जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक हालातों पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक के विषय में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं ।
24 जून को दोपहर बाद दिल्ली में आयोजित इस बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे । बैठक में शामिल होने के लिए जम्मू व कश्मीर की सभी प्रमुख पार्टियों को भारत सरकार की ओर से बुलावा भेजा गया है ।
बैठक का परिणाम जो भी सामने आए, लेकिन ऐसी पहल एक अच्छा संकेत है । जम्मू व कश्मीर राज्य को विशेष संवैधानिक दर्जा समाप्त करके दो संघशासित क्षेत्रों(यूटी) में बांटे जाने के बाद से यह पहली महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधि है । 05-08-2019 को लागू जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 से इस राज्य की संवैधानिक हैसियत बदल गयी । उसके बाद नवंबर-दिसंबर 2019 में जिला विकास परिषद चुनाव हुए । मगर केंद्र सरकार और जम्मू व कश्मीर की मुख्यधारा वाली स्थानीय पार्टियों के बीच संवादहीनता की स्थिति थी । राजनीतिक दलों ने चुनाव में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली । क्योंकि राज्य के प्रमुख दल विशेष संवैधानिक दर्जा वाले अनुच्छेद 370 की वापसी पर अड़े थे । अगस्त, 2019 में धारा 370 खत्म किए जाने के बाद चलाए गए धरपकड़ अभियान में जेल में डाले गए सभी प्रमुख नेताओं में से अधिकांश पर डीडीसी(जिला विकास परिषद) चुनाव के समय भी पाबंदी थी । उसके बाद से तनातनी का माहौल था ।
जम्मू व कश्मीर की सबसे प्रभावशाली जनाधार वाली पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस के अध्यक्ष डा. फारूख अब्दुल्ला की अध्यक्षता में प्रमुख दलों का गठजोड़ 370 वापसी तक लड़ाई जारी रखने के लिए बना । यह तो असंभव था कि भारत सरकार अपने इस फैसले पर पुनर्विचारर करे ।
इस गतिरोध को कम करने और आपसी अविश्वास की खाई को पाटने के लिए दोनों पक्षों ने अपना अड़ियल रवैया बदला है । हवा का रूख बदलने और राजनीतिक हलचल प्रक्रिया बहाल करने की पहल कायदे से देखा जाए तो जम्मू व कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला की ओर से ही हुई। केंद्र सरकार के रवैए से लगा मानो संपर्क का सिलसिला शुरू करने के लिए ऐसी पहल के इंतजार में थी ।
फारूख अब्दुल्ला की अध्यक्षता वाले गुपकार गठजोड़(पीएजीडी - पीपुल्स एलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन) की 9 जून को श्रीनगर में बैठक शायद केंद्र को यही संदेश देने के लिए बुलायी गयी थी । लगभग 6 महीने के अंतराल के बाद हुई उस बैठक में फारूख अब्दुल्ला ने संवाददाताओं से साफ-साफ कहा - ‘हमने कोई दरवाजे और विकल्प के रास्ते बंद नहीं किए हैं । अगर केंद्र सरकार हमें बातचीत के लिए बुलाएगी, तब हम तय करेंगे । फारूख अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि धारा-370 वापसी के लिए 04/08/2019 को ही तैयार अपने डिक्लेरेशन पर गुपकार गठजोड़ कायम है । उन्होंने जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को चेताया कि ‘पुलिस का दवाब बढ़तार जा रहा है । बेकसूरों को हिरासत में डालना बंद किया जाना चाहिए । बर्ना लोग इतने ज्यादा खिलाफ हो जाएंगे कि संभालना कठिन हो जाएगा ।’ पीएजीडी बैठक में पीडीपी नेता महबूबा ने सुप्रीम कोर्ट के रवैए पर भी असंतोष जताया, जहां धारा-370 हटाए जाने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई डेढ़ साल से लंबित है ।
गुपकार गठजोड़ मिलान के हफ्ते भर बाद केंद्र सरकार ने 18 जून को जम्मू व कश्मीर पर बैठक की । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिंहा, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के अलावे खुफिया ब्यूरो आईबी, रॉ प्रमुख और जम्मू व कश्मीर के पुलिस प्रमुख भी उस बैठक में मौजूद थे । वो बैठक तो जम्मू व कश्मीर में विकास और सुरक्षा हालातों की समीक्षा के लिए बुलायी गयी थी । मगर उसका नतीजा जम्मू व कश्मीर में सामान्य राजनीतिक स्थिति बहाली की दिशा में एक सार्थक जवाबी पहल के रूप में सामने आया । केंद्र सरकार ने जम्मू व कश्मीर के सभी दलों को बातचीत के लिए बुलावा भेजा और 24 जून की तारीख तय करके यह भी बता दिया कि बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे । पूर्व जम्मू व कश्मीर मुख्यमंत्री पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सबसे पहले रिस्पांस किया और कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय से उनको फोन आया, मगर उन्हें गुपकार गठजोड़ के रूख का इंतजार है ।
पीएजीडी(गुपकार गठजोड़) के प्रवक्ता सीपीएम नेता एम. वाई. तारीगामी ने भी बुलावे की पुष्टि की, मगर बातचीत के एजेंडे के बारे में कह दिया कि जम्मू व कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा और विशेष संवैधानिक हैसियत लौटाना पीएजीडी की पहली प्राथमिकता है ।
केंद्र सरकार ने बुलावा भेजने के समय से ही कयास चल रहे हैं कि विधान सभा चुनाव तैयारी के सिलसिले में सीटों के परिसीमन के सम्बन्ध में बातचीत की संभावना है । पीएजीडी घटकों में केंद्र की ओर से आए बुलावे को लेकर अटकलें चल रही हैं । धारा-370 वापसी पर अड़ियल रवैए पर पहले से मतभेद हैं । उसके बाद बैठक में शामिल होने को लेकर भी मतभेद हैं । श्रीनगर से प्राप्त सूत्रों के अनुसार पीएजीडी घटक दलों की 24 जून की सुबह बैठक होगी, जिसमें अंतिम निर्णय किया जाएगा । प्रधानमंत्री के साथ बैठक दोपहर बाद तीन बजे तय है । इन दो-तीन दिनों में सभी दल आपस में अलग-अलग 24 जून के बैठक में भाग लेने के विषय में विचार करेंगे । कांग्रेस ने कभी धारा 370 वापसी की बात नहीं करती ।
पीएजीडी से बाहर के प्रमुख दलों में कांग्रेस है, जो कश्मीर के स्थानीय दलों के एजेंडे से पहले से ही अलग है । दूसरी असहजता भाजपा और महबूबा मुफ्ती के बीच है जो धारा-370 खत्म किए जाने से पहले भाजपा के सहयोग से गठबंधन सरकार की मुख्यमंत्री बनी थी । जम्मू व कश्मीर में अपने प्रबल प्रतिद्वंदी नेशनल कान्फ्रेंस के साथ महबूबा ने 370 वापसी गठजोड़ जरूर किया है, मगर उनके राजनीतिक इरादे अब्दुल्ला परिवार से मेल नहीं खाते । 370 हटाए जाने के बाद से केंद्र के साथ एकमात्र संवाद पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती का मई, 2020 में प्रधानमंत्री के नाम लिखा गया पत्र है, जिसमें उन्होंने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने की गुजारिश की । उसके बाद तहरीक-ए-हुर्रियत प्रमुख मुहम्मद अशरफ सहराक की हिरासत में ही जम्मू अस्पताल में मौत हो गयी । 24 जून की प्रधानमंत्री वार्ता में शामिल होने के विषय में विचार करने के लिए महबूबा मुफ्ती ने अपनी पार्टी की बैठक 20 जून को रखी । उसके पहले उनके चाचा सरताज मदनी को रिहा कर दिया गया । अगस्त, 2019 के समय से वे दो बार हिरासत में लिए गए ।
कश्मीरी पार्टियों की लगातार बैठके जारी हैं । मुख्य मुद्दा है कि विश्वास बहाली के केंद्र सरकार के प्रयासों को किस रूप में लिया जाए और धारा-370 वापसी पर जोर दिया जाए अथवा नहीं । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नवंबर, 2020 में जिला विकास परिषद चुनाव के समय बार-बार गुपकार गठजोड़ को ‘गुपकार गिरोह’ बताते हुए कहा कि यह ‘अपवित्र गठबंधन है, जो कश्मीर में बाहरी ताकतों का हस्तक्षेप चाहता है ।’ अमित शाह का 17 नवंबर, 2020 का ऐसा ट्वीट रिकार्ड में है ।
विधान सभा चुनाव प्रक्रिया शुरू करने के सम्बन्ध में ही विमर्श होने की ज्यादा संभावना है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2020 को स्वतंत्रता दिवस संबोधन और धारा-370 हटाए जाने की पहली बरसी पर जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव कराने की बात कह चुके हैं । उसके अलावे भी यदा-कदा उन्होंने विधान सभा चुनाव की प्रतिबद्धता दुहरायी है । इसके लिए भारत सरकार पर भी बाहरी ताकतों का दवाब है । इसलिए केंद्र सरकार को कश्मीरी नेताओं को विश्वास में लेना है । क्योंकि कोरोना लॉकडाउन से पहले से वहां राजनीतिक लॉकडाउन है, जो कायदे से अनलॉक हुआ नहीं है ।
डीडीसी चुनाव के समय धांधली की शिकायत तो नहीं आयी, मगर गैर-भाजपा दलों को चुनाव प्रचार की भरपूर छूट नहीं थी । मतदाताओं ने जम्मू व कश्मीर का पार्टी और मजहबी आधार पर दोबारा विभाजित कर दिया । हिंदू बाहुल आबादी वाले जम्मू में भाजपा को भारी जीत मिली और मुस्लिम बाहुल कश्मीर में भाजपा विरोधी स्थानीय दलों के उम्मीदवार जीते ।
17-18 फरवरी, 2021 को विदेश मंत्रालय के आमंत्रण पर विदेशी राजनयिकों ने कश्मीर का दौरा किया । जिनमें यूरोपीय संघ(ईयू) के भारत स्थित प्रतिनिधि शामिल थे । इन राजनयिकों ने शीघ्र विधान सभा चुनाव पर बल दिया । धारा-370 हटाए जाने के बाद से यूरोपीय संघ(ईयू) का यह तीसरा दौरा भारत सरकार ने आयोजित किया । जनवरी, 2020 में ईयू देशों के राजदूत शामिल नहीं हुए । फरवरी, 2020 में राजनयिकों ने विधान सभा चुनाव पर जोर दिया । चुनाव से पहले जरूरी सीटों के परिसीमन का काम केंद्र सरकार ने ढीला रखा और 24 जून की पीएम वार्ता में उसी पर फोकस होने की चर्चा है । सूत्रों के अनुसार जम्मू व कश्मीर प्रशासन ने सभी 20 जिलों को उपायुक्तों को लिखा कि 24 जून की बैठक से पहले ज्यादा आबादी वाले इलाकों और बाहरी लोगों के आकर बसने के बाद की स्थिति की जानकारी भेजी जाए ।
यूरोपीय संघ दौरे के बाद परिसीमन आयोग की अवधि 03/03/2021 को एक साल के लिए बढ़ायी गयी, जिसके अंदर भी मतभेद हैं । रिटायर जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में 18 फरवरी को आयोग की बैठक हुई । परिसीमन आयोग के पांच सहयोगी सदस्यों में से सिर्फ दो - केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह और सांसद जुगल किशोर सिंह मौजूद रहे । नेशनल कान्फ्रेंस के सांसद फारूख अब्दुल्ला, मुहम्मद अकबर लोन और हसनैन मसूदी बैठक में शामिल नहीं हुए ।