प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यों से कहा है कि नदियों को जोड़ने के रास्ते में बाधा डालनेवाले जल विवादों का समाधान आपसी सहमति और सहयोग के जरिए निकाला जाए । हालिया 51वीं ‘प्रगति’ बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री ने यह बात कही । उन्होंने एक्स( X) पर पोस्ट में कहा कि ‘प्रगति’ सत्र के दौरान 30,000 करोड़ से अधिक की परियोजनाओं की समीक्षा की गयी । लेकिन प्रधानमंत्री ने अपना संबोधन नदियों को जोड़ने से शुरू किया और उसी से संबंधित परियोजना पर फोकस किया ।

इस सिलसिले में मोदी ने राज्यों से सहयोग, समय पर मंजूरी व प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी के माध्यम से अंतरराज्यीय जल विवादों के हल की चर्चा के क्रम में केन-बेतवा नदियों को जोड़नेवाली परियोजना का उदाहरण दिया । प्रधानमंत्री ने केन-बेतवा परियोजना को आदर्श और मॉडल के रूप में देखने भी कहा ।

केन और बेतवा नदियों को जोड़नेवाली परियोजना पर काम के साथ-साथ विवाद भी चल रहा है । प्रधानमंत्री के कथनानुसार इस मायने में आदर्श माना जा सकता है कि उनकी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़(एनडीए) सरकार के नदियों को जोड़नेवाले महत्वाकांक्षी एजेंडे में केन-बेतवा पहली परियोजना है । केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर, 2021 में केन-बेतवा परियोजना को मंजूरी दी और बताया गया कि इस पर 44,605 करोड़ रुपये की लागत आएगी । वर्ष 2030 में इसका काम पूरा होना है । 25 दिसंबर, 2024 को प्रधानमंत्री ने केन-बेतवा नदी लिंक(जोड़ो) की आधारशिला रखी ।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 13 जिलों को केन-बेतवा नदियों से लाभान्वित करनेवाली इस परियोजना का असली मकसद है हमेशा जल संकट से जूझते बुन्देलखण्ड क्षेत्र को पानी पहुंचाना और पनबिजली पावर प्लांट स्थापित करना । उत्तर प्रदेश की मध्य प्रदेश की सीमा से सटे बुंदेलखंड आदिवासी क्षेत्र है, जिसकी पहचान ही स्थायी सूखाग्रस्त इलाके के रूप में होती है । दोनों राज्यों के बीच की नदी है, केन-बेतवा । केंद्र सरकार की ओर से परियोजना को यह कहकर प्रस्तुत किया गया कि इससे केन नदी का अतिरिक्त पानी बुंदेलखंड की सूखी बेतवा नदी में भेजा जाएगा । इसमें केन नदी पर दौधान डैम और 221 किलोमीटर लंबी नहर का निर्माण भी शामिल है, जो केन से पानी बेतवा नदी तक पहुंचाएगी ।

इसका स्वागत हुआ, बुन्देलखण्ड के लोग खुश हुए । मगर उनकी खुशी परियोजना की आधारशिला रखे जाने और काम शुरू होने के बाद ही दुख में बदल गयी । विवाद मुख्यरूप से वहां के मूल आदिवासी वाशिंदों की जीविका और डैम पनबिजली प्लांट निर्माण के लिए उन्हें अलग विस्थापित किए जाने से जुड़ा है । दो साल से आंदोलन जारी है । विस्थापित होनेवालों को न तो उचित मुआवजा मिला है, न ही आदिवासियों की जीविका से जुड़े जल, वन, जमीन की मिलती-जुलती वैकल्पिक व्यवस्था का ठोस आश्वासन मिला है ।

अप्रैल पूरे महीने मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के दौधान गांव में आंदोलन चला, जहां केन नदी पर डैम बनना है ।

आदिवासी(वनवासी-भाजपा के शब्दों में) किसानों ने महिला-बच्चे समेत आंदोलन की शुरुआत 08 अप्रैल, 2026 को चिता आंदोलन से की । इसमें सैकड़ों किसान पत्नी, बहन, बेटियों-बहुओं के साथ बांस-बल्ली की चिताएं सजाकर लेट गए । उनके साथ बड़ी संख्या में महिलाएं धरना पर भी बैठी । महिलाओं ने दोनों हाथों में लेकर माथे के ऊपर जो बैनर तख्तियां रखी थी, उस पर लिखा था - ‘वंदे मातरम् - न्याय दो या मौत दो’ । आदिवासियों की जीविका और सामाजिक-संस्कृति का स्रोत प्राकृतिक संसाधनों के नाम से उनका असंतोष विभिन्न रूपों में लगातार राष्ट्रीय सुर्खियों में आया । ‘आकाश आंदोलन’ के अंतर्गत उपवास रखा गया । ‘मिट्टी आंदोलन’ के तहत प्रदर्शनकारियों ने अपने शरीर को मिट्टी से ढक दिया । ‘जल आंदोलन’ के अंतर्गत सब के सब कमर से ऊपर तक केन नदी में कई घंटे खड़े रहे । फिर नाक और गर्दन भी वे पानी में डुबोए रहे । अप्रैल के अंतिम सप्ताह में मध्य प्रदेश प्रशासन के उनकी शिकायतें सुने जाने के आश्वासन पर आदिवासियों ने आंदोलन स्थगित किया ।

मई के अंतिम सप्ताह तक ऐसी रिपोर्ट नहीं मिली कि राज्य सरकार ने केन-बेतवा परियोजना से पीड़ित वनवासियों को संतोषजनक ठोस उपाय करने का भरोसा दिलाया है । फिर से आंदोलन की सुगबुगाहट है । इसकी चर्चा शुरुआत में ही करनी युक्तिसंगत है । क्योंकि मई के अंतिम सप्ताह में ही 51वीं प्रगति सत्र में प्रधानमंत्री ने केन-बेतवा परियोजना को आदर्श रूप में देखने राज्यों से कहा । मोदी ने यह भी कहा कि सार्वजनिक परियोजनाओं के कार्यान्वयन में देरी से लागत बढ़ती है और नागरिकों को जरूरी सुविधाओं का लाभ भी समय पर नहीं मिल पाता । हर विलंब का लोगों के जीवन, विकास पर असर पड़ता है ।

प्रधानमंत्री का कहना बिल्कुल सही और मौजूदा प्रसंग के अनुकूल है । इस विश्लेषण का तात्पर्य प्रधानमंत्री की पहल केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना को उनके आदर्श दावे की बखिया उधेड़ना नहीं है । उन्होंने आगे बढ़कर एक महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत की । अब उसे समय से पूरा करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है । अधिकारियों से लेकर मंत्री तक जमीनी हकीकत का आकलन और सारा मूल्यांकन प्रभावित तथा लाभान्वित होनेवाले स्थानीय लोगों की आकांक्षा पूरी करने के बजाय सरकारी खानापूरी करके पल्ला झाड़ते रहते हैं ।

नदियों को जोड़ने की योजना कोई नयी नहीं है । प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ही इसके लिए कमिटी बनायी, जो के. एल. राव कमिटी के नाम से जानी जाती है । इस कमिटी द्वारा तय देश भर की नदियों को जोड़ने की रूपरेखा 1970 के दशक से चर्चा में है । 1980 के दशक में इस योजना को तेजी से अमल में लाने के लिए एक एन पी पी(NPP - नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान) तैयार हुआ । उसके तहत 1982 में बनी राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी को केंद्र ने नदियों को जोड़ने का काम सौंपा और इसके लिए 30 लिंक परियोजनाओं की पहचान की गयी ।

इस योजना के अंतर्गत केन-बेतवा लिंक पहली बार एकमात्र परियोजना है, जिसका कार्यान्वयन शुरू हुआ । इस परियोजना का नाम दिया गया राष्ट्रीय जल विकास एजेंसी -2026

दो साल में केन-बेतवा लिंक के अमल में आने से पहले रास्ते में आनेवाली बुनियादी दिक्कतों की गहराई में गए बगैर सतही आकलन के कारण काम ढीला चल रहा है । इसका कारण है, उस जगह और आसपास के जनजीवन की भावनाओं की उपेक्षा । नदियों को जोड़ने के क्रम में वहां के वाशिंदों से जुड़ाव को नजरअंदाज करने का परिणाम है आंदोलन । केन नदी से सटे दौधान गांव में डैम बनाने के लिए जमीन अधिग्रहण से 22 गांवों के 7,000 परिवार विस्थापित होंगे । उनमें से 10 गांव लगभग पूरी तरह जलमग्न हो जाएंगे ।

ऐसी स्थिति में नदी लिंक योजना की मूल भावना ही विस्थापित और जलमग्न होने की नौबत आ जाएगी । नदी लिंक योजना का असली मकसद है ऐसा जलप्रबंधन, ताकि जनशक्ति के अराजक होने की स्थिति पैदा न हो और किसानों को इसका हर मौसम में लाभ मिले । देश के विभिन्न क्षेत्रों की जलवायु और खेतों की हाल मानसून के हिसाब से भिन्न-भिन्न है । पूर्वी भारत में हर साल बाढ़ से खेतों में खड़ी फसल बर्बाद होती है । दक्षिण और पश्चिमी राज्यों में सुखाड़ स्थायी संकट है । खेतों में बीचड़े पानी के अभाव में सूख जाते हैं । इसी का हल निकालने के लिए नदी लिंक योजना बनी, ताकि बाढ़ प्रभावित राज्यों से अतिरिक्त पानी सूखा वाले राज्यों में पहुंचाया जा सके । यह तभी संभव है, जब नदियों को जोड़ा जाए । जल प्रबंधन को ज्यादा-से-ज्यादा लाभकारी बनाने के लिए जल स्टोरेज, नहर समेत वर्षा जल संचय का काम शुरू हुआ । लेकिन जितनी भी नदी लिंक परियोजना बनी, सब की सब विवादों से घिरी है ।

केन-बेतवा लिंक प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के रिकॉर्ड 12वें साल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि में गिनी जा सकती थी । लेकिन विशेषज्ञों की राय में अमल में लाने से पहले सभी बिंदुओं पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया । सूखाग्रस्त बुंदेलखंड को पानी मिलेगा या नहीं, यह तो अभी खटाई में है । मगर पन्ना टाइगर रिजर्व और केन तट पर छतरपुर जिले के 10 गांवों के जलमग्न होने की संभावना बतायी जा रही है । कहा जा रहा है केन बेतवा लिंक में मध्य प्रदेश डैम पर ज्यादा फोकस है । जबकि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं ।

नदियों को जोड़ने में अभी तक आशानुकूल सफलता नहीं मिलने का कारण राज्य सरकारों का आपस में दिलों का नहीं जुड़ना है । इसकी वजह क्षेत्रीय और राजनीतिक पूर्वाग्रस्त दिल में संजोकर राज्यों का वार्ता के लिए बैठना है । ऐसा नहीं है कि नदी लिंक में पानी के लेन-देन, अदला-बदली में सिर्फ अलग-अलग दलों की सरकारें सिर्फ अपने स्वार्थ को आगे रखकर बात करती है । एक दल की सरकारों पर भी अपना क्षेत्रीय पक्ष हावी रहता है। जब दिल नहीं जुड़ेंगे, तो नदियां कैसे जुड़ेंगी । दिल तोड़नेवाली बातें नदियों को तोड़ रही हैं ।

सतलुज-यमुना लिंक, कावेरी जल विवाद, नर्मदा जल विवाद अब नदी-लिंक योजना के इतिहास का बहुविवादित अध्याय बन चुका है । राज्यों में सरकारें बदलीं, केंद्र में सरकारें बदली । सुप्रीम कोर्ट भी सुनवाई करते, निर्देश दे-देकर थक चुकी । न नदियां जुड़ी, न लोग जुड़े ।