राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकजुटता की जितनी फजीहत हुई, उससे ज्यादा 6 अगस्त को होनेवाले उपराष्ट्रपति चुनाव में होनी तय है । भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़(एनडीए) की ओर से राष्ट्रपति चुनाव के संभावित नाम की चर्चा द्रौपदी मूर्मू को उम्मीदवार घोषित किए जाने के पहले से नहीं थी । लेकिन भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं से बातचीत की पहल की । राष्ट्रपति पद के लिए ऐसा उम्मीदवार तलाशने की शायद मंशा रही होगी, जिस पर विपक्ष की भी सहमति हो । लेकिन विपक्षी दलों में आपस में ही ऐसे उम्मीदवार को लेकर मतभेद था, जिन्हें भाजपा के मुकाबले में खड़ा किया जा सके । सर्वसम्मत उम्मीदवार तय करने के लिए भाजपा या एनडीए घटकों से बात करने का प्रश्न कहां उठता था ।
भाजपा ने ऐसा उम्मीदवार तय किया, जिनके नाम पर एनडीए के साथ.साथ विपक्ष को भी कोई एतराज न हो । आदिवासी समाज से आनेवाली द्रौपदी मूर्मू का सक्रिय राजनीति का रिकार्ड नहीं है । किसी भी तरह की सियासी विवाद से दूर लो प्रोफाईल में रही । द्रौपदी मूर्मू के नाम का एलान करने के पीछे विपक्ष को धराशायी करनेवाले किसी सियासी दाव की झलक नहीं दिखी । क्योंकि भाजपा नीत एनडीए उम्मीदवार की भारी जीत सुनिश्चित थी । द्रौपदी मूर्मू जिस आदिवासी समुदाय की हैं, उनका राष्ट्रीय मुख्यधारा में अन्य समुदायों की तुलना में प्रतिनिधित्व बहुत कम है । विपक्षी दलों की देश में अच्छी छवि बनती, अगर द्रौपदी मूर्मू के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारते । हाल में राज्य सभा के लिए कई उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हुए । ऐसा राष्ट्रपति चुनाव में भी किया जा सकता था । क्योंकि द्रौपदी मूर्मू किसी खेमे में नहीं थी और गैर.भाजपा दलों से भी उनका ऐसा कोई नाता नहीं था, जो बिल्ला विपक्षी उम्मीदवारों के साथ लगा हुआ था । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) ने ही राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी नेताओं को गोलबंद करना शुरू किया । दिल्ली में बैठकों का सिलसिला शुरू करने से पहले संभावित नाम दीदी ने तय कर लिया था । कांग्रेस के साथ रिश्ता असहज होने के बावजूद दीदी ने ऐसे नाम सुझाए, जिसका कांग्रेस भी विरोध न करे । राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता शरद पवार और नेशनल कांफ्रेंस प्रमुख जम्मू व कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला का नाम ममता बनर्जी ने 15 जून को दिल्ली में आयोजित पहली बैठक में रखा । उस बैठक से ही यह संदेश बाहर आया कि विपक्षी दल दीदी के विचार से सहमत नहीं है । शरद पवार और फारूक अब्दुल्ला के इन्कार करने के बाद ममता बनर्जी ने ही तीसरा नाम पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल व प्रशासक गोपालकृष्ण गांधी का नाम सुझाया । गोपालकृष्णा गांधी ने बड़ी अच्छी बात कही कि वे तभी राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनेंगे, जब सभी दलों की सहमति हो । ऐसा न तो होना था, न हुआ । उसके बाद चौथे उम्मीदवार के रूप में ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस में हाल में आए नरेंद्र मोदी की नीतियों के आलोचक पूर्व भाजपा नेता यशवंत सिंहा को खड़ा किया । उस समय तक कई गैर.भाजपा मुख्यमंत्री द्रौपदी मूर्मू को समर्थन देने की घोषणा कर चुके थे । विपक्षी खेमे में सिर्फ इतना हुआ कि यशवंत सिंहा का किसी ने खुलकर विरोध नहीं किया, उनके नाम पर सहमति नहीं थी उसका सबूत राष्ट्रपति चुनाव के लिए हुए मतदान के दिन 13 राज्यों के सवा सौ से ज्यादा विधायकों के क्रॉस वोटिंग दावे से मिल गया । विपक्षी एकता के छिन्न.भिन्न होने और पोल खुलने की स्थिति से बचा जा सकता था, जो क्रॉस वोटिंग से देश ने जाना । अपनी कमजोरी जानते हुए भी विपक्ष ने सिर्फ खानापूरी और इसे अपनी अहम की लड़ाई समझकर राष्ट्रपति चुनाव लड़ा, जिसमें मुख्य भूमिका पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री दीदी की थी । वहीं गत उपराष्ट्रपति चुनाव में भी हो रही है ।
भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को खड़ा करके सियासी दांव स्पष्ट खेल दिया । क्योंकि जगदीप धनखड़ जब से पश्चिम बंगाल के राज्यपाल बनाए गए हैं दीदी से लगातार उनकी ठनी हुई है । जगदीप धनखड़ को उम्मीदवार बनाने के पीछे राष्ट्रपति चुनाव में दीदी की एकजुटता सक्रियता प्रतीत होती है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दीदी की रार राजनीतिक तथा मीडिया हलकान में किसी से छिपी नहीं है । लेकिन कांग्रेस की भी तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो दीदी से बातचीत का टेबुल साझा करने वाला संबंध नहीं है । नरेंद्र मोदी की वैसी ही रार आम आदमी पार्टी नेता दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव दोनों में उभरी । ये दोनों कांग्रेस से भी मिलाने के लिए हाथ नहीं बढ़ाते । इसलिए इन दोनों ही चुनावों में भाजपा नीत एनडीए के मुकाबले में विपक्ष साझा उम्मीदवार खड़े करने में नाकामयाब रहा । विपक्ष की थोड़ी सी बची.खुची साख उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान से पहले ही तार.तार हो गयी । पूर्व कांग्रेस नेता केंद्रीय मंत्री मारगरेट अल्वा के नाम का उपराष्ट्रपति पद के लिए चयन 17 जुलाई को दिल्ली में शरद पवार के आवास पर हुआ ।
बैठक में तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने हिस्सा नहीं लिया । शरद पवार ने कहा कि 17 विपक्षी दलों ने सर्वसम्मति से मारगरेट अल्वा के नाम का निर्णय लिया । राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नेता पवार ने बैठक में मौजूद नेताओं को बताया कि अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी को मारगरेट अल्वा का नाम सुझाया गया, जिस पर दोनों ने सहमति दी । लेकिन तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो दीदी ने अगले दिन साफ कह दिया कि उनसे इस संबंध में राय नहीं ली गयी, इसलिए उपराष्ट्रपति चुनाव के मतदान में तृणमूल कांग्रेस हिस्सा नहीं लेगी । आम आदमी पार्टी ने भी मारगरेट अल्वा के नाम पर सहमति नहीं दी । अल्वा ने तृणमूल कांग्रेस के रवै, पर खेद जताया, लेकिन यह भी साफ कर दिया कि वे निर्वाचकों की संख्या कम होने के कारण मैदान से पीछे नहीं हटेंगी । मारगरेट अल्वा का नाम वास्वत में कांग्रेस को साथ लेकर चलने के लिए संयुक्त विपक्ष ने तय किया, जिस विपक्ष में दीदी और अरविंद केजरीवाल नहीं हैं । आम आदमी पार्टी राष्ट्रपति चुनाव में भी तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार यशवंत सिन्हा के नाम पर चुप थी । मतदान के एक दिन पहले आम आदमी पार्टी ने सिन्हा के पक्ष में मतदान करने का फैसला किया । इस पार्टी ने उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना रूख स्पष्ट नहीं किया है ।
मारगरेट अल्वा भाजपा शासित राज्यों समेत सभी मुख्यमंत्रियों से बात कर रही हैं । सबसे पहले उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से बात की। उसके बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई से भी अल्वा के बात करने की रिपोर्ट है। ये दोनों भाजपा मुख्यमंत्री हैं ।
राष्ट्रपति चुनाव में यशवंत सिन्हा को सिर्फ 208 संसद सदस्यों के वोट मिले, जबकि द्रौपदी मूर्मू के पक्ष में 540 संसद सदस्यों ने मतदान किया । उपराष्ट्रपति चुनाव में सिर्फ संसद सदस्यों को ही वोट डालना होता है । इसलिए मारगरेट अल्वा के पक्ष में हार का ही आंकड़ा बैठता है ।
केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का नेता तो निर्विवाद रूप से भाजपा है । लेकिन विपक्ष का न तो गठजोड़ है, न कोई नेता । नेतृत्व को लेकर असम का टकराव भी विपक्ष के कमजोर पड़ने का कारण है । सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आपसी सहमति से सर्वसम्मत उम्मीदवार तय करना विपक्षी एकजुटता से संभव हो सकता था ।
उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष ने पहले पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी के नाम पर विचार किया था । लेकिन दीदी ने जम्मू व कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी नेता महबूबा मुफ्ती का नाम प्रस्तावित किया, जो धारा.370 हटाने वाले मुद्दे पर प्रधानमंत्री की सबसे प्रबल आलोचक हैं ।
भाजपा केंद्रीय नेतृत्व विपक्ष को बिल्कुल बेजान करने पर तुला है । विशेषकर उपराष्ट्रपति चुनाव में तो यह उजागर हो गया । जगदीप धनखड़ के बहाने ममता बनर्जी से रंजिश निकालने के बजाए भाजपा द्रौपदी मूर्मू की ही तरह किसी साफ.सुथरी छवि वाले व्यक्ति को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर एक अच्छी शुरुआत कर सकती थी । क्योंकि भाजपा गठजोड़ इतनी मजबूत स्थिति में है कि किसी को भी राष्ट्रपति की तरह उपराष्ट्रपति पद पर जिता सकती है ।
जो कुछ हो रहा है वो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ नहीं है । राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ही 16 जुलाई को कांग्रेस शासित राजस्थान विधान सभा के एक समारोह में भारत के प्रधान न्यायाधीधा एन. वी. रमना को आखिरकार कहना पड़ा कि ‘विपक्ष का लगातार सिकुड़ते जाना लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं है ।’ उन्होंने कहा कि पहले विपक्ष और सत्ता पक्ष में एक.दूसरे के लिए आदर का भाव था, जिसका अब ह्रास हो रहा है । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने कहा कि ‘पूरी चर्चा और बहस के बिना ही कानून पास किए जा रहे हैं, विपक्ष को मजबूत करना संसदीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है ।’