाव के काम में हस्तक्षेप का अधिकार ही नहीं है । लेकिन उसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट लगातार कैफियत मांग रहा है और चुनापव आयोग को जवाब देना पड़ रहा है ।

संसद सत्र शुरू होने से एक दिन पहले चुनाव आयोग ने मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण का समय एक सप्ताह बढ़ाने का एलान किया । 12 राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में चलाए जा रहे दूसरे चरण के एसआईआर कर्मियों को एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिए जाने के बाद अब मसौदा सूची 16 दिसंबर को प्रकाशित होगी और अंतिम मतदाता सूची 14 फरवरी, 2026 को जारी की जाएगी ।

परिपाटी के अनुसार संसद सत्र शुरू होने से एक दिन पहले केंद्र सरकार द्वारा बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में 30 नवंबर को एसआईआर मुद्दा उठना तय था ।

30 नवंबर को चुनाव आयोग ने यह भी दावा किया कि नागरिकता जांच करने की केंद्र की शक्ति ‘सीमित’ है और नागरिकता कानून, 1955 तथा जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 का हवाला देते हुए कहा कि इन दोनों कानूनों के तहत कोई संसदीय कानून चुनाव आयोग के अधिकारक्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकता । गौरतलब है कि बिहार विधान सभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट पीठ ने एसआईआर पर सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से कहा कि अपने दायरे में रहे, नागरिकता जांच का काम केंद्रीय गृह मंत्रालय का है। बिहार चुनाव के बाद नवंबर के अंतिम सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर को चुनौती देनेवालों को बिहार चुनाव की सफलता का उदाहरण दिया। उसके बाद चुनाव आयोग ने दावा किया कि मतदाता सूची के पंजीकरण के लिए ‘नागरिकता सुनिश्चित’ करने का उसके पास अधिकार है। 30 नवंबर को चुनाव आयोग ने एसआईआर डेडलाईन समय.सीमा मात्र एक हफ्ते बढ़ाने का एलान किया उस दिन भी राजस्थान और पश्चिम बंगाल से एक.एक बीएलओ की मौत की खबर आयी । एक दिन पहले केरल और पश्चिम बंगाल ने एसआईआर के क्फ्रम में मतदाता सूची की पड़ताल का आंकड़ा सार्वजनिक किया । बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी के अनुसार 27 लाख वोटरों की पहचान ‘मृत’ के रूप में हुई है। केरल के मुख्य चुनाव अधिकारी का विवरण चौंकानेवाला है । उनके अनुसार गहन पुनरीक्षण के दौरान कुल 8ए80ए344 मतदाताओं में 3ए79ए729 मतदाता ‘मृत’ के रूप में सूचीबद्ध किए गए हैं। मृतक मतदाताओं को तो चुनाव आयोग ने खोज निकाला यह काम मतदाता सूची की सफाई की दृष्टि से अच्छा है। मगर इस काम में लगे बीएलओ स्वयं ‘मृत’ सूची में दर्ज हो रहे हैं और अस्पतालों में मृत घोषित किए जाने की हालत में हैं। इससे हाल.चाल खराब हो गया है। चुनाव आयोग इससे बिल्कुल बेखबर एसआईआर फार्म वितरण और उसके डिजिटलाइजेशन का आंकड़ा प्रस्तुत किए जा रहा है। सत्र शुरू होने से एक दिन पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित सर्वदलीय बैठक में संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने एसआईआर चर्चा पर कोई वायदा नहीं किया और जब संसद की कार्यवाही स्थगित करने की नौबत आयी तो कहा कि सरकार चर्चा के लिए तैयार है। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष का रवैया इस सत्र में मानसून सत्र से ज्यादा आक्रामक है। संसद के दोनों सदनों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है और विपक्षी नेता कांग्रेसि हैं। नवंबर में संपन्न बिहार चुनाव में कांग्रेस बिल्कुल निचले पायदान पर चली गयी। बिहार चुनाव से ही शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देनेवालों में कांग्रेस भी है। संसद के मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों में हंगामा हो रहा था, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। अभी शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले दिल्ली पुलिस ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ नेशनल हेराल्ड मामले में एफआईआर दर्ज किया। दोनों सदनों में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के बाद दूसरी बड़ी पार्टी समाजवादी पार्टी है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़़ डीएमके और तृणमूल कांग्रेस के सभी सदस्यों ने सरकार पर मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया। सरकार ने एसआईआर की जगह वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरा होने पर संसद में चर्चा की तारीख घोषित की, जिसमें किसी भी दल को कोई दिलचस्पी नहीं थी। संसद का सत्र 19 दिसंबर तक चलना तय है और एसआईआर समय.सीमा चुनाव आयोग ने 09 दिसंबर से बढ़ाकर 16 दिसंबर की है। इसलिए हंगामा जारी रहने की संभावना लगती है। एसआईआर विवाद में संवैधानिक और राजनीतिक के साथ.साथ नागरिकता संशोधन कानून, 2019(सीए) भी गुंथ गए हैं। इसलिए मामला जटिल होता जा रहा है। विपक्षी दलों ने बिहार चुनाव के समय ही चुनाव आयोग पर बांग्लादेश घुसपैठिए की आड़ में अल्पसंख्यक मुसलमान मतदाताओं की बहुलता वाले इलाकों में एसआईहार चलाने को भाजपा का अजेंडा लागू करने का आरोप लगाया। विपक्षी दलों की यह भी शिकायत रही कि नागरिकता के दस्तावेजों में माता.पिता का जन्मस्थान, जन्मतिथि, आवास प्रमाण पत्र ऐसे.ऐसे कागजात मांगे गए जो मूल भारतवंशियों को भी जुटाना कठिन है। सुप्रीम कोर्ट भी वोटर के रूप में आधार कार्ड को एक कागजात मानने को तो चुनाव आयोग से कहा, मगर यह भी कहा कि यह नागरिकता का प्रमाण जांच के बाद ही माना जाए। बिहार से ज्यादा बांग्लादेश मामला पश्चिम बंगाल में विवाद की सुर्खी बनाए जो जारी है। एक दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक बंगाली गर्भवती सुनाली को उसके परिवार समेत बांग्लादेश होन के संदेह में ढाका भेजने पर जवाब मांगा। जून में सुनाली के 5 साल के पुत्र और पति दानिश शेख समेत परिवार के 6 सदस्यों को दिल्ली पुलिस ने संदिग्ध बांग्लादेशी बताकर हिरासत में रखा और फिर बांग्लादेश भेज दिया । उनकी अर्जी पर कलकता हाईकोर्ट ने सुनाली के परिवारजनों का निर्वासन गैरकानूनी बताया । उस फैसले को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । क्योंकि कलकता हाईकोर्ट के केंद्र को 4 हफ्ते के अंदर सुनाली परिवार को वापस लेने का निर्देश दिया । सुप्रीम कोर्ट से हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा ।

02 मई से केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार घुसपैठियों की नागरिकता की जांच करके उन्हें निकाल बाहर करने का काम जिला मजिस्ट्रेटों ने शुरू किया । फिर जून के अंतिम सप्ताह से चुनाव आयोग ने एसआईआर के काम में लगे बीएलओ को नागरिकता जांच का अधिकार दे दिया, जो मामला सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया ।

जिन पांच राज्यों में अप्रील.मई, 2026 में चुनाव होने हैं, उनमें सिर्फ असम में भाजपा की सरकार है । 240602025 को जारी एसआईआर आदेश पूरे देश के लिए था, लेकिन असम के लिए नहीं । इस संबंध में विपक्षी दलों के सवालों का जवाब चुनाव आयोग टालता रहा । बिहार चुनाव संपन्न होने के बाद असम में 17 नवंबर को चुनाव आयोग ने असम में जो विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण का एलान किया, उसमें अन्य राज्यों की तरह ‘गहन’ प्रक्रिया शामिल नहीं की । इसका कारण नेशनल नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) की लंबित हालत बताया गया । असम से ही घुसपैठ का राजनीतिक मामला उजपा है, जहां सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में 2013 से 2019 तक नागरिकता पहचान का काम चलाए मगर झमेला अभी तक कायम है ।

2019 एनआरसी(छल्ब) सूची में असम के 3ण्3 करोड़ आवेदकों में से 19 लाख का नाम हटा दिया गया । ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र यूनियन की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजकर एनआरसी का काम पूरा करने कहा । अर्जी में सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया गया कि अंतिम एनआरसी में शामिल 3ण्1 करोड़ को राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी नहीं किया गया है, न ही 19 लाख आवेदकों को हटाए जाने की कोई स्लिप दी गई है ताकि वे विदेशी ट्राइबुनल में अपील कर सकें । असम सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में एनआरसी को चुनौती दे रखी है ।

पश्चिम बंगाल के ठाकुरनगर में मटुआ हिन्दू अल्पसंख्यक बांग्लादेशी मूल के हैं । भाजपा ने 11 दिसंबर, 2019 को पास सीएए(नागरिकता संशोधन कानून) के अंतर्गत नागरिकता प्रदान करने के वायदे पर दो लोकसभा चुनाव में मटुआ वोटरों का समर्थन लिया । 2024 में तृणमूल कांग्रेस ने उपचुनाव जीता ।

अब एसआईआर के कारण मटुआ समुदाय का भविष्य अधर में है । तृणमूल कांग्रेस से मटुआ समुदाय की राज्य सभा सदस्य ममता वाला ठाकुर और यहां से सांसद केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर दोनों ही मटुआ लोगों को सीएए के तहत नागरिक बनाने के लिए दबाव बना रहे हैं। मटुआ लोगों ने भूख हड़ताल कर रखी है ।

एसआईआर का दूसरा डर ये है । 6 वर्षों में सीएए के अंतर्गत लगभग 50ए000 आवेदकों का भी मामला लंबित है जो सीएए प्रावधानों में आते हैं । सीएए में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के प्रताड़ित अल्पसंख्यक हिंदू, सिख, इसाई, बौद्ध, पारसी, जैन लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया । अभी तक नागरिकता से वंचित इनलोगों की अर्जी सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई के लिए मंजूर कर ली है ।

चुनाव आयोग के निर्देश पर वर्तमान सूची से 2003 की मतदाता सूची की मैपिंग फैमिली ट्री बनाते हुए की जा रही है, जैसा कि झारखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय का कहना है । 2003 में केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार थी । सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि 2012 और 2014 में मतदाताओं की संख्या कुल युवा आबादी से ज्यादा हो गयी । क्या मतदाता सूची को सही नहीं किया जाना चाहिए 6 उन्होंने बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण का उदाहरण दिया । झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस गठजोड़ सरकार के मंत्री इरफान अंसारी ने लोगों से कहा कि बीएलओ घर आए तो बांध कर रखें ।