भारत - श्रीलंका संबंधोंं का सबसे विवादास्पद और अप्रिय पहलू है, श्रीलंका के राजनीतिज्ञों का अपने देश में हर उथल-पुथल के लिए भारत की खुफिया एजेंसियों को जिम्मेदार ठहराना । इस आरोप का इस्तेमाल सत्तारूढ़ समेत सभी पार्टियां अपने राजनीतिक स्वार्थ के अलावे देश की आतंरिक और बाहरी सुरक्षा के मामले में भी करती हैं । इसका ऐसा ज्वलंत मामला अभी गरम है, जैसा शायद ही पहले कभी देखने को मिला हो ।

21 अप्रील को ईस्टर संडे के रोज श्रीलंका में संत एंथनी चर्च पर हुए आत्मघाती हमले में 11 भारतीय समेत 258 लोगों के मारे जाने की भयानक वारदात का दूसरा महीना चल रहा है । इस अभूतपूर्व हमले को एक महिला समेत नौ आत्मघाती हमलावरों ने अंजाम दिया । उसके बाद से राजनीतिक और आंतरिक अराजकता का दौर अपने चरम पर है । सामान्य स्थिति के आसार नहीं हैं । क्योंकि असामान्य हालात के लिए श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना समेत धार्मिक समुदायों के नेता और राजनीतिक दल जिम्मेदार हैं, जो ऐसी अराजक स्थिति कायम रखना चाहते हैं । जातीय और धार्मिक वैमनस्य श्रीलंका का स्थायी संकट है । अभी इस उन्माद के भड़कने का कारण है, कथित इस्लामी गुट नेशनल तोहीद जमात(एनटीजे) सुप्रीमो जहरान हाशिम द्वारा इसाई समुदाय के पवित्र स्थल को निशाना बनाकर आत्मघाती हमले करवाना ।

यह मामला ऐसे समय में हुआ है, जब श्रीलंका में एक ही साथ राष्ट्रपति चुनाव और संसदीय चुनाव दोनों ही होनेवाले हैं । ईस्टर संडे हमले के एक महीने तक तो राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना समेत सभी राजनीतिक दलों ने देश की पुलिस और खुफिया एजेंसियों का भारत से लिंक जोड़ा । चुनाव आयोग प्रमुख महिंदा देशप्रिय ने दो जून को ज्योंही एलान किया कि 15 नवंबर से सात दिसंबर के बीच राष्ट्रपति चुनाव होंगे, खुफिया एजेंसियों का पेंच सियासी राजनीति से जुड़ गया । श्रीलंका का मामला 21 अप्रील के आत्मघाती हमले की अलर्ट सूचना देने में चूक का नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना द्वारा उस सूचना की अवहेलना का है । विवाद का विषय ये नहीं है कि राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय पुलिस प्रमुख और खुफिया प्रमुखों के अलर्ट की अनदेखी की । बल्कि ये है कि राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने वारदात के बाद खुफिया प्रमुख और पुलिस प्रमुख को हटा दिया । उतना ही नहीं राष्ट्रपति ने वारदात की जांच के लिए गठित संसदीय समिति को भी चेतावनी दे डाली कि वे किसी भी रक्षा या पुलिस अधिकारी को संसदीय समिति के सामने पेश होने की इजाजत नहीं देंगे । वारदात के दिन 21 अप्रील को ही राष्ट्रपति मैत्रीपाला सुरक्षा को लेकर विवाद के घेरे में आ गए थे, क्योंकि उन्होंने खुफिया एजेंसियों को बार-बार एलर्ट सूचना के बावजूद पुलिस और सेना को चौकस नहीं किया । रक्षा मंत्री राष्ट्रपति स्वयं हैं । आत्मघाती हमले के दूसरे दिन 22 अप्रील को ही राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने ईस्टर संडे बम धमाके कीजांच और इसके कारणों का पता लगाने के लिए कमिटो नियुक्त कर दी । सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस विजित मलालगाडा इस जांच कमिटो के अध्यक्ष बनाए गए । लेकिन संदेह की उंगलियां सिरिसेना की ओर ही लगातार उठ रही थीं । इसलिए राष्ट्रपति ने बम विस्फोटों के तुरंत बाद देश में इमर्जेंसी लागू कर दी । महीना भर बाद 22 मई को फिर एक महीन के लिए इमर्जेंसी की अवधि बढ़ा दी गयी । इस दौरान राजनीतिक हालात इतने बिगड़े कि राष्ट्रपति के लिए देश के सामने सफाई देते नहीं बन रहा है । सबसे ज्यादा बवेला उस समय मचा जब 6 जून को मंत्रिमंडल की आपात बैठक में राष्ट्रपति ने कहा कि संसदीय समिति की विवादास्पद जांच में न तो वे सहयोग करेंगे, न ही उसके आगे झुकेंगे । हुआ यों कि संसद सदस्यों की मांग पर स्पीकर कारू जयसूरिया ने घटना की जांच के लिए संसदीय समिति गठित कर दी । संसदीय समिति ने सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों को बुलाकर उनकी खिंचाई शुरू कर दी और टीवी न्यूज चैनलों के जरिए उसे जनता का दिखाया । राष्ट्रपति द्वारा बखास्त किए गए राष्ट्रीय खुफिया प्रमुख सािसरा मोदस न ससदाय सांमात के सामने सुरक्षा चूक के लिए राष्ट्रपति को जिम्मेदार ठहराया । सिसिरा मेंदिस ने सीधा आरोप लगाया कि कट्टरपंथी इस्लामी गुट की धमकियों का जायजा लेने और उससे निबटन के लिए सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबद करने के लिए राष्ट्रपति ने सुरक्षा की समीक्षा बैठक कभी नहीं की। बर्खास्त खुफिया प्रमुख ने संसदीय समिति के सामने कह दिया कि राष्ट्रपति कायालय को बार-बार खुफिया सूचना दो जा रही थी, लेकिन राष्ट्रपति ने उसे कोई तवज्जो नहीं दी । सिसिरा मेंदिस ने कहा कि राष्ट्रपति अगर समय रहते चेत जाते तो ऐसी भयानक घटना से बचा जा सकता था । संसदीय समिति के सामने हुए इन खुलासों का सीधा प्रसारण टीवी चैनलों पर होने से राष्ट्रपति बौखला गए । राष्ट्रपति ने पहले तो संसदीय समिति की इन कार्यवाहियों का प्रसारण इमर्जेंसी अधिकारों का इस्तेमाल करके रोक दिया और पुलिस सेना तथा खुफिया अधिकारियों से कहा कि ‘उनमें से कोई भी संसदीय समिति के सामने पेश न हों । सरकार के तमाम आला कमानों के बीच राष्ट्रपति की मनमानी को लेकर आपस में ही ठन गयी । उस सबके अंदर में सबसे ज्यादा विवाद का विषय रहा, भारतीय खुफिया एजेंसियों की ओर दी गयी गुप्त सूचनाओं पर राष्ट्रपति का उपेक्षापूर्ण रवैया । स्पीकर जयसुरिया अड़ गए कि वे संसदीय समिति वापस नहीं लेंगे और राष्ट्रीय सुरक्षा के इस अहम मुद्दे पर जन सुनवाई जारी रखेंगे । आपात मंत्रिमंडल बैठक के बाद स्पीकर ने राष्ट्रपति के पास दो पृष्ठों का कड़ा नोट भेजा, जिसमें कहा गया कि जिस किसी भी अधिकारी का संसदीय समिति द्वारा सम्मन भेजा जाएगा, उसे उपस्थित होकर सारे साक्ष्य प्रस्तुत करने होंगे । अधिकारियों को अच्छी तरह पता है कि अगर वे संसदीय समिति के सामने पेश नहीं होते हैं तो उसका परिणाम क्या होगा । संसदीय समिति ने मई के अंतिम सप्ताह में उसी समय अधिकारियों को बुलाकर जन सुनवाई शुरू की, जब राष्ट्रपति ने इमर्जेंसी की अवधि बढ़ायी । खुफिया सूचनाओं के अलर्ट पर राष्ट्रपति द्वारा अमल नहीं किये जाने के टीवी चैनलों द्वारा प्रसारित संदेश ने राष्ट्रपति को जनता के सामने कटघरे में खड़ा कर दिया । स्पीकर के जन सुनवाई जारी रखने पर अड़े रहने के जवाब में राष्ट्रपति की बौखलाहट से सभी अधिकारी सकते में आ गए । रक्षा और पुलिस के आला अधिकारियों के अलावे रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वे संसदीय समिति के सामने पेश होने के लिए बाध्य हैं । इस बात को लेकर भी असंतोष व्यक्त किया गया कि राष्ट्रपति ने रक्षा मंत्री के रूप में भारतीय खुफिया एजेंसी से प्राप्त सूचनाओं पर अमल के उचित प्रोटोकोल का पालन नहीं किया । 31 मई को यह अंदरूनी घमासान अपने चरम पर था । मैत्रीपाला सिरिसेना ने मीडिया कर्मियों के सामने सफाई दी कि भारतीय खुफिया एजेंसियों से मिली पूर्व चेतावनी की सूचना उन्हें दी गयी । श्रीलंकाई राष्ट्रपति ने कहा कि ‘भारतीय खुफिया एजेंसियों ने श्रीलंका के खुफिया अधिकारियों को चार अप्रील को ही आत्मघाती हमले की संभावना से अवगत करा दिया था, लेकिन इसकी जानकारी मुझे नहीं दी गयी ।’ राष्ट्रपति ने खासतौर पर भारतीय मीडिया कर्मियों को संबोधित करते हुए अपनी सफाई में रक्षा सचिव, पुलिस प्रमुख और खुफिया प्रमुख को हटाए जाने के कदम को सही ठहराया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 9 जून को कोलंबो आने के कार्यक्रम की पुष्टि करते हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति ने एक सवाल के जवाब में कहा कि उन्हें ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली कि ईस्टर संडे आतंकी हमले का मास्टरमाइंड जहरान हाशीम ने भारत की यात्रा की थी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मालदीव्स से लौटने के क्रम में नौ जून को निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कोलंबो पहुंचे । संत एंथनी चर्च जाकर मातमपुर्सी की औपचारिकता के बाद नरेंद्र मोदी राजनयिक संबंध का संतुलन बनाए रखते हुए श्रीलंका के तीनों टॉप नेताओं से अलग-अलग मिले । नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना प्रधानमंत्री रानिल बिक्रमसिंघे, विपक्षी नेता महिंदा राजपक्षे से बंद कमरे में मुलाकात की, जिसका मजमून उजागर नहीं हुआ । श्रीलंका के तीनों नेता राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर एक-दूसरे के खिलाफ भितरघात में जुट हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा ही मुख्य चुनावी मुद्दा बनेगा । श्रीलंका में राजनीतिक उलटफेर में भारतीय खुफिया एजेंसियों की भूमिका की चर्चा गत दिनों विवादित रही । ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोलंबो यात्रा पर अटकलबाजी गर्म हो गयी, जब खुफिया एजेंसियो को ही लेकर श्रीलंका में ठनी हुई है । नरेंद्र मोदी के कोलंबो से दिल्ली के लिए प्रस्थान करने के बाद नौ जून को ही राष्ट्रपति ने तमिल आबादी नरेंद्र मोदी के कोलंबो से दिल्ली के लिए प्रस्थान करने के बाद नौ जून को ही राष्ट्रपति ने तमिल आबादी वाले इलाके में जाकर चेतावनी दी कि वे ‘मुस्लिम प्रभाकरन’ पैदा नहीं होने देंगे । इसका तार भारत से जुड़ा है और

यह आत्मघाती हमला वैसे समय में हुआ है, जब लिट्टे सफाए के 10 साल गुजर चुके हैं । अलग तमिल प्रांत की मांग को लेकर लगभग तीन दशक तक खूनी लड़ाई लड़नेवाले विद्रोही गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) सुप्रीमो वेलुपिल्लई प्रभाकरन के मारे जाने के बाद मई, 2009 में इस गुट का पतन हो गया । उस समय महिंदा राजपक्षा राष्ट्रपति थे । लिट्टे के प्रति आज भी तमिलनाडु की जनता में सहानुभूति है । अभी का आत्मघाती हमला श्रीलंका के बट्टीकलोआ में उस जगह हुआ है, जो कभी लिट्टे का गढ़ था ।

अक्टूबर 2018 में राष्ट्रपति ने एक सनसनीखेज खुलासा किया कि भारत की एलीट खुफिया एजेंसी ‘रॉ’(तॅ. रिसर्च एंड एनेलिसिस विंग) उनकी कथित ‘हत्या’ की साजिश में जुटा है । मंत्रिमंडल की आपात् बैठक बुलाकर राष्ट्रपति ने पहले यह विस्फोटक खुलासा किया और उसके बाद भारत समेत दुनिया भर के सभी मीडियाकर्मियों के जरिए इसका जमकर प्रचार किया । फिर उसके बाद राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बार-बार फोन करके इसके लिए खेद व्यक्त किया और इसके प्रचार के लिए मीडिया को जिम्मेदार ठहरा दिया । अभी राष्ट्रपति आत्मघाती हमले की जांच रिपोर्ट की चर्चा मीडिया तक पहुंचने के खिलाफ हैं । राजपक्षा ने अक्टूबर में ही भारत आकर कहा कि मैत्रीपाला को राष्ट्रपति चुनाव जिताने में ‘रॉ’ का हाथ था । जनवरी 2015 में राष्ट्रपति चुनाव के समय मैत्रीपाला सिरिसेना तत्कालीन राष्ट्रपति राजपक्षा मंत्रिमंडल से निकलकर राष्ट्रपति पद के दावेदार हो गये और चुनाव जीत गये ।