आजादी के समय से अलग झारखण्ड राज्य की मांग को लेकर चला आ रहा आन्दोलन आखिरकार कुछ तो कारगर साबित हुआ, चलिये फिलहाल झारखण्ड स्वशासी परिषद ही सही। ये मिल जाय तो फिर अलग राज्य की मांग तेज करेंगे। लगता है इस आन्दोलन से जुड़ी झारखण्ड और अन्य पार्टियों ने यही सोचकर सन्तोष कर लिया है। इसलिए अब सबके सब जितना मिल रहा है उसी में अपनी-अपनी कुर्सी सुरक्षित करने की जुगाड़ में लग गये हैं। ११ जुलाई को बिहार के मुख्यमंत्री लालूप्रसाद ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलायी और झारखण्ड स्वशासी परिषद का विधिवत गठन कर दिया।
परिषद का प्रशासनिक कामकाज चलाने के लिए अपर मुख्य सचिव के स्तर के आई. ए. एस. अधिकारी को मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी के रूप में नियुक्त किया जायगा। इस परिषद का अपना स्वतंत्र कोष होगा और इस परिषद के अधीनस्थ १८ जिलों की योजना के लिए बिहार की वार्षिक योजना की कम से कम २५ प्रतिशत राशि की व्यवस्था की जायगी।
घोषणा हुई नहीं कि बिहार की राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गयी। सबसे पहले झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन और उपाध्यक्ष सूरज मण्डल ने मौकापरस्ती का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपना राजनीतिक तेवर बदला। अलग झारखण्ड राज्य के लिए लड़ रही ये वो सबसे बड़ी पार्टी है जिसके नेताओं का कहना था कि ‘अलग राज्य’ से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं होगा और आदिवासियों की यह आकांक्षा पूरी होने तक आन्दोलन जारी रहेगा। लेकिन जिस स्वार्थपरता के चलते ५० वर्षों में यह आन्दोलन जोर नहीं पकड़ पाया, उसी का परिचय दिया शिबू सोरेन ने। शिबू सोरेन और सूरज मण्डल दोनों ही श्री लालूप्रसाद की खुशामद में लग गये ताकि अन्तरिम परिषद के अध्यक्ष का पद कहीं उनके हाथ से निकल न जाय क्योंकि मनोनयन का अधिकार मुख्यमंत्री के हाथ में है। इसके लिए दोनों ने राष्ट्रीय मोर्चे में शामिल होने का प्रस्ताव रखा जिसे मुख्यमंत्री लालूप्रसाद ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
दोनों को लाभ मिला। शिबू सोरेन ने दिल्ली में पहले से ही गोटी सेट कर रखी है क्योंकि स्वशासी परिषद को सीधे केन्द्र से पैसा मिलेगा और परिषद का अध्यक्ष होने के नाते सारे कोषों का वारा-न्यारा वे अपनी मर्जी से कर सकेंगे, साथ-साथ राज्य सरकार की वार्षिक योजना का लाभ भी उन्हें ही मिलेगा। श्री शिबू सोरेन झारखण्ड इलाके में किसी भी आदिवासी अथवा गैर आदिवासी नेता से ज्यादा प्रभाव रखते हैं। इसलिए इसमें दो राय नहीं कि छः महीने में चुनाव होने की स्थिति में झारखण्ड मुक्ति मोर्चे को सबसे ज्यादा सीटें मिलेंगी।
आदिवासियों की दशा में कोई सुधार हो या न हो अपना घर भरने का उन्हें पूरा अवसर मिलेगा। जैसा कि अब तक आदिवासी हितों के नाम पर सारे झारखण्डी नेता करते रहे हैं।
सत्तारूढ़ जनता दल आदिवासी इलाके में आज तक अपना वोट बैंक नहीं बना पाया। खासकर इस वर्ष के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी के सर्वेसर्वा लालू प्रसादजी को पहले से ज्यादा निराशाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा है। इस चुनाव में जीत या तो झारखण्ड पार्टियों को मिली अथवा भारतीय जनता पार्टी को। भारतीय जनता पार्टी को झारखण्ड जिलों को मिलाकर अलग ‘वनांचल’ राज्य की मांग बुलन्द करने का लाभ मिला और उस मांग पर आज भी यह पार्टी अड़ी है। भाजपा की प्रदेश शाखा के अध्यक्ष कैलाशपति मिश्र बताते हैं कि स्वशासी परिषद का गठन आदिवासियों को अपनी मूल मांग से विमुख करने का एक बहाना है, इसलिए उनकी पार्टी अलग वनांचल राज्य से कम किसी भी बिन्दु पर समझौता नहीं करेगी।
लालूप्रसादजी ने देखा कि झारखण्डी इलाकों में अपना प्रभाव जमाने का अब एक ही उपाय बच रहा है कि सबसे प्रभावशाली पार्टी झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के साथ गठजोड़ किया जाय ताकि अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में कम से कम भाजपा को ज्यादा सीटें हासिल न होने पायें। यह जनता दल सरकार के हक में अच्छा ही हुआ कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के नेता स्वयं उनसे सटने आये।
मुख्यमंत्री लालूप्रसाद ऐसा कभी नहीं होने देंगे कि सारा कुछ शिबू सोरेन के हाथ में चला जाय, लेकिन इतना अवश्य हो कि लोकसभा चुनाव में जनता दल उम्मीदवारों को भी जीतने में शिबू सोरेन मदद करें। इसलिए श्री लालूप्रसाद अन्तरिम परिषद के उपाध्यक्ष पद पर अपने दल के गौतम सागर राणा का मनोनयन करने के पक्ष में हैं। श्री राणा अभी बिहार विधान परिषद के सदस्य हैं।
आदिवासी कल्याण के नाम पर क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए चल रही इस जोड़तोड़ में यह तय करना मुश्किल है कि वास्तव में झारखण्ड स्वशासी परिषद के गठन का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय किसे है। जब तक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए थे, केन्द्र सरकार और बिहार की जनता दल सरकार ने एक-दूसरे पर ठीकरा फेंका। लालूप्रसाद यह कहकर पल्ला झाड़ लेते थे कि अलग राज्य का गठन तो केन्द्र सरकार के हाथ में है। राज्य सरकार इस मामले में कुछ नहीं कर सकती। केन्द्र सरकार के लिए इतना काफी था कि बिहार सरकार के अड़ंगे के कारण कुछ नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस (इ) सरकार का दावा है कि स्वशासी परिषद का सारा इन्तजाम काफी पहले हो गया था, जनता दल सरकार उसे कार्यान्वित नहीं होने दे रही थी। श्री लालूप्रसाद जोर देकर इस बात को कहते हैं कि जो काम अपने चालीस वर्षों के शासन की अवधि में जनता दल ने कर दिखाया। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के नेतागण भी अपने आदिवासी भाइयों के बीच परिषद के गठन का श्रेय स्वयं को देते हैं। लेकिन पत्थरों और खदानों के बीच कंक्रीट में अपनी किस्मत फोड़ती आदिवासी जनता इन सारे झंझावातों से बेखबर है।
आदिवासियों को न तो यह मालूम है कि चार राज्यों के २७ जिलों को मिलाकर अलग झारखण्ड राज्य के गठन की मांग करने वाले आदिवासी नेताओं ने झारखण्ड स्वशासी परिषद पर ही कैसे सन्तोष कर लिया न ही इस बात की उन्हें जानकारी है कि भुखमरी की शिकार जनता के प्रतिनिधि इतना मालामाल कैसे हो गये। पिछले वर्ष आदिवासी जिला पलामू के भयंकर सूखाग्रस्त इलाकों का दौरा करने जब प्रधानमंत्री आये उस समय तक उस जिले के कोई विधायक या सांसद उनका हालचाल लेने नहीं पहुंचे थे। मुख्यमंत्री लालूप्रसाद प्रधानमंत्री के साथ गये।
पिछले वर्ष झारखण्ड इलाकों में लगातार कई-कई बार झारखण्ड पार्टियों ने हिंसात्मक तरीके से बन्द आयोजित किये जिससे सबसे ज्यादा केन्द्र को नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि खनिज का भण्डार झारखण्ड इलाके में है जिसका भरपूर लाभ केन्द्र को मिलता है। राज्य सरकार ने कानून और व्यवस्था बनाये रखने में कोई खास दिलचस्पी नहीं ली। आखिरकार प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि १५ अगस्त तक इस समस्या का वे हल निकाल लेंगे, लेकिन १५ अगस्त न सही, ३० सितम्बर तक उन्होंने हल निकाल दिया।
समझौते का भाजपा, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (कृष्णा मार्डी गुट), झारखण्ड पीपुल्स पार्टी और सी. पी. आई. (माले) ने यह कहकर विरोध किया था कि समझौता भोलीभाली आदिवासी जनता के साथ धोखा है। अब भाजपा को छोड़कर सभी पार्टियां चाहती हैं कि कुर्सी की बन्दरबांट में उन्हें भी हिस्सा मिले। कृष्णा मार्डी के गुट वाला झारखण्ड मुक्ति मोर्चा वो तबका है जिसने श्री शिबू सोरेन से अलग होकर श्री लालूप्रसाद का साथ दिया था, आज उसी का पत्ता कट रहा है।