सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में केंद्र सरकार को स्पष्ट करना है कि राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की परिभाषा तय करने का आधार क्या है और उन राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं, जहां उनकी संख्या अन्य समुदायों से कम हो गयी है । इस महीने के अंतिम सप्ताह तक केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे की स्थिति स्पष्ट करके बताना है कि अन्य समुदायों की तुलना में कम संख्या वाले राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है या नहीं । केंद्र सरकार को यह भी स्पष्ट करना है कि किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का आधार क्या है ।

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर करनेवाले वकील अश्विनी उपाध्याय भाजपा के हैं और केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में चल रही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार हिन्दुत्व एजेंडे की ही सियासी राजनीति करती है । कम हिन्दू आबादी वाले राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने के संबंध में दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के बावजूद यह सरकार चुप्पी साधे रही। इस पर कोई स्टैंड लेना तो दूर, नोटिस का जवाब भी सरकार टालती रही । जबकि याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी अर्जी में कश्मीर, पंजाब और कई उत्तर पूर्वी राज्यों का हवाला दिया, जहां बहुसंख्यक समुदायों के लोग अल्पसंख्यक दर्जा के अधिकारों का लाभ उठा रहे हैं । इन राज्यों के हिन्दू अल्पसंख्यक होने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक समुदाय धारणा के कारण सामाजिक और आर्थिक रूप से अल्पसंख्यक दर्जे के अधिकार से वंचित हैं । क्योंकि संविधान में ही अल्पसंख्यक दर्जे की कोई ठोस परिभाषा तय नहीं है ।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की नोटिस का जवाब तब दिया, जब पांच साल से लंबित इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रवैया अपनाया और केंद्र सरकार को फटकार के साथ दूसरी बार हलफनामे के लिए चार हफ्ते की डेडलाईन दी । 27.03.2022 को केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को हलफनामा दायर करके बताया कि ‘राज्य सरकारें भी अल्पसंख्यक दर्जे की परिभाषा तय कर सकती हैं और अपने यहां किसी धार्मिक या भाषाई समुदाय को ‘अल्पसंख्यक समुदाय’ घोषित कर सकती हैं ।’

केंद्र सरकार ने 7500 रुपये का जुर्माना भी भरा, जो शीर्ष कोर्ट ने नोटिस की अवहेलना के लिए लगाया ।

यह हलफनामा केंद्र सरकार ने अश्विनी उपाध्याय द्वारा 2020 में दायर याचिका के जवाब में प्रस्तुत किया, जिसमें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट की सेक्शन 2(सी) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गयी ।

उपाध्याय ने 2017 में जब सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली, तो शीर्ष कोर्ट ने उन्हें एनसीएम(राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग) के पास जाने को कहा और हाथ खड़े कर दिया । सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि ‘इस अर्जी पर विचार करना शीर्ष कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और एनसीएम एक्ट की सेक्शन 2(सी) के अतंगर्त सिर्फ केंद्र ही किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित कर सकता है ।’

उपाध्याय ने फिर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी । उस वक्त भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल से सहायता मांगी । लेकिन सुनवाई की अगली तारीख आने तक रंजन गोगोई का कार्यकाल समाप्त हो गया । उनकी जगह लेनेवाले चीफ जस्टिस एस. ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिना कोई कारण बताए याचिका खारिज कर दी ।

उसके बाद वकील अश्विनी उपाध्याय ने अगस्त, 2020 में फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट, 1992 के तहत केंद्र सरकार के अधिकार को ही चुनौती दी गयी । याचिकाकर्ता ने एनसीएम एक्ट की उसी सेक्शन 2(सी) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी, जिसके तहत केंद्र को अल्पसंख्यक दर्जे की अधिसूचना जारी करने का अधिकार है और उन राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की, जहां हिन्दुओं की संख्या अन्य समुदायों से कम हो गयी है ।

केंद्र सरकार ने जवाबी हलफनामा दायर नहीं किया, 2021 गुजर गया । आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने 31 जनवरी, 2022 को केंद्र सरकार पर फटकार के साथ 7500 रुपये का जुर्माना लगाया और ‘जवाब के लिए फिर समय’ठ चार हफ्ते का दिया । ज्ञात हो कि अभी भारत के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण हैं । उपाध्याय की याचिका खारिज करने की केंद्र की अर्जी शीर्ष कोर्ट ने ठुकरा दी ।

इस सुनवाई की तय तारीख से एक दिन पहले केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने हलफनामे में कहा कि राज्य भी अल्पसंख्यक दर्जे की परिभाषा तय कर सकते हैं, और अपने राज्य के अंदर किसी धार्मिक या भाषाई समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित कर सकते हैं ।

लेकिन याचिकाकर्ता ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग(एनसीएम) एक्ट, 1992 के अंतर्गत प्राप्त केंद्र के अधिकार को ही चुनौती दी है और कम हिंदू आबादी वाले राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की है । अब केंद्र को सुप्रीम कोर्ट के सामने अगला रवैयाधस्टैंड स्पष्ट करना है । केंद्र ने राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस सवाल की बला राज्य सरकारों पर फेंक दिया । लेकिन इसका कोई आधार नहीं है कि राज्य सरकारें कैसे किसी अल्पसंख्यक दर्जे की पहचान करेगी और हिन्दुओं की कम संख्या वाले राज्यों में उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा कैसे देगी ।

पंजाब, कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में तो हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ही । लेकिन याचिकाकर्ता ने 2011 जनगणना के आधार पर इसकी पुष्टि आंकड़ों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में की है । 2011 जनगणना के अनुसार हिन्दुओं के अल्पसंख्यक होने का राज्यवार ब्योरा इस प्रकार है. लक्षदीप(275:)ए मिजोरम(275:)ए नगालैंड(875:)ए मेघालय(11753:)ए जम्मू व कश्मीर(2844:)ए अरुणाचल प्रदेश(29:)ए मणिपुर(31739:)ए और पंजाब(3840:) । लेकिन हिन्दुओं को इन राज्यों में अल्पसंख्यक का दर्जा प्राप्त नहीं है । 01.04.2022 को संसद के चालू बजट सत्र में तृणमूल कांग्रेस के राज्य सभा सदस्य बरखा छेत्री ने मेघालय में हिन्दुओं की आबादी कम होते जाने का मामला उठाकर उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग उठायी ।

केंद्र के हलफनामे के अनुसार राज्यों का तो बाद में पहले अब तय हो जाए कि एनसीएम एक्ट के अंतर्गत केंद्र को प्राप्त आधिकार संवैधानिक रूप से वैध है या नहीं ।

संविधान की धारा 29ए 30 और 350(ए) में ‘अल्पसंख्यकों’ का जिक्र आता है, मगर इसकी कोई परिभाषा नहीं है । एनसीएम एक्ट, 1992 के अंतर्गत केंद्र अधिसूचना जारी करती है और उसमें भी इसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है । अभी तक सिर्फ धार्मिक आधार पर ही अल्पसंख्यक दर्जा मिलता रहा है । राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट के अंतर्गत 23.10. 1993 को केंद्र ने मुस्लिम, इसाई, सिख, बौद्ध, पारसी को ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय का दर्जा दिया । जनवरी, 2014 में जैन भी उसमें शामिल हो गए । जबकि धारा 29 में दूरदराज की अलग-थलग पड़ी भाषा, लिपि, संस्कृति वाले अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का प्रावधान है ।

2003 में टीएमए पार्क फाउंडेशन वाले विवाद में सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों की पीठ ने कहा कि अल्पसंख्यकों की किसी विशेष परिभाषा के अभाव में, चाहे तो धार्मिक हो या भाषाई, ऐसे जिस समुदाय की राज्य में 50: से कम संख्या हो, वे अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा पाने के हकदार हैं ।

केंद्र सरकार ने अभी अपने हलफनामे में अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान के लिए राष्ट्रीय आयोग एक्ट, 2005 का भी हवाला दिया है, और कहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर तथा राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की परिभाषा तय है ।

अल्पसंख्यक दर्जे की बात आरक्षण की तरह सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े कम आबादी वाले समुदायों के लिए शुरू में उठी थी । लेकिन कानून बनने के समय इसका आधार सिर्फ धर्म रह गया । देश की अर्थव्यवस्था चलानेवाले पारसी और जैन अरबपति घराने हैं, लेकिन अल्पसंख्यक सुरक्षा के हकदार हैं । क्योंकि आधार सिर्फ उनकी संख्या कम होना है । वर्तमान सरकार के लिए हिन्दू अल्पसंख्यक सिर्फ वोट बैंक हैं, चाहे किसी राज्य में वे अल्पसंख्यक होने के कारण प्रताड़ित ही क्यों न हों ।