यों बिहार में शिक्षकों की बात करना ही अपने आप में एक मजाक बन गया है क्योंकि पिछले 20 वर्षों से सबसे ज्यादा अव्यवस्था और अराजकता यहां के स्कूलों और कालेजों में व्याप्त है। इसका खामियाजा मुख्य रूप से उन अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है जो पैसे के अभाव में अपने बच्चों को बिहार से बाहर भेजने में असमर्थ हैं। खासकर वैसे अभिभावकों की स्थिति तो और भी हास्यास्पद है जो यहां के स्कूलों में भी अपने बच्चों को नहीं पढ़ा पाते। ऐसे ही बच्चों के भविष्य का रोना रो रहे हैं बिहार के 3006 संस्कृत विद्यालय जिनके पास अपना मकान नहीं है और इन विद्यालयों के नाम कागजों में जी रहे 14,000 शिक्षक, जिन्हें 14 वर्षों से वेतन नहीं मिला है।

संस्कृत शिक्षकों का आरोप है कि वेतन देने की बात तो दूर, उल्टे मुख्य मंत्री लालूप्रसाद सार्वजनिक रूप से उन्हें अपमानित करने और उनका मनोबल गिराने का कोई अवसर नहीं चूकते। संस्कृत को वे ब्राह्मणों की भाषा मानते हैं और जनसभाओं में ब्राह्मणवादी व्यवस्था का विरोध करने के नाम पर ब्राह्मणों के खिलाफ अपशब्द बोलना लालूप्रसाद की आदतों में है। इसलिए संस्कृत शिक्षकों का प्रतिनिधिमंडल जब भी मुख्य मंत्री से मिलने जाता है तो संवाद की शुरुआत शिक्षकों के चन्दन टीका पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी से होती है - 'क्या टीकाधारी, तुम लोगों को वेतन नहीं मिला? ठीक है, अभी मैं व्यस्त हूं जाओ, बाद में बात करेंगे।'

कालेजों-स्कूलों का अपना मकान न होना और शिक्षकों को वेतन न मिलना बिहार के लिए आम बात है। अन्य इलाकों की क्या बात, राजधानी के दर्जनों स्कूल-कालेज बिना भवन के हैं और शिक्षक तथा शिक्षकेतर कर्मचारियों को कई वर्षों से वेतन नहीं मिला। राज्य के तमाम स्कूलों-कालेजों के शिक्षक वेतन की मांग के लिए आंदोलन पर हैं और उनका आंदोलन कई महीनों से चल रहा है। पिछले महीने प्रधान मंत्री द्वारा 'सबके लिए शिक्षा' पर दिल्ली में बुलाए गए मुख्य मंत्री सम्मेलन में बिहार के मुख्य मंत्री ने स्वयं स्वीकार किया कि राज्य में 13,000 भवनविहीन स्कूल हैं। हालांकि यह संख्या वास्तविकता से कोसों दूर है लेकिन जाहिर है कि इस सूची में अस्तित्वहीन संस्कृत विद्यालय एक भी नहीं है।

राज्य के सारे संस्कृत विद्यालय ऐसे ही स्थानों पर चल रहे हैं जहां संभ्रांत लोग नहीं रहते और अगर उधर से गुजरना भी हो तो नाक बंद कर लेते हैं। विद्यालय चलानेवालों को वैसी जगहों पर भी खटालवालों और कूड़ा-कचरा फेंकनेवालों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ता है। अगर देहात में हो तो संस्कृत शिक्षकों को अपने जीवनयापन के लिए सम्पन्न गृहस्थों का आश्रय लेना पड़ता है। विद्यालय के लिए कृपालु गृहस्थ अपने दालान का एक हिस्सा दे देते हैं जिसके एक कोने में 'पण्डीजी' की चौकी रहती है। भोजन और चौकी के एवज में 'पण्डीजी' को आश्रयदाता के बच्चों को सुबह-शाम पढ़ाना होता है।

राजधानी के एक मुख्य चौराहे के निकटवर्ती मुहल्ले का एक संस्कृत विद्यालय खुद अपनी कहानी कह रहा है। टूटी झोपड़ी में चल रहे इस स्कूल के तीन तरफ खटाल हैं और एक तरफ है कचरागाह। इस विद्यालय की संचालिका सह-प्रधानाध्यापिका विष्णुकुमारी सिन्हा बताती हैं - 'खटालवालों के गिज्जत और ताने तो रोजमर्रा की बात है, इसकी परवाह की होती तो यह स्कूल ही नहीं बनता। संस्कृत पढ़ना-पढ़ाना इस राज्य में अभिशाप है।' चारों तरफ गोबर, गंदे नाले, कचरों की सड़ांध और बीच में स्थित है प्राथमिक सह-उच्च संस्कृत विद्यालय की यह झोपड़ी, जिसका 300 रुपया किराया श्रीमती सिन्हा को देना पड़ता है और जीविका चलाने के लिए झोपड़ी में आटा-चक्की चलाने की मजबूरी है। इधर हाल में हरिजन आदिवासी महिला कल्याण के नाम पर कचरागाह का एक टुकड़ा इन्हें कार्यालय का सचिव होने के चलते मिला है, जिसमें बच्चे पढ़ते हैं। शुक्र है, इसका किराया श्रीमती सिन्हा को नहीं देना पड़ रहा है।

हरिजन आदिवासियों के कल्याण का दिन-रात ढिंढोरा पीटनेवाली बिहार की जनता दल सरकार का ध्यान क्या इस ओर जाएगा? कमाल की बात तो यह है कि इस विद्यालय से निर्गत प्रमाणपत्रों को सरकारी मान्यता प्राप्त है लेकिन सरकार को प्रमाणपत्र निर्गत करने की प्रक्रिया से जुड़नेवालों के दोनों जून की रोटी की चिंता नहीं है। इस विद्यालय में अपने बच्चों को भेजनेवाले इस मुहल्ले के निहायत ही गरीब तबके के लोग हैं जिनमें से अधिकांश शुल्क जमा करने की स्थिति में नहीं हैं। जो थोड़ा-बहुत दे देते हैं, वही शिक्षकों की रोजी है।

ताजातरीन सूचनाओं के अनुसार अबतक 49 संस्कृत शिक्षक भुखमरी के शिकार हो चुके हैं। बिहार संस्कृत शिक्षक महासंघ के प्रवक्ता रामाश्रय चौधरी का कहना है कि जिनके पास अपने गांव में थोड़ा-सा जमीन जोत है (हालांकि ऐसे शिक्षकों की संख्या बहुत कम है) उन्हें छोड़कर शेष शिक्षकों के परिवार, बाल-बच्चों के सामने तो भुखमरी की स्थिति है ही। उनका आरोप है कि शिक्षा मंत्री डाक्टर रामचन्द्र पूर्वे ने 50 बार समय निर्धारित करके बातचीत नहीं की। अन्य शिक्षकों को बीच-बीच में किसी न किसी कोष से वेतन दे दिया जाता है लेकिन संस्कृत शिक्षकों के बारे में बातचीत करना भी जरूरी नहीं समझा जाता। इस सम्बन्ध में शिक्षा मंत्री से सम्पर्क स्थापित करने की कोशिश बेकार गयी।

संस्कृत शिक्षकों ने अपनी ओर से हाथ-पांव मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है - प्रधान मंत्री श्री पी.वी. नरसिंह राव और केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह भी इनके लिए मददगार साबित नहीं हुए। 1991 और 1993 में 2 अक्टूबर को संस्कृत शिक्षकों का राजघाट पर सामूहिक उपवास चला और 8 अक्टूबर, 91 को उनका प्रतिनिधिमंडल प्रधान मंत्री से मिला। श्री चौधरी के मुताबिक तत्कालीन प्रधान मंत्री ने संस्कृत शिक्षकों की दु:स्थिति पर काफी दु:ख और आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि 'एक ओर तो राष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत विद्वानों का सम्मान कर हम इस भाषा की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं, दूसरी ओर देश के अंदर संस्कृत पढ़ानेवालों की यह दुर्दशा बड़े शर्म की बात है।' उन्होंने इस सम्बन्ध में मानव संसाधन विकास मंत्रालय से बात करने का आश्वासन भी दिया। उसके पूर्व प्रतिनिधिमंडल श्री अर्जुन सिंह से मिला जिन्होंने बिहार सरकार के मानव संसाधन विकास विभाग को लिखा कि संस्कृत शिक्षकों के वेतन पर होनेवाले खर्च का ब्यौरा भेजा जाये।

अगर बिहार सरकार ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री की बात गंभीरता से ली होती तो अबतक उनके पत्र का जवाब चला गया होता। और यहां स्थिति यह है कि हर बार विधानमंडल के दोनों सदनों में सबसे ज्यादा प्रश्न मानव संसाधन विकास विभाग के सम्बन्ध में पूछे जाते हैं जिनमें अधिकांश संस्कृत शिक्षकों के वेतन से जुड़ा होता है, लेकिन किसी का भी माकूल जवाब रामचन्द्र पूर्वे जी नहीं दे पाते। वैसे अल्पसंख्यक स्कूलों की दशा भी इससे बेहतर नहीं है जो और अचरज की बात है क्योंकि जनता दल सरकार अपने से ज्यादा किसी को भी अल्पसंख्यकों का शुभचिंतक नहीं मानती।

बिहार में एकमात्र संस्कृत विश्वविद्यालय है कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा जो अगर केन्द्र के अधीन नहीं होता तो यहां के शिक्षक भी वेतन के लिए तरसते रहते। इस विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर छात्र कुलानन्द झा का कहना है - 'बाहर की कौन कहे, घर में भी लोग मनोबल गिराते हैं और हमेशा ताने मारते हैं - किसी स्कूल-कालेज में पण्डीजी बनने के सिवाय और बनोगे क्या?' ऐसे वातावरण में भी छात्र पढ़ रहे हैं और शिक्षक पढ़ रहे हैं।

वास्तव में सचाई यह है कि बिहार में अबतक जितनी भी सरकारें बनीं, किसी ने भी संस्कृत शिक्षा के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया। इसके लिए श्री लालूप्रसाद पर 'ब्राह्मण विरोधी' होने का आरोप लगाकर सिर्फ इन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। श्री लालूप्रसाद के सत्ता में आये चार साल हुए और संस्कृत शिक्षक 1961 से आंदोलन कर रहे हैं जब मुख्य मंत्री कांग्रेसी ही नहीं, ब्राह्मण भी थे। उस समय की राजनीति दूसरी थी। लम्बे-चौड़े और आकर्षक घोषणाएं करके वाहवाही लूटी गयी लेकिन उनके कार्यान्वयन पर ध्यान नहीं दिया गया। संस्कृत शिक्षा बोर्ड का गठन, प्रत्येक प्रखंड में 11 विद्यालय खोलने और सभी विद्यालयों को राजकीय घोषित करने का फैसला कांग्रेसी मुख्य मंत्रियों के समय की बात है, लेकिन इन 14 वर्षों में 3006 संस्कृत विद्यालयों की स्वीकृति की अधिसूचना जारी नहीं की गयी। लालूप्रसाद न तो बातचीत करते हैं न ही घोषणाएं।

इसी से मिलती-जुलती स्थिति है संस्कृत अकादमी की जिसे प्रतिवर्ष बिहार सरकार से सिर्फ इतना ही मिलता है ताकि कार्यालय के मकान का किराया दिया जा सके। अकादमी के शोध अधिकारी विश्वेश चौधरी बताते हैं कि 1984 में इसकी स्थापना संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए की गयी थी, लेकिन अब तो बंद होने की स्थिति है। इतने वर्षों में अकादमी कार्यालय के लिए भवन तक नहीं मिला। 1990 में किराये की अदायगी नहीं होने के कारण मकान मालिक ने कार्यालय में तालाबंदी कर दी। अकादमी के लिए दो लाख रुपये की सालाना स्वीकृति मिली हुई है लेकिन 93-94 में मात्र 50 हजार दिया गया जिससे स्थापना खर्च की भी भरपाई नहीं हुई। 1990-91 में एक पैसा नहीं मिला। स्वीकृत पद हैं 14, कार्यरत हैं 9 और वे भी 30 महीनों से बिना वेतन के काम कर रहे हैं। जबकि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश का अपना संस्कृत भवन है, जहां प्रतिवर्ष 11 लाख मिलता है। श्री मुलायम सिंह यादव ने दूसरी बार मुख्य मंत्री बनने के बाद यह राशि बढ़ाकर 15 लाख कर दी। श्री यादव भी लालूप्रसाद सरीखी पिछड़े वर्ग की राजनीति करते हैं लेकिन संस्कृत अकादमी को 'ब्राह्मणों की खाओ-पियो संस्था' कहकर उन्होंने तिरस्कृत नहीं किया जो बिहार में हो रहा है। बंगाली अकादमी के लिए अलग से भूमि आवंटित किया गया है। पिछले साल इस सम्बन्ध में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय और प्रधान मंत्री के संस्कृत सचिव विद्याधर शर्मा गुलेरी को लिखा गया। दोनों ओर से संस्कृत अकादमी कर्मचारियों को वेतन भुगतान न किये जाने का कारण पूछा गया और बिहार सरकार ने चुप्पी साध ली। बिहार के शिक्षा विभाग का कोई अधिकारी संस्कृत शिक्षकों और संस्कृत अकादमी के बारे में कुछ भी स्पष्ट बताने की स्थिति में नहीं है।