प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना लॉकडाउन में ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति(एनईपी) की घोषणा कर डाली, जब देश के सारे स्कूल, कॉलेज, सरकारी और निजी शिक्षण संस्थान बंद हैं । प्रधानमंत्री ने एनईपी लागू करने के लिए राज्यपालों और राज्यों के शिक्षा मंत्रियों का सम्मेलन 8 सितंबर को बुलाया, जिसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी संबोधित किया । 400-प्लस विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति(चांसलर) के रूप में राज्यपालगण थे । साथ में विश्वविद्यालयों के कुलपति(वाइस-चांसलर) भी मौजूद थे । इन विश्वविद्यालयों से संबद्ध 40,000 से ज्यादा कालेजों को नयी शिक्षा नीति लागू करने में अहम भूमिका निभानी है ।

प्रधानमंत्री ने सभी राज्यों से कहा कि एनईपी लागू करने के लिए इससे जुड़े सभी पक्षों से विचार-विमर्श 25 सितंबर तक कर लं । यह कहना कठिन है कि उस तारीख तक विचार-विमर्श हो पाएगा या नहीं ।

11 सितंबर को 21वीं सदी में स्कूली शिक्षा विषय पर एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारत को नयी दिशा देगी । नरेंद्र मोदी ने कहा कि इस पर एक सप्ताह में सरकार को 15 लाख से ज्यादा सुझाव मिले हैं । प्रधानमंत्री ने या केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उन सुझावों में एक भी ऐसा सुझाव था या नहीं कि एनईपी लागू करने के लिए यह उपयुक्त समय नहीं था ।

8 सितंबर का एनईपी की घोषणा के समय प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा कि ‘जब हम परिवर्तन लाने के लिए कदम बढ़ाएंगे, तो इसके बारे में लोगों के मन में संशय और सवाल उठना स्वाभाविक है । माता-पिता के मन में इस शिक्षा नीति के प्रारूप पर सवाल उठेंगे, एनईपी के विषय में जानना चाहेंगे । अन्य दावेदारों(निजी) को एनईपी लागू करने के लिए संसाधनों की उपलब्धता पर संदेह हो सकता है । संशयों और सवालों के निवारण के लिए नरेंद्र मोदी ने इस पर चर्चा करने कहा, साथ में यह भी जोड़ा कि ‘एनईपी तभी लागू हो सकता है जब लोगों के मन से सारी शंकाएं, प्रश्न दूर हो जाएं । 11 सितंबर को भी स्कूली शिक्षा नीति कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने स्वीकारा कि एनईपी एलान के बाद से लोगों के मन में कई सवाल आ रहे हैं । मसलन ये शिक्षा नीति क्या है? कैसे अलग है, इससे स्कूलों और कॉलेजों में क्या बदलाव आएगा । कुछ का जवाब तो प्रधानमंत्री ने दे दिया कि इसमें बच्चों के मनोरंजक तरीकों से सीखने पर जोर दिया गया है । बाकी नरेंद्र मोदी ने शिक्षा मंत्रियों, शिक्षकों पर छोड़ दिया । ‘निशंक’ एनईपी लाने से पहले और उसके बाद जनता की संकाओं का समाधान सिर्फ इतना कहकर कर चुके हैं - इमसें ‘कंटेन्ट भी होगा, पेटेंट भी होगा, टैलेंट भी होगा ।’ तुकबंदी सुनने में तो अच्छा लगा, मगर एनईपी मसौदे की धुंधली तस्वीर साफ होते देखने के लिए अभिभावकों को 10 से 40 साल तक इंतजार करना पड़ेगा, जब उनके बच्चे अभिभावक बन जाएंगे ।

एनईपी एलान के बाद प्रधानमंत्री का ध्यान बिहार विधान सभा चुनाव और संसद के मानसून सत्र पर केंद्रित हो गया । बिहार में वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए चुनावी आधारशिलाओं और शिलान्याशों का सिलसिला शुरू करते हुए 13 सितंबर को नरेंद्र मोदी ने कहा कि बिहार उस दौर से बाहर निकल रहा है, जिसमें एक पीढ़ी काम शुरू होते देखती थी और दूसरी पीढ़ी उसे पूरा होते हुए । बस ठीक उसी स्थिति में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप को रखा गया है । आज की पीढ़ी एनईपी कार्यान्वयन चर्चा देख-सुन पाएगी, पूरा/प्रभावी होते दूसरी पीढ़ी देखेगी ।

प्रधानमंत्री ने राज्यपालों और कुलपतियों के सम्मेलन में एनईपी का एलान इसलिए किया, क्योंकि इसमें उच्च शिक्षण संस्थाओं(एचईआई) पर ज्यादा फोकस किया गया है । उन्होंने कहा कि देश में ‘ज्ञान अर्थव्यवस्था’

तैयार करना है और स्थानीय कैंपसों को ग्लोबल शिक्षण संस्थानों के लिए खोलना है । एनईपी का लक्ष्य 2040 तक सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में बहुआयामी बहुक्षेत्रीय कैंपस बनाना है, जिसमें हजारों की संख्या में नामांकन होंगे । इस प्रक्रिया का पहला चरण 2030 तक पूरा होगा और 2035 तक उच्च शिक्षा में नामांकन 26.3 प्रतिशत (2018) को बढ़ाकर 50 प्रतिशत ले जाना है । ये तो हुई कॉलेज/उच्च शिक्षा हासिल करनेवाली वर्तमान और अगली पीढ़ी की तकदीर की बात, जो उपभोक्ता बाजार के आइटम बनेंगे । क्योंकि प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि एनईपी में सरकार का हस्तक्षेप ‘न्यूनतम’ होगा । पहली बार ऐसा हुआ है, जब सरकार की ओर से निजी स्कूली शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है । इस नीति में स्कूली और कॉलेज दोनों में ‘ऑनलाईन/डिस्टेंस लर्निंग पर बल दिया गया है । पहले से ही निजी संस्थाओं में व्यवसाय की तरह चल रही शिक्षा व्यवस्था को अब सुरक्षा कवच मिल गया ।

एनईपी से संबंधित बिल सरकार ने संसद में पेश करना और इस पर चर्चा कराना आवश्यक नहीं समझा । यह सवाल देश के पढ़े-लिख लोग उठा रहे हैं। संसद में चर्चा और अनुमोदन की संविधान सम्मत प्रक्रिया अपनाए बगैर राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करना कहां तक न्यायोचित है ।

लॉकडाउन में श्रमिकों की रक्षा करनेवाले श्रम कानून खतम किए गए । सार्वजनिक उपक्रमों में विनिवेश से लेकर रेलवे, बिजली के निजीकरण की अनुमति दी गयी और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील परियोजनाओं का व्यावसायीकरण कर दिया गया । जुलूस, प्रदर्शन, धरना पर पाबंदी है । विरोध के सारे रास्ते बंद हैं। इसी मौके का फायदा उठाकर सरकार ने अपने लंबित राजनीतिक काम निबटा लिए । लॉकडाउन में दो करोड़ युवा बेरोजगार हो गए, गरीबों ने दुहरीमार झेली, मध्य निम्न वर्ग के लोग पिस गए । निजी स्कूलों ने बंदी में ट्यूशन फीस, बस की फीस अभिभावकों से वूसली, शिक्षकों को भी वेतन नहीं दिया । उसी अवधि में एनईपी तत्काल लागू करने का प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल से मंजूर हो गया । इसकी जानकरी केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री ने 30 जुलाई को संवाददाताओं को दी । उन्होंने कहा कि यह सरकार की लंबित परियोजनाओं में से एक थी ।

एनईपी वैसे समय में सरकार ने लागू करने की प्रक्रिया अपनायी है, जब सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) में इतनी गिरावट पहले नहीं देखी गयी । 8 सितंबर को राज्यपालों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि 1968 की शिक्षानीति के कारण जीडीपी का 6 प्रतिशत सार्वजनिक शिक्षा में निवेश करने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया ।

संसद का सत्र चल रहा है । एक अक्टूबर तक बिना अवकाश के 18 बैठकें होंगी । इसमें 45 बिल और 11 अध्यादेश सदनपटल पर रखे जाने हैं । इनमें मंत्रियों के वेतन और भत्ते बढ़ाने वाला बिल भी शामिल है । देखना है कोई सदस्य इस संबंध में या एनईपी पर कोई सवाल उठाते हैं या नहीं । विपक्षी सदस्यों के विरोध के बावजूद सरकार ने प्रश्नकाल समाप्त कर दिया । 30 मिनट के शून्यकाल पर भारत-चीन तनाव हावी है और रहेगा । एक तरफ तो सरकार ने विश्वबैंक से कर्ज लेकर उसी के मोडल पर शिक्षा को व्यवसाय बनाने का मसौदा तैयार करवाया । कोरोना राहत का सारा काम अनुदान और केंद्रीय कर्मचारियों के वेतन से वूसली पर चल रहा है । ऐसे में मंत्रियों का वेतन और भत्ता बढ़ना कहां तक उचित है, जनता का यह सवाल प्रधानमंत्री के कानों तक नहीं पहुंचेगा ।

सरकारी नौकरियों के दिन अब लदने वाले हैं । अब परंपरागत हुनर आधुनिक तकनीक से सिखाए जाएंगे और उसे ग्लोबल ‘बिग बाजार’ में उपभोक्ता की तरह परोसा जाएगा । 24 जून को विश्वबैंक से इसी मोडल के लिए कर्ज फाइनल होने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एनईपी को मंजूरी दे दी । उसके पहले राज्य सरकारों से कोई राय नहीं ली गयी ।

2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के समय से ही नरेंद्र मोदी कांग्रेस शासनकाल में 1986 और 1992 में लागू शिक्षा नीति बदलना चाहते थे । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो) के पूर्व प्रमुख के. कस्तूरीरंगन ने 66 पृष्ठों का एनईपी खाका 2016 में तैयार किया और मई, 2019 में नरेंद्र मोदी के दुबारा सत्ता में आने के समय फाइनल कर दिया ।

एनईपी ‘देश का’ तभी साबित होगा, जब 2030 तक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनते रहें । अन्यथा किसी सत्तारूढ़ दल का हो जाएगा, जैसा कि प्रधानमंत्री ने 8 सितंबर को एलान के समय कांग्रेस की ओर इंगित करते हुए कहा ।