जम्मू व कश्मीर में पाक पोषित आतंकी गतिविधियों पर लगभग काबू पा लिया गया है और हालात काफी हद तक सामान्य है । केंद्र सरकार और जम्मू व कश्मीर प्रशासन का यह दावा है । शायद सही होए तब प्रश्न है कि विधान सभा चुनाव क्यों टल रहा है । कश्मीर के सभी राजनीतिक दल चुनाव जल्द.से.जल्द कराना चाहते हैं । वहां के मतदाता अपने जन प्रतिनिधियों की सरकार देखने के लिए बेचैन हैं । स्थिति सामान्य का मतलब निवेशकों को न्योता देना नहीं होता । व्यापक जनाधार वाले कश्मीर के सभी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के नेताओं की आवाज केंद्र सरकार तक नहीं पहुंच रही है । इसलिए इन पार्टियों के प्रतिनिधियों ने चुनाव आयोग और सभी राष्ट्रीय दलों के नेताओं से मिलने का कार्यक्रम बनाया चुनाव आयोग से दिल्ली में 16 मार्च को मुलाकात करनेवाले नेताओं के प्रतिनिधिमंडल में भाजपा के कोई नहीं थे । मिलने.जुलने का यह कार्यक्रम तय करने के लिए 11 मार्च को जम्मू में हुई बैठक में भाजपा को छोड़ सभी दलों के प्रतिनिधि शामिल थे । बैठक कश्मीर की सबसे मजबूत पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस अध्यक्ष पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के जम्मू स्थित आवास पर बुलायी गयी । तय हुआ कि चुनाव आयोग से जल्द विधान सभा चुनाव कराने के लिए मिला जाए और सभी राष्ट्रीय दलों के नेताओं से भी जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा लौटाने के लिए समर्थन जुटाने को मिलें ।
11 मार्च की जम्मू बैठक के बाद फारूक अब्दुल्ला ने संवाददाताओं को यह जानकारी देते हुए कहा कि जम्मू व कश्मीर संघ शासित क्षेत्र(यूटी) के सारे विपक्षी नेता इन मुलाकातों के लिए साथ दिल्ली जाएंगे ।
इससे इतना तो पता चल जाता है कि इस अभियान में भाजपा के कश्मीर या केंद्रीय नेतृत्व को कोई दिलचस्पी नहीं है और एकमात्र भाजपा है, जिसे जम्मू व कश्मीर में चुनाव की जल्दीबाजी नहीं है ।
चुनाव आयोग से 16 मार्च को मिलनेवाले प्रतिनिधिमंडल में नेशनल कान्फ्रेंस, पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी(पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी)ए कांग्रेस, सीपीएम, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तमिलनाडु की सत्तारूढ़ दल डीएमके, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(एनसीपी) के प्रतिनिधि शामिल थे । चुनाव आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में इन सभी दलों के प्रतिनिधियों के दस्तख्त हैं । इनमें भाजपा के कोई नहीं थे और इस मुलाकात पर भी भाजपा के किसी नेता ने कोई टिप्पणी नहीं की ।
चुनाव आयोग से मिलनेवाले प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व नेशनल कान्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ही कर रहे थे । उन्होंने मीडिया कर्मियों को बताया कि चुनाव आयोग से जल्द.से.जल्द लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया गया और यह जानकारी भी दी गयी कि चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन(डिलिमिटेशन) का काम पूरा किया जा चुका है ।
ज्ञापन में चुनाव आयोग को नेताओं ने लिखा है कि जम्मू व कश्मीर में 2014 से चुनाव नहीं हुए हैं और पांच वर्षों से वहां न तो विधान सभा है, न ही निर्वाचित सरकार है ।
जम्मू व कश्मीर के सभी गैर.भाजपा नेता काफी समय से चुनाव की मांग कर रहे हैं । वर्ष 2023 के शुरू से ही यह मांग तेज हो गयी है । साथ.साथ लेह और लद्दाख की सर्द हवा में भी राजनीतिक गर्मी आ गयी । लद्दाखियों ने राज्य का दर्जा देने की मांग पर जोर डाला । अगस्त, 2019 में धारा.370 समाप्त करके जम्मू और कश्मीर को दो यूटी में बांटा गया । लद्दाख को जम्मू व कश्मीर से अलग करके स्वतंत्र यूनिट बना दिया । लेह.लद्दाख जम्मू व कश्मीर विधान सभा का ही हिस्सा बना रहा । इस व्यवस्था को लद्दाखियों ने स्वीकार नहीं किया । वे लोग काफी समय से जम्मू व कश्मीर के अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलने को बेचैन हैं । कई वर्षों से लद्दाखियों का आंदोलन ऐसे संघशासित क्षेत्र दर्जा के लिए चल रहा था, जिसकी अपनी अलग विधान सभा हो । जम्मू व कश्मीर का हिस्सा किसी भी रूप में लद्दाख न रहे और पूरी तरह केंद्र के प्रति जवाबदेह हो । केंद्र सरकार ने इस आवाज को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए लद्दाखियों की राजनीतिक सरगर्मी को उनकी जमीन, संस्कृति और विकास योजनाओं से जोड़ना चाहा । 04.01.2023 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लद्दाखियों की हजमीन और रोजगार सुरक्षा सुनिश्चित’ करने के लिए एक उच्चस्तरीय कमिटी गठित की । इस कमिटी में लद्दाख के प्रभावशाली सामाजिक.राजनीतिक गठजोड़ के भी दो सदस्य रखे गए । अगले ही दिन लेह जन निकाय और कारगिल लोकतांत्रिक गठबंधन ने इस कमिटी के विषय में कहा कि यह गोलमटोल तथा दिग्भ्रमित करनेवाली है । 07.01.2023 को इस गठजोड़ ने जम्मू में वक्तव्य जारी करके उस कमिटी को ठुकरा दिया और राज्य का दर्जा देने की मांग पर कड़ा रूख अपनाया । गठजोड़ ने कहा कि इस उच्चस्तरीय कमिटी में लद्दाख के किसी लंबित मामले को सुलझाने की कोई ठोस नीति नहीं है और दुहरा दिया कि लद्दाख को यूटी का दर्जा देना संघर्ष का निदान नहीं है, वो राज्य का दर्जा आंदोलन में सफलता का पहला कदम है । कमिटी केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय की अध्यक्षता में गठित की गयी । जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों के नेताओं ने 2023 शुरू होने के समय विधान सभा चुनाव और राज्य का दर्जा वापसी के लिए आवाज बुलंद की । तब लद्दाख भी जगे । लद्दाखियों को विधान सभा चुनाव में कोई रुचि नहीं है और जम्मू व कश्मीर का राज्य का दर्जा लौटनेधन लौटने से भी कोई सरोकार नहीं है । उसी समय से पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने कहना शुरू कर दिया कि जम्मू व कश्मीर में तिरंगा की जगह भगवा झंडा फहराया जाएगा और भाजपा वैसा माहौल तथा अवसर का इंतजार कर रही है । 16 मार्च, 2023 को जम्मू व कश्मीर के नेतागण जब दिल्ली में चुनाव आयोग कार्यालय से बाहर निकलेए तो चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने मई.जून में चुनाव का संकेत दिया । अधिकारी के अनुसार मई, 2022 में डिलिमिटेशन की अधिसूचना के बाद नवंबर तक जम्मू व कश्मीर में निर्वाचन अधिकारियों की नियुक्ति और मतदान बूथों को ऑर्डर में लाने का काम पूरा कर लिया गया । उसके बाद सर्दी के महीनों में चुनाव तैयारी का काम रुक गया । मई.जून में मौसम अनुकूल रहेगा । चुनाव अधिकारियों ने चुनाव का कोई वायदा नहीं किया । फरवरी, 2023 में एक और झमेला खत्म हो गया । सुप्रीम कोर्ट ने डिलिमिटेशन आयोग गठित करने के केंद्र के फैसले को चुनौती देनेवाली याचिका को खारिज कर दी ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा कोई भी नेता जब भी कश्मीर दौरे पर जाते हैं तो मतदाताओं को भरोसा दिलाते हैं कि राज्य का दर्जा लौटा दिया जाएगा, लेकिन चुनाव की बात नहीं करते । मार्च, 2023 में चुनाव आयोग से कश्मीरी नेताओं से मिलने के दिन जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज कुमार सिन्हा बिहार में थे । गए तो थे पटना के निकट दानापुर में एक निजी डेयरी फार्म का उद्घाटन करने मगर फिर सेना के रेजीमेंटल सेंटर में गार्ड ऑफ ऑर्डर लेने भी पहुंचे । मनोज सिन्हा ने वहां सिर्फ जम्मू व कश्मीर पर सेना की उपलब्धियों की चर्चा करते हुए कहा कि विगत वर्ष रिकार्ड एक करोड़ 88 लाख पर्यटक जम्मू व कश्मीर पहुंचे । 188 आतंकियों को सुरक्षा बल जवानों ने मार गिराया जिनमें 47 पाक पोषित आतंकी शामिल थे । जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल ने कहा कि पुलवामा और शोपियां दूसरे कारणों से जाने जाते थे, अब वहां हजारों नौजवान भारत का तिरंगा हाथ में लेकर ‘भारत माता की जय’ नारे लगा रहे हैं । मनोज सिन्हा ने जिस दूसरे कारणों का खुलासा नहीं किया, उनमें पहला है, लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिलाने के लिए तैनात जवानों द्वारा लाइसेंसी आतंक पैदा करना ।
सुरक्षा बल के जवान किसी को भी संदिग्ध आतंकी समझकर गोली मार देते हैं और ऐसी खबरों को दबाने की कोशिश की जाती है । शोपियां की जुलाई, 2020 की ऐसी ही एक वारदात के दोषी जवानों का 6 मार्च, 2023 को कोर्ट मार्शल हुआ । एक सैनिक अधिकारी को उम्र कैद हुई । शोपियां जिले के आम्सीपुरा में तीन मजदूरों की संदिग्ध आतंकी समझकर गोली मारकर हत्या कर दी गयी ।
इससे सेना की छवि बेहतर हुई है । जम्मू व कश्मीर के नेता लोग बार-बार कह रहे हैं कि जब हालात सामान्य है तो सेना क्यों तैनात है और चुनाव क्यों टल रहा है ।
भाजपा के कोई नेता चुनाव की बात नहीं करते । जम्मू व कश्मीर से प्राप्त सूत्रों के अनुसार भाजपा जिस हिंदू, कश्मीरी पंडित वोट के बल पर जम्मू व कश्मीर में अपनी सरकार बनाने का सपना देख रही हैं, वही सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं । 04.03.2023 को प्रवासी कश्मीरी पंडितों ने अपना 310 दिन से चला आ रहा आंदोलन सरकार से सुरक्षा के भरोसे के बाद वापस ले लिया । प्रधानमंत्री विशेष रोजगार पैकेज के अंतर्गत रोजगार पानेवाले कश्मीरी पंडितों ने बार-बार जानेलेवा आतंकी हमले के बाद कश्मीर से बाहर तबादला करने के लिए आंदोलन छेड़ दिया । कश्मीर से भागकर जम्मू गए, वहां भी हमले हुए । प्रशासन ने उल्टे वेतन रोक दिया । ऑल माइग्रेंट एम्प्लोयीज एसोसिएसन कश्मीर के नेता रूबन सप्रू ने जम्मू में 4 मार्च को कहा कि ‘आंदोलन स्थगित कर दिया है, सरकार ने भरोसा दिलाया है, मगर हमने आत्मसमर्पण कर दिया है, मजबूरी है, अब सरकार जो करे ।’ एक नेता ने कहा कि कश्मीरी मुस्लिमों से गुहार लगायी है कि हिंदू भाइयों को सुरक्षा के लिए आगे आएं ।’ जब भी होए धारा.370 हटाये जाने के बाद यह पहला चुनाव होगा और मतदाता बताएंगे कि बदली संवैधानिक व्यवस्था स्वीकार्य है या नहीं । कश्मीरी नेता हिंदुओं को साथ लेकर चलना चाहते हैं । महबूबा मुफ्ती के पुंछ जिले के नवग्रह मंदिर में जाकर पूजा करने पर बवाल हो गया ।