श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा तमिल विद्रोही गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) सफाया अभियान के सिरमौर और चीन के करीबी माने जाते हैं । उन्होंने ऐसे समय में तमिल घावों पर नमक छिड़कनेवाला बयान दे दिया, जब सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के अभियुक्त ए. जी. पेरारीवालन की क्षमा याचिका पर विचार करने कहा है । मई, 1991 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलनाडु में मानव बम विस्फोट में हत्या हुई, जिसकी साजिश कथित रूप से लिट्टे ने रची । तमिलनाडु की राजनीति और जनमानस के रगों में लिट्टे समाया है । लिट्टे सुप्रीमो वेलुपिल्लई प्रभाकरन तमिलनाडु के हीरो माने जाते थे । महिंदा राजपक्षा ने 2009 में अपने शासनकाल में श्रीलंकाई फौज और चीन समेत विदेशी हथियारों की मदद से लिट्टे सफाया अभियान चलाया । मानवाधिकार की धज्जियां उड़ाकर पूरी अल्पसंख्यक तमिल आबादी को तहस-नहस कर दिया । प्रभाकरन को धोखा देकर मारा गया और उसे मुठभेड़ दिखाया दिया गया ।
पूर्व श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने गत हफ्ते भारत आकर कहा - ‘हमने कोई जातीय युद्ध नहीं छेड़ा । सैनिक कार्रवाई का निशाना तमिल समुदाय नहीं था । यह नहीं भूलना चाहिए कि आतंकी गुट लिट्टे की पहुंच सिर्फ श्रीलंका तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत में भी उसकी गहरी पैठ थी । भारत में ही लिट्टे ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और कई अन्य की हत्या की ।’
तमिलनाडु के लोगों का यह जख्म न तो भरा है, न कभी भरनेवाला है । तमिलनाडु सरकार राजीव गांधी के हत्यारों को माफी देकर जेल से रिहा करने के पक्ष में है । मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने मत्रिमंडल से अभियुक्तों को रिहा करने का प्रस्ताव पारित किया है । कानून मंत्री सी. शान्मुगम ने कहा कि स्व. अम्मा जयललिता चाहती थीं कि राजीव गांधी हत्या के सातों अभियुक्तों को कैद से रिहा किया जाए । उन्हीं में से एक ए. जी. पेरारीवालन ने सुप्रीम कोर्ट में माफी की अर्जी लगायी । जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस के. एम. जोसेफ की पीठ ने अर्जी पर सुनवाई के बाद तमिलनाडु के राज्यपाल से कहा कि माफी अर्जी पर विचार किया जाए । केंद्र सरकार माफीनामा के खिलाफ है । सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश अर्जी में तमिलनाडु सरकार के प्रस्ताव का विरोध जताते हुए कहा गया कि राजीव गांधी हत्या के सात अभियुक्तों को उम्र कैद से माफी देने से ‘खतरनाक परंपरा’ की शुरूआत होगी और इसक ‘अंतरराष्ट्रीय प्रभाव’ भी सामने आएंगे ।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अर्जी को निबटा दिया और तमिलनाडु के राज्यपाल से ए. जी. पेरारीवालन की क्षमादान याचिका पर विचार करने कहा ।
ए. जी. पेरारीवालन पर आरोप है कि उसने 9-वोल्ट बैट्री सप्लाई की थी, जिसका इस्तेमाल राजीव गांधी और 14 अन्य की हत्या के लिए बेल्ट बम में किया गया । 47-वर्षीय पेरारीवालन उर्फ अरिव ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि उसने दो साल पहले तमिलनाडु के राज्यपाल के पास माफी की अर्जी भेजी थी, लेकिन अभी तक उस पर विचार नहीं किया गया ।
लिट्टे अपने समय में श्रीलंका का ही नहीं, दुनिया का सबसे मजबूत और खूंखार आतंकवादी गुट के रूप में विख्यात था । यह लड़ाई भारतीय मूल के तमिलों के नागरिक अधिकारों के लिए छेड़ी गयी थी, इसलिए तमिलनाडु के लोगों को इस पर बहुत शान-गुमान था । 1987 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जे. आर. जयवर्द्धन के बीच समझौते के तहत भारत सरकार ने लिट्टे सफाया में मदद के लिए अपनी सेना श्रीलंका सरकार की मदद के लिए भेजी । दोनों ही नेता लिट्टे हिंसा के शिकार हुए ।
लिट्टे तमिलनाडु की भावनाओं से जुड़ा है । 2009 में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा ने लिट्टे सफाया अभियान में तमिल आबादी का जो सफाया किया, उससे तमिलनाडु के लोगों को गहरी चोट पहुंची । आज तक संयुक्त राष्ट्र समेत दुनिया के किसी मानवाधिकार संगगठन ने श्रीलंका सरकार को माफ नहीं किया है । 2015 में महिंदा राजपक्षा को हराकर उन्हीं की श्रीलंका फ्रीडम पार्टी(एएलएफपी) के मैत्रीपाला सिरिसेना राष्ट्रपति बने । तीन साल से वे संयुक्त राष्ट्र को अपने स्पष्टीकरण से ‘संतुष्ट’ नहीं कर पा रहे हैं । वैसे सिरिसेना की भी फौजी नीति में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ । भारत में अपनी छवि सुधारने के लिए तमिल रवैए में मैत्रीपाला सिरिसेना ने बदलाव लाया ।
लेकिन संयुक्त राष्ट्र अपनी नीतियों पर कायम है कि श्रीलंका सरकार युद्ध अपराध का दोषी है । अमेरिका समेत सभी सदस्य देशों ने श्रीलंका सरकार को युद्ध अपराध का दोषी माना है, जिसने आतंरिक समस्या के खात्मे के लिए समूचे सिविलियन समुदाय को ही खत्म कर दिया और वैसे अमानवीय तरीके अपनाए जिससे अंतरराष्ट्रीय युद्धों में भी परहेज किया जाता है । युद्ध के स्थापित मानदंडों की खुली अवहेलना के कारण श्रीलंका को माफ नहीं किया गया है ।
राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना को इसी हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र में अपनी फौज के बचाव में सफाई देनी है । अपने नेतृत्व में श्रीलंकाई राष्ट्रपति एक प्रतिनिधिमंडल लेकर जा रहे हैं और आम बहस में इसी विंदु पर उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करना है । मैत्रीपाला सिरिसेना का भाषण संयुक्त राष्ट्र से ‘रियायत’ मांगने पर केंद्रित होगा कि श्रीलंकाई सेना के खिलाफ युद्ध अपराध आरोप हटा लिए जाए । श्रीलंका सरकार सूत्रों को ही सही मानें तो 2009 में युद्ध के दौरान उत्तर और पूर्व में तमिल आबादी इलाके में सेना के निर्मम नरसंहार अभियान में एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए । गृह युद्ध और अन्य झड़पों में लापता 20,000 लोगों का अभी तक कोई अता-पता नहीं है । तमिलनाडु से लकर श्रीलंकाई तमिल आबादी तक लोगां का कहना है कि ज्यादातर तमिलों के लापता होने के पीछे श्रीलंका सरकार तथा फौज का हाथ था । उधर मैत्रीपाला सिरिसेना ने कोलंबो में कहा कि वे संयुक्त राष्ट्र महासभा से आग्रह करेंगे कि उनकी सेना को युद्ध अपराध आरोपों से मुक्त करने का मामला मैत्रीपूर्ण तरीके से सुलझाने की इजाजत दी जाए ।
ठीक उसी समय उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा ने लिट्टे के खिलाफ अपनी फौज की कार्रवाई सही ठहरायो और भारत आकर लिट्टे के प्रति आहत तमिल भावनाओं को कुरेद दिया । महिंदा राजपक्षा को ऐसा भाषण के लिए भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने ‘विराट हिन्दुस्तान संगम’ की ओर से न्योता भेजा था । महिंदा राजपक्षा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मिले और इस बात पर जोर दिया कि लिट्टे के खिलाफ युद्ध के लिए वे लगातार भारत तथा अन्य पड़ोसी देशां से मशविरा करते रहे । राजपक्षा ने 2008-09 के ‘त्रयिका’(तीन-तीन) विमर्श का भी जिक्र किया । उसके लिए भारत की ओर से तीन - राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम. के. नारायणन, विदेश सचिव शिवशंकर मेनन और रक्षा सचिव विजय सिंह थे । श्रीलंका की ओर से तीन - सुरक्षा सलाहकार बासिल राजपक्षा, रक्षा सचिव गोताबाया राजपक्षा और स्थायी सचिव वीरातुंगा ।
तमिलनाडु की जनता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को माफ नहीं कर पायी है । क्योंकि उन्होंने लिट्टे सफाया अभियान में श्रीलंका सरकार को सहयोग किया, जबकि महिंदा राजपक्षा पहले ही चीन से अपने यहां बंदरगाह बनाने की सहूलियत देने के एवज में हथियार ले चुके थे ।
सुब्रमण्यम स्वामी को भी याद कर लेना चाहिए कि वर्ष 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंग का लिट्टे के खिलाफ हथियार और फौजी सहायता मांगने का आग्रह ठुकरा दिया था । उनके विदेशमंत्री लक्ष्मण कादिरगमर अपोलो अस्पताल में इलाज के बहाने जमे रहे, लेकिन वाजपेयी टस से मस नहीं हुए । उन्हें तमिल भावनाआं की फिक्र थी ।
अभी वसे वक्त में महिंदा राजपक्षा को भारत बुलाकर सुब्रमण्यम स्वामी ने घावों पर नमक छिड़कने वाला बयान दिलवाया है, जब तमिल राजनीति के शलाका पुरूष लिट्टे समर्थक एम. करूणानीति गुजर गए । उसके पहले जयललिता गुजर गयी । जयललिता पहले लिट्टे विरोधी थीं, लेकिन जनभावनाओं का ख्याल अपने प्रतिद्वंद्वी करूणानिधि को पछाड़ने के लिए उन्होंने भी अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की तरह लिट्टे कार्ड खेला । तभी तो जयललिता की पार्टी की सरकार ने राजीव गांधी हत्याकांड के अभियुक्तों की माफी के प्रस्ताव को ‘अम्मा की इच्छा’ बताया । अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के सदमे से अभी देश उबर नहीं पाया है ।
चीन वैसे देशों में है, जिसने लिट्टे को भी हथियार दिए और लिट्टे सफाया अभियान में श्रीलंका सरकार को भी मदद पहुंचायी । महिंदा राजपक्षा के भारत आने के मात्र दो महीने पहले उनके बारे में ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने रिपोर्ट छापी कि 2015 राष्ट्रपति चुनाव में प्रचार अभियान के लिए चीन की हार्बर इंजीनियरी कंपनी ने 7.6 मिलियन डॉलर रिश्वत दी । उसो कंपनी ने श्रीलंका में विवादित हम्बानटोटा बंदरगाह बनाया, जो विवाद के घेरे में है । चीनी कर्ज के बोझ से श्रीलंका सरकार इतनी दबी है कि हम्बानटोटा बंदरगाह पर 99 साल के लिए चीन का कब्जा हो चुका है । भारत के लिए भी वो चिंता का विषय है ।
मैत्रीपाला सिरिसेना जनवरी, 2015 में महिंदा राजपक्षा को हराकर राष्ट्रपति बनने के बाद सबसे पहले भारत आए और चीन से किनारा करने तथा तमिलों के प्रति रवैया बदलने का भरोसा दिलाया । लेकिन वैसा हुआ नहीं । उसके बाद महिंदा राजपक्षा सिरिसेना की सरकार गिराने पर तुल गए । मेत्रीपाला सिरिसेना ने सबको साथ लेकर मिली-जुली सरकार चलाने का श्रीलंका के इतिहास में पहला प्रयोग किया । राजपक्षा के प्रबल प्रतिद्वंद्वी युनाईटेड नेशनल पार्टी के रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनाया ।
महिंदा राजपक्षा नहीं चाहते कि मैत्रीपाला अपना बाकी बचा दो साल का कार्यकाल पूरा कर पाएं । अप्रील, 2018 में राजपक्षा के इशारे पर प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में राष्ट्रपति के गुट के सांसद समेत छह मंत्रियों ने भी वोट डाले । सरकार में तमिल नेशनल एलायंस के भी सांसद शामिल हैं । मंत्रियों ने मंत्रिमंडल की बैठक का भी बहिष्कार किया ।
इसकी जड़ में है, तमिल नीति और लिट्टे । श्रीलंकाई सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल महेश सेनानायके को यह बात अखरती है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन श्रीलंका सेना को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं कि युद्ध के अंतिम चरण मई, 2009 में 40,000 तमिल सिविलियनों की हत्या की गयी। उन्होंने अपने बचाव के लिए एक स्पेशल यूनिट बनायी है । लेकिन तमिल इलाकों में सेना की मौजूदगी पहले की तरह बरकरार है ।
फिलहाल तमिलनाडु की वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी जयललिता की अन्ना द्रमुक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तालमेल चाहते हैं । करूणानिधि गुट की पार्टी का कांग्रेस से तालमेल रहा है । लिट्टे पर भारत में अभी भी प्रतिबंध है और लिट्टे के बगैर तमिल राजनीति नहीं चलती । राजीव गांधी हत्याकांड की जांच के लिए गठित जस्टिस पी. डी. जैन आयोग ने करूणानिधि को संदेह के घेरे में रखा था । उसके बावजूद मनमोहन सिंह ने करूणानिधि की पार्टी से गठजोड़ किया और अपनी सरकार में भी शामिल किया । भाजपा हा या कांग्रेस, उसे तमिलनाडु में क्षेत्रीय पार्टियों से तालमेल करना ही होगा, इसके लिए भावनात्मक लिट्टे कार्ड सबसे महत्वपूर्ण है । नरेंद्र मोदी ने लिट्टे से इतर तमिल हवा बनाने का प्रयास किया जिसमें सुब्रमण्यम स्वामी ने महिंदा राजपक्षा को बुलाकर विघ्न डाला है ।
तमिल नरसंहार ने समूचे दक्षिण एसिया के जहन को झकझोर दिया, जिसका दंश कभी कम होनेवाला नहीं है । नवंबर, 2017 में ढाका साहित्य महोत्सव में श्रीलंकाई लेखक अनुक अरूदप्रागासाम्स की पुस्तक ‘एक संक्षिप्त विवाह की कहानी’ को 2017 का दक्षिण एसिया साहित्य पुरस्कार मिला । तमिल टाइगर और श्रीलंका सेना के फांस में तड़पते एक युवक की दर्दनाक तस्वीर लेखक ने प्रस्तुत की है । आहत लेखक ने पुरस्कार में प्राप्त 25,000 डॉलर की एक तिहाई राशि उत्तरी श्रीलंका के पीड़ित तमिलों, कश्मीरियों और रोहिंग्या मुसलमानों के लिए काम करनेवाले संगठनों के नाम कर दी ।