शे-रो-शायरी की क्रांतिकारी धारा के चहेतों के लिए फैज अहमद 'फैज' के बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं और न ही वे फैज की पहले महबूबा तथा फिर बेगम बनी एलिस फैज का नाम भूले होंगे. ये कुछ पंक्तियाँ एलिस की याद में हैं, जिनका हाल ही में पाकिस्तान में इंतकाल हो गया. वे सही मायने में एक क्रांतिकारी पति की क्रांतिकारी पत्नी थीं. दोनों का परिचय और संबंध भी उनकी मिलती-जुलती कम्युनिस्ट विचारधारा की वजह से हुआ, ये अलग बात कि एलिस ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत लंदन से की, जहाँ वे पैदा हुईं, जबकि फैज पैदा हुए १९१२ में सियालकोट में, लेकिन विभाजन के बाद पाकिस्तान में जाकर बस गए. पंजाबी फैज को विभाजन का हिमायती होने का लाभ उस रूप में नहीं मिला, जैसा जिन्ना के अनुयायियों को. बल्कि फैज को कई वर्ष अपने ही देश में जेल में या निर्वासन में गुजारने पड़े. एलिस फैज उनकी वैसी अनुगामिनी थीं कि १९८४ में पति के निधन के बाद रिश्तेदारों ने जब उनसे अपनी बड़ी बहन के पास लंदन लौट जाने को कहा तो उन्हें डाँट दिया और पति के अधूरे सपनों को साकार करने के लिए पहले से ज्यादा सक्रिय हो गईं. १९८६ में वे पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग की संचालिका अस्मा जहाँगीर के साथ हो गईं और जीवनपर्यंत निःस्वार्थ भाव से जनता के लिए काम करती रहीं.

चूँकि पाकिस्तान में ज्यादा समय फौजी हुकूमत रही, इसलिए फैज दंपत्ति की गतिविधियों को किसी ने भी ज्यादा तरजीह नहीं दी, जिन्होंने न केवल पाकिस्तान में कम्युनिस्ट आंदोलन शुरू किया, बल्कि जनता को उसके अधिकारों के प्रति जागरूक करने वाले भी ये पहले नेता थे.

लंदन के अखबारों ने एलिस के बारे में लंबे-लंबे डिस्पैच छापे हैं, शायद इसलिए कि वे वहाँ पैदा हुईं. मगर पाकिस्तान और भारत के अखबारों में चर्चा नहीं है, जहाँ उनका दिल बसता था. इन्हें सिर्फ पाकिस्तानी नहीं माना जा सकता. एलिस फैज के बारे में भले यहाँ लोग कम जानते हों, मगर फैज अहमद फैज की शायरी से भारत का जन-जन वाकिफ है. एलिस के व्यक्तित्व को कम करके आँकना भी बेइन्साफी होगी. एलिस का जब फैज से परिचय हुआ (१९४०), उस समय इकबाल के 'सारे जहाँ से अच्छा हिंदोस्ताँ हमारा' के बाद लोगों की जुबान पर फैज ही थिरकते थे- 'मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग' १९३६ में इकबाल गुजर गए और उसके बाद उर्दू शायरी में रूमानियत के साथ-साथ राष्ट्रवाद भरने की मशाल फैज ने थामी. कहते हैं, ये शेर फैज ने एलिस के लिए लिखा था और एलिस को भी ये नज्म बेहद पसंद थे. इसमें सिर्फ हुस्न और मोहब्बत नहीं, इन्सानियत के मुँह पर कालिख लगती, उस समय के हालात बयाँ हुए हैं.

इस नज्म में एलिस का सबसे पसंदीदा और रूह को झकझोरने वाला मतला है-

जा-ब-जा बिकते हुए, कूचा-ओ-बाजार में जिस्म / खाक के लथड़े हुए, खून में नहलाए हुए / जिस्म निकले हुए अमराज के तन्नूरों से / पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से / लौट जाती है इधर को भी नजर क्या कीजे / अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे / और भी दुःख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा / राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा / मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग /

एलिस १६ वर्ष की उम्र में ही लंदन में कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रिय सदस्य बन गई थीं. उस समय वहाँ रहकर भारत की आजादी के लिए आंदोलन चला रहे राष्ट्रवादी नेताओं से उनका संपर्क हुआ. सबसे ज्यादा वो वी.के. कृष्णमेनन से प्रभावित हुईं, जो जादुई असर वाले नेता माने जाते थे. आत्मनिर्णय के अधिकारों की भारतीय नेताओं की माँग के समर्थन में एलिस ने भारत आने का फैसला किया, जब पूरा यूरोप युद्ध में जुटा था. उनकी बड़ी बहन एक भारतीय डॉक्टर से शादी करके अमृतसर में रह रही थीं. उसी दौरान एलिस फैज अहमद से मिली और पहली ही मुलाकात में दोनों एक दूसरे पर फिदा हो गए. एलिस और फैज अहमद का निकाह १९४१ में शेख अब्दुल्लाह ने श्रीनगर में कराया जो खुद ही कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन चला रहे थे. दोनों मियाँ-बीबी की उम्र में मात्र दो साल का फर्क था. एलिस १९१४ में पैदा हुई और फैज १९१२ में. कम्युनिस्टों ने विभाजन का समर्थन किया था, जिसमें फैज भी शामिल थे, लेकिन कम्युनिस्ट नेता ये नहीं चाहते थे कि फैज पाकिस्तान जाएँ. फैज को पाकिस्तानी बनने में कोई एतराज नहीं था, लेकिन वहाँ पहुँचकर भी उन्होंने अपने उसूल नहीं छोड़े. भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं ने यह सोचकर इसे मंजूरी दे दी कि पाकिस्तान में पार्टी की नींव रखी जा सकेगी. पाकिस्तान में कम्युनिस्ट आंदोलन सिर्फ फैज तक ही जिंदा रह पाया. अब एलिस के साथ उसकी बची-खुची हैसियत भी जाती रही.

एलिस वहाँ के बड़े अखबार 'पाकिस्तान टाइम्स' से जुड़ गईं और उसमें महिलाओं तथा बच्चों वाले कालम देखने लगीं. १९५१ के 'रावलपिंडी साजिश' वाले मुकदमे में फैज को जेल में डाल दिया गया. पाकिस्तानी हुक्मरानों ने उन पर तख्तापलट की कोशिश का आरोप लगाया. एलिस को लोगों ने अपने दो बच्चों के साथ लंदन चले जाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान में ही रहना बेहतर समझा. पति के चार साल के कारावास के दौरान एलिस के लिखे खत ऐतिहासिक हैं. बाद में सारे खत 'प्यारे दिल' स्तंभ के अंतर्गत छापे. पाकिस्तान के प्रगतिशील विचारधारा वाले अखबार 'व्यूप्वाइंट' में एलिस नियमित रूप से लिखती रहीं. १९७० और १९८० के दशक में पाकिस्तान में सैनिक फासीवाद अपने चरम पर था. फैज ने वो समय लेबनान में निर्वासन में गुजारे और पूरे समय एलिस उनके साथ रहीं, तथा वहाँ से 'शी' और 'पाकिस्तान टाइम्स' के लिए फीचर भेजती रहीं. 'व्यूप्वाइंट' के संपादक मंजर अली खाँ पाकिस्तान में प्रगतिशील विचारों के सिरमौर माने जाते रहे हैं. वे एलिस को अपना दाहिना हाथ मानते थे.

ब्रिटेन की चकाचौंध की दुनिया छोड़कर साधारण जनता के बीच की जिंदगी एलिस ने स्वेच्छा से चुनी थी, जिसका उन्हें जरा भी मलाल नहीं था और बिल्कुल विपरीत परिस्थितियों में रहने के बावजूद उन्होंने मजहबी कट्टरपंथियों तथा फासीवादियों से कोई समझौता नहीं किया. यह एक मिसाल है कि फैज अहमद फैज और एलिस फैज दोनों वाकई एक-दूसरे के लिए बने थे.