चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) को लेकर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस सरकार और चुनाव आयोग के बीच तकरार बढ़ती जा रही है । जैसे-जैसे विधान सभा चुनाव करीब आ रहा है, लगभग सीधी टकराव की नौबत आती जा रही है । इसमें भाजपा भी निशाने पर है । क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) समेत उनकी पार्टी के सभी नेता चुनाव आयोग पर भाजपा के इशारे पर पश्चिम बंगाल में मतदाताओं का नाम हटाने का आरोप लगा रही है ।
बिहार में भी चुनाव आयोग ने वहां की मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल और सहयोगी कांग्रेस वाम दलों के एसआईआर विरोध के बीच गत वर्ष कराया । कोर्ट में एसआईआर को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुनवाई और मतदाता सूची गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया मतदान शुरू होने के समय तक टलती रही । बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल(यू) और भाजपा गठजोड़ को भारी ऐतिहासिक जीत मिलने के बाद राजद.कांग्रेस का चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ का आरोप वही सीमित रह गया ।
अभी वही स्थिति पश्चिम बंगाल और केरल में पैदा हो गयी है । इस वर्ष अप्रैल.मई में पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, जिनमें इन दोनों विधान सभाओं के अलावे असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी भी है । लेकिन एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग और भाजपा से तनातनी में पहले नंबर पर पश्चिम बंगाल है । दूसरे नंबर पर केरल है । इन दोनों राज्यों में भी एसआईआर बिहार की तरह जून, 2025 में शुरू होने के समय से ही विवादित है ।
केंद्र में तो भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार है ही, पश्चिम बंगाल विधान सभा में भाजपा मुख्य विपक्षी दल है । नए साल की शुरुआत राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच नयी खींचातानी मतदाताओं की मसौदा सूची में से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के कारण बढ़ी है । इसमें सबसे ज्यादा मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के काम में लगे कर्मचारियों और अधिकारियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है । खासकर बीएलओ( बूथ स्तरीय अधिकारी) दुहरी मार झेल रहे हैं । पश्चिम बंगाल में यह राजनीतिक विवाद अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है कि आए दिन राज्य सरकार, तृणमूल कांग्रेस नेता और चुनाव आयोग एक.दूसरे को चुनौती देनेवाला बयान आए दिन जारी कर रहे हैं ।
03 जनवरी को एसआईआर विवाद उस समय गहरा गया, जब चुनाव आयोग ने पांच चुनाव कर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया । इन कर्मियों को निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान गणना पत्र वितरण और उसे इकट्ठा करने में कथित अनियमितता का दोषी पाया है ।
यह तब हुआ जब 31 दिसंबर को तृणमूल कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल की दिल्ली में चुनाव आयोग से मुलाकात हुई । आधिकारिक सूत्रों के अनुसार बातचीत का माहौल अच्छा नहीं था । मुलाकात के दौरा मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने तृणमूल कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल से कहा कि बूथ स्तरीय अधिकारीए मतदाता सूची अधिकारीए पर्यवेक्षक समेत एसआईआर के काम में लगे किसी भी कर्मचारी को राजनीतिक प्रतिनिधियों द्वारा डराया ध धमकाया जाना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । 04 नवंबर से बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया शुरू हुई और उस महीने भी तृणमूल कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिला था । उस वक्त अन्य राज्यों से भी बीएलओ की आत्महत्या, मौतों की खबरें आ रही थी और हर जगह काम का अत्यधिक दबाव कारण बताया गया । सुप्रीम कोर्ट के कहने पर चुनाव आयोग ने मतदाता पुनरीक्षण, मसौदा सूची और अंतिम मतदाता सूची की डेडलाईन तारीखें बढ़ायी । लेकिन तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) नेताओं को सीईसी ने नवंबर में बीएलओ पर दबाव का कारण दूसरा बताया । सीईसी के अनुसार पार्टी कार्यकर्ताओं और खासकर टीएमसी कार्यकर्ताओं ने बीएलओ तथा अन्य एसआईआर कर्मियों को धमकी दी कि मृत मतदाताओं, अन्यत्र चले गए और एक से ज्यादा जगहों पर नाम दर्ज मतदाताओं का नाम सूची से हटाने की अनुशंसा न भेजें । उस सिलसिले में चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी और कोलकाता पुलिस कमिश्नर को पत्र लिखकर निर्देश दिया था कि बीएलओ लोगों को मतदाताओं का नाम जोड़ने या घटाने के लिए धमकानेवाले पार्टी कार्यकर्ताओं से सुरक्षा प्रदान करें ।
लेकिन 31 दिसंबर की मुलाकात में एक और बात सामने आयी, जो बीएलओ की परेशानियों का अहम पहलू है । इस चुनौतीपूर्ण माहौल में सीईसी ने 05 जनवरी को ही झारखंड जाकर एसआईआर समीक्षा के बाद कहा कि ‘न हम रुकेंगे, न डरेंगे ।’ बीएलओ के साथ बैठक करके कहा. ‘2003 की वोटर लिस्ट में जिनके नाम दर्ज हैं, वे भारतीय नागरिक हैं । गौरतलब है कि 2003 में भी केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार थी ।’ चुनाव आयोग के एक अधिकारी के अनुसार चुनाव आयोग ने बूथ स्तरीय अधिकारियों के लिए बढ़ाए गए मानदेय की राशि तत्काल मुहैया कराने के संबंध में पश्चिम बंगाल सरकार से आग्रह किया । उसके जवाब में टीएमसी सूत्रों ने चुनाव आयोग से कहा कि केंद्रीय वित्त मंत्री को राज्य का रोका गया 2 लाख करोड़ फंड जारी करने के लिए सीईसी ज्ञानेश कुमार को लिखना चाहिए । फंड मुहैया न भी तो, अगर सीईसी पत्र लिखें तब भी राज्य सरकार बीएलओ को 50ए000 मानदेय का भुगतान करेगी । टीएमसी नेताओं ने यह भी कहा कि अगर चुनाव आयोग को बीएलओ की इतनी ही चिंता है तो एसआईआर के दौरान करनेवाले बीएलओ लोगों के शोकसंतप्त परिवारजनों को सहायता दे या कम.से.कम सांत्वना की वक्तव्य तो जारी करे ।
06 जनवरी को एसआईआर सुनवाई के बीच भी 2 लोगों की मौत हो गयी । उनके परिवारजनों ने बताया कि एसआईआर को लेकर तनाव से मौत हुई । 06 जनवरी को ही चुनाव आयोग ने बंगाल में चुनावकर्मियों को सख्त निर्देश दिया कि जिनके नाम सूची से हटाए गएउनके बीच गणना पत्र वितरण और उसे इकट्ठा करने के काम में ढिलाई न बरती जाए ।
03 जनवरी को जिस दिन चुनाव आयोग ने कथित लापरवाही ध अनियमितता के दोषी पांच बीएलओ के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया, उस दिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को पत्र लिखा । चुनाव आयोग को लिखा गया दीदी का यह तीसरा पत्र है । मुख्यमंत्री ने आयोग को लिखा कि या तो मतदाता सूची के एसआईआर को लेकर चल रहे झमेले को दूर करें या पश्चिम बंगाल में इसे रोकें । पत्र में दीदी ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि मनमाने तरीके से एसआईआर प्रक्रिया में लाखों लोगों को पहले वोट डालने के संवैधानिक अधिकार से वंचित किया गया और फिर आपत्तियोंधदावे प्रस्तुत करने के नाम पर परेशान किया जा रहा है । पश्चिम बंगाल में 58 लाख मतदाताओं का नाम पहले चरण के एसआईआर में हटाया गया और 27 दिसंबर को शुरू हुई आपत्तियांधदावे सुनवाई में भी लगभग 1726 करोड़ मतदाताओं को ‘संदिग्ध’ श्रेणी में रखा गया । मृत्यु, गणना पत्र जमा नहीं करने, स्थायी रूप से अन्यत्र चले जाने और एक से ज्यादा स्थानों पर मतदाता सूची में दर्ज जैसी अड़चनें लगाकर मसौदा सूची से हटे नाम तकरीबन 94049 लाख हैं । दीदी ने अपने पत्र में लिखा कि बुजुर्ग, शरीर से लाचार, गंभीर बीमारियों के शिकार लोगों को भी बख्शा नहीं गया है तथा उन्हें 20न्25 कि.मी. से ज्यादा तय करके चुनाव आयोग कार्यालय आना पड रहा है । उन्हें सम्मन करने से पहले यह भी नहीं बताया गया कि किन कारणों से उनकी सुनवाई होनी है । तीन जनवरी को ही चुनाव आयोग ने दक्षिण 24 परगना जिले में मतदाता सूची पर्यवेक्षक आईएसएस अधिकारी सी. मुरुगन की गाड़ी पर स्थानीय लोगों द्वारा किए गए हमले की एक्शन टेकेन रिपोर्ट(एटीआर) डीजीपी राजीव कुमार से मांगा ।
एसआईआर प्रक्रिया में एक साथ पहले से विवादित नागरिकता, घुसपैठ और मतदाता सूची में कथित फर्जी नाम समेत कई गुत्थियां उलझी हैं, इसलिए विवाद ने राजनीतिक तूल पकड़ लिया । सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के क्रम में भी मतदाताओं की पात्रता तय करने के चुनाव आयोग के आधार और नागरिकता सुनिश्चित करने के अधिकार पर सवाल उठाए गए ।
06 जनवरी को सागर दीप में एक जनसभा में दीदी ने चुनाव आयोग को धमकी दी कि मतदाताओं को परेशान करना अगर बंद नहीं हुआ तो वे चुनाव आयोग के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगी । शीर्ष कोर्ट में पहले से ही एसआईआर पर सुनवाई चल रही है और चीफ जस्टिस सूर्यकान्त ने नए वर्ष के दिन कहा कि ऐसे संवैधानिक मामले निबटाने में तेजी लाने के लिए ज्यादा पीठों का गठन उनकी प्राथमिकता है ।
06 जनवरी को ही चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने चुनाव आयोग ने दावा किया कि संविधान की धारा 324 और 326 के तहत उसे हर चुनाव से संबंधित सारे अधिकारों के अलावे मतदाता सूची में नाम दर्ज करने से पहले उस व्यक्ति की भारतीय नागरिकता सुनिश्चित करने का भी अधिकार है । गत वर्ष की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के ही दूसरे जज जोयमाल्या बागची ने ही यह सवाल उठाया था कि नागरिकता से जुड़ा कोई भी मामला केंद्रीय गृह मंत्रालय का अधिकार क्षेत्र है, चुनाव आयोग कैसे तय कर सकता है ।
गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग का फोकस बांग्लादेशी घुसपैठिया पर है, जिनमें मुसलमान ज्यादा हैं । जहां तक बांग्लादेशी हिंदू समुदाय की नागरिकता का सवाल है, दीदी ने दोनों को मतुआ समुदाय की हालत की ओर ध्यान दिलाया । उत्तरी 24 परगना और नादिया जिले के 15 चुनाव क्षेत्रों में मतुआ समुदाय की आबादी है, जो बांग्लादेश से आकर बसे हैं । एसआईआर प्रक्रिया के दौरान इनका भविष्य अधर में लटका है । चुनाव आयोग ने इनकी नागरिकता और मतदाता सूची से नाम हटाने का मामला लटकाकर रखा है । 31 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के चुनावी दौरे पर पहुंचे गृह मंत्री अमित शाह ने भी मतुआ के बारे में कुछ नहीं कहा । जबकि यहां से जीते मतुआ नेता भाजपा सांसद शांतनु ठाकुर ने दो दिन पहले 28 दिसंबर को पार्टी के एक समारोह में ही यह मामला उठाया । उन्होंने कहा कि 50 लाख रोहिंग्या, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी मुसलमान एसआईआर में हटाए गए, जबकि हमारे एक लाख लोगों को वोट डालने से फिलहाल रोका गया है, कहां हम ज्यादा हासिल कर रहे हैं ।’ मतुआ समुदाय ने 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया । 2019 में नागरिकता संशोधन कानून बनाए जिसमें वैसे प्रावधान हैं, जो मतुआ समुदाय को नागरिक बनने के लिए लागू होते हैं । अब अभी एसआईआर तलवार के डर से मतुआ लोगों को अफरा-तफरी में नागरिकता के लिए आवेदन करने कहा गया है । गत वर्ष एसआईआर के कारण तृणमूल काँग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के नेताओं ने मतुआ की नागरिकता के लिए भूख हड़ताल की । मतुआ वोट 2024 उपचुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जिता चुके हैं ।
तृणमूल कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है एसआईआर के बहाने आयोग नागरिकता और समानान्तर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) अभियान चला रहा है । सुप्रीम कोर्ट में 06 जनवरी को सुनवाई के दिन चुनाव आयोग को सफाई देनी पड़ी । दीदी ने सागर द्वीप की जनसभा में चुनाव आयोग पर अमानवीय आचरण का आरोप लगाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने मनमाने ढंग से मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए संदिग्ध डिजिटल प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया, जिसमें मेसेज भेजने के लिए भाजपा के प्(आईटी) सेल वाला वाट्सएप् भी शामिल है ।
06 जनवरी को एसआईआर पर सुनवाई के दिन ही तृणमूल कांग्रेस एमपी डेरेक ओ ब्रिएन ने पश्चिम बंगाल मतदाता सूची में कथित अनियमितता और मनमाना रवैए का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग के खिलाफ कोर्ट में नयी याचिका दायर कर दी ।
दरअसल विवाद का कारण संवैधानिक से ज्यादा राजनीतिक है । चुनाव आयोग पर भाजपा के हित में असंवैधानिक एसआईआर प्रक्रिया चलाने के आरोप बिल्कुल आधारहीन नहीं है । इसीलिए बार-बार सफाई और सुप्रीम कोर्ट में भी चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप का अधिकार न होने जैसी चुनौतीपूर्ण दलीलें चुनाव आयोग द्वारा दिए जाने के बावजूद शीर्ष कोर्ट पीठ ने कह दिया है कि मतदाता सूची में अनियमितता की शिकायत मिली तो हस्तक्षेप करेंगे ।
असम के भाजपा मुख्यमंत्री हिमंता विस्वासरमा ने 07 जनवरी को यह कहकर आरोपों की पुष्टि कर दी कि बांग्लादेशियों और अवैध रूप से रह रहे मियां समुदाय के लोगों का नाम हटाने के लिए एक सही सूची तैयार करना भाजपा का एजेंटा है । मियां अपमानजनक संबोधन है । असम में 10ए56ए291 नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए चिन्हित किए गए हैं और 18 लाख जोड़े गए हैं । भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में 2न्89 नाम काटे गए हैं । वाममोर्चा शासित केरल में 2408 लाख मतदाताओं को 23 दिसंबर को प्रकाशित मसौदा सूची में नाम नहीं मिला । यहां भी एसआईआर पर सुनवाई की समस्या पश्चिम बंगाल की तरह सभी गैर.भाजपा दलों ने उठायी है ।
चुनाव आयोग ने अपने हिसाब से एसआईआर की डेडलाईन कड़ाई से पूरी करने के बीएलओ और राजनीतिक दलों की आवाज अनसुनी कर दी । सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद समय.सीमा बढ़ायी थी और मसौदा सूची पर दावेधआपत्तियां दायर करने की सुनवाई में 85 वर्ष की उम्र के बुजुर्ग तथा बीमार.लाचार के लिए उनके घर जाकर सुनवाई के निर्देश चुनाव आयोग ने दिए ।
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को जब एसआईआर नोटिस गयी, तब बवाल और तेज जो गया । चुनाव आयोग ने सफाई दी कि अमर्त्य सेन को सुनवाई के लिए आने की जरूरत नहीं है, एक बीएलओ उनके घर जाएंगे । अमर्त्य सेन की मां का नाम 2003 के एसआईआर सूची में दर्ज है ।
पश्चिम बंगाल में विवाद ज्यादा तूल पकड़ने का असली कारण दो है । पहला, 16 दिसंबर को प्रकाशित एसआईआर मसौदा सूची से कटे 58 लाख नाम में से सबसे ज्यादा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भवानीपुर विधान सभा सीट प्रभावित हुई । दूसरा, काटे गए नाम में से पुरूषों की तुलना में महिला मतदाताओं की संख्या ज्यादा हैं, जो दीदी की पार्टी को अन्य की अपेक्षा ज्यादा पसंद करती हैं । तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि मुसलमान महिला वोटरों को चुनाव आयोग ने बांग्लादेशी घुसपैठिया करार दिया ।
ऐसी एक महिला सुनाली खातुन को केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के अनुसार गर्भवती की हालत में परिवार के 6 सदस्यों समेत बांग्लादेश भेज दिया गया । कलकता हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से लड़कर 100 दिन मुकलिसी में गुजारकर सुनाली खातुन ने अपनी पहचान सुनिश्चित की । 03 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर वापस कोलकाता लौटी और 05 दिसंबर को बच्चे को जन्म दिया । उसके पति और तीन अन्य बांग्लादेश में ही हैं ।