इस बार का राष्ट्रपतिए उपराष्ट्रपति चुनाव कई मायने में पूर्व के चुनावों से अलग है । पहला संयोग तो ये है कि इन दोनों ही शीर्ष पदों के लिए मतदान उस दौरान होंगे, जब संसद का मानसून सत्र चलता रहेगा । राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए 18 जुलाई को वोट डाले जायेंगे और उसी तारीख से संसद का मानसून सत्र शुरू है । 6 अगस्त को उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान होगा और संसद सत्र 12 अगस्त तक चलता है ।

विदित हो कि उपराष्ट्रपति चुनाव में संसद के दोनों सदनों के सदस्य वोटर होते हैं । राष्ट्रपति चुनाव में संसद सदस्यों के साथ.साथ राज्य विधान सभाओं के सदस्य भी मतदान करते हैं । अधिकांश राज्यों में या तो भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है, अथवा गठजोड़ से भाजपा को निर्णायक बहुमत हासिल है । ऐसे में भाजपा गठजोड़ के राष्ट्रपति उम्मीदवार द्रौपदी मर्मू का विजयी होना तय है ।

संसद में हंगामे के लिए विपक्ष के पास मुद्दे तो कई हैं और भाजपा गठजोड़ सरकार दोनों सदनों में पूर्ण बहुमत में होने के कारण विपक्ष का मुकाबला करने में सक्षम हैं । हालिया लोक सभा उपचुनाव और राज्य सभा द्विवार्षिक चुनाव में भाजपा ने ज्यादा सीटें जीतकर राष्ट्रपतिए उपराष्ट्रपति दोनों ही चुनावों में विपक्ष को मुकाबले की हालत में नहीं रहने दिया है ।

इस बार संसद सत्र शुरू होने से पहले मुख्य मुद्दा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव बनने की संभावना है । जून के मध्य में जब राष्ट्रपति के लिए साझा उम्मीदवार तय करने के लिए बातचीत, मिलना.जुलना चल रहा था, उसी समय विपक्ष का मतभेद उजागर हो गया था । पूर्व भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा कहने के लिए विपक्ष के साझा राष्ट्रपति प्रत्याशी हैं । गैर.भाजपा दलों के नेताओं और विभिन्न राज्यों में उनकी सरकारों में यशवंत सिन्हा के नाम पर सहमति नहीं है ।

केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़(एनडीए) का मुखिया होने के कारण भाजपा नेताओं ने अपने घटकों के साथ.साथ विपक्षी दलों के नेताओं से भी बातचीत की । ऐसा लगाए मानो भाजपा सभी दलों से राय लेकर राष्ट्रपति पद के लिए साझा उम्मीदवार खड़े करना चाहती है । लेकिन वास्तव में भाजपा की योजना ऐसे उम्मीदवार सामने लाने की थी, ताकि ज्यादातर विपक्षी पार्टियों को समर्थन करना पड़ जाए और विपक्ष का प्रत्याशी मुकाबले में टिके ही नहीं । द्रौपदी मूर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करके भाजपा नेतृत्व ने मतदान से पहले ही परिणाम अपने पक्ष में कर लिया । द्रौपदी मूर्मू का आदिवासी और उनमें भी संथाल समुदाय से होना तीन राज्यों में समर्थन का हकदार बना । आदिवासी बहुल आबादी वाले राज्यों में ओडीशा के मुख्यमंत्री बीजू जनता दल प्रमुख नवीन पटनायक ने सबसे पहले द्रौपदी मूर्मू को समर्थन देने का एलान किया । ओडीशा से सटे आदिवासी राज्य झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस गठजोड़ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन धर्मसंकट में पड़ गए । उतना ही नहीं, द्रौपदी मूर्मू ने गत हफ्ते रांची पहुंचकर भावनात्मक कार्ड खेल दिया । मूर्मू ने झारखंड मुक्ति मोर्चा सुप्रीमो शिबू सोरेन और उनके पुत्र हेमंत सोरेन से मिलकर उनसे पारिवारिक रिश्ता बताया । उसके पहले द्रौपदी मूर्मू पटना पहुंची और बिहार के जद(यू)भाजपा गठजोड़ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिली । ओडीशा द्रौपदी मूर्मू का जन्मस्थान है और वे झारखंड की राज्यपाल रह चुकी हैं । बिहार से अलग करके वर्ष 2000 में भाजपा शासनकाल में झारखंड राज्य बनाए जाने के बावजूद बिहार में भी बड़ी संख्या में आदिवासी हैं । पश्चिम बंगाल में भी संथालों की पर्याप्त आबादी है, जहां की मुख्यमंत्री तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी(दीदी) ने यशवंत सिन्हा को भाजपा के खिलाफ उतारा है ।

आदिवासी वोट पर दीदी की भी नजर है । बंगाल के 30 विधान सभा क्षेत्रों में और कम.से.कम 5 लोक सभा क्षेत्रों में आदिवासी मतदाता फैले हैं । ममता बनर्जी ने कहा कि भाजपा ने अगर पहले मशविरा किया होता तो द्रौपदी मूर्मू सर्वसम्मत प्रत्याशी बन सकती थी । उस वक्त यशवंत सिन्हा लखनऊ में समाजवादी पार्टी नेता अखिलेख यादव और उनके सहयोगी राष्ट्रीय लोकदल के जयंत सिन्हा से मिल रहे थे । उत्तर पूर्वी राज्यों में सबसे ज्यादा परंपरागत आदिवासी निवासी हैं । उनके इसाईयत प्रभुत्व में होने के बावजूद ज्यादातर पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी गठजोड़ की सरकारें हैं । वहां यशवंत सिन्हा के लिए पैर टिकाना कठिन है । सिन्हा बिहार के रहनेवाले हैं, विभाजन के बाद उनका राजनीति केंद्र झारखंड में शिफ्ट हो गया । बिहार में अकेली सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल मजबूत विपक्ष है । इस पार्टी का कांग्रेस और वामदल के साथ यशवंत सिन्हा को समर्थन देने का एकमात्र कारण भाजपा उम्मीदवार के विरोध में खड़ा होना है । राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव एक प्रकार से देखा जाए तो दीदी बनाम नरेंद्र मोदी मुकाबला जैसा लग रहा है । भाजपा में सारे महत्वपूर्ण निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लेते हैं, सभी जानते हैं । लेकिन विपक्ष की ओर से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने का दीदी का स्व्यंभू जिम्मा लेना गैर.भाजपा दलों ने स्वीकार नहीं किया । वैसे दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी मृणमूल कांग्रेस नेता के रूप में ममता बनर्जी ने संभावित उम्मीदवार और वैकल्पिक नाम का चयन सोच-समझकर ऐसा किया था, ताकि विपक्ष में सर्वसम्मति बन जाए । लेकिन वैसा हो नहीं पाया । पहला नाम था वरिष्ठ एनसीपी(राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) नेता शरद पवार, दूसरा नाम था जम्मू व कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री नेशनल कान्फ्रेंस नेता फारूख अब्दुल्ला । इन दोनों ने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया । तीसरा नाम था पूर्व प्रशासक और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल महात्मा गांधी के पौत्र गोपालकृष्ण गांधी । ये तीनों ही नाम दीदी ने ही राष्ट्रपति पद के साझा प्रत्याशी पर विचार करने के लिए दिल्ली में 15 जून को आयोजित विपक्षी दलों की पहली बैठक में सुझाए । उस बैठक में आम आदमी पार्टी, तेलंगाना में सत्तारूढ़ तेलंगाना राष्ट्र समितिए आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने किनारा कर लिया । नवीन पटनायक न भाजपा के समर्थक हैं, न विपक्ष के साथ हैं । इसलिए उनकी पार्टी के भी कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए । शिवसेना और एनसीपी प्रतिनिधि मौजूद थे । गोपालकृष्ण गांधी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने को इस शर्त पर सहमत हुए कि वे भाजपा और विपक्ष दोनों के साझा उम्मीदवार हों । भाजपा से ज्यादा कांग्रेस उनके पक्ष में नहीं थी । क्योंकि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में गोपालकृष्ण गांधी अपने विवेक से संवैधानिक दायित्व निभाने का संकेत दे चुके हैं । भाजपा कांग्रेस की ही तरह ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रपति पद पर नहीं बिठाना चाहती, जो अपने विवेक से कोई निर्णय ले । गोपालकृष्ण गांधी उस समय पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे, जब कांग्रेस नेतृत्ववाली गठजोड़ का पहला कार्यकाल था । 2017 राष्ट्रपति चुनाव में गांधी को संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार घोषित करने पर सहमति बनी । लेकिन जब भाजपा गठजोड़ ने रामनाथ कोविंद को खड़ा कर दिया तब विपक्ष ने पूर्व लोक सभा अध्यक्ष मीरा कुमार को उतारा । गोपालकृष्ण गांधी फिर उपराष्ट्रपति पद के लिए खड़े किए गए और हार गए । विपक्ष ने ताजा हालात को देखते हुए दीदी अब उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार तय करने में अपनी ओर से कोई पहल नहीं कर रही है । विपक्ष को शायद भाजपा की घोषणा का इंतजार है । उपराष्ट्रपति चुनाव में जीत के लिए 388 संसद सदस्यों का वोट चाहिए और भाजपा के पास उसमें 7 ज्यादा 395 वोट है । इसलिए किसी उम्मीदवार के लिए भाजपा का होना ही काफी है । ममता बनर्जी प्रस्तावित चौथे उम्मीदवार यशवंत सिन्हा भाजपा के असंतुष्ट नेता थे । तृणमूल कांग्रेस में शामिल होकर राष्ट्रपति उम्मीदवार बनने के बाद वे नरेंद्र मोदी के सबसे विवादास्पद जम्मू व कश्मीर से धारा.370 हटाने के फैसले का राजनीतिक लाभ उठाने श्रीनगर पहुंचे । धारा.370 वापसी पर अड़े फारूख अब्दुल्ला और पीपुल्स डेमोक्लेटिक पार्टी नेता महबूबा मुफ्ती से उसी मुददे पर समर्थन मांगा । संघ शासित क्षेत्र(यूटी) जम्मू व कश्मीर में विधायक नहीं हैं । पांच लोक सभा सदस्यों में से तीन का समर्थन सिन्हा को मिल सकता है, जो नेशनल कान्फ्रेंस के हैं ।

महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार के गिर जाने से विपक्ष को झटका लगा है । पुराने भाजपा सहयोगी उद्धव ठाकरे ने एनसीपी और कांग्रेस को मिलाकर सरकार बनायी थी । गत हफ्ते शिव सेना के बागी विधायक एकनाथ शिंदे ने भाजपा को साथ लेकर सरकार बना ली । द्रौपदी मूर्मू वैसी ही राष्ट्रपति साबित होंगी, जैसे रामनाथ कोविंद थे । कोविंद ने अपने पांच साल के कार्यकाल में भाजपा सरकार द्वारा संसद से पारित कराए गए सारे विवादास्पद बिलों को इस तरह मंजूरी दी, मानो पहले से उसके लिए तैयार बैठे हों ।

इस संदर्भ में दो राष्ट्रपतियों के नाम का जिक्र युक्तिसंगत होगा जो भाजपा और कांग्रेस दोनों ही शासनकाल में इस पद पर रहे । भारत के परमाणु पिता वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उम्मीदवार बनाया, ताकि मशहूर वैज्ञानिक होने के साथ.साथ उनके मुसलमान होने के कारण मजबूत विपक्षी दल कांग्रेस विरोध न कर सके । 2012 में कलाम को दूसरे कार्यकाल के लिए खड़ा करने का कांग्रेस ने विरोध कर दिया, जो उस वक्त केंद्र में सत्ता में थी । क्योंकि 2006 में लाभ वाले पद पर होने के कारण 45 सांसदों की सदस्यता बचाने के लिए जल्दबाजी में ला, गए संशोधन बिल पर कलाम ने सवाल उठा दिया । लाभ वाले पद पर होने के चलते सदस्यता समाप्त करनेवाले एक्ट, 1959 की धारा 102 और 103 के अंतर्गत इतने सारे सदस्यों की सदस्यता समाप्त होने पर सरकार गिर जाती । दोबारा बिल भेजकर सरकार बचायी गयी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी ऊंगली उठायी ।

कलाम के बाद राष्ट्रपति बने प्रणव मुखर्जी कांग्रेस के उम्मीदवार थे, जो नरेंद्र मोदी के समय भी 3 साल रहे ।

जुलाई, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने जेल में रहते हुए दागी सांसदोंधविधायकों के चुनाव लड़नेवाले ‘विशेषाधिकार’ को असंवैधानिक बिल बताकर समाप्त कर दिया । लोक सभा चुनाव करीब था । कांग्रेस सरकार ने अध्यादेश लाकर उसका काट प्रस्तुत करने का प्रस्ताव तैयार किया, जिससे भाजपा समेत सभी दल सहमत थे । राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इसके औचित्य पर सवाल उठाकर अध्यादेश को मंजूरी नहीं दी ।