इस बार पांच अगस्त को श्रीलंका में वैसे समय में संसदीय चुनाव हो रहे हैं, जब भारत-चीन के बीच तनातनी चल रही है । चुनाव में भारत और चीन से व्यापारिक संबंध की आड़ में भारत से दूरी के परस्पर विरोधाभासी बयान प्रचार अभियान में खुलकर सामने आ रहे हैं । लेकिन पांच अगस्त के चुनाव का सबसे रोचक मामला है, प्रचार तेज होने के समय ही श्रीलंका में ‘रावण लीला’ का सरकारी आयोजन । वो भी उस समय जब भारत में तय हो गया कि अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन समारोह होगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसका शिलान्यास करेंगे । चुनाव में भारत की ‘कथित’ भूमिका की श्रीलंका में विवादित चर्चा होती है । लेकिन इस पांच अगस्त को जब श्रीलंका में वोट पड़ेंगे, उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में रामलला मंदिर का भूमि पूजन करेंगे । भारत में रामलला का माहौल होगा और श्रीलंका में ‘रावणलला’ के समर्थक सिंहली राजनीतिक दल सत्ता पर अपनी पकड़ बरकरार रखने में कोई कसर नहीं चूकेंगे । श्रीलंका की 225 सदस्यीय संसद के 196 सदस्य 25 जिलों से सीधे चुने जाएंगे । 29 सदस्य राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्रीय वोट में अपने शेयर के आधार पर मनोनीत राष्ट्रीय सूची से नियुक्त किए जाएंगे । सबसे बड़ी तमिल पार्टी टीएनए(तमिल नेशनल एलायंस) अपनी सीटें बढ़ाने की कोशिश में जुटी है । इसके नेता आर. सांपनथन भारत से आशा उम्मीद लगाए बैठे हैं ताकि श्रीलंका सरकार पर तमिलों को संवैधानिक अधिकार देने का वायदा पूरा करने के लिए दवाब बनाया जा सके । वे 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते की बात कर रहे हैं, जिसके आधार पर 13वां संविधान संशोधन अधिकारों के अवमूल्यन के लिए लाया गया, मगर आज तक लटका हुआ है । श्रीलंका में अभी राष्ट्रपति गोटावाया राजपक्षा और उनके बड़े भाई प्रधानमंत्री महिन्दा राजपक्षा दोनों ही भारत जैसी संघीय व्यवस्था के विरोधी हैं । वे सिंहलियों के समान संवैधानिक अधिकार तमिल या मुस्लिम अल्पसंख्यकों को देने के पक्ष में नहीं है । राजपक्षा सरकार ने चुनाव के समय ही अचानक ऐसा धार्मिक कार्ड खेल दिया, ताकि तमिल भी इससे इत्तेफाक रखने से इन्कार कर सकें । तमिलनाडु की राजनीति में हमेशा से द्रविड़ पार्टियां हावी रही । सी. एन. अन्नादुरई से लेकर एम. करूणानिधि जैसे प्रभावशाली नेता इसके उदाहरण हैं, जो राम के बजाए रावण को पुज्य मानते रहे । इसका प्रचार श्रीलंका में चुनाव के समय किया गया । श्रीलंका के सिंहला बौद्ध तमिलनाडु की द्रविड़ पार्टियों की तरह रावण को ‘प्रतापी’ राजा के रूप में महिमामंडित कर रहे हैं । जुलाई के अंतिम सप्ताह में श्रीलंका के नागरिक उड्डयन प्राधिकरण ने सिंहला में अखबार में विज्ञापन देकर जनता से राजा रावण के प्राचीनकाल में आकाशीय रूट पर आधिपत्य का उजागर करनेवाले दस्तावेज मांगे । गत वर्ष जून में श्रीलंका सरकार ने पहला उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा, जिसका नाम था - ‘रावण-1’ । 2016 में ही श्रीलंका के परिवहन और नागरिक उड्डयन मंत्री निमाल सिरिवाला डिसिल्वा ने नागरिक उड्डयन विशेषज्ञों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए रावण महिमामंडन तुक्का छोड़ा । मंत्री ने कहा कि विश्व अंतरिक्ष यात्रा का आधुनिक इतिहास राईट बंधुओं से शुरू होता है । लेकिन श्रीलंका में यह सामान्य किवदंती है कि प्रतापी राजा रावण ने ‘डोंडू मोनारा’ नामक उड़नखटोले में अपने देश के अलावे इस पूरे क्षेत्र(भारत) में उड़ान भरी । अभी चुनाव के समय श्रीलंका सरकार ने रावण के लुप्त आकाशमार्ग की खोज के लिए तथ्य जुटाने शुरू किए हैं ।

टीएनए नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उसभाषण की याद दिलायी है, जो उन्होंने मार्च 2015 में श्रीलंकाई संसद को संबोधित करते हुए कही । महिंदा राजपक्षा को राष्ट्रपति चुनाव में हराकर उन्हीं के मंत्रिमंडल में मंत्री रहे मैत्रीपाला सिरिसेना 2014 में राष्ट्रपति बने और सबसे पहले भारत आए । फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आमंत्रित किया । नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका के लिए 450 मिलियन ऋण के अलावे भारत की संघीय व्यवस्था का उदाहरण दिया । मैत्रीपाला शासनकाल में भी महिंदा राजपक्षा का ही अप्रत्यक्ष राज रहा । जबकि सिरिसेना ने सबको साथ लेकर चलने की एकता सरकार बनायी । उसमें तमिल सांसदोंं का भी समर्थन लिया और धर राजपक्षा विरोधी रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री बनाया ।

तमिलों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले रानिल विक्रमसिंघे भारत से नजदीकी के पक्ष में थे । इसलिए राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने दिसंबर, 2018 में विक्रमसिंघे को अचानक बर्खास्त करके महिंदा राजपक्षा को प्रधानमंत्री बना दिया और संसद भंग करके चुनाव का एलान कर दिया । उसके पहले राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने अक्टूबर में मंत्रिमंडल की आपात बैठक बुलाकर एक सनसनीखेज खुलासा किया कि भारत की एलीट खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ उनकी कथित हत्या की साजिश में जुटा है । दुनिया भर के अखबारों में उछालने के बाद सिरिसेना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करके सफाई दी कि ‘मीडिया’ ने इसे तूल दे दिया, मैंने ऐसा नहीं कहा था । उसके पहले महिंदा राजपक्षा ने भारत आकर एक सम्मेलन में कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें पराजित करने में भारत का हाथ था । श्रीलंका की सुप्रीम कोर्ट ने समय पूर्व संसद भंग करने को ‘गैरकानूनी’ और प्रधानमंत्री की बर्खास्तगी को गलत करार दिया । महिंदा राजपक्षा को इस्तीफा देना पड़ा ।

श्रीलंका की राजनीति विद्रोही गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) के इर्दगिर्द ही हमेशा घूमती है, जिसके सफाया अभियान से महिंदा राजपक्षा और उनके भाई गोटावाया रापजक्षा ने राष्ट्रीय राजनीति में ताकतवर हैसियत बनायो है । 2009 में लिट्टे सफाया अभियान के समय महिंदा राजपक्षा राष्ट्रपति थे और गोटावाया रक्षा मंत्री । लिट्टे का तार तमिलनाडु से जुड़ा है और उससे भारत-श्रीलंका संबंध भी प्रभावित हुआ है । श्रीलंकाई तमिलों का विरोध सिर्फ महिंदा राजपक्षा से है, इसलिए वे वैसे सिंहली नेताओं को समर्थन देने के मामले में भी भ्रम में पड़ जाते हैं, जो तमिल हितैषी तो नहीं हैं मगर राजपक्षा के प्रतिद्वंदी हैं ।

नवंबर, 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में भी वही हुआ । गोटावाया राजपक्षा ने जीत दर्ज करने के बाद बहुसंख्यक सिंहली मतदाताओं के प्रति आभार व्यक्त किया । तमिल और मुस्लिम मतदाताओं ने उनके विरोधी साजित प्रेमदासा को वोट दिया । 2010 चुनाव में भी तमिलों ने राजपक्षा के खिलाफ राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार साराथ फोन्सेका को वोट दिया, जो लिट्टे सफाया अभियान के समय सेना प्रमुख थे और ‘युद्ध हीरो’ के रूप में राजपक्षा को चुनाव में मात देना चाहते थे ।

श्रीलंका में तमिल दोयम दर्ज क नागरिक हं । उनके पास सिंहलियों के समान अधिकार प्राप्त नहीं है । तमिलों और मुस्लिमों की सेना तथा पुलिस में भर्ती नहीं होती ।

18 नवंबर को राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद गोटाबाया राजपक्षा ने तमिलों के अधिकारों की बात की और लिट्टे सफाया अभियान से तहस-नहस तमिल आबादी वाले उत्तरी श्रीलंका के विकास पर ध्यान देने का वायदा किया । गोटाबाया राजपक्षा की छवि लिट्टे टमिनेटर’(सफाया) की है। उन्होंने तुरंत रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाया और संसदीय चुनाव की तैयारी शुरू कर दी । क्योंकि संसद में उनकी पार्टी को बहुमत नहीं था । संसद का कार्यकाल अगस्त, 2019 तक है । राष्ट्रपति ने अपने अधिकार का इस्तेमाल करके छह महीने पहले संसद भंग करके चुनाव का एलान कर दिया । कोरोना वायरस के चलते दो बार तारीख बढ़ायी गयी । तमिल नेताओं में फूट से उनकी लड़ाई कमजोर पड़ी है । इस संसदीय चुनाव में टीएनए को पहले अपनी ही बिरादरी के पूर्वी प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री सी. वी. बिग्नेस्वरन से भिड़ना है । ऑल सीलोन तमिल कांग्रेस के नेता गजेंद्र कुमार और मंत्री डगलस देवानंद नीत ईलम पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट से भी मुकाबला है, जो राजपक्षा सरकार के साथ है । ये तमिल नेता मानते हैं कि भारत को सिर्फ श्रीलंका सरकार से जुड़े अपने हितों की फिक्र है, तमिलों की नहीं ।

राष्ट्रपति बनने के बाद गोटाबाया राजपक्षा सबसे पहले भारत आए । प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षा भी पहले भारत आए । लेकिन तमिल अधिकारों की बात नहीं की। भारत से ऋण माफी की गुहार लगा रहे हैं । भारत और जापान की भागीदारी वाली पूर्वी कंटेनर टमिर्नल परियोजना(ईसोटी) श्रीलंका सरकार ने लटका रखी है । कटर कम्यूनिस्ट सिंहली गुट जनता विमुक्ति पेरामुन इसे भारत के हाथों जमीन गिरवी रखनेवाली परियोजना बताया है ।

धूर्त्त राजनीतिज्ञ महिंदा राजपक्षा ने जुलाई, 2020 के पहले सप्ताह में तमिल पत्रकारों के बीच कहा कि इस पर अंतिम फैसला नहीं हुआ है । ईसीटी परियोजना पर मई, 2019 में राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सहमति बनी थी । 30 जुलाई को एक चुनावी सभा में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षा ने तमिल पार्टी टीएनए को चेताया कि जो अधिकार लिट्टे सुप्रीमो प्रभाकरन बंदूक से हासिल करना चाहते थे, वो चुनाव के जरिए टीएनए को हासिल नहीं करने दिया जाएगा ।