गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और उनकी टीम का शायद यह अंतिम आमरण अनशन था । अब वे पार्टी बनाकर जनता के बीच जाएंगे ताकि दो साल में लोग उनकी टीम तथा उनके द्वारा चयनित उम्मीदवारों को इतनी संख्या में जिताकर संसद भेजें, जो जनलोकपाल बिल पारित कर दें ।

अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए जनलोकपाल जैसा पद सृजित करनेवाला बिल लाने के वास्ते अनशन के जरिए आंदोलन शुरू किया ।

पहले के अनशनों की तरह इस बार भी अन्ना और उनकी टीम के सदस्य जनता के बीच स्वयं नहीं गए, जनता को उनके आंदोलन की जानकारी मीडिया के जरिए मिली और भ्रष्टाचार से त्राहि-त्राहि कर रही जनता आंदोलित हुई ।

अब अन्ना राजनीतिक पार्टी बनाकर जनता के बीच वोट मांगने जाएंगे । पहली बार उन्होंने महसूस किया कि वे अपना समय नष्ट कर रहे हैं । आम चुनाव होने में मात्र दो साल बाकी रह गए हैं । 2014 तक अनशन पब्लिसिटी से मिली लोकप्रियता का कितना चुनावी लाभ अन्ना टीम उठा जाएगी, यह तो आम चुनाव से पहले स्पष्ट नहीं हो पाएगा । लेकिन पहले जनलोकपाल बिल का मसौदा तो मतदाताओं के बीच स्पष्ट हो, जो अन्ना टीम की नजर में भ्रष्टाचार खत्म करने का एकमात्र जरिया है । क्योंकि इस अनशन की तरह पहले के अनशनों की शुरूआत और समाप्ति भी जनलोकपाल जैसे व्यापक अधिकार संपन्न पद के सृजन को लेकर हुई है ।

मतदाताओं को सिर्फ इतनी ही बात समझ में आयी है कि दो साल के अंदर टीम अन्ना द्वारा गठित राजनीतिक पार्टी इस स्थिति में आ जाएगी कि 2014 में संसद पहुंचने के 20 महीने के भीतर जनलोकपाल बिल पारित कराएगी,(बकौल अन्ना) लेकिन इस जनलोकपाल बिल का मसौदा अपने 44वें वर्ष में भी उसी दिग्भ्रमित स्थिति में है, जिसके चलते यह कानून का रूप नहीं ले पाया है । मुख्य रूप से जिच प्रस्तावित जनलोकपाल के अधिकार और इसके दायरे में आनेवाले शीर्ष पदों(प्रधानमंत्री समेत) को लेकर है ।

ऐसा नहीं है कि इस मुद्दे को लेकर तकरार पहली बार टीम अन्ना और केंद्र की कांग्रेस गठजोड़ सरकार के बीच सामने आयी है । लोकपाल मसौदा पर संशय उस समय से बरकरार है, जब 1968 में मोरारजी देसाई जैसे जानकार और अनुभवी नेता ने प्रशासनिक सुधार आयोग के अध्यक्ष के रूप में इसका ब्लूप्रिंट तैयार करके प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सौंपा था ।

हम आम मतदाताओं को इस पचड़े में नहीं पड़ना कि इतने वर्षों में बार-बार लोकपाल बिल पेश होकर भी पारित क्यों नहीं हो पाया, जबकि पहले के मसौदे में लोकपाल चयन समिति का गठन राष्ट्रपति की अध्यक्षता में होने की बात थी, जिसके सदस्य उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा तथा राज्य सभा में विपक्ष के नेता हों ।

पहली बार ऐसा हुआ है, जब सिर्फ लोकपाल गठन के मुद्दे को लेकर नई राजनीतिक पार्टी बनाने की बात सामने आयी है । सिर्फ नाम लोकपाल की जगह जनलोकपाल है और इसी पद का गठन करने के लिये टीम अन्ना तथा उनके दल के उम्मीदवार सत्ता में आने लायक वोट मांगने जाएंगे । क्योंकि अभी जनलोकपाल के अन्ना टीम आंदोलन के प्रति सत्ता पक्ष और विपक्ष का रवैया एक जैसा है । इससे अन्ना हजारे जी को अंदाजा लग गया होगा कि भ्रष्टाचार सिर्फ सरकारी बुराई नहीं है, जैसा वे अब तक मानते और प्रचारित करते रहे हैं। इसलिए बहुमत हासिल करके सत्ता में आने के बावजूद टीम अन्ना जनलोकपाल बिल पारित कराकर यह पद गठित कर पाएगी, इसमें संदेह है । अगर जनलोकपाल पद गठित हो गया तो यह वाकई एक नए क्रांतिकारी युग की शुरूआत होगी ।

हालांकि वो पद सरकार के साथ-साथ समाज की भी नस-नस में व्याप्त भ्रष्टाचार पर काबू पाने में कितना सफल हो पाएगा, यह बाद की बात है और इस पर 2014 में सोचेंगे ।

राजनीतिक पार्टियां पहले से ही बहुत हैं और सब के सब सरकारी व्यवस्था के अंग हैं । अन्ना हजारे को पता होगा कि सभी संसद सदस्यों के वेतन और भत्ते समान हैं । सारे संसद सदस्य चाहे तो सत्तारूढ़ दल के हां या विपक्ष के, हर समय, हर जगह(संसद के बाहर और अंदर) संविधान की धारा-105 के तहत विशेषाधिकार से लैस हैं, जिन्हें भ्रष्टाचार में लिप्त होने के बावजूद कोर्ट में नहीं घसीटा जा सकता, पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकती । इसके लिए संसद की मंजूरी चाहिए । विपक्ष के नेता को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है ।

ऐसा व्यवस्था में सिर्फ सरकार पर अनशन के जरिए जनलोकपाल बिल लाने के लिए दबाब डालना कहां तक व्यवहारिक है, इसका अंदाजा देर से ही सही, अन्ना हजारे को तो लग गया । लेकिन मतदाताओं को यह अंदाजा लगाना कठिन हो रहा है कि नयी पार्टी जनलोकपाल बिल पारित कराने लायक व्यवस्था कैसे कायम कर पाएगी । क्योंकि विकल्प की जरूरत तो इसीलिए है । कोई पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी आंदोलन को तवज्जो नहीं देना चाहती ।

इतने दिनों के अनशन से अन्ना हजारे और उनकी टीम को इतना तो फायदा जरूर हुआ कि मीडिया ने उन्हें उछालकर इस स्थिति में ला दिया कि जनता के बीच अपना परिचय नहीं देना पड़ेगा । लेकिन उन्हें यह बात खूब अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि राष्ट्रीय स्तर पर एक विकल्प तैयार करना सिर्फ जंतर-मंतर पर बैठकर अनशन के लिये टीवी बयानबाजी जैसा नहीं है । इसके लिए उन्हें जमीनी स्तर पर उन लोगों के बीच जाना होगा, जिनकी समझ से बाहर है जनलोकपाल मसौदा । वही लोग सबसे ज्यादा संख्या में जुटकर वोट डालने जाते हैं, जिनके लिए राईट टु रिकॉल और राईट टु रिजेक्ट समझना मुश्किल है ।

यह चुनौती कठिन है, जिसकी ओर अन्ना हजारे ने तब देखा जब आसान रास्ता(अनशन) कामयाब नहीं हो पाया । लेकिन अभी भी जनता का सामना करने में ढुलमुल की स्थिति में उनका मुद्दा और माद्दा दोनों ही उन्हें उस जगह से हिलने में कमजोर कर रहा है, जहां जनता नहीं, जनप्रतिनिधि रहते हैं । और इस आंदोलन की सफलता के लिये जनता के बीच जाकर गांवों-कस्बों में मतदाताओं को बताने की जरूरत है कि ऐसे प्रतिनिधि न चुनें जो भ्रष्टाचारी हैं । एक ओर तो वे चाहते हैं कि दिल्ली में बैठे-बैठे ही बात बन जाए, दूसरी ओर ये डर भी सता रहा है कि संसद में जाने के बाद कहीं उनकी अपनी ही टीम उस व्यवस्था का अंग न हो जाए ।

अन्ना जी ने कांग्रेस गठजोड़ सरकार को अनशन तोड़ने के बाद राजनीतिक पार्टी बनाने के साथ-साथ यह भी चुनौती दी कि अगर दो साल के अंदर जनलोकपाल बिल, राईट टु रिकॉल और राईट टु रिजेक्ट बिल पारित कर दे तो वे अपना कदम पीछे खींच लेंगे । इसका मतलब उन्हें व्यवस्था बदलने में कोई दिलचस्पी नहीं है और वे इसके लिए जनता के बीच उस तरह भी नहीं जाना चाहते हैं जैसे चुनाव के समय जनप्रतिनिधि जाते हैं । कांग्रेस पहले से ही चाहती है कि अन्ना टीम इस दिशा में कदम आगे बढ़ाए और बाकी पार्टियां भी क्यों नहीं चाहेंगी । संसदोय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल ने तुरंत यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि इस मानसून सत्र में लोकपाल बिल पारित करना संभव नहीं है, क्योंकि प्रवर समिति के पास विचाराधीन है । यह बयान नौ दिनों का अनशन समाप्त होने के बाद आया । सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने आगे बढ़कर अन्ना टीम के चुनाव लड़ने के फैसले का स्वागत किया ।

जनता बदलाव चाहती है, लेकिन उसे उपयुक्त जनमंच की तलाश है जो समाज और देश को सही व्यवस्था दे । जनलोकपाल के लिए जनप्रतिनिधि बनने को बेताब टीम अन्ना के सदस्यों के मौजूदा तेवर से तो नहीं लगता कि वे इसके प्रति गंभीर हैं। उनके भी विशेषाधिकार हथियार से लैस हो जाने के बाद भ्रष्टाचार खत्म कैसे होगा । ऐसी आशंका खुद अन्ना हजारे को ही है ।

प्रबुद्ध मतदाताओं को वोट डालने से ज्यादा रूचि नहीं है । चुनाव आयोग ने राईट टु रिकॉल और राईट टु रिजेक्ट प्रस्ताव को पहले ही अव्यवहारिक करार दिया है । मौजूदा चुनाव कानून के मुताबिक अगर एक वोट भी पड़ गया तो पानेवाला निर्वाचित घोषित हो जाएगा । बेहतर होता टीम अन्ना भ्रष्टाचार को प्रश्रय देनेवाले कुछ वैसे कानूनों को निरस्त करने के लिए सरकार पर दबाब बनाती जो ऊंचे पदों पर आसीन व्यक्तियों को कानून के शिंकजे में आने से बचाता है । धारा-105 जैसी ही एक धारा है 311, जिसके तहत किसी आई ए एस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई के लिए उस मंत्री की अनुमति चाहिए जिनके वो पीए हैं ।

जब शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ शिकंजा कसेगा तो निचले स्तर के अधिकारी अपने आप ठंडे हो जाएंगे । थानों और सचिवालयों में जाइये तो यही बात सुनने को मिलेगी कि ‘नीचे से ऊपर तक कमीशन फिक्स है’, लेकिन ऊपर से नीचे आने की बात कभी नहीं सुनी गयी । टीम अन्ना ने आंदोलन की शुरूआत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीमकोर्ट, हाईकोर्ट, राज्यपाल, मुख्यमंत्री सबको एक ही डंडे से हांकने लायक जनलोकपाल लाने की मांग से की, जिसके लिए नया संविधान चाहिए और यह राजतंत्रीय व्यवस्था में ही संभव है । वाहवाही लूटने के लिए और आंदोलन के लिए ऐसा मसौदा ठीक है । लेकिन यह चुनावी मसौदा नहीं बन सकता । भ्रष्टाचार मिटाओ नारा गरीबी हटाओ की तरह देकर वोट नहीं बटोरा जा सकता । विगत वर्षों में जितने चुनाव हुए सबसे ज्यादा पैसे लेकर वोट देने और पेड न्यूज की खबरें सामने आयीं । ऐसे मतदाताओं को पैसा छोड़कर विवेक से वोट डालने को तैयार करने के लिए उनके बीच ऐसा ठोस मुद्दा लेकर जाना होगा, जो उन्हें मौजूदा व्यवस्था से अलग और बेहतर लगे । अभी तो विवेक से वोट डालने वाले ही मसौदे को लेकर दिग्भ्रमित हैं ।

हाल में सेनाध्यक्ष पद से रिटायर जनरल वी. के. सिंह ने अन्ना को अनशन तुड़वाने के बाद जेपी टाईप आंदोलन की आवश्यकता जतायी । क्योंकि 1975 जैसी इमर्जेंसी वाली हालत से देश गुजर रहा है, उनका कहना सही है । लेकिन जनरल सिंह को याद होगा कि जे पी भी कांग्रेस सरकार नहीं, व्यवस्था बदलने की बात कहते थे । उन्होंने कभी अनशन के जरिए जनता को आंदोलित नहीं किया, सीधे जनता के बीच गये । जेपी के जीते जी सिर्फ सरकार बदली, व्यवस्था वही रही जबकि जेपी का देश में विकल्प नहीं था । उसके बाद से जितनी गैर कांग्रेसी सरकारें आयीं कोई भी कांग्रेस का स्थायी राष्ट्रीय विकल्प नहीं बनी । जेपी आंदोलनवाले भी उसी के चट्टे वट्टे बन गए । फिर नयी व्यवस्था का प्रारूप क्या हो?

चलते-चलते हाल में हुए राष्ट्रपति चुनाव की याद दिला दें, जिसमें दोनों ही उम्मीदवारों ने राज्यों की राजधानियों में जाकर जनप्रतिनिधियों से वोट मांगा । टीम अन्ना को जनप्रतिनिधि बनना है, लेकिन अभी तक दिल्ली को छोड़ किसी अन्य राज्य में वे जनता से भ्रष्टाचार के खिलाफ समर्थन मांगने नहीं गए । अब उनका जाना भ्रष्टाचार जैसा अभिशाप मिटाने के बजाय इसे भुना कर वोट मांगने वाला चुनावी दौरा माना जाएगा ।