दिवंगत भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बनने से पहले जब लोकसभा में विपक्षी नेता थे तो कभी-कभार जनसभाओं में कहा करते थे कि पीएम से एम पी बन जाने में ज्यादा देर नहीं लगती । खुद उन्हीं के साथ ऐसा हुआ । अटल बिहारी वाजपेयी जब पहली बार प्रधानमंत्री(पीएम) बने तो मात्र 13 दिनों में उनकी सरकार गिर गयी और वे वापस एमपी हो गय ।
ठीक वही बात अभी श्रीलंका में लागू हुई और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षा को 51 दिनों में पद से हटना पड़ा । पड़ोसी श्रीलंका में गत तीन महीने के दौरान जो राजनीतिक घमासान देखने को मिला उसकी शुरूआत में ही श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने इसमें भारत का हाथ बताया था । श्रीलंका के राजनीतिक इतिहास में ऐसी विचित्र और अप्रत्याशित उठापटक पहली बार देखने को मिली । घटनाक्रम इतने नाटकीय तरीके से और इतनी तेजी से बदलता गया कि राजनीतिक विश्लेषकों के लिए त्वरित टिप्पणी करना कठिन हो गया ।
निर्वाचित प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को अचानक बर्खास्त करके राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने एमपी महिंदा राजपक्षा को पीएम बना दिया । संसद में बहुमत राजपक्षा को था नहीं, यह बात राष्ट्रपति अच्छी तरह जानते थे । इसलिए संसद को निलंबित अवस्था में डाल दिया ताकि विश्वास मत हासिल करने की नौबत न आए और राजपक्षा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश ही न हो पाए । स्पीकर कारू जयसूरिया ने महिंदा राजपक्षा को पीएम के रूप में मान्यता देने से इन्कार कर दिया । स्पीकर के दवाब में राष्ट्रपति को संसद सत्र आहूत करनी पड़ी । उधर रानिल विक्रमसिंघे खुद को बर्खास्त मानने को तैयार नहीं हुए ।
मार-पीट, जूतम पैजार और जर्बदश्त पुलिस तैनातो के बीच बर्खास्त पीएम रानिल विक्रमसिंघे ने दो-दो बार बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव पारित कराकर राष्ट्रपति के लिए भारी मुश्किल खड़ी कर दी । बौखलाए राष्ट्रपति ने संसद भंग करके चुनाव की घोषणा कर दी, जबकि संसद का कार्यकाल समाप्त होने में 20 महीने बचे थे । विक्रमसिंघे मामला सुप्रीम कोर्ट में ले गए । श्रीलंका की शीर्ष कोर्ट ने समय पूर्व संसद भंग करने के राष्ट्रपति के फैसले को ‘गैरकानूनी’ करार दिया और चुनाव तैयारियों पर भी रोक लगा दी । राष्ट्रपति ने पांच जनवरी, 2019 को संसदीय चुनाव का एलान किया था । पीएम महिंदा राजपक्षा को इस्तीफा देना पड़ा और 51 दिनों के अंदर वापस एमपी बन गए ।
26 अक्टूबर से 16 दिसंबर के बोच मची इस अभूतपूर्व उठापटक के पीछे किसका हाथ था? भारत-श्रीलंका रिश्ते के बीच यह एक अहम सवाल है, जिसका जवाब दोनों देशों में खोजा जा रहा है और दबाने से दब नहीं रहा है । इसमें भारत और चीन दोनों का हाथ होने की बात सामने आ रही है । महिंदा राजपक्षा श्रीलंका दो-दो बार राष्ट्रपति रह चुके हैं और सबसे ताकतवर नेता हैं । इनकी चीन से ज्यादा करीबी है, इसलिए श्रीलंका में भारत के बजाए चीन का दबदबा ज्यादा है । मैत्रीपाला सिरिसेना महिंदा राजपक्षा के शासनकाल में मंत्री रहे हैं । महिंदा राजपक्षा के समर्थन से 2015 में मिलीजुली राष्ट्रीय एकता सरकार गठित की गयी । मैत्रीपाला सिरिसेना राष्ट्रपति और राजपक्षा शासनकाल में विपक्षी नेता रहे रानिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री बने । रानिल विक्रमसिंघे हमेशा से चीन के बजाए भारत से ज्यादा नजदीकी के पक्षधर रहे हैं । लेकिन राष्ट्रपति के अपने पूर्व आका महिंदा राजपक्षा से सटे रहने के कारण यह घमासान सामने आया । इसमें चीन पर्दे के पीछे से अपनी चाल खेल रहा है और भारत का नाम जमकर उछाला गया है ।
अक्टूबर के मध्य में इस सुनियोजित उलटफेर की शुरूआत राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के विस्फोटक ‘खुलासे’ से हुई । राष्ट्रपति ने अचानक मंत्रिमंडल की आपात् बैठक बुलाकर यह विस्फोटक खुलासा किया कि भारत की एलीट खुफिया एजेंसी रॉ(तॅ. रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग) उनकी हत्या की कथित ‘साजिश’ में जुटा है ।
सिरिसेना समझ ही रहे थे कि यह विस्फोट मोडिया में उछलेगा । दुनिया भर को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भरपूर उछलने के बाद श्रीलंका के राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 17 अक्टूबर को फोन करके ‘सफाई’ दी और इन मीडिया रिपोर्टों को गलत बताया । राष्ट्रपति ने स्वयं और उनके कार्यालय ने भी बार-बार स्पष्टीकरण दिया । राजपक्षा और सिरिसेना के दल श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के उपाध्यक्ष कृषि मंत्री महिंदा समरवीरा ने राष्ट्रपति के खुलासे में इजाफा किया । उन्होंने मंत्रिमंडल की बैठक में कहा कि चार मंत्री ‘रॉ’ के जासूस हैं । बताया गया है कि नरेंद्र मोदी ने सिरिसेना से कहा कि अगर ऐसी बात है तो उन्हें सीधे ‘मुझसे संपर्क करना चाहिए’ ।
उसी समय प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे दिल्ली पहुंचे और भारत में तीन दिन रहे । इस दौरान वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज समेत संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ चेयरपर्सन सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से भी मिले । इन नेताओं से बातचीत के क्रम में श्रीलंका के राष्ट्रपति का ‘बम’ चर्चा में नहीं आया । लेकिन विक्रमसिंघे ज्योंही स्वदेश लौटे कि राष्ट्रपति ने उन्हें बर्खास्त करके महिंदा राजपक्षा को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया । उसके बाद श्रीलंका की अंदरूनी राजनीति में धमाकों का सिलसिला चला और भारत की खुफिया एजेंसी पर राष्ट्रपति की हत्या की साजिश की बात थोड़ी दब गयी । 13 दिसंबर को श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट ने संसद भंग करने के राष्ट्रपति के फैसले को निरस्त किया और 16 दिसंबर को रानिल विक्रमसिंघे फिर से प्रधानमंत्री बने । राष्ट्रपति अड़े थे कि विक्रमसिंघे को दुबारा प्रधानमंत्री नहीं बनाएंगे । 18 दिंसबर को राजपक्षा के विपक्षी नेता बनते ही तीन महीने पहले का गुबार एक नए षडयंत्रकारी तरीके से उभरा ।
उस समय भारत के प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में सभी राज्यों और केंद्र शासित राज्यों के डीजीपी (पुलिस महानिदेशक) के अलावे तमाम एलीट खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों की बैठक की तैयारी हो रही थी । डीजीपी की बैठक तो हर साल होती है। लेकिन इस बार ‘रॉ’ और इंटेलिजेंस ब्यूरो(आईबी) के प्रमुख भी जुटे थे । 20-22 दिसंबर को बैठक चल रही थी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह संबोधित कर रहे थे ।
उसी दौरान श्रीलंका में ‘रॉ’ का मामला दूसरा मोड़ देकर उछाला गया। रॉ का यह स्वर्णजयंती वर्ष है ।
कोलंबो के प्रमुख अखबार ‘संडे लीडर’ ने खबर की शुरूआत ‘रॉ’(रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग) के स्वर्णजयंती से की । उसमें के. इलान्गो को नया ‘रॉ’ प्रमुख बनाने की चर्चा थी । साथ में यह भी जोड़ा गया कि 2015 राष्ट्रपति चुनाव के समय के. इलान्गो कोलंबो में तैनात थे, जिन पर महिंदा राजपक्षा ने आरोप लगाया कि उन्हें हरवाने और मैत्रीपाला सिरिसेना को जिताने का इंतजाम उसी ‘रॉ’ अधिकारी ने लगाया था । ‘संडे लीडर’ अखबार को चीन समर्थक और सरकार पिटू माना जाता है । इस अखबार ने अपनी रिपोर्ट में एम. थॉमस नामक एक भारतीय का फिर से जिक्र किया, जिसका हवाला देकर राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने ‘रॉ’ पर हत्या की साजिश का आरोप लगाया था । राष्ट्रपति ने मंत्रिमंडल की आपात् बैइक में कहा कि उसभारतीय एम. थॉमस ने ‘रॉ’ की साजिश की जानकारी होने का दावा किया । जबकि राष्ट्रपति के खुलासे के बाद भारतीय पुलिस और खुफिया अधिकारियों को तहकीकात के बाद पता चला कि जिसभारतीय का नाम श्रीलंका सरकार ने ‘थॉमस’ बताया वो पहले से ही दूरिस्ट वीसा की अविध समाप्त हो जाने के बावजूद टिके रहने के कारण श्रीलंका की जेल में बंद है ।
18 दिसंबर को रानिल विक्रमसिंघे के फिर से प्रधानमंत्री बन जाने के बाद से राजनीतिक सरगर्मी की खबर नहीं आ रही है । लेकिन स्थिति सामान्य नहीं हुई है ।
भारत और चीन में पड़ोसी देशों को अपने पाले में रखने की होड़ रहती है, जिसमें श्रीलंका पहले नंबर पर है । श्रीलंका से समुद्री सीमा मिले रहने के कारण भारत का व्यापारिक के अलावे चीन से गहरे प्रवेश से सुरक्षा हित भी जुड़े हैं ।
अक्टूबर में श्रीलंकाई मंत्रिमंडल की जिस बैठक में राष्ट्रपति ने कथित ‘रॉ’ साजिश का खुलासा किया, उसी बैठक में प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि कोलंबो बंदरगाह के इस्ट कन्टेनर टर्मिनल में भारत को निर्माण कार्य शुरू करने दें । उसमें भारत का 20 प्रतिशत दावा है, जबकि चीन का समूचे टर्मिनल पर कब्जा है । राष्ट्रपति ने जवाब दिया कि वे किसी ‘बाहरी पार्टी’ को इजाजत नहीं देंगे । जब सिरिसेना ने नरेंद्र मोदी को फोन करके सफाई दी तो प्रधानमंत्री ने दोनों देशों के बीच कई परियोजनाओं के ठप्प रहने पर भी चिंता जतायी, जिस पर 2017 में ही काम शुरू होना तय था ।
दीगर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में भाग लेने मई, 2014 में राष्ट्रपति महिंदा रापजक्षा आए । सिरिसेना जनवरी, 2015 में राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे पहले भारत आए ।