संयुक्त राष्ट्र का न्यूयॉर्क मुख्यालय जासूसों से भरा हुआ है और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर अपनी खुफिया एजेंसी एम.आई.-6 के जरिए अमरीकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान के कार्यालय की जासूसी कर रहे हैं। दुनिया भर में जितना बवाल इस बात को लेकर मचा हुआ है, उतना ही विवादास्पद भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में हाल में आए 'फील गुड' को 'फील बैड' में बदलने वाली यह खबर है कि भारत की खुफिया एजेंसी 'रॉ' की मदद से पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ दो-दो बार कातिलाना हमले में बाल-बाल बचे। ये हैं अभी की सुर्खियां।

वैसे तो बड़े देशों द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ खुफियागिरी पुराना दस्तूर है और खासकर अमरीका तथा विघटन से पहले सोवियत संघ के बीच यह सिलसिला सामान्य-सी बात थी, जिसका खुलासा उस समय होता था, जब दोनों सार्वजनिक रूप से जासूसी के आरोप में राजनयिकों का निष्कासन किया करते थे। लेकिन विगत कुछ वर्षों में खुफिया एजेंसियों के काम करने का तौर-तरीका बदल गया है। इनका काम पहले की तरह प्रतिद्वंद्वी और कमजोर देशों की अंदरूनी तथा बाहरी रक्षा से संबंधित गुप्त सूचनाएं एकत्र करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अब खुफिया प्रमुख ही अपने देश की अंदरूनी तथा विदेशी कूटनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और किस देश में किस प्रकार आंतरिक कलह पैदा करके उसे कमजोर किया जाए, यह योजना इन्हीं के निर्देशन में बनती है।

पहले इस क्षेत्र में सी.आई.ए. का एकछत्र राज था, बाद में सोवियत खुफिया एजेंसी के.जी.बी. शामिल हो गई और अब एम.आई.-6, इस्राइल की मोसाद तथा पाकिस्तान की आई.एस.आई., सी.आई.ए. के साथ मिलकर काम करते हैं। के.जी.बी. प्रमुख व्लादिमीर पुतिन जब रूस के राष्ट्रपति बन गए तो उसका नाम और काम बदल दिया। और देशों में खुफिया एजेंसियां पर्दे के पीछे से कूटनीतिक निर्णयों में हावी रहती हैं, लेकिन रूस में उसी के संचालक सर्वेसर्वा बन गए और अगले पखवाड़े होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मिखाइल कास्यानोव को हटा दिया। इंटरफैक्स समाचार ब्यूरो का कहना है कि प्रधानमंत्री रहते वे अपनी प्रतिद्वंद्वी दक्षिणपंथी महिला उम्मीदवार इरिना हाकामादा के खिलाफ जासूसी करना चाहते थे, जिन्हें चेचन्या के विद्रोहियों से कथित समर्थन मिल रहा है।

शीतयुद्ध के जमाने में के.जी.बी. का सी.आई.ए. से ज्यादा खतरनाक नेटवर्क था। आज एशियाई जासूसी नेटवर्क में सी.आई.ए., एम.आई.-6 और आई.एस.आई. अपनी तमाम योजनाओं की रूपरेखा एक ही नजरिए से तैयार करते हैं, जिसका उद्देश्य है उन देशों में अस्थिरता पैदा करना जो अमरीका व ब्रिटेन की धौंस में रहने से इनकार कर दे। पहले ईरान और फिर इराक ज्वलंत प्रमाण हैं। इनमें ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी का तौर-तरीका जरा अलग है। वो अपने देश की विदेश नीति के इस सिद्धांत के अनुरूप चलती है कि तब तक दुनिया के किसी हिस्से में दखल न दिया जाए, जब तक वहां स्वयं उस पर खतरा न हो। संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की जासूसी को लेकर उठे ताजा विवाद में एम.आई.-6 के फंसने की वजह अमरीका और इराक समेत खाड़ी की तेल संपदा से जुड़े व्यापारिक स्वार्थ हैं। इसमें टोनी ब्लेयर सीधे तौर पर फंसे हैं और उन्हें फंसाया है उनकी अपनी ही पार्टी की पूर्व मंत्री क्लेयर शार्ट ने, जिन्होंने मंत्रिमंडल से उसी समय इस्तीफा दे दिया, जब बी.बी.सी. ने इराक में परमाणु हथियार होने की ब्लेयर की रिपोर्ट को झूठा करार दिया।

संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय अमरीका में है और महासचिव वही व्यक्ति हो सकता है जिसे अमरीका बनाना चाहे, इसलिए सी.आई.ए. को वहां की हर गतिविधि की जानकारी मिलती रहती है। बल्कि यों कहें कि संयुक्त राष्ट्र में कोई काम अमरीका की मर्जी के बगैर नहीं हो सकता तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन अपने पुश्तैनी मित्र ब्रिटेन से जुड़े विवाद ने अमरीका को भी चक्कर में डाल दिया है, क्योंकि इराक नीति को लेकर अब तक हुई फजीहत में इस खबर ने नहले पर दहला मारा है, जबकि एम.आई.-6 प्रमुख रिचर्ड डियरलव ने सी.आई.ए. निदेशक को विश्वास में लेकर इराक पर हमले से पहले ही कोफी अन्नान के कार्यालय में अपने जासूस फिट किए थे। उतना ही नहीं, इराक युद्ध के दौरान विश्व स्तर पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालयों में जासूस तैनात किए गए थे।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो खलबली मची है, उसका तो देर-सबेर परिणाम आएगा, क्योंकि विश्व पंचायत के मुखिया के खिलाफ जासूसी की यह पहली घटना है। लेकिन टोनी ब्लेयर का और जार्ज डब्ल्यू. बुश का राजनीतिक भविष्य अधर में लटक गया है। ये है खुफिया एजेंसी के कूटनीतिक इस्तेमाल का परिणाम, जो अमरीका व ब्रिटेन की राजनीति पर सीधा प्रभाव डालने वाला है। फरवरी के अंतिम सप्ताह में जब यह विवाद तूल पकड़ रहा था, उस समय सी.आई.ए. प्रमुख जार्ज टीनेट पाकिस्तान और अफगानिस्तान के दौरे पर थे। उनकी ताजी चिंता का सबब यह है कि पाकिस्तान द्वारा उत्तर कोरिया और लिबिया को परमाणु विषयक जानकारी देने की खबर उन्हें कैसे नहीं लगी।

उस समय अमरीकी फौज पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर पाक-अफगान सीमा के कबीलाई इलाकों में आतंक सरगना ओसामा बिन लादेन को पकड़ने के लिए जबरदस्त धरपकड़ अभियान चला रही थी। ओसामा बिन लादेन अकेली ऐसी शख्सियत है, जिसने अमरीकी खुफिया एजेंसी की सारी हेकड़ी हवा कर रखी है। अरब और इस्लामी देशों के चप्पे-चप्पे पर सी.आई.ए. का जाल बिछा है, फिर भी ओसामा का ठिकाना मालूम नहीं हो पाता। ये तीन महत्वपूर्ण घटनाएं ऐसी हुई हैं, जब सी.आई.ए. को बड़े पैमाने पर अपने स्टॉफ बदलने पड़े और इसे अपनी हैसियत के बारे में फिर सोचना पड़ा। पहला है 1998 में भारत का पोखरण परमाणु परीक्षण, दूसरा है 2001 का वाशिंगटन और न्यूयार्क में आतंकी हमला, तीसरा मामला ताजा है पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान द्वारा ईरान, लीबिया और उत्तर कोरिया को परमाणु विषयक जानकारी देना, जो तीनों देश अमरीका की नजर में बुराई की जड़ें हैं। बीजिंग में उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों में हुई छह देशों की बातचीत (26 फरवरी) में बड़ी चालाकी से सी.आई.ए. ने इस बात को चर्चा में नहीं आने दिया। दक्षिण कोरिया यह सवाल उठाने वाला था।

उसी समय 'रॉ' की ओर से जारी यह बयान कूटनीतिक हलकों में छाया रहा कि परवेज मुशर्रफ को दो-दो बार कातिलाना हमले से बचाया। यह खबर भारत से ज्यादा पाकिस्तानी अखबारों में सुर्खियों में रही। जिस मुशर्रफ के नेतृत्व में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. ने पूरे दक्षिण एशिया में जाल फैलाया, आज उसी से उनको खतरा है। यह बात कुछ अजीबो-गरीब लगती है। आई.एस.आई. की आय का मुख्य स्रोत है नशीली दवाओं की तस्करी, जो इस्लामी उग्रवादियों के जरिए होती है। मुशर्रफ के नेतृत्व में आई.एस.आई. ने इस्लामी उग्रवादियों का कश्मीर में जमावड़ा किया। जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद पर भी शांति की पहल के बाद दो-दो बार कातिलाना हमले हुए। मुशर्रफ को बचाने वाली 'रॉ' कश्मीर में क्या कर रही है? जिस दिन (27 फरवरी) 'रॉ' ने यह दावा किया, उसी दिन सईद पर हमला हुआ। हुर्रियत कांफ्रेंस के असंतुष्ट नेताओं द्वारा संयुक्त राष्ट्र कार्यालय तक कश्मीर का मामला पहुंचाने की रिपोर्ट है, यह जानकारी 'रॉ' को कैसे नहीं मिली?

यह सही है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेटवर्क सी.आई.ए. और मोसाद का है, दक्षिण एशिया में वैसी ही हैसियत आई.एस.आई. ने बना रखी है। भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में आई.एस.आई. एजेंट छाए हुए हैं, यह सहूलियत नेपाल व बांग्लादेश के रास्ते मिली है। इधर श्रीलंका में मोसाद की मर्जी चलती है, जो तमिल विद्रोही और सरकार दोनों को हथियार व जासूसी करने का तरीका सिखाती है। शांति प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद उसमें कोई अंतर नहीं पड़ा। अमरीकी नौ सेना और इस्राइल ने मिलकर एक नयी संयुक्त खुफिया यूनिट बनायी है, जिसका काम है समुद्री रास्ते में आने वाले तमाम अरब व इस्लामी देशों के दूतावासों की गतिविधियों पर नजर रखना। इसमें शामिल अमरीकी जासूस 'टास्क फोर्स-121' और इस्राइली जासूस 'यूनिट-8200' के गुप्त नाम से जाने जाते हैं। 'न्यूयार्क टाइम्स' के अनुसार अभी इस यूनिट को पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर चौकसी का दायित्व सौंपा गया है। यहां ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए जबरदस्त सैनिक अभियान जारी है।

अन्य स्तर से भी खुफिया एजेंसियां अपनी सरकार के लिए काम करती रही हैं। प्रसिद्ध ब्रितानी वामपंथी इतिहासकार क्रिस्टोफर हिल सारी जिंदगी लंदन में रहकर के.जी.बी. के लिए जासूसी करते रहे, लेकिन यह बात उनकी मृत्यु के बाद ही पता चल पाई। 82 साल की उम्र में दादी होला के नाम से मशहूर एक शिक्षिका को रूस के लिए जासूसी करते हुए लंदन के एक उपनगर से गिरफ्तार किया गया। अमरीका ने अपने क्यूबाई मामलों की विशेषज्ञ एना बेलेन मोटेस को देश की अंदरूनी जानकारी क्यूबा को देने के कारण 30 साल की सजा सुनायी है।

ईरान में ऐसी सरकार बनाने के लिए जो अमरीकी इशारे पर चले, सी.आई.ए. 1953 से शाह के शासन काल से जुटी है। कितनी सरकारों को अपदस्थ किया, लेकिन ताजे चुनाव परिणाम में कट्टरपंथियों ने अपना वर्चस्व फिर से कायम करके उसकी आंखें खोल दी है। इराक में अमरीका और उसके सहयोगी देशों के सैनिकों पर आए दिन हो रहे आत्मघाती हमले से भी सी.आई.ए. को अपनी करतूत का अंदाजा लग रहा होगा, जो ईरान की तरह इराक की जनता का भी जबरदस्ती हमदर्द बनने पर आमादा है।

ताजातरीन सूचना के मुताबिक एक ओर अटलांटा में भारत और अमरीका का संयुक्त नौ सैनिक युद्धाभ्यास चल रहा है, दूसरी ओर इस्लामी उग्रवादी अरब देश के अमरीकी समुद्री खुफिया ठिकाने के रास्ते मुंबई के बॉम्बे हाई तेल कुएं पर 9/11 टाइप हमले की योजना में जुटे हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। देश में कुल 30 मिलियन टन तेल खपत का लगभग 11 मिलियन टन बॉम्बे हाई से निकलता है।