भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल के 100 दिन पूरे होने की दो बड़ी उपलब्धियां लगभग सभी केंद्रीय मंत्री गिना रहे हैं । पहला है - जम्मू व कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाला अनुच्छेद 370 समाप्त करना और दूसरा है - तीन बार बोलकर तलाक देनेवाला मुस्लिम महिलाओं पर लागू शरियत ‘पर्सनल ला’ खत्म करना । 9 सितंबर को जिस दिन केंद्र में भाजपा शासन के 100 दिन पूरे होने के उपलक्ष में देश भर में आयोजन हुए और वो सिलसिला जारी है, उस दिन कश्मीर में सामान्य जनजीवन ठप्प होने का 35वां दिन था । पांच अगस्त को राष्ट्रपति के आदेश से जम्मू व कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाला संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 370 और 35-ए समाप्त हो गया । जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 के अनुसार जम्मू व कश्मीर राज्य को केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया । लद्दाखियों की तो केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग पुरानी थी, जो पूरी हुई । लेकिन विधान सभा सिर्फ कश्मीर में ही होगी, जो जम्मू व कश्मीर की राजधानी है और रहेगी ।
सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी अपनी कश्मीर यूनिट के नेता विधायक मुहम्मद युसुफ तारिगामी से मिलना चाहते थे । तारिगामी काफी समय से बीमार थे, उसी हालत में अपने घर में नजरबंद किए गए । सीताराम येचुरी को अपने कामरेड तारिगामी को देखने जाने की इजाजत सुप्रीम कोर्ट से लेनी पड़ी । वापस लौटकर उन्हें हलफनामा दायर करना पड़ा । पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा को भी मां से मिलने जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से इजाजत लेनी पड़ी । तारिगामी को दिल्ली के एम्स अस्पताल में सुप्रीम कोर्ट से क्लियरेंस के बाद इलाज के लिए लाया जा सका ।
अगस्त के अंतिम सप्ताह में जब जम्मू व कश्मीर में तनाव अपने चरम पर था, उसी समय सुप्रीम कोर्ट में जम्मू व कश्मीर का दर्जा खत्म करने के सरकार के फैसले के खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गयीं । याचिका दायर करनेवाले पूर्व आईएएस और सैनिक अधिकारी हैं । इन अधिकारियों ने जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, 2019 और इसके संसद से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के आदेश से 370 खत्म किए जाने की संवैधानिकता को चुनौती दी है । चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षतावाली पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ अक्टूबर के पहले सप्ताह में इस पर विचार करेगी कि यह कानून संवैधानिक है या नहीं । जम्मू व कश्मीर में लागू किसी भी कानून में ‘कश्मीरियत’ और ‘जम्हूरियत’ सबसे ऊपर है । विशेष दर्जा जब कायम था, तब भी ‘कश्मीरियत’ की दुहाई दी जाती थी । इसे खत्म करने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘कश्मीरियत’ को ‘जम्हूरियत’ से भी जोड़ते हैं । पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का यह नारा था - कश्मीरियत, जम्हूरियत और इन्सानियत ।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी शेख अब्दुल्ला को जेल में डालना पड़ा और 11 साल तक बंद रखा गया । सबसे ज्यादा कश्मीरियत की दुहाई शेख अब्दुल्ला देते थे, जो वास्तव में ‘इस्लामियत’ थी । अभी तो प्रेस पर पाबंदी है । समाचार वही मिलता है, जो अधिकारी बताते हैं । ‘संचार ब्लैक आउट’ के खिलाफ ‘कश्मीर टाइम्स’ की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट को इसी हफ्ते 16 सितंबर को सुनवाई करनी है । पांच सितंबर को यह याचिका दायर की गयी, जिसमें अनुराधा भसीन ने कहा कि पाबंदी के एक महीना के बावजूद वो अपना अखबार नहीं छाप सकती ।
मोबाईल और इंटरनेट पर तो रोक है । कश्मीरियों से सेव सीधे खरीदने का सरकार का फैसला भी स्वागत योग्य है । एक सेव उत्पादक पर हमला करनेवाले आतंकी को मार गिराने का सुरक्षा बलों का काम सराहनीय है।
सेना में बहाल होने के लिए कश्मीरी युवकों में रूचि भी अच्छी खबर है । 29,000 के नियुक्ति के लिए पंजीकरण और 575 के ज्वाईन करने की रिपोर्ट है ।
लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है - ‘कश्मीरियत’ और ‘जम्हूरियत’ । कश्मीर में चुनाव लायक माहौल बनाने में तो अभी समय लगेगा, तभी जम्हूरियत बदला रूप देखने को मिलेगा । लेकिन जिस ‘कश्मीरियत’ की दुहाई दी जा रही है, उसका कानूनी आधार सीधे तौर पर धर्म से जुड़ा है । कश्मीर के बारे में देशी से ज्यादा विदेशी समाचार मिलते हैं । पाकिस्तानी हरकतों के बारे में चीन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र से ज्यादा खबरें आ रही हैं । आज से नहीं, जवाहर लाल नेहरू के समय से ही यह सिलसिला चला आ रहा है ।
अभी विशेष दर्जा देनेवाले जिन प्रावधानों की ‘कश्मीरियत’ पर सुप्रीम कोर्ट को विचार करना है, उसकी जड़ में है मजहब । भाजपा महासचिव और कश्मीर प्रभारी राम माधव ने बार-बार कहा है कि जम्मू व कश्मीर का मामला हिन्दू व मुस्लिम का नहीं है । इसको भाजपा शासन के 100 दिन पूरे होने के प्रचार-प्रसार के आइने से देखा जाए, क्योंकि उसमें मुस्लिम महिलाओं को राहत देनेवाला ‘तीन तलाक’ कानून भी उपलब्धि में शामिल है, जो उन महिलाओं को पुरूषों की भोग्या बने रहने की विवशता से बचाता है ।
जम्मू व कश्मीर का मामला हिन्दू और मुसलमान ही नहीं, बौद्ध धर्म से भी जुड़ा है । ‘कश्मीरियत’ का हिस्सा सिर्फ कश्मीर बना । उसमें जम्मू शामिल नहीं हुआ क्योंकि वह हिन्दू बहुल आबादी वाला प्रांत था । ‘कश्मीरियत’ का हिस्सा लेह और लद्दाख कभी नहीं बना, क्योंकि वह बौद्ध आबादी वाला प्रांत था । उसका एकमात्र कारण यह रहा कि ‘कश्मीरियत’ पर ‘इस्लामियत’ हावी था और वो सिर्फ कश्मीरी नेताओं का तकिया कलाम था । जिन आतंकियों ने कश्मीर को अपना अड्डा बनाया, उसका आधार इस्लाम था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आठ अगस्त को कहा ही कि जम्मू को भी अलग राज्य का दर्जा दिया जाएगा । लद्दाख की केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने की मांग के पीछे इस्लामियत में सराबोर ‘कश्मीरियत’ थोपा जाना था ।
उस ‘कश्मीरियत’ का पारंपरिक आधार हिन्दू राजा के समय में लागू कानून था, जिसके प्रावधान महिलाओं के साथ इस्लामी शरियत वाली ज्यादती से मेल खाते हैं । यह कानून डोगरा राजवंश के राजा रणवीर सिंह ने 1932 में लागू किया, जो आरपीसी(रणवीर पनल कोड-दंड संहिता) के नाम से जाना जाता था । पांच अगस्त, 2019 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के आदेश के बाद जम्मू व कश्मीर में आईपीसी(भारतीय दंड संहिता) लागू हुई । अब देखिए कि अभी तक के सभी मुस्लिम शासकों ने ‘कश्मीरियत’ और ‘विशेष दर्जा’ के नाम परर आरपीसी क्यों लागू रखा हुआ था । आरपीसी के अनुच्छेद 497 के अनुसार अगर कोई पुरूष किसी ऐसी महिला के साथ शारीरिक संबंध बना लेता है जो किसी दूसरे की पत्नी है और उसमें उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है, तो वह बलात्कार का मामला नहीं बनेगा, उसके लिए वो महिला ही ‘व्यभिचार’ की दोषी मानी जाएगी । वो पीड़िता ‘बदचलन’ की अपराधी साबित होगी और उसके लिए जुर्मान या पांच साल जेल का प्रावधान था ।
सुप्रीम कोर्ट ने दो अगस्त को आरपीसी के सिर्फ इसी अनुच्छेद 497 को ‘असंवैधानिक’ बताकर समाप्त किया । आरपीसी पूरी तरह पांच अगस्त को खत्म हुई । आरपीसी के इस प्रावधान को इटली निवासी एनआरआई जोसेफ शाईन ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी ।
विशेष दर्जा खत्म करनेवाले अनुच्छेद में 35 ए भी आता है, जो 1954 में राष्ट्रपति के आदेश से भारतीय संविधान में जोड़ा गया । इसका भी आधार 1927 में महाराजा हरिसिंह के शासनकाल से जुड़ता है । उस समय ‘कश्मीर कश्मीरियों के लिए’ आंदोलन चलानेवाले सभी हिन्दू संगठन थे । वो ‘कश्मीरियत’ हिन्दू प्रभुत्ववाला था और उस पर कश्मीरी पंडित हावी थे । उन्हीं कश्मीरी पंडितों को अपनी जगह जमीन छोड़कर भागनी पड़ी, जब ‘कश्मीरियत’ पर इस्लाम हावी हो गया ।
अलगाववाद के पीछे धर्म रहा है । मुस्लिम प्रभुत्व वाले 35-ए से परेशान पंडितों ने मुसलमानों को ‘सांप्रदायिक’ बताया और इसे खत्म करके अलग राज्य की मांग करने लगे । 1991 में इनके संगठन ‘पनून कश्मीर’ के नेतृत्व में कश्मीरी हिंदुओं का विशाल आयोजन हुआ, जिसमें धारा 370 और 35 ए खत्म करने की जोरदार मांग हुई । इस धारा को खत्म करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वास्तव में ऐतिहासिक कदम है, जिससे धर्म आधारित ‘कश्मीरियत’ का अंत हुआ । जब बाहर से लोग जाकर वहां बसेंगे, उस समय की ‘जम्हूरियत’ और ‘कश्मीरियत’
अवश्य ही पहले से अलग होगी । 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय शेख अब्दुल्ला के स्वयंभू ‘प्रधानमंत्री’ और ‘सद्रे-रियासत’ की जगह राज्यपाल और मुख्यमंत्री पद का प्रावधान हुआ । उसके बाद से आजतक कोई हिन्दू जम्मू व कश्मीर का मुख्यमंत्री नहीं बना और केंद्र ने किसी मुसलमान को राज्यपाल नहीं बनाया ।