हम हिन्दू आबादी वाले राज्यों में इस समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने के मामले में केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक सरकार के टालमटोल रवैए पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जतायी है ।
जस्टिस एस. के. कॉल और जस्टिस एम. एम. सुंदरेश की सुप्रीम कोर्ट पीठ को आखिरकार कहना पड़ा है कि हिन्दुओं समेत अल्पसंख्यकों की पहचान करने से जुड़े मामले में केंद्र का अलग-अलग रूख अपनाना न्यायोचित नहीं है । वास्तव में सुप्रीम कोर्ट का फोकस खासकर हिन्दू अल्पसंख्यकों को यह दर्जा देने के मामले में ठोस निर्णय टालनेधडंप रखने के लिए बार-बार रवैया बदलने पर था । सुप्रीम कोर्ट जजों ने नाराजगी उसी से सम्बंधित याचिका पर सुनवाई के दौरान व्यक्त की, जिसमें उन राज्यों और संघशासित क्षेत्रों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की गयी है, जहां अन्य समुदायों की तुलना में हिन्दुओं की आबादी कम हो गयी है । यह याचिका वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की हुई है, जिस पर केंद्र सरकार पांच साल से सुप्रीम कोर्ट में अपना रूख स्पष्ट नहीं कर रही है ।
सुप्रीम कोर्ट पीठ ने केंद्र सरकार को गत हफ्ते उस समय फटकार लगायी, जब सरकार अपने पहले के हलफनामे से मुकर गयी और टालने का नया हथकंडा अपनाया । केंद्र की ओर से शीर्ष कोर्ट में पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 10 मई को कहा कि किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने की शक्ति सिर्फ केंद्र के पास है और राज्यों में विचार-विमर्श के लिए तीन महीने का समय मांगा । जबकि इसके पहले 25 मार्च को दायर हलफनामे में केंद्र से पल्ला झाड़ने के लिए कहा कि राज्यों के पास भी यह शक्ति है ।
ताजे हलफनामे में पहले की दलील से मुकरने पर सुप्रीम कोर्ट जजों ने अप्रसन्नता व्यक्त की । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार का और समय मांगने का आग्रह स्वीकार करके सुनवाई की अगली तारीख तो 30 अगस्त तय कर दी, लेकिन साथ में यह भी निर्देश दिया कि उस सुनवाई के तीन दिन पहले सारे विचार-विमर्श के नतीजे की स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए । याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट, 1992 के अंतर्गत अल्पसंख्यक का दर्जा देने की अधिसूचना जारी करने के केंद्र की शक्ति को चुनौती दी है । उसी पर गत हफ्ते सुनवाई थी ।
वकील अश्विनी उपाध्याय ने अपनी पूर्व याचिका में कहा है, कि 2011 की जनगणना के अनुसार जम्मू व कश्मीर और पूर्वोत्तर समेत कई राज्यों तथा केंद्र शासित क्षेत्रों में हिन्दुओं की आबादी कम हो गयी है, तथा वे अल्पसंख्यक हो गए हैं । इस आधार पर इन राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक दर्जा के लिए केंद्र को निर्देश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अश्विनी उपाध्याय की अर्जी उसी समय से झूल रही है, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा गठजोड़ का पहला शासनकाल था ।
उसी पर सुनवाई के दौरान 25 मार्च, 2022 को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हिन्दू और अन्य समुदायों की संख्या जहां-जहां कम है, वहां उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने/नहीं देने का फैसला उन राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों को करना है । और फिर 10.05.2020 को पेशी में अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने सफाई दी कि अल्पसंख्यकों को अधिसूचित करने का मामला केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है और इस संबंध में कोई भी निर्णय राज्यों तथा अन्य हितधारकों के साथ चर्चा के बाद लिया जाएगा ।
यह हालिया सुनवाई ऐसे समय में हुई, जब हिन्दू अल्पसंख्यकों और खासकर कश्मीरी पंडितों की असुरक्षा का मामला सुर्खियों में है । भाजपा और संघी नेताओं का अल्पसंख्यकों के विषय में कांग्रेस तथा अन्य गैर-भाजपा क्षेत्रीय दलों के खिलाफ राजनीतिक प्रचार अभियान मुख्य रूप से मुसलमानों पर केंद्रित है । अल्पसंख्यक का मतलब मुसलमान ही माना जाता है, जिन्हें पूरे देश में अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त है । जिन राज्यों में मुसलमानों की आबादी हिन्दुओं से ज्यादा है, वहां भी मुसलमान अल्पसंख्यक दर्जे के अंतर्गत संवैधानिक सुरक्षा और अन्य अधिकारों से लैस हैं । कांग्रेस और अन्य गैर-भाजपा दलों पर अल्पसंख्यक(मुस्लिम) तुष्टीकरण का राजनीतिक आरोप लगानेवाली भाजपा हिन्दू अल्पसंख्यकों को ‘रामभरोसे’ छोड़े रखना चाहती है । सुप्रीम कोर्ट में जब से इस पर सुनवाई शुरू हुई है, उसी समय से भाजपा कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का दावा कर रही है ।
मुस्लिम बहुल आबादी वाले राज्य जम्मू व कश्मीर में 1990 के दशक में इस्लामी आतंकी हमले बेकाबू हो गए । कश्मीर के अंदर पैदा हुए और पाक पोषित आतंकी हमलों में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया । जिन हिन्दू कश्मीरियों को अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा, जान-माल गंवाने पड़े, उनमें सबसे ज्यादा पंडित समुदाय के लोग थे । जम्मू व कश्मीर को संघशासित क्षेत्र बनाए जाने और धारा-370 के अंतर्गत प्राप्त विशेष राज्य का संवैधानिक दर्जा खत्म किए जाने के बावजूद कश्मीर में पंडितों पर हमले जारी हैं । जम्मू व कश्मीर के बडगाम जिले में एक कश्मीरी पंडित सरकार कर्मचारी राहुल भट्ट के 12 मई को आतंकी हमले में मारे जाने के बाद उसके पिता बिट्टा जी भट्ट ने कहा. ‘ऐसी ही सुरक्षा देकर सरकार विस्थापित कश्मीरियों को वापस लाकर बसाने और उन्हें प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत सरकारी नौकरी देने का दावा कर रही है ।’
कश्मीरी पंडितों पर हुए जुल्म पर बनी विवादास्पद फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ को कई भाजपा शासित राज्यों ने टैक्स फ्री कर दिया । मार्च, 2022 के अंतिम सप्ताह में संसद के बजट सत्र में भी इस पर चर्चा हुई । 01.04.2022 को राज्यसभा में कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा और पुनर्वास के लिए उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने के संबंध में प्राइवेट सदस्य बिल पेश करनेवाले कांग्रेस के विवेक तनखा थे । जून में उनका कार्यकाल समाप्त हो जाएगा । अभी रिक्त होनेवाली कई राज्यसभा सीटों के चुनाव में कांग्रेस ने अगर दोबारा विवेक तनखा को मनोनीत नहीं किया तो यह बिल समाप्त हो जाएगा । विवेक तनखा ने यह बिल पेश करते हुए राज्य सभा में अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार की जांच के लिए रिटायर सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में गठित कमिटियों, संसद की स्थायी समितियों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्टों का हवाला देकर उन्हें अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग उठायी । ऐसा बिल पेश होने से पहले और उनके बाद सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्या कैफियत दी, सब जानते हैं ।
भाजपा नेतृत्व को अभी मुस्लिम अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेने की चिंता है, ताकि आनेवाले विधान सभा चुनावों में उसका राजनीतिक लाभ मिले । भाजपा शासनकाल के आठ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत नड्डा ने अपनी पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ को हर राज्य में इन समुदायों के बीच जाकर उनके लिए चलाए जा रहे केंद्र के कार्यक्रमों की चर्चा करने का निर्देश दिया है । यह खबर सुप्रीम कोर्ट में हिंदू अल्पसंख्यकों पर सुनवाई के अगले दिन 11 मई को आयी । भाजपा के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठों को 6 से 8 जून तक यह चर्चा चलाने का निर्देश दिया गया है ।
मई, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला ने कहा, कि सरकार कश्मीर, लद्दाख, पंजाब, कुछ उत्तर पूर्वी राज्यों और लक्षद्वीप में हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने के खिलाफ नहीं है । दूसरी बार सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में 2020 में अश्विनी उपाध्याय की याचिका खारिज करने की अर्जी में कहा. ‘यह अवाम और राष्ट्रीय हित में नहीं है ।’ 2020 में ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार पर 7500 का जुर्माना लगाया, जब सरकार ने हलफनामा दायर करने के निर्देश का पालन नहीं किया ।
2017 में उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पास जाने कहा । अल्पसंख्यक आयोग ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि. इस याचिका पर विचार करना आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं है और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट के सेक्शन 2(सी) के अंतर्गत सिर्फ केंद्र ही किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित कर सकता है ।’
उपाध्याय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट, 1992 के तहत केंद्र के इसी अधिकार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । उसके बाद से केंद्र का फेकाफेकी जारी है ।
बकौल अश्विनी उपाध्याय, 2011 की जनगणना के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में पेश राज्यवार हिन्दुओं की आबादी कम होने का प्रतिशत इस प्रकार है, जो अल्पसंख्यक अधिकारों से वंचित हैं. लक्षद्वीप(275:)ए मिजोरम (275:)ए नगालैंड(8.75:)ए जम्मू व कश्मीर(2844:)ए मेघालय(11.53:)ए पंजाब(3840:)ए मणिपुर(3139:) और अरुणाचल प्रदेश(29:) ।