जम्मू व कश्मीर परिसीमन आयोग केंद्र सरकार के एजेंडे के अंतर्गत विधान सभा सीटों के परिसीमन के लिए कश्मीर का दौरा किया । इसके लिए जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों स परिसीमन आयोग को फीडबैक लेना था कि वे सहयोग करने को तैयार हैं या नहीं । अधिकारियों से बात करने का मकसद तो सिर्फ सीटों के दायरों में संभावित अंतर तक सीमित था । जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 लागू होने के बाद धारा-370 के तहत प्राप्त इस राज्य का विशेष संवैधानिक दर्जा के साथ-साथ राज्य का दर्जा भी समाप्त हो गया । जम्मू व कश्मीर को विभाजित करके दो यूटी(संघशासित क्षेत्र) में बांट दिया गया । उसके डेढ़-दो साल गुजर जाने के बाद केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार अब जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव कराना चाहती है । उसके लिए सीटों का परिसीमन जरूरी है । भारत सरकार का एजेंडा सिर्फ परिसीमन और उसके बाद विधान सभा चुनाव पर केंद्रित है । ठीक उसके उलट जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों का एजेंडा सिर्फ एक ही मुद्दे पर केंद्रित है कि पहले जम्मू व कश्मीर का राज्य का दर्जा लौटाया जाय, उसके बाद चुनाव हो । जम्मू व कश्मीर परिसीमन आयोग से मिलकर सभी नेताओं ने अपना एजेंडा बता दिया कि ‘पहले राज्य का दर्जा, फिर चुनाव’ और परिसीमन का बिल्कुल अनावश्यक करार दिया । जबकि परिसीमन आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो टूक - ‘पहले चुनाव फिर राज्य का दर्जा’ पर काम करने कश्मीर गया था । प्रधानमंत्री ने यह दो टूक ‘दिल की दूरी और दिल्ली की दूरी’ कम करने के लिए 24 जून को आमंत्रित जम्मू व कश्मीर के 14 दलों की बैठक में सुना दिया । धारा 370 की वापसी और अगस्त, 2019 से पहले की जम्मू व कश्मीर की संवैधानिक स्थिति लौटाने की बात यही लड़ाई लड़ने के लिए बने गुपकार गठजोड़ के चारों प्रमुख दलों में से किसी ने बैठक के अंदर नहीं की । इस गठजोड़ के अध्यक्ष नेशनल कान्फ्रेंस नेता फारूक अब्दुल्ला, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी(पीडीपी) प्रमुख महबूबा मुफ्ती, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुहम्मद यूसुफ तारिगामी और जम्मू व कश्मीर पीपुल्स कान्फ्रेंस के सज्जाद लोन 24 जून की बैठक में शामिल हुए । गुपकार गठजोड़ से बाहर के कांग्रेस की ओर से गुलाम नबी आजाद मौजूद थे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंदीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ बातचीत में इनमें से किसी भी नेता ने जम्मू व कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा(धारा-370) की वापसी पर जोर नहीं दिया । प्रधानमंत्री ने पहले चुनाव और उसके लिए परिसीमन पर सभी दलों से सहयोग मांगा । जबकि कश्मीरी नेताओं ने कहा कि पहले राज्य का दर्जा दिया जाए, फिर चुनाव हो । जम्मू व कश्मीर परीसीमन आयोग 6-9 जुलाई के बीच कश्मीर दौरे पर पहुंचा । पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने तो विरोध में आयोग से मिलने से इन्कार कर दिया । लेकिन गुपकार गठजोड़ के अन्य घटकों ने ज्ञापन देकर परिसीमन की जरूरत पर ही सवाल उठा दिया और कहा कि पहले जम्मू व कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल किया जाए, फिर चुनाव हो । व्यापक जनाधार वाली दोनों प्रमुख पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस और कांग्रेस ने परिसीमन आयोग से कहा कि राज्य के दर्जे तक परिसीमन न किया जाए । इसका थोड़ा-बहुत अंदाजा केंद्र सरकार को पहले से रहा होगा । क्योंकि जम्मू व कश्मीर के सारे दल भी भारत सरकार की ओर से राजनीतिक प्रक्रिया की बहाली में ऐसा सहयोग नहीं करना चाहते, जिसमें भारत सरकार के हर एजेंडे से समझौता करना पड़े । लेकिन केंद्र सरकार ने सारा एजेंडा तय कर लेने के बाद जम्मू व कश्मीर परिसीमन आयोग को यह टास्क दिया है, जिसके अनुसार आयोग को 2021 के अंदर सीटों के परिसीमन का काम पूरा कर लेना है । इसके लिए परिसीमन आयोग का कार्यकाल मार्च, 2022 तक के लिए बढ़ाया गया है ।

धारा-370 का तो केंद्र सरकार ने ऐसा बैकफुट पर ला दिया कि जम्मू व कश्मीर के सभी दल समझ रहे हैं कि इसकी वापसी असंभव है । उनमें मुख्यधारा वाली पार्टियों के नेता हैं, जिन्होंने डेढ़-दो साल के कई महीने जेलों में और नजरबंदी में गुजारे हैं । 24 जून की एक बैठक से लौटकर नेशनल कान्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने अपने साथी घटकों के साथ बातचीत में कहा - ‘हम धारा-370 वापसी के भ्रम में न रहें ।’

जम्मू व कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हैं । केंद्र सरकार भी असहज महसूस कर रही है । क्योंकि राष्ट्रपति शासन ज्यादा समय तक लागू नहीं रखा जा सकता है और कानून व व्यवस्था का हवाला देकर चुनाव लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता । 28/11/2018 का विधान सभा भंग की गयी और जनवरी, 2019 से राष्ट्रपति शासन लागू है ।

जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट 2019 लागू होने के बाद भारत सरकार के लिए तो भारतीय संसद से पास भारतीय संविधान के सारे कानून लागू हो गए । लेकिन जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों के अनुसार विधान सभा से पास उस समय के कानून आज भी अमल में हैं, जब जम्मू व कश्मीर को राज्य का दर्जा प्राप्त था । उसी में से एक है, परिसीमन एक्ट, जिसके तहत 2026 तक जम्मू व कश्मीर में सीटों का परिसीमन नहीं किया जा सकता । यह बात नेशनल कांफ्रेंस की कश्मीर यूनिट के अध्यक्ष नसीर असलम वानी ने परिसीमन आयोग से मिलने के बाद उठायी । उनका कहना था कि सिर्फ जम्मू व कश्मीर में परिसीमन क्यों, पूरे देश में क्यों नहीं । नेशनल कांफ्रेंस नेताओं ने 24 जून की पीएम बैठक की बात फिर दुहरायी कि कश्मीरियों का भारत सरकार और इन संस्थाओं से भरोसा उठ चुका है, परिसीमन आयोग को पहले भरोसा लाने का प्रयास करना चाहिए और परिसीमन के लिए धारा-370 पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक इंतजार करना चाहिए । नेशनल कांफ्रेंस नेता ने परिसीमन आयोग से पूछा कि क्या 2026 में फिर दुहराया जाएगा ।

जम्मू व कश्मीर में डिलिमिटेशन(परिसीमन) का काम भी संवैधानिक मामला है । जिस पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग चुकी है । अब मुश्किल है कि जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट लागू होने के बाद विशेष राज्य दर्जा प्राप्त जम्मू व कश्मीर और भारतीय संविधान का कानून अब कैसे प्रभावी होगा । अगस्त, 2019 में विशेष दर्जा खत्म होने के पहले तक जम्मू व कश्मीर में लोकसभा सीटों का परिसीमन का संचालन भारतीय संविधान द्वारा और विधान सभा सीटों के परिसीमन का संचालन जम्मू व कश्मीर संविधान तथा जम्मू व कश्मीर प्रतिनिधित्व एक्ट, 1957 द्वारा होता था । उसी के अनुसर 1963, 1973 और 1995 में इस राज्य में विधान सभा सीटों का परिसीमन हुआ । 2001 जनगणना के बाद राज्य सरकार ने कोई परिसीमन आयोग गठित नहीं किया । क्योंकि जम्मू व कश्मीर विधान सभा ने एक कानून बनाकर 2026 तक सीटों के परिसीमन पर रोक लगा दी । इस रोक को सुप्रीम कोर्ट ने उचित ठहराया ।

अभी भारत सरकार द्वारा गठित सुप्रीम कोर्ट की रिटायर जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाले परिसीमन आयोग को 2011 जनगणना के आधार पर यूटी जम्मू व कश्मीर विधान सभा सीटों का परिसीमन करना है । यह पूरी तरह अधिकार संपन्न संवैधानिक निकाय है, जिसके फैसले को किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के परिसीमन पर पहले के फैसले और भारत सरकार द्वारा विशेष दर्जा समाप्त किए जाने वाला कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लंबित सुनवाई के बीच परिसीमन आयोग को वही करना होगा जो केंद्र सरकार चाहती है । वर्तमान भाजपा गठजोड़ सरकार कांग्रेस के ही नक्शे कदम पर परिसीमन करा रही है । जम्मू व कश्मीर का पिछला परिसीमन रिटायर जस्टिस के. के. गुप्ता आयोग ने कराया था, जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू था । 1981 जनगणना पर आधारित उसी परिसीमन के अनुरूप 1996 में विधान सभा चुनाव हुए ।

अभी परिसीमन आयोग को जम्मू में भाजपा नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि 2011 जनगणना के आधार पर चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन न कराया जाए । मतदाता सूची को आधार बनाया जाय ।

8 जुलाई को आयोग से मिलनेवाले नेताओं में जम्मू व कश्मीर भाजपा अध्यक्ष रविन्दर रैना भी थे, जिन्होंने बताया कि अभी तक जितने परिसीमन हुए वे एकतरफा और पक्षपातपूर्ण तथा ‘एक खास क्षेत्र’ के हित को ध्यान में रखकर कराए गए । उनका इशारा कश्मीर क्षेत्र की ओर था, जहां के मतदाताओं ने नवंबर-दिसंबर 2020 जिला विकास परिषद चुनाव में गैर-भाजपा स्थानीय दलों को वोट दिया । हिन्दू बाहुल जम्मू में भाजपा का भारी जीत मिली । रविंदर रैना 24 जून की पीएम बैठक में मौजूद थे । जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट में 2011 जनगणना को परिसीमन का आधार माना गया है ।

लद्दाख लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर जीते जाम्यांग त्सेरिंग नामग्याल ने 24 जून को आयोजित प्रधानमंत्री की जम्मू व कश्मीर सर्वदलीय बैठक से एक दिन पहले लद्दाख यूटी के लिए अलग विधान सभा की मांग कर डाली । लद्दाख को यूटी का दर्जा जरूर मिला, मगर इसे जम्मू व कश्मीर विधान सभा के अंदर ही रखा गया । नामग्याल को मालूम था कि 24 जून की बैठक सिर्फ सीटों के परिसीमन और विधान सभा चुनाव में सहयोग के लिए बुलायी गयी । भाजपा सांसद ने जम्मू में 23 जून को अपनी मांग रखी, जब चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री के एजेंडे पर उनकी बैठक से एक दिन पहले ही जम्मू व कश्मीर के जिला उपायुक्तों से चुनाव क्षेत्रों की मौजूदा स्थिति के बारे में बातचीत शुरू कर दी । अब देखना है कि 19 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में नामग्याल कुछ बोलते हैं कि नहीं ।

परिसीमन आयोग के अंदर भी सब ठीक-ठाक नहीं चल रहा है । अध्यक्ष जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के अलावे मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चन्द्रा और जम्मू व कश्मीर के चुनाव आयुक्त के. के. शर्मा इसके पदेन सदस्य हैं । इसके अलावे पांच सहयोगी सदस्यों में नेशनल कान्फ्रेंस के सांसद फारूक अब्दुल्ला, मुहम्मद अकबर लोन और हसनैन मसूदी हैं । इसके अलावे केंद्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह और भाजपा के जुगल किशोर शर्मा भी इसके आयोग के सदस्य हैं ।

6 मार्च, 2020 को गठित परिसीमन आयोग की पहली बैठक फरवरी, 2021 में हुई । नेशनल कान्फ्रेंस के तीनों सांसद बैठक में शामिल नहीं हुए । उन नेताओं ने विरोध में वही कहा जो इस हफ्ते परिसीमन आयोग को कश्मीर दौरे में नेशनल कांफ्रेंस समेत सभी गैर-भाजपा नेताओं ने कही है । जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 असंवैधानिक है और सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक इस एक्ट के अनुसार परिसीमन नहीं किया जाना चाहिए । ये मामला संसद के आगामी मानसून सत्र में उठाए जा सकते हैं ।

विशेषज्ञों के अनुसार जम्मू व कश्मीर को वापस राज्य का दर्जा देना भी आसान नहीं है । इसके लिए केंद्र को संविधान की धारा-3 के अनुसार नया बिल संसद में लाना होगा और राज्य दर्जा के विभिन्न पहलुओं को फिर से बहाल करने के लिए जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 में कई संशोधन करने होंगे ।