जम्मू व कश्मीर में जारी आतंकी गतिविधियां, आतंकियों पर काबू पाने के लिए फर्जी मुठभेड़ समेत सैनिक अभियान और इन सबके बीच चल रही केन्द्र की शांति वार्ता इस हफ्ते खतरनाक मोड़ पर पहुंच गयी, जब राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को अपनी यूरोप यात्रा के क्रम में कश्मीर से संबंधित मुद्दे पर सफाई देनी पड़ी।

वैसे तो 50 वर्षों के दौरान युद्ध के माहौल में पाकिस्तान से चल रही शांति बातचीत, यूरोपीय देशों को विश्वास में लेकर, में भी उतार-चढ़ाव आए हैं, लेकिन यह पहला अवसर है जब यूरोपीय संसद के अध्यक्ष ने किसी भारतीय राष्ट्रपति से कश्मीर की चर्चा की। यह चर्चा इस मायने में भारत के लिए अर्थ रखती है, क्योंकि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने कश्मीर मसले का बातचीत से हल निकालने के तोता-रटंत सुझाव के बजाय अफजल गुरु के क्षमादान पर दबाव डाला और वह भी उस समय जब कलाम स्ट्रैसबर्ग में यूरोपीय संसद को संबोधित कर रहे थे। उसी वक्त ब्रुसेल्स स्थित यूरोपीय कश्मीर केंद्र के प्रदर्शनकारी बाहर कश्मीर पर भारत के जबरन कब्जे के खिलाफ नारे लगा रहे थे।

विदित हो कि भारतीय संसद पर हमले का आरोपी अफजल गुरु कश्मीर का है, जिसे अदालत की ओर से सजा-ए-मौत सुनायी जा चुकी है और उसकी क्षमादान याचिका राष्ट्रपति के पास लगभग साल भर से विचाराधीन है।

इस हफ्ते कश्मीर से जुड़े घटनाक्रमों का सिलसिला कुछ ऐसा नाटकीय रहा कि एकबारगी लगा मानो सारा कुछ पूर्व नियोजित हो और उसका तार विदेशों से जुड़ा हो। चूंकि यह सब ऐसे माहौल में हुआ है जब केन्द्र सरकार सिर्फ हिंसा की बदौलत आजादी, यानी कश्मीर की आजादी, हासिल करने वाले अलगाववादी हुर्रियत नेताओं को विश्वास में लेने के लिए शांति वार्ता पर काफी जोर दे रही है। इससे विश्वास कायम करने के उपायों में कोई उल्लेखनीय प्रगति होने का वृत्तांत तो नहीं मिलता, क्योंकि अविश्वास के वातावरण में विश्वास बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं और इसमें कुछ भी नया नहीं है। लेकिन सिर्फ मीडिया के सामने ही सही, मुस्कुराहट का भाव लाकर हाथ मिलाने से जो थोड़ी-बहुत मिठास की अनुभूति हुई, उसका असर दिखने से पहले ही खटास का माहौल बन गया।

एक ओर दुनियाभर में चर्चा का विषय बना कि यूरोपीय संसद के अध्यक्ष हान्स गर्ट पोटरिंग ने राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम पर अफजल को माफी देने के लिए ‘दबाव’ डाला, जिसके लिए राष्ट्रपति को वापसी में सफाई देनी पड़ी और इस बात का खंडन करना पड़ा। दूसरी ओर उसी वक्त पीओके, यानी पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर, जिसका पाकिस्तान की ओर से अंतरराष्ट्रीय जगत में ‘आजाद कश्मीर’ कहकर प्रचार किया जाता है, के पूर्व तथाकथित राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री सरदार अब्दुल कय्यूम खां ने कश्मीर से सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम वापस लेने की दिल्ली आकर वकालत की।

तीसरी ओर उसी वक्त विश्वास बनाने के उपायों के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा गठित कार्यदल के अध्यक्ष एम.ए. अंसारी ने भी इस अधिनियम को कश्मीर से खत्म करने की सिफारिश की और चौथी ओर ठीक उसी वक्त पाकिस्तानी सैनिक शासन के कश्मीर मंत्रालय ने वहां की संसद नेशनल एसेम्बली में बयान दिया कि आत्मनिर्णय का अधिकार कश्मीरियों को मिले बिना इस मसले का हल नहीं निकल सकता; भारत सरकार बंदूक की नोक पर शांति वार्ता चला रही है।

यह सारा कुछ ऐसे वक्त में हुआ है जब हाल में समाप्त तीसरे गोलमेज सम्मेलन (24 अप्रैल) की उपलब्धियों के आलोक में चौथे दौर के एजेंडे पर विचार हो रहा है। कश्मीर पर एक मैत्रीपूर्ण नतीजे पर पहुंचने के लिए पिछले वर्ष से शुरू गोलमेज सम्मेलनों के दूसरे दौर में मनमोहन सिंह स्वयं श्रीनगर में मौजूद थे (24-25 मई) और उन्होंने ही कश्मीर पर विकल्प सुझाने के लिए पांच कार्यदल गठित किए, जिनमें से एक दल के अध्यक्ष राजनयिक एम.ए. अंसारी हैं।

इन्हें सबसे महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया, जो सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम से सीधे तौर पर जुड़ा है। वैसे सरकार उनसे ऐसे सुझाव की उम्मीद नहीं कर रही थी, क्योंकि अभी तक बातचीत के जितने दौर हुए हैं, किसी में भी केन्द्र ने इस विषय को एजेंडे में नहीं रखा और जहां तक संभव हुआ, इस पर विचार टाला। यहां तक कि इसी बात को लेकर कश्मीर की कांग्रेस-पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) गठबंधन सरकार में भी दरार पड़ी हुई है, जिसे पाटने की कोशिश में केन्द्र सरकार को सफलता नहीं मिल रही है।

हालत यह है कि सरकार के किसी भी समय गिरने की नौबत है, जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने अपना राजनैतिक संन्यास त्यागने और इस वर्ष के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही कहा है। अभी कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री हैं, जिन्हें पीडीपी प्रमुख मुफ्ती मुहम्मद सईद द्वारा मुख्यमंत्री पद की पहली पारी पूरी करने के बाद राज करने का मौका मिला है। गुलाम नबी आजाद सशस्त्र बल कानून वापस लेने के पक्ष में नहीं हैं और तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने पहुंचे सईद ने माहौल अनुकूल बनाने की पहली शर्त यही रखी।

हुर्रियत नेताओं का एक बड़ा तबका गोलमेज सम्मेलनों का बायकाट कर रहा है। इन नेताओं को भारत सरकार की ओर से आयोजित ऐसे सम्मेलनों में भाग लेने की सलाह देने वाले राजनीतिक मुख्यधारा से जुड़े नेता वैसे ही हैं, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पाक समर्थित हुर्रियत संगठनों से मिले हैं। हुर्रियत नेता हमेशा से कश्मीर मसले का हल निकालने के लिए त्रिपक्षीय बातचीत पर बल देते रहे हैं। अर्थात उनके मुताबिक इस समस्या का हल पाकिस्तान को बातचीत में शामिल किए बिना नहीं निकाला जा सकता। ‘गोली से नहीं, बोली से’ का नारा देकर विधानसभा चुनाव जीतने वाले मुफ्ती मुहम्मद सईद या गुलाम नबी आजाद में से किसी ने भी हुर्रियत के इस रवैये की आलोचना नहीं की।