कोरोना लॉकडाउन और फिर उसमें विभिन्न चरणों में ढील(अनलॉक) प्रक्रिया के साथ-साथ सियासी उठापटक भी जारी है । कुछ राज्य सरकारों ने केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार की तर्ज पर कोरोना की चपेट में आने की खबरें देनेवाले मीडियाकर्मियों पर शिकंजा कसने का प्रयास किया । सरकारी बयानों/विज्ञाप्तियों को छोड़ अन्य समाचारों को फर्जी बताया गया । बिहार, बंगाल में शुरू से कोरोना संक्रमण छिपाया गया । सभी राज्य सरकारों को केंद्र के साथ तालमेल बिठाते हुए कोरोना में सावधानी बरतने और बचाव उपाय संक्रमितों तक पहुंचने का प्रयत्न किया । ऐसा नहीं लगा कि राज्य सरकारें बहुत सतर्क और सजग थी ।
लेकिन पूरे लॉकडाउन में सबसे तेज और तूफानी सियासी उठापटक का दौर चला । सत्तारूढ़ दल की सत्ता पर पकड़ में थोड़ी सी चूक के प्रति विपक्ष काफी अलर्ट रहा । किसी भी असावधानी पर टक्कर देने के लिए सतर्कता और साधन में कोई कमी नहीं हुई । मामला राज्य विधान सभाओं की सीमा से निकलकर संबंधित हाईकोर्टों और सुप्रीम कोर्ट तक गया । यह सिलसिला जारी है । लॉकडाउन शुरू होने से लेकर अनलॉक तक देश की जनता ने देखा कि सियासी उठापटक और जोड़-तोड़ की राजनीति का काम कोरोना बचाव से ज्यादा मुस्तैदी से चला । ये खबरें जमकर उछली और इसके उछल-कूद पर किसी भी सत्तारूढ़ या विपक्षी दल ने कोई एतराज नहीं किया ।
मार्च में मध्यप्रदेश से शुरू होकर मणिपुर होते हुए सियासी सरगर्मी राजस्थान पहुंची, जो सबसे ज्यादा सुर्खियों में रही । मणिपुर में तो लॉकडाउन के पहले से ही दलबदल हलचल तेज थी और मामला मणिपुर हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हुआ था । लेकिन राजस्थान का मामला लॉकडाउन में बेहद गर्माया रहा ।
हाल ये था कि अबकी स्वतंत्रता दिवस समारोह के समय लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन से लेकर मुख्यमंत्रियों का भी आयोजन कोरोना के चलते फीका रहा । मगर पूरे देश की जनता ने उस समय सियासी राजनीति और उसमें सरकार बचाने/गिराने के लिए करोड़ों रुपये विधायकों की खरीद-फरोख्त की खबरें चरम पर देखी/सुनी । कोरोना बचाव में लगे डॉक्टरों, नर्सों, स्वास्थ्यकर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं का हर महीने वेतन सुनिश्चित करने की ओर किसी का ध्यान नहीं था । दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों को हड़ताल करना पड़ा । वेंटिलेटर, सेनेटाइजर की कमी से अस्पताल जूझते रहे । इसी हफ्ते पटना हाईकोर्ट ने स्वास्थ्यकर्मियों की हड़ताल पर रोक लगा दी ।
इसके लिए सरकारों के पास पैसे नहीं थे । स्वास्थ्यकर्मियों की मांगों पर विचार करने की भी जरूरत नहीं समझी गयी । बाकी सारे छोटे-मंझोले उद्योग-धंधे व्यवसाय पैसे, साधन की किल्लत झेलते रहे । मगर सियासी कारोबार का पर्दे के पीछे छिपा पैसा स्वयं बोल रहा था । राजनीतिक जोड़-तोड़ की खबरें अभी तक आ रही हैं ।
स्वतंत्रता दिवस समारोह से एक दिन पहले 14 अगस्त को अशोक गहलोत के नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार ने विश्वास मत जीत लिया, सरकार गिरने से बच गयी । कांग्रेस के ही उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने 18 विधायकों को मिलाकर सरकार गिराने की मुहिम छेड़ी । एक महीने तक यह सिलसिला चला । कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को मनाने में जुटा रहा । पायलट के भाजपा में जाने की अटकलबाजी चलती रही । आखिरकार अशोक गहलोत पायलट से हाथ मिलाकर सरकार बचाने में सफल हो गए । उस दौरान असंतुष्ट विधायकों को राजस्थान से बाहर रखकर करोड़ों रुपये ऑफर करने की खबरों में भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां लपेटे में रहीं । राजस्थान में राज्यपाल कलराज मिश्र भाजपा के हैं, जो विधान सभा सत्र बुलाने की राज्य सरकार का आग्रह तीन बार लौटाने के बाद फिर मुश्किल से विश्वास मत पर बहस के लिए सत्र आहूत करने को राजी हुए । उसी बीच बहुजन समाज पार्टी(बसपा) के छह विधायकों की कांग्रेस में विलय हो गया ।
इस हफ्ते 24 अगस्त को राजस्थान हाईकोर्ट ने विधान सभा अध्यक्ष सी. पी. जोशी को बसपा के उन विधायकों के खिलाफ दायर याचिका पर पुनर्विचार करने कहा और इसके लिए तीन महीने का समय दिया । राजनीतिक अफरातफरी के दौरान 22 जुलाई को भाजपा विधायक मदन दिलावर ने कांग्रेस में विलय करनेवाले छह बसपा विधायकों के खिलाफ विधान सभा अध्यक्ष को अर्जी दी, जिसमें दलबदल कानून के अंतर्गत उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की थी । विधान सभा अध्यक्ष ने अर्जी ठुकरा दी । राजस्थान हाईकोर्ट के एकल जज पीठ महेन्द्र गोयल ने विधान सभा अध्यक्ष के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें उन्होंने बसपा विधायकों की सदस्यता समाप्त करने से इन्कार कर दिया । भाजपा विधायक मदन दिलावर सुप्रीम कोर्ट गए । सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरुण मिश्र की पीठ ने यह कहकर 24 अगस्त को ही याचिका खारिज कर दी कि राजस्थान हाईकोर्ट ने विधान सभा अध्यक्ष को बसपा विधायकों पर निर्णय लेने के लिए तीन महीने का समय दिया है ।
मध्य प्रदेश में भी कमलनाथ की नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार को गिराने की प्रक्रिया मार्च में इसी तरह शुरू हुई । 18 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लॉकडाउन एलान और मध्यप्रदेश में भाजपा को वापस लाने की कार्रवाई साथ-साथ हुई । वो राजस्थान की तरह लंबी नहीं चली । कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों के साथ तुरंत भाजपा में शामिल होकर राज्यसभा के सदस्य बन गए । कयास लगाए गए कि भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमलनाथ सरकार गिराने के इनाम में मुख्यमंत्री पद देगी । मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सुप्रीमकोर्ट के आदेश से विश्वास मत का सामना करने से पहले ही 21 मार्च को इस्तीफा दे दिया और 469 दिन की कांग्रेस सरकार को गिराकर शिवराज सिंह चौहान फिर से मुख्यमंत्री बन गए ।
इससे ज्यादा राजनीतिक जोड़-तोड़ अभियान मणिपुर में चला, जो थोड़े-थोड़े अंतराल पर अनलॉक-4 अर्थात् अगस्त तक जारी रहा । मणिपुर के भाजपा मुख्यमंत्री एन. बोरेन सिंह को दो बार विश्वास मत हासिल करना पड़ा और दोनों ही बार उनका कांग्रेस विधायकों को फोड़कर समर्थन जुटाना चर्चा में रहा । कांग्रेस के छह विधायकों ने 10 अगस्त को मुख्यमंत्री के विश्वास मत हासिल करने के बाद पार्टी नेतृत्व के विरोध में अपना इस्तीफा विधान सभा अध्यक्ष युमनाम खेमचंद को सौंपा और 10 दिन बाद भाजपा में शामिल हो गए । 28 जुलाई को विपक्षी कांग्रेस नेता पूर्व मुख्यमंत्री ओकरम इबोबी सिंह ने भाजपा सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया । उस पर बहस के दौरान विधान सभा अध्यक्ष पर नियमावली का उल्लंघन करके सरकार बचाने का आरोप लगाया । विपक्षी नेता ने संविधान की धारा 174 और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए मणिपुर की राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला को पत्र लिखकर विशेष सत्र बुलाने का आग्रह किया । मणिपुर का जोड़-तोड़ मार्च 2017 में खंडित विधान सभा चुनाव परिणाम आने के बाद से ही सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है । 60 सदस्यीय विधान सभा चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस 28 सीटें जीतकर अकेली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी ।
कांग्रेस के लिए बहुमत जुटाना आसान था । लेकिन राज्यपाल ने 21 सीटें जीतनेवाली भाजपा को न्योता दिया, जिसके नेता एन. बीरेन सिंह ने बहुमत के लिए कम पड़ रही 10 सीटें कांग्रेस को फोड़कर जुटायी और एक विधायक श्याम कुमार सिंह को मंत्री पद दिया । श्याम कुमार सिंह और अन्य सात कांग्रेस विधायकों का अयोग्य घोषित करने की अर्जी पर विधान सभा अध्यक्ष ने तीन साल तक विचार ही नहीं किया । मामला मणिपुर हाईकोर्ट से निकलकर सुप्रीम कोर्ट में गया । सुप्रीम कोर्ट के बार-बार निर्देशों की अवहेलना के बाद आखिरकार कोर्ट ने असाधारण अधिकारों का उपयोग करते हुए मंत्री श्याम कुमार सिंह को 18 मार्च, 2020 को विधान सभा में प्रवेश करने से रोक दिया और मंत्री पद से हटा दिया । फिर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद बाकी सात विधायकों की भी विधान सभा अध्यक्ष को 22 जून को सदस्यता समाप्त करनी पड़ी । सरकार के अल्पमत में आने के बाद विपक्षी नेता ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया । लॉकडाउन के दौरान ही मणिपुर की भाजपा सरकार ने कांग्रेस के छह विधायकों को फिर से मिलाकर विश्वास मत हासिल कर लिया । कांग्रेस प्रवक्ता ने नशीली दवा माफिया का करोड़ों रूपया सरकार बचाने में खर्च करने का आरोप लगाया । केरल की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी नेतृत्ववाली वाममोर्चा सरकार के खिलाफ कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव 24 अगस्त को गिर गया । मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन पर आरोप है कि उनके कार्यालय के अधिकारी सोना तस्करी मामले में शामिल हैं, जिसकी सीबीआई जांच कर रही है । इसमें विचित्र यह देखने को मिला कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने राजस्थान में कांग्रेस सरकार को बचाने के लिए अपने दो विधायकों का समर्थन दिया ।