जातीय हिंसा और तनावग्रस्त मणिपुर में सामाजिक सद्भाव का एक नायाब प्रयास तारीफ के लायक है । अर्द्धसैनिक बल असम राइफल्स ने ऐसे समय में यह प्रयोग इस हफ्ते आजमाया, जब नयी सरकार बनने और राष्ट्रपति शासन हटने के बाद नए तरह से हिंसा भड़क उठी । असम राइफल्स के अधिकारियों ने उन जातियों, समुदायों को फुटबॉल मैच के बहाने आपस में मिलवाया, जो एक.दूसरे से लड़ रहे हैं । इस आयोजन के लिए हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित मणिपुर के पहाड़ी इलाके को चुना गया, जहां बड़ी संख्या में सुरक्षा बल तैनात हैं ।
पश्चिमी इंफाल की तनावपूर्ण पहाड़ियों के बीच स्थित इस मैदान में ऑपरेशन सद्भावना के तहत आयोजित इस फुटबॉल मैच के लिए 13 टीमों में आठ नगा, तीन मेइतेइ और दो कूकी समुदायों के युवक शामिल किए गए । इसका मकसद आपसी वैमनस्य की चक्की में पिस रही इन जातियों के लोगों को एक साथ लाना था । सुरक्षा के लिए विभिन्न ऑपरेशन चलाने के क्रम में हर समुदाय के अपने.अपने हिसाब से आरोपों का सामना कर रहे असम राइफल्स ने झंझट और कटुता के माहौल को भाईचारा में बदलने के लिए यह ‘सद्भावना ऑपरेशन’ चलाया ।
फुटबॉल टीम के लिए खिलाड़ियों को उसी गाड़ियों में मैदान तक ले जाया गया जिसमें बिठाकर हिंसा में शामिल संदिग्धों को थाने और हिंसा प्रभावित लोगों को राहत शिविरों या सुरक्षित स्थानों में पुलिस तथा असम राइफल्स के जवान ले जाते हैं ।
यह मैदान असम राइफल्स फूटहिल्स फुटबॉल टूर्नामेंट का है और सुरक्षा बल का हथियार भंडार भी इसी में है पांच दिनों तक चले इस मैच में नगा, मेइतेइ और कूकी समुदायों के फुटबॉल खिलाड़ी अच्छे माहौल में खेले, मिले, जो गत तीन वर्षों से हिंसा की त्रासदी झेल रहे हैं । ‘इंफाल प्रेस जर्नल’ ने एक असम राइफल्स के अधिकारी के हवाले से खेल शुरू होने से पहले उनकी हिन्दी में की गयी अपील ज्यों.की.त्यों छापी. ‘प्रिय खिलाड़ी बंधुओं, खेल की सद्भावना बनाए रखें, रेफरी के निर्णय का पालन करें, खेल का जोश, उत्साह निभाएं ।’ मैच के आयोजक असम राइफल्स के वरिष्ठ अधिकारियों ने पहले इन समुदायों की फुटबॉल टीमों से संपर्क करके उन्हें अपनी मेजबानी में खेलने के लिए आने को तैयार किया । इसमें टीम के खिलाड़ियों को प्रेम से चेतावनी भी दी गयी कि खेल के दौरान या उसके बाद अपने किसी प्रतिद्वंद्वी को फुटबॉल से या मुंह से किसी भी तरह चोट न पहुंचाएं । ऐसा करते देखे जाने पर तुरंत रेडकार्ड जारी कर दिया जाएगा और पूरी टीम को अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा । रेफरी का निर्णय अंतिम होगा । प्रायः रेफरी को लेकर विवाद होता है, इसलिए रेफरी के लिए सैनिकों को मणिपुर ही नहीं, पूरे उत्तर पूर्व के बाहर से बुलाया गया है ।
मणिपुर की पहाड़ियों में कूकी.जो और घाटी में मेइतेइ समुदायों की आबादी ज्यादा है । पहाड़ी में ही मणिपुर की सबसे बड़ी तान्खुन नगा जनजाति के लोग रहते हैं। इनका आपस में मेलजोल और एक.दूसरे के घर के आसपास से गुजरने में भी लोग परहेज करते हैं । 03 मई, 2023 से भड़की जातीय हिंसा के बाद से इन समुदायों के युवा अपने बुजुर्गों के निर्देश पर घड़ी और टॉर्च लेकर रातभर पहरा देते हैं ।
इस फुटबॉल मैच का आयोजन कीथेलमान्वी में किया गया, जो जगह इंफाल घाटी और पहाड़ियों के बीच स्थित है और बफरजोन कहलाता है । जहां कड़ी सुरक्षा रहती है । मई, 2023 के बाद पहली बार इस चार किलोमीटर बफरजोन से कूकी टीम के खिलाड़ी और कोच असम राइफल्स की बसों में गुजरे । असम राइफल्स ने खिलाड़ियों की भावनाओं का ख्याल करके टीमों का नाम उनके गांवों पर ही रखा था । बफरजोन एक संकरी जमीन की टुकड़ी है, जो मेइतेइ और कूकी.जो को अलग करती है और हिंसा का केंद्र रही है ।
सबसे ज्यादा और करने लायक बात यह रही कि कूकी गांव लिटान सारेकखोंग में रहनेवाले नगा समुदाय के खिलाड़ियों को टीम में लिया जाना । फुटबॉल मैच के समय ही लिटान गांव में तान्खुन नगाओं पर पथराव किया गया और कथित कूकी उग्रवादियों ने उनके कई मकानों में आधी रात के समय आग लगा दी । उसके जवाब में कूकियों के कुछ मकानों में भी आग लगाने की खबर फैली । हिंसा और आगजनी की यह वारदात 09 फरवरी की है और 14 फरवरी को फुटबॉल मैच समाप्त हुआ । 04 फरवरी को मणिपुर में नयी सरकार का गठन हुआ और पूर्व विधान सभा अध्यक्ष युमनाम खेमचंद सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली । उनके साथ कूकी,जो और नगा दोनों समुदायों के दो विधायकों को भी राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी । भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने अपने पार्टी विधायकों से विमर्श के बाद सभी समुदायों को साथ लेकर चलने का फैसला किया, ताकि हिंसा रूके और हालात सामान्य हो । इसलिए मेइतेइ समुदाय के मुख्यमंत्री के साथ कूकी और नगा जातियों के दो उपमुख्यमंत्री बनाए गए । लेकिन गैर-आदिवासी मेइती के साथ मिलकर चलना कुकी और नगा जनजातीय संगठनों ने स्वीकार नहीं किया । हिंसा नए सिरे से भड़क उठी । दिसंबर के मध्य में ही विधायकों की मांग पर सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हो गयी थी, ताकि 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन की अवधि समाप्त होने से पहले नयी सरकार बन जाए । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मणिपुर का दौरा किया, उसके पहले सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गए । गुटों में बंटे मणिपुर के 36 जातीय समुदायों को तकलीफ इस बात को लेकर है कि तीन साल में न तो हिंसा का अंत हुआ, न ही इससे विस्थापित 62ए000 लोगों के पुनर्वास का इंतजाम किया गया । 11.12.2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन देकर सरकार के दिसंबर तक के आश्वासन की याद दिलायी गयी । मणिपुर में दरअसल नेतृत्व की नहीं, नीति में बदलाव की जरूरत थी । मेइतेइ की जगह कूकी मुख्यमंत्री बनाने से शायद हिंसा नहीं उफनती । 2022 में मेइतेइ मुख्यमंत्री एन वीरेन सिंह ने अपने समुदाय को एस टी (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा देने का फैसला करके यह विवाद खड़ा किया । 2 साल तक बेकाबू हिंसा के बाद विपक्षी कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव लाने से एक दिन पहले वीरेन सिंह ने 09.02.2025 को इस्तीफा दिया और मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया । उसके इस्तीफे से चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री के कूकी समुदाय के खिलाफ हिंसा भड़काने वाले भाषण में उनकी आवाज की जांच का आदेश दिया । अभी जनवरी, 2026 में सरकार गठन की प्रक्रिया के दौरान कूकी.जो कौंसिल ने केंद्र सरकार को चेताया कि 2026 तक उनकी अलग यूटी(केंद्र शासित क्षेत्र) की मांग पूरी नहीं हुई तो 2020 मणिपुर विधान सभा चुनाव का वायकाट करेंगे । भाजपा के 32 विधायकों में से 10 कूकी.जो समुदाय के हैं, जिनमें सात ‘अलग प्रशासन’ की मांग कर रहे हैं । गुवाहाटी से 14 जनवरी को प्राप्त रिपोर्ट में कूकी.जो कौंसिल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को यह भी आग्रह किया कि बफरजोन के पास मेइतेइ विस्थापितों को बसाने की कथित कोशिश से तनाव बढ़ेगा । कूकियों का दावा है कि विगत तीन वर्षों की हिंसा में मारे गए 260 लोग कूकी समुदाय के ही हैं और विस्थापितों में 40ए000 हैं । मणिपुर में हिंसा से राजनीतिज्ञ से ज्यादा सामाजिक जन.जीवन प्रभावित हुआ है । इस त्रासदी का स्कूली बच्चों के दिलो.दिमाग पर खोफजदा असर पड़ा है । असम राइफल्स द्वारा आयोजित सद्भावना फुटबॉल मैच के दौरान मैदान से सटे राहत शिविर के अंदर कुछ ड्राइंग और पेंटिंग देखे गए । किसी में एक आदमी पेड़ से लटका है और उसकी गर्दन मरोड़ी हुई है । एक ड्राइंग में घर जल रहा हैऐ छत से आग की लपटें निकल रही है । कुछ पेंटिंग में एके.47 राइफलों से गोलियां दाजी जा रही है और चारों ओर खून के धब्बे हैं, लोग धुएं में बेतहाशा जान बचाने को भाग रहे हैं । बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए मणिपुर आयोग के अध्यक्ष की शाम प्रदीप कुमार के मुताबिक 10 साल के मेइतेइ बच्चे ने पैंसिल और स्याही से ये स्केच बनायी है, जो उनके मानसिक हालत को दर्शाती है । ये उन बच्चों में से एक है, जिनके स्कूल राहत शिविर बने हुए हैं और वे स्कूल जाने से वंचित हैं । संयोग कुछ ऐसा रहा कि असम राइफल्स के ‘सद्भावना ऑपरेशन’ के बाद से हिंसा की कोई खबर नहीं मिली । मैच खतम होने के दिन 13 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली पीठ मणिपुर ट्राइबल फोरम की याचिका पर सुनवाई के दौरान हिंसा पीड़ित मेइती और कूकी समुदायों से सम्बन्धित मुकदमे मणिपुर तथा गुवाहाटी हाईकोर्ट ले जाने को कह रही थी ।