मध्य प्रदेश के भाजपा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ज्यों ही कहा कि उनके राज्य में सरकारी नौकरियां सिर्फ उन्हीं के लिए आरक्षित रहेंगी, जो यहां के निवासी हैं । मुख्यमंत्री ने इसे ‘बहुत महत्वपूर्ण’ फैसला बताते हुए कहा कि इसके लिए जरूरी कानूनी प्रावधान किए जा रहे हैं, ताकि मध्य प्रदेश के संसाधन सिर्फ वहीं के बच्चों के लिए रहें । उसके तुरंत बाद बिहार की जद(यू)-भाजपा गठजोड़ सरकार ने एलान किया कि राज्य के प्रारंभिक स्कूलों में बिहार निवासी ही शिक्षक बनेंगे । इसके लिए कानूनी प्रक्रिया मुख्यमंत्री चौहान जबतक अपनाएं उसके पहले ही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने तो बाकायदा इस आशय का आदेश जारी कर दिया कि राज्य के करीब 72 हजार सरकारी प्रारंभिक स्कूलों में शिक्षक पद पर सिर्फ बिहार के निवासी ही नियुक्त हो सकेंगे ।

शिवराज सिंह चौहान के फैसले पर दो त्वरित टिप्पणी/प्रतिक्रिया गौर करने लायक है । सबसे पहले पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसका श्रेय खुद को देते हुए कहा कि चौहान कांग्रेस सरकार के निर्णयों के अनुसार काम कर रहे हैं । गत मार्च में ही शिवराज सिंह चौहान कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को गिरा कर फिर से मुख्यमंत्री बने । 15 साल से चौहान मुख्यमंत्री थे । चुनाव में हार के बाद भाजपा सत्ता से बाहर हुई । कमलनाथ ने तो दावा किया कि उन्होंने तो औद्योगिक नीति बदलकर 70% स्थानीय युवाओं को नौकरी देना अनिवार्य कर दिया था ।

लेकिन जम्मू व कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री नेशनल कान्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया बिल्कुल सटीक है । उन्होंने ट्वीटर पर कहा - ‘जम्मू व कश्मीर और लद्दाख में नौकरियां सबके लिए, लेकिन मध्य प्रदेश में नौकरियां सिर्फ मध्यप्रदेश निवासियों के लिए । वहां कोई अचरज नहीं ।’

मध्य प्रदेश और बिहार सरकारों के इन हालिया फैसलों के बाद केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार द्वारा बुलायी गयी जीएसटी(वस्तु एवं सेवा कर) परिषद् की 41वीं बैठक में गैर-भाजपा शासित राज्यों ने संघीय व्यवस्था पर उंगली उठा दी ।

इसके विस्तार में जाने से पहले जम्मू व कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया के पीछे का विवादित पहलू याद कर लें । जम्मू व कश्मीर को संविधान की धारा-370 के अंतर्गत प्राप्त विशेष दर्जा संघीय सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को समाप्त कर दिया । लद्दाख जम्मू व कश्मीर राज्य का हिस्सा था । नए संशोधित कानून में जम्मू व कश्मीर और लद्दाख को अलग अलग करके केंद्र शासित क्षेत्र बना दिया गया । उसके बाद से जम्मू व कश्मीर और लद्दाख में देश के अन्य हिस्सों के युवाओं की नौकरी के लिए रास्ता खोल दिया गया । वहां अन्य राज्यों के लोगों को बसने संपत्ति खरीदने-बेचने का भी प्रावधान कर दिया गया । धारा-370 के अंतर्गत जम्मू व कश्मीर का अलग संवैधानिक प्रावधान था, जिसमें वहां की नौकरियां वहीं के निवासियों के लिए आरक्षित थीं । अन्य बाहरियों के लिए आए दिन डोमिसाईल अधिसूचनाएं जारी की जा रही हैं और धारा-370 खत्म करने का विरोध थम नहीं रहा है ।

इसके लिए सिर्फ भाजपा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता । महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, तेलंगाना सरकारों ने हाल के वर्षों में युवाओं की नौकरी के लिए स्थानीय निवासी होना पहली योग्यता का प्रावधान किया है ।

पहले जीएसटी परिषद की बैठक का जिक्र करें, जिससे उपजे विवाद से संघीय सरकार के खिलाफ गैर-भाजपा शासित सरकारों ने मोर्चा खोल दिया । संघीय सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 27 अगस्त को जीएसटी परिषद की बैठक बुलायी । सभी राज्यों के वित्त मंत्रियों को संबोधित करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री सीतारमण ने जीएसटी राजस्व में राज्यों की मुआवजा देनदारी पर हाथ खड़े कर दिए और इसका कारण कोरोना संकट बताकर ‘अदृश्य दैवी आपदा’ को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया । भाजपा शासित राज्य सरकारों ने चुपचाप स्वीकार कर लिया । एक-दो वित्त मंत्रियों ने बोला भी तो दबी जुबान से । लेकिन गैर-भाजपा शासनवाले राज्यों के वित्तमंत्रियों ने ‘अदृश्य दैवी आपदा’ के बहाने इसे राज्यों की हकमारी बताया ।

भाजपा विरोधी राज्यों के वित्तमंत्री जिस बात से बिफरे वो संघीय वित्तमंत्री का इसके निदान के लिए दिया गया ‘ऑफर’ था । निर्मला सीतारामन ने सुझाव दिया कि राज्य सरकारें भारतीय रिजर्व बैंक से कर्ज लेकर इसकी भरपाई करें । केंद्रीय वित्त मंत्री का पहला ऑफर था कि राज्य 97000 करोड़ रूपये रिजर्व बैंक से ब्याज पर कर्ज ले सकते हैं । दूसरा ऑफर था कि राज्य पूरी मुआवजा राशि 2.35 करोड़ रूपये कर्ज रिजर्व बैंक की मदद से मार्केट से ले सकते हैं । केंद्रीय वित्तमंत्री ने स्वीकारा कि इस वर्ष राज्यों को जीएसटी राजस्व का 3 लाख करोड़ ‘गैप’ झेलना पड़ सकता है और इसका कारण ‘अदृश्य दैवी आपदा’ बताया । राज्य सरकारों को दैवी आपदा की आड़ में अपनी हकमारी से ज्यादा केंद्रीय वित्तमंत्री का कर्जदार बनाने का ऑफर अखरा । सबसे ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया केरल की वाममोर्चा सरकार के वित्तमंत्री टी. एम. थॉमस आइसाक और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार के वित्तमंत्री अमित मित्रा ने व्यक्त की । दोनों ने भारत सरकार के इस रवैए को संघीय व्यवस्था की नीतियों के खिलाफ बताया । केरल के वित्तमंत्री थॉमस आइसाक ने तो अपनी राजधानी लौटकर अगले दिन 28 अगस्त को ही संवाददाता सम्मेलन आयोजित करके कहा कि राज्यों को कर्जदार बनाने के बजाए संघीय सरकार केंद्रीय बैंक से खुद कर्ज लेकर भुगतान क्यों नहीं करती । 30 अगस्त को कोलकाता में बंगाल के वित्तमंत्री ने कहा कि जीएसटी बकाया से इन्कार करना संघीय व्यवस्था को खतम करने की साजिश है । उन्होंने भी केरल सरकार की तर्ज पर कहा कि संघीय सरकार स्वयं रिजर्व बैंक से कर्ज लेकर बकाया भुगतान करे । अमित मित्रा ने ‘दैवी आपदा’ के बहाने राज्यों का वित्तीय स्वास्थ्य बिगाड़ने की सोची-समझी चाल बताया । केरल सरकार ने संघीय सरकार की नीतियों के खिलाफ रणनीति तैयार करने के लिए 31 अगस्त को तिरुवनंतपुरम में गैर-भाजपा शासित राज्यों के वित्तमंत्रियों की बैठक बुलायी । उस बैठक में पंजाब, दिल्ली, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल के वित्तमंत्री शामिल हुए । वीडियो कान्फ्रेंस द्वारा आयोजित उस बैठक की अध्यक्षता केरल के वित्तमंत्री थॉमस ने की । इन सभी राज्यों के वित्तमंत्रियों ने केंद्र सरकार के कोरोना आपदा के नाम पर इस रवैए को ‘विश्वासघात’ बताते हुए इसके खिलाफ पूरे देश में अभियान चलाने का फैसला किया । टी. एम. थॉमस आइसाक ने बैठक के बाद संवाददाताओं को बताया कि इन छह राज्यों के मुख्यमंत्री जीएसटी मुआवजे पर इस रवैए की जानकारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देंगे और जीएसटी से बाहर भी इस मुद्दे को जिंदा रखा जाएगा । केरल के वित्तमंत्री ने बताया कि वे अगले हफ्ते फिर बैठक आयोजित करेंगे ।

क्षेत्रीय दल हमेशा से स्थानीय निवासियों की भावनाओं पर ही फोकस करते आए हैं । क्षेत्रीयता का मुद्दा उठानेवाली महाराष्ट्र की शिवसेना ने 1980 के दशक में ‘आमची महाराष्ट्र’ के नाम पर बाहरियों को निकाल बाहर करने का अभियान चलाया तो सबसे ज्यादा कांग्रेस और भाजपा को अखरा । अभी राष्ट्रीय जनाधार वाली यही दोनों पार्टी है, जिनकी सरकारों का अपनी बनायी हुई संघीय व्यवस्था की बड़ी नाव में छोटे छेद करना अच्छा नहीं है । इन्हीं दोनों पार्टियों से जनता विभिन्नता वाली इस बड़ी नाव को एकता की पतवार से चलाने की उम्मीद रखती है ।

अभी जीएसटी विरोध के आईने में छह राज्यों का संघीय सरकार पर ‘दुहरे मानदंड’ का आरोप लगाना बेबुनियाद नहीं है । इसके अन्य पहलू भी हैं, जिसे जम्मू व कश्मीर के नेता उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया के आलोक में देखा जाना चाहिए । महाराष्ट्र में अभी शिवसेना के नेतृत्ववाली गठजोड़ सरकार में कांग्रेस भी शामिल है । शिवसेना निजी क्षेत्र में रोजगार में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता देने पर जोर दे रही है। वही रवैया भाजपा शासित गुजरात, कर्नाटक, हरियाणा ने अपनाया है । तेलंगाना राष्ट्र समिति सरकार(तेलंगाना) और आंध्र प्रदेश में कांग्रेस से अलग होकर बनी क्षेत्रीय पार्टी वाई एस आर कांग्रेस की सरकार उसी रास्ते पर है । खुद का राष्ट्रीय दल माननेवाली बिहार की सत्तारूढ़ जद(यू) ने भाजपा के सहयोग से वही काम किया है ।