श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव पर ऐसे अप्रिय और असंगत मुद्दे हावी हैं जो भारत-श्रीलंका द्विपक्षीय रिश्ते में खटास पैदा करनेवाले हैं । वर्तमान राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसना का हटना निश्चित है । क्योंकि वे 16 नवंबर को हो रहे राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार नहीं है । सिरिसेना की अपनी श्रीलंका फ्रीडम पार्टी ने ही उनका साथ देने से इन्कार कर दिया । फिर उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा की श्रीलंका पीपुल्स पार्टी का समर्थन जुटाने के लिए राजपक्षा भाइयों से साझा चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने के लिए समर्थन मांगा, मगर मैत्रीपाला सिरिसेना को समर्थन नहीं मिला । महिंदा राजपक्षा के भाई गोतावाया राजपक्षा राष्ट्रपति पद के मजबूत उम्मीदवार हैं । जिन कारणों से और जिन मुद्दों को लेकर सिरिसेना दोबारा राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ पाए, उस सबका तार सीधा भारत से जुड़ा है । राष्ट्रपति पद के दो दर्जन से ज्यादा उम्मीदवारों में सभी ने भारत-श्रीलंका सम्बंधों में तल्ख वाले मामलों को ही चुनावी मुद्दा बनाया हुआ है । इसी हफ्ते पता चल जाएगा कि नए राष्ट्रपति का चुनाव और उनकी जीत में भारतीय ताल्लुकात का कोई जिक्र पराजित उम्मीदवार करते हैं या नहीं । इस पर भारत की नजर इसलिए है, क्योंकि राष्ट्रपति मेत्रीपाला सिरिसेना का कार्यकाल(2015-2019) में ऐसी सियासी राजनीतिक उथल-पुथल मची रही, जिसमें एक ही साथ सत्तारूढ़ समेत सभी पाटियों ने भारत को मोहरा बनाकर अपनी पारी खेली । बेमेल सत्तारूढ़ गठजोड़ और दोतरफा चाल चलनेवाली विपक्षी पार्टियों की अंदरूनी उठापटक में पांच साल लगातार भारत को घसीटा गया । राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा मंत्रिमंडल से निकलकर मैत्रीपाला सिरिसेना उनके प्रतिद्वंद्वी बन गए और जीत गए । भारत विरोधी नीतिवाले महिंदा राजपक्षा ने तीन साल बाद भारत आकर एक समारोह ममें कहा कि सिरिसेना को जिताने में भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ का हाथ था ।
नरेंद्र मोदी के प्रचंड बहुमत से दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद श्रीलंका के सभी राजनीतिक दल भारत-श्रीलंका संबंधोंं के पीछे हाथ धो के पड़ गए । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी देशों से संबंध बेहतर बनाने की नीति में सबसे ज्यादा श्रीलंका को महत्व दिया । क्योंकि श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यकों के साथ भारत के तमिल प्रांत तमिलनाडु की भावनाएं जुड़ी हैं । श्रीलंका में तमिलों के नागरिक अधिकारों की लड़ाई के नाम पर 2009 में महिंदा राजपक्षा सरकार द्वारा चलाए गए भीषण तमिल नरसंहार अभियान का जख्म अभी तक टिस रहा है । मैत्रीपाला सिरिसेना के कार्यकाल में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्विपक्षीय हितों और गृह युद्ध से तहस-नहस तमिल आबादी वाले क्षेत्र जाफना के पुननिर्माण की दिशा में कदम उठाते हे, उस समय राष्ट पति सिरिसेना भारत विरोधी राजनीति की साजिश में जुटे रहे ।
जनवरी, 2015 में राष्ट्रपति बनने के बाद मैत्रीपाला सिरिसेना सबसे पहले दिल्ली आए । उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कोलंबो गए । उस समय से लेकर अभी तक के घटनाक्रम बताते हैं कि या तो मैत्रीपाला सिरिसेना भारत से मजबूत रिश्ते बनाने के पक्ष में रहे होंगे अथवा उन्हें ऐसा दिखावा करना था । मैत्रीपाला सिरिसेना चाहे मर्जी से या दवाब में अपने ही रचे राजनीतिक हलकान में ऐसे खुराफाती तत्वों का हथकंडा बने रहे जो अंदरूनी राजनीतिक उथल-पुथल के बहाने भारत से रिश्ते बिगाड़ने का आए दिन कोई-न-कोई धमाका करते रहे । इसकी शुरूआत अक्टूबर, 2018 में राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के एक सनसनीखेज ‘खुलासे’ से हुई । राष्ट्रपति ने अचानक मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाकर यह ‘विस्फोट’ किया कि भारत की एलीट खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ उनकी कथित हत्या की ‘साजिश’ में जुटा है । सिरिसेना ने दुनिया भर के प्रिंट और इलेक्ट्रनिक मीडिया को बुलाकर स्वयं इसकी जानकारी दी । सनसनीखेज मामले के भरपूर उछल जाने के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उस रिपोर्ट को ‘गलत’ बताया और मीडिया को इसे उछालने के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया, जैसा प्रायः राजनीतिज्ञ करते हैं । फिर विवाद बढ़ने के बाद सिरिसेना ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके ‘सफाई’ दी । राष्ट्रपति कार्यालय ने भी बार-बार स्पष्टीकरण दिया । लेकिन साथ में सिरिसेना मंत्रिमंडल के एक सदस्य कृषि मंत्री महिंदा समरवीरा ने उस ‘खुलासे- में इजाफा भी किया कि मंत्रिमंडल के चार मंत्री ‘रॉ’ के जासूस हैं । उसके तुरंत बाद राष्ट्रपति सिरिसेना ने अपने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को भारत दौरे पर भेजा। अक्टूबर की इस घटना से कुछ दिन पहले महिंदा राजपक्षा ने भारत आकर कहा था कि उन्हें अपदस्थ करने के पीछे ‘रॉ’ का हाथ था ।
चुनाव में हार के बाद राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा ने सिरिसेना को मिलीजुली सरकार बनाने में सहयोग किया । उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी विपक्षी युनाइटेड नेशनल पार्टी के रानिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री बने । लेकिन मिलजुली सरकार की आड़ में आपस में भिड़न्त और सरकार नहीं चलने देने का नाटकीय तांडव चलता रहा । दिसंबर 2018 में दूसरे राजनीतिक धमाके में राष्ट्रपति सिरिसेना ने अचानक रानिल विक्रमसिंघे को बर्खास्त करके उनकी जगह महिंदा राजपक्षा को प्रधानमंत्री बना दिया । रानिल विक्रमसिंघे का रवैया कभी तमिल विरोधी नहीं रहा और वे भारत से अच्छे रिश्ते के समर्थक माने जाते हैं । महिंदा राजपक्षा को प्रधानमंत्री के रूप में स्पीकर कारू जयसुरिया ने मान्यता नहीं दी और विक्रमसिंघे ने दो-दो बार राजपक्षा के खिलाफ संसद से अविश्वास प्रस्ताव करा दिया । बौखलाए राष्ट्रपति ने समय पूर्व संसद भंग करके चुनाव का एलान कर दिया जबकि संसद का कार्यकाल समाप्त होने में 20 महीने बचे थे । विक्रमसिंघे सुप्रीम कोर्ट गए । श्रीलंका शीर्ष कोर्ट ने राष्ट्रपति के फैसले को गैर कानूनी करार दिया और चुनाव तैयारियों पर रोक लगा दी । महिंदा राजपक्षा को हटना पड़ा ।
उसके बाद अप्रील 2019 में श्रीलंका में ईस्टर संडे के रोज संत एंथनी चर्च पर हुए इस्लामी आत्मघाती हमले में 11 भारतीय समेत 258 लोगों के मारे जाने की घटना का तार भी राष्ट्रपति ने भारत से जोड़ दिया । वो इनती बड़ी घटना थी, जिसमें श्रीलंका की राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर विवाद खड़ा हो गया । सिरिसेना की अपनी पार्टी समेत विपक्षी दल और पुलिस, सेना के भी सुरक्षा पहलुओं को लिट्टे गृहयुद्ध तथा भारत में सक्रिय इस्लामी आतंकी गुटों से जोड़ दिया गया । उस घटना के दो महीने बाद 9 जून को नरेंद्र मोदी श्रीलंका दौर पर गए । उसके पहले चुनाव आयोग राष्ट्रपति चुनाव की घोषणा कर चुका था । नरेंद्र मोदी के लौटने के बाद सिरिसेना ने तमिल क्षेत्र वट्टीकलोआ में जाकर कहा कि ‘मुस्लिम प्रभाकरन’ नहीं पैदा होने देंगे । बट्टीकलोआ कभी लिट्टे का गढ़ था जिसके प्रमुख बी. प्रभाकरन के मारे जाने के बाद मई, 2009 में लिट्टे का पतन हो गया । श्रीलंका सरकार ने प्रचार किया किया कि ईस्टर संडे इस्लामी हमले का मास्टरमाइंड अहरान हाशिम भारत में रहा है ।
अभी वैसे समय में तमिल मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार चुनाव प्रचार में उछल रहे हैं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जाफना से चेन्नई विमान सेवा शुरू की । श्रीलंका में 41 वर्षों के तमिल गृह युद्ध के बाद का यह पहला महत्वपूर्ण कदम है । जाफना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा पलाली सैनिक हवाई पट्टी के रूप में तमिल संहार अभियान के लिए इस्तेमाल होता था । उसी जाफना में 17 अक्टूबर को चेन्नई से उड़ी फ्लाईट उतरी । उद्घाटन समारोह के अवसर पर श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों मौजूद थे ।
लेकिन श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव में इस सद्भाव माहौल का कोई असर नहीं दीख रहा है । संविधान के अनुसार महिंदा राजपक्षा तीसरी बार राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकते । इसलिए भाई गोताबाया राजपक्षा को उम्मीदवार बनाया, जो लिट्टे युद्ध के समय रक्षा मंत्री थे । तमिल संहार युद्ध के दूसरे हीरो सेना प्रमुख साराथ कोन्सेका के करीबी सैनिक कमांडर महेश सेनानायके भी उम्मीदवार हैं । साराथ कोन्सेका ने 2010 में अपने राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा के खिलाफ लिट्टे युद्ध के मुद्दे पर चुनाव लड़ा और हार गए। फील्ड मार्शल साराथ फोन्सेका को राजपक्षा ने जेल में डाल दिया । सेनानायके देश छोड़कर भाग गए । उन्हें 2015 में वापस बुलाकर राष्ट्रपति सिरिसेना ने सेना प्रमुख बनाया । अप्रील, 2019 के इस्लामी आत्मघाती हमले के बाद सिरिसेना ने फोन्सेका पुलिस विभाग देखने का काम सौंपा । घुर सिरिसेना विरोधी युनाइटेड नेशनल पार्टी के उम्मीदवार और पूर्व रक्षा मंत्री साजिथ प्रेमदास को भी साराथ फोन्सेका पर ही भरोसा है । प्रेमदास अभी आवास मंत्री हैं ।