सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत 31 दिसंबर को रिटायर होते ही सीडीएस(चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ) बना दिये गए । सीडीएस गठन की केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी और उसकी अधिसूचना जारी होने के समय तक लगभग सुनिश्चित हो गया था कि जनरल विपिन रावत ही देश के पहले सीडीएस प्रमुख बनेंगे ।

24 दिसंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सीडीएस नियुक्ति को मंजूरी दी, जिसमें बताया गया कि तीनों सेनाओं के प्रमुख की तरह सीडीएस ‘फोर स्टार रैंक’ का पद होगा और ये तीनों सेनाओं के प्रमुख होंगे । उसके पहले से सीडीएस पद पर जनरल विपिन रावत की नियुक्ति तय मानी जा रही थी । सरकारी और गैर-सरकारी हलकों में सिर्फ उन्हीं के नाम की चर्चा थी । वो चर्चा और पुख्ता हो गयी, जब जनरल विपिन रावत ने 26 दिसंबर को ‘नागरिकता संशोधन एक्ट’ को लेकर हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर भाजपाई नेताओं जैसा बयान दे डाला । जनरल रावत ने विरोध प्रदर्शनों के समर्थन में उतरे बुद्धिजीवियों और विपक्षी नेताओं के बारे में टिप्पणी करके उनके नेतृत्व पर सवाल उठा दिया ।

जनरल विपिन रावत ने यों कहा - नेता वो हैं, जो लोगों को सही दिशा में चलने-चलाने के लिए नेतृत्व प्रदान करें, वो नेता नहीं जो लोगों को गलत दिशा में ले जाएं । जिस तरीके से वे हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ के लिए लोगों का नेतृत्व कर रहे हैं, ये नेतागिरी नहीं है ।

ऐसा ही बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत सभी भाजपा नेता दे रहे हैं । इसलिए सेना प्रमुख के वैसे बयान पर बवाल मचा । कांग्रेस के अलावे भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के प्रमुख घटक जद(यू) समेत सभी विपक्षी नेताओं ने इस पर एतराज किया और तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की । कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने कहा कि सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत खुद को अपने दायित्व तक सीमित रखें और राजनीतिक बयान न दें ।

लेकिन जनरल विपिन रावत को एक दायित्व से मुक्त होते ही दूसरा उससे ज्यादा महत्वपूर्ण दायित्व सौंपने की तैयारी भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने पूरी कर ली थी । यह अच्छी तरह जानते हुए ही जनरल विपिन रावत ने भाजपाई बयान दिया । इस संबंध में लगाए जा रहे कयास को तुरंत विराम लग गया । 29 दिसंबर को जारी अधिसूचना के अनुसार नवगठित सीडीएस पद के रिटायर होने की उम्र 65 वर्ष होगी । यह तीनों सेना -नौसेना, वायुसेना, थल सेना प्रमुखों के रिटायर होने की उम्र से तीन साल ज्यादा है । इसके लिए सेना एक्ट, 1950 में बदलाव करके सीडीएस का अधिकतम कार्यकाल तीन साल निर्धारित किया गया और यह भी बताया गया कि लोकहित में सरकार चाहे तो इसे विस्तारित कर सकती है । ऐसा प्रावधान लोकहित में किया गया अथवा भाजपा हित में इसकी झलक तो जनरल विपिन रावत ने सेना प्रमुख पद पर रहते हुए ही दे दी । 31 दिसंबर को जनरल विपिन रावत का रिटायर होना तय था और उसके एक दिन पहले 30 दिसंबर को केंद्र सरकार ने देश के पहले सीडीएस के रूप में जनरल विपिन रावत की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया । आदेश के अनुसार विपिन रावत की सीडीएस के रूप में नियुक्ति मंगलवार, 31 दिसंबर से प्रभावी हुई, जिस दिन वे सेना प्रमुख पद से रिटायर हुए ।

रक्षा राज्यमंत्री श्रीपाद नाईक ने राज्य सभा में इस संबंध में उठे सवाल के जवाब में 2 दिसंबर को कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है । प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को सीडीएस गठन प्रस्ताव को ‘लैंडमार्क’ रक्षा सुधार बताया था । प्रधानमंत्री ने अपने ‘लैंडमार्क’ नीति के तहत 30 दिसंबर को अपने लोकसभा कल्याण मार्ग स्थित आवास पर आयोजित जनरल विपिन रावत के विदाई भोज के दौरान ही उन्हें सीडीएस प्रमुख बनाये जाने की जानकारी दी ।

रक्षा सुधार के क्रम में रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत एक अलग सैनिक मामला विभाग गठित किया गया । उसे भी केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 24 दिसंबर को मंजूरी दी। सीडीएस जनरल रावत इस नए विभाग के प्रमुख और न्यूक्लियर कमांड ऑथोरिटी के भी सदस्य बने, जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं ।

सेना नियम में ऐसे संशोधन किए गए हैं, ताकि कोई भी सेना प्रमुख रिटायर होने के बाद सीडीएस बन सकते हैं । सेना प्रमुख के रिटायर होने की उम्र 62 साल है और वे उसके बाद 65 वर्ष की उम्र तक सीडीएस बने रह सकते हैं । सीडीएस को तीनों सेनाओं के मामले में रक्षा मंत्री का मुख्य सैनिक सलाहकार बनाया गया है । तीन साल पहले जनरल विपिन रावत का सेना प्रमुख बनाये जाने पर भी विवाद उठा था । इसलिए सीडीएस के रूप में इनके तीन साल के कार्यकाल पर सबकी नजर होगी कि वे किस प्रकार ‘देशहित’ और ‘भाजपा हित’ की रक्षा में तारतम्य कायम रखते हैं ।

जनरल विपिन रावत की राजनीतिक बयानबाजी को लेकर विवादास्पद माहौल में ही देश के पहले सीडीएस वही बना दिए गए । राजनीतिक दलों के बीच इस मामले के विवादास्पद बनने के पीछे जनरल विपिन रावत के भाजपा नेताओं जैसे बयान ठीक नियुक्ति के समय देने के अलावे भी कई कारण थे । 24 दिसंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सीडीएस नियुक्ति को हरी झंडी देने के साथ-साथ यह भी निर्णय लिया कि सीडीएस ही स्टाफ कमिटी के प्रमुखों के भी स्थायी चेयरमैन होंगे । इस कमिटी के सदस्य तीनों सेनाओं के प्रमुख होंगे ।

स्टाफ कमिटी के प्रमुखों के चेयरमैन का पद इसके पहले स्थायी नहीं था । जनरल विपिन रावत देश के पहले सीडीएस के साथ-साथ सेना प्रमुखों की स्टाफ कमिटी के भी स्थायी चेयरमैन बन गए । केंद्रीय मंत्रिमंडल के फैसले के एक दिन पहले तक सारा कुछ गोलमटोल था । लग रहा था कि कुछ ऐसा होनेवाला है, जो अबतक नहीं हुआ । वरिष्ठतम सेना प्रमुख होने के कारण जनरल विपिन रावत सेना प्रमुखों की स्टाफ कमिटी(सीओएससी) के चेयरमैन थे । 23 दिसंबर को निर्धारित था कि जनरल विपिन रावत सीओएससी का कार्यभार नौसेना प्रमुख एडमिरल करमवीर सिंह को सौंपेंगे । लेकिन रक्षा मंत्रालय ने अचानक वो निर्धारित समारोह 31 दिसंबर तक के लिए स्थगित कर दिया ।। सीओएससी का पदभार नौसेना प्रमुख को सौंपने का समारोह अंतिम क्षण में अचानक स्थगित कर दिए जाने से कयास लगाए जाने लगे कि अब एक दो दिनों में सीडीएस के नाम का एलान हो जाएगा । जनरल विपिन रावत के नाम की घोषणा से एक दिन पहले यह बात उजागर हुई कि पांच अधिकारियों के छांटे गए हैं । रक्षा मंत्रालय ने ये नाम मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के पास निर्णय के लिए भेजा है । लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ जनरल विपिन रावत के ही नाम की चर्चा गरम थी । नागरिकता संशोधन बिल पर देश भर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों में शामिल बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेताओं की सक्रिय भागीदारी पर नागरिकता संशोधन बिल का नाम लिए बगैर सरकारी बयान देने के बाद जनरल विपिन रावत सीडीएस पद के एकमात्र सबसे ‘सक्षम’ दावेदार रह गए । जनरल विपिन रावत ने कहा - ‘हम देख रहे हैं कि बड़ी संख्या में कालेजों और विश्वविद्यालयों के छात्र नगरों, कस्बों में हिंसा, आगजनी पर अमादा हैं । भीड़ को इस तरह का जो नेतृत्व दे रहे हैं, जो नेतृत्व नहीं है । जनरल विपिन रावत ने विरोध प्रदर्शनों का जिक्र नहीं किया, सिर्फ इसके नेतृत्वकर्ताओं पर उंगली उठायी । पूरे देश में सभी गैर भाजपाई दल, संगठन नागरिकता संशोधन बिल के विरोध में सड़क पर उतरे हुए हैं । जद(यू) भी इसके खिलाफ है, नीतीश कुमार के नेतृत्व में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चल रही है ।

जनरल विपिन रावत अपने पूरे कार्यकाल में विवादों के घेरे में रहे हैं । रक्षा मामलों में केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार के अनुसार चलने के अलावे भाजपा की विवादास्पद नीतियों के समर्थन में बयान देने के कारण भी सेना प्रमुख लगातार विवादों की सुर्खियों में रहे । कई अवसरों पर राजनीतिक बयानबाजी के कारण जनरल विपिन रावत विपक्ष के निशाने पर रहे ।

फरवरी, 2018 में बांग्लादेशी घुसपैठ पर भी जनरल विपिन रावत ने भाजपा नेताओं जैसा बयान पूर्वोत्तर के मामले में दिया था । सेना प्रमुख जनरल रावत ने कहा था - ‘पूर्वोत्तर को उपद्रवग्रस्त क्षेत्र बनाए रखने के लिए बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ चीन और पाकिस्तान के समर्थन से चलाया जा रहा छद्म युद्ध है ।’ इस बयान को लेकर काफी दिनों तक घमासान मचा रहा । उसी बांग्लादेशी घुसपैठ का बीज नागरिकता संशोधन बिल के अंदर है और उस पर भी जनरल रावत ने बयान दे डाला ।

भाजपा की 1999 में कारगिल युद्ध के समय से चली आ रही नीतियों के अनुपालन में जनरल विपिन रावत ने भरपूर सहयोग पहुंचाया । कारगिल युद्ध समीक्षा समिति ने एक ऐसे सीडीएस टाईप नया पद सृजित करने का सुझाव रक्षा सुधार के अंतर्गत दिया, जो सरकार का सैनिक सलाहकार हो । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को लालकिले से अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन भाषण में एलान किया कि भारत के पास जल्द ही एक सीडीएस(चीफ ऑफ डिफेन्स स्टाफ) होगा, जो तीनों सेनाओं के प्रमुख होंगे । प्रधानमंत्री के ऐलान के कुछ ही दिनों बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अध्यक्षता में एक कार्यान्वयन कमिटी बनायी गयी, जिसे सीडीएस के लिए फ्रेमवर्क तैयार करने और इस पद की वास्तविक जवाबदेही तय करने का जिम्मा दिया गया । इस उच्चस्तरीय कमिटी के बारे में नवंबर के अंत तक अटकलबाजी चलती रही कि यह सीडीएस पद क्या है और इसका प्रारूप क्या होगा । क्योंकि संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर राष्ट्रपति हैं । यह अनुमान लगाया जाता रहा कि सीडीएस तीनों सेनाओं के प्रमुख के रूप में राष्ट्रपति और सरकार के बीच कड़ी का काम करेंगे । 15 अगस्त से अब तक सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत उत्तर पूर्व से लेकर कश्मीर तक पार्टी के रूप में भाजपा और सरकार की नीतियों के कार्यान्वयन में कड़ी का काम करते रहे । 15 अगस्त से पहले जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा वाला प्रावधान अनुच्छेद 370 और 35 ए समाप्त हो गया था । 15 अगस्त से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कश्मीर में तीन दिन गुजारा । उनकी कश्मीर रवानगी के पूर्व जनरल विपिन रावत कश्मीर जाकर सैनिक तैनाती का जायजा ले आए थे । वही सुरक्षा व्यवस्था भाजपा महासचिव कश्मीर मामलों के प्रभारी राम माधव के हर कश्मीर दौरे में बरकरार रही ।