भारत ने श्रीलंका को कोरोना राहत सामग्रियों की दूसरी खेप समुद्र के रास्ते जिस दिन भेजा, उस दिन श्रीलंका के युद्ध विस्थापित तमिल ‘मातम दिवस’ मना रहे थे और श्रीलंका सरकार ‘विजय दिवस’ मना रही थी । 18 मई, 2009 को श्रीलंका सरकार ने तमिल आतंकवादी गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) सुप्रीमो वी. प्रभाकरन को मारकर इस संगठन का सफाया करने में सफलता हासिल की थी । अल्पसंख्यक तमिलों के अधिकारों की मांग को लेकर लिट्टे की 30 वर्षों से लड़ाई चल रही थी । श्रीलंका सरकार लिट्टे सफाया दिवस हर साल 18 मई को ‘विजय दिवस’(रणवीरू दिवस) के रूप में मनाती है । युद्ध में तहस-नहस तमिल आबादी वाले उत्तरी श्रीलंका के विस्थापित तमिल लोगों के पुनर्वास और उनसे मेलजोल बढ़ाने की बातचीत भी भारत-श्रीलंका के बीच चलती रहती है । लिट्टे युद्ध को श्रीलंका में ईलम युद्ध कहा जाता है । इस बार ईलम युद्ध के 11वें वर्ष में माहौल पहले जैसा नहीं था । विश्व कोरोना संक्रमण की त्रासदी भारत की तरह श्रीलंका भी झेल रहा है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेशनीति के ‘पड़ोसी पहले’ सिद्धांत के तहत श्रीलंका को राहत सामग्रियां भेजी गयी । राहत लेकर तो भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी स्वयं विमान चलाते हुए बांग्लादेश गए । मगर श्रीलंका में जिस समय राहत जहाज पहुंचा उस समय माहौल जरा दूसरा था ।
भारत सरकार श्रीलंका में अस्त-व्यस्त उजड़ी जिंदगी जी रहे तमिलों की पीड़ा से अवगत है । युद्ध से बर्बाद इलाकों के पुननिर्माण में सहायता पहुंचायी गयी है। कोरोना राहत श्रीलंका भेजने के हफ्ते भर बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षा से फोन पर बात करके कोरोना युद्ध का जायजा लिया । एक ओर श्रीलंका सरकार ईलम युद्ध जीत का जश्न मना रही थी, दूसरी ओर तमिल लोग युद्ध में सेना के अमानवीय नरसंहार में मारे गए अपने परिवारजनों की याद में कैंडिल जलाकर आंसू बहा रहे थे । कई चरणों में चले ईलम युद्ध में श्रीलंका की सेना ने उत्तरी जाफना की सिविलियन आबादी को निशाना बनाया, जो ‘युद्ध वर्जित’ क्षेत्र घोषित था । उस युद्ध में हजारों बेकसूर तमिल नागरिक महिलाएं, बच्चे मारे गए । संयुक्त राष्ट्र में मृतकों की संख्या 40,000 से ज्यादा आंकी है और मानवाधिकार परिषद ने श्रीलंका सरकार को ‘युद्ध अपराधी’ माना है । भारत में भी ईलम युद्ध की समाप्ति के आसपास पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को श्रद्धांजलि दी जाती है । श्रीलंका सरकार के अनुसार अपनायी गयी तमिल नीति के कारण प्रधानमंत्री राजीव गांधी 1991 में 21 मई को तमिलनाडु में संदिग्ध लिट्टे समर्थकों के मानव बम हमले में मारे गए थे । इस बार तमिलनाडु में भी कांग्रेसजनों का राजीव गांधी की स्मृति में बलिदान दिवस फीका रहा । श्रीलंका में तमिलों के साथ कुछ भी होता है, उसका असर भारत में सिर्फ तमिलनाडु की राजनीति पर पड़ता है । लेकिन श्रीलंका में तमिल मुद्दा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करता है । श्रीलंका सरकार लिट्टे सफाया रणवीरू दिवस भले मना ले, मगर श्रीलंका की घरेलू और विदेश नीति पर अभी तक लिट्टे के नाम पर नरसंहार हावी है । तमिलनाडु की राजनीति में भी प्रतिबंधित लिट्टे के साथ-साथ युद्ध से विस्थापित हुए तमिलों के भागकर आए शरणथियों की पीड़ा छायी है । 11 वें वर्ष में भी वे शरणार्थी ही बने हुए हैं ।
कोलंबो से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंकाई तमिलों ने 11वें वर्ष में पिछले वर्ष के मुकाबले ज्यादा पीड़ा महसूस किया । क्योंकि अभी श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों भाई वही हैं जो ईलम युद्ध का संचालन कर रहे थे । 2009 में महिंदा राजपक्षा राष्ट्रपति थे, जो अभी प्रधानमंत्री हैं । उनके छोटे भाई गोटाबाया राजपक्षा अभी राष्ट्रपति हैं, जो 2009 में रक्षा सचिव थे । ये दोनों सिंहली बहुसंख्यक बौद्ध मतावलंबी समुदाय के हैं और तमिलों के प्रति उपेक्षा तथा नफरत की राजनीति करते आए हैं । महिंदा राजपक्षा 2015 तक सिंहलियों में युद्ध उन्माद उभाड़ कर राष्ट्रपति रहे । नवंबर, 2019 में राष्ट्रपति बनने के बाद गोटाबाया राजपक्षा ने अपने राष्ट्रीय संबोधन में साफ-साफ कहा कि वे सिंहली वोट से जीते हैं और श्रीलंका के अल्पसंख्यक समुदायों को यह मानकर चलना होगा कि श्रीलंका में सिंहली बहुसंख्यक नीति एकछत्र सरकार के लिए जरूरी है। यहां के लिए संघीय व्यवस्था सही नहीं है, लेकिन अल्पसंख्यकों के हितों का ख्याल रखा जाएगा । उसी समय राष्ट्रपति भारत के दौरे पर भी आए ।
ईलम युद्ध के वोर सैनिकों की याद दिवस से मात्र एक हफ्ते पहले श्रीलंका तमिल नेशनल एलायंस नेताओं ने प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षा से मुलाकात करके राजनीतिक युद्धबंदियों की रिहाई की मांग की । लिट्टे समर्थक होने के कारण कैद में पड़े इन तमिलों में से कई ऐसे हैं, जिन्हें ईलम युद्ध के पहले से बिना मुकदमा चलाए जेल में रखा गया है । टीएनए(तमिल नेशनल एलायंस) के प्रवक्ता और जाफना से पूर्व सांसद रहे एम. ए. सुमंतिरान ने प्रधानमंत्री को 96 तमिल कैदियों की सूची सौंपी । तमिल नेता ने राष्ट्रपति के क्षमादान के अधिकार का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री से क्षमादान का आग्रह किया । ये सारे तमिल विवादस्पद आतंकवाद रोक कानून के अंतर्गत जेल में डाले गए हैं । राजनीतिक दल और सिविल सोसायटी संगठन काफी समय से इन बंदियों की रिहाई की मांग कर रहे हैं । इन संगठनों ने इस कानून को रद्द करने का भी आग्रह किया है । इस आतंकवाद रोक कानून(पीटीए) के अंतर्गत किसी को भी ‘गैर कानूनी गतिविधियों’ में लिप्त होने के कारण बिना वारंट के गिरफ्तार करके 18 महीने तक बिना मुकदमा चलाए जल में रखने का प्रावधान है । इसमें यह स्पष्ट नहीं है कि अभियुक्त का कौन काम ‘गैरकानूनी’ के दायरे में आएगा । तमिल नेताओं के अनुसर इन युद्धबंदियों में से कुछ के 10 साल जेल में गुजर गए, अभी तक आरोपपत्र भी दायर नहीं हुआ । कुछ अभियुक्त 20 साल से ज्यादा समय से जेल में हैं । तमिल नेताओं ने फरवरी, 2020 में ही प्रधानमंत्री से क्षमादान का आग्रह किया था, जब महिंदा राजपक्षा भारत की यात्रा पर आनेवाले थे । महिंदा राजपक्षा के स्वदेश लौटने के एक महीने बाद मार्च में राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षा ने अपने एक ‘वीर सैनिक’ की मौत की सजा माफ कर दी । इस सैनिक को पांच साल के बच्चे, महिला समेत आठ तमिल सिविलियन की नृशंस हत्या के कारण मौत की सजा हो चुकी थी । मई में एक ही साथ ईलम युद्ध ‘रणवीरू दिवस’ और उसमें मारे गए अपने बेकसूर परिजनों के शोक में मातम दिवस के समय तमिल नेताओं ने अपना निवेदन दुहराया ।
महिंदा राजपक्षा के भारत आने से पहले तमिल राष्ट्रगान का सिलसिला समाप्त कर दिया गया, जो मैत्रीपाला सिरिसेना शासनकाल में शुरू हुआ था । सिरिसेना को हराकर गोटाबाया राजपक्षा राष्ट्रपति बने है ।
प्रधानमंत्री ने अपने छोटे भाई राष्ट्रपति से इस संबंध में बात करने का आश्वासन भर दे दिया । श्रीलंका सरकार का मूड अन्य कारणों से खराब था । क्योंकि अमेरिका ने श्रीलंका के सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शवेन्द्र सिल्वा को अपने यहां आने पर प्रतिबंध लगा दिया था । ईलम युद्ध के अंतिम दिनों में मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन करके तमिल नरसंहार और लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन की धोखे से हत्या करने में शवेन्द्र सिल्वा का हाथ था । अमेरिका के अनुसार उसके पास इसकी पक्की सूचना है, इसलिए शवेन्द्र सिल्वा और उनके परिवार की अमेरिका यात्रा पर प्रतिबंध लगा दिया गया ।
जिस आतंकवाद रोक कानून का दंश तमिल भुगत रहे हैं, वो 1979 का बना हुआ है, जब जे. आर. जयवर्द्धन श्रीलंका के राष्ट्रपति थे । 1987 में जयवर्द्धन ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी से लिट्टे के खिलाफ सैनिक सहायता लेने का समझौता किया । उसके बाद भारतीय सैनिकों पर तमिलों का साथ देने का आरोप लगाया । लिट्टे समर्थकों ने राजीव गांधी और जयवर्द्धन दोनों की जान ली ।
18 मई को राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षा ने ईलम युद्ध संहार को उचित ठहराते हुए संयुक्त राष्ट्र समेत दुनिया के सभी देशों को चेतावनी दी कि ‘रणवीरों’ को निशाना बनाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और श्रीलंका संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार परिषद से अलग हो जाएगा, जिसने उसे युद्ध अपराधी ठहराया है । साथ-साथ राष्ट्रपति ने यह भी दुहरा दिया कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यक सिंहलियों का प्रभुत्व और वर्चस्व तो स्वीकारना होगा । उसी समय मुस्लिम अल्पसंख्यकों की भावनाओं पर भी कुठाराघात हुआ । सरकार ने कोरोना से मरे मुसलमानों को भी उनके परिवार की इच्छा के खिलाफ अनिवार्य दफन कानून के अंतर्गत दफना दिया । पूर्व मंत्री रहे मुस्लिम नेता रिशाद बदिउद्दीन ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है । उनका कहना है कि अगस्त में होनेवाले संसदीय चुनाव में सरकार इसे भुनाएगी । 2015 में महिंदा राजपक्षा को हराकर राष्ट्रपति बने मैत्रीपाला सिरिसेना ने सबको साथ लेकर मिली-जुली सरकार बनायी । लेकिन तमिल युद्धबंदियों की रिहाई टाली और भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ द्वारा उनकी कथित हत्या की साजिश रचने का प्रचार किया ।