असम में असली नागरिकों की पहचान कठिन हो रही है । इसका असली कारण बाहरी लोगों और खासकर बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाया जाना है । भिन्न-भिन्न जातियों, समुदायों और कबीलाई टाईप टोलियों में बंटे असम के मूल वाशिंदों के बीच आबादी संतुलन तथा सामाजिक सद्भाव मुख्य रूप से बांग्लादेशी घुसपैठ के कारण बिगड़ा । घुसपैठियों के नागरिक बन जाने के बाद इनके वोट की राजनीति चली । इसके खिलाफ हिंसक आंदोलन और घुसपैठिया वोट की चुनावी राजनीति के कारण कई दशकों से असम में सामान्य जन-जीवन अस्तव्यस्त चल रहा है । सेना, अर्द्धसैनिक बल, केंद्रीय सुरक्षा बलों की लगातार तैनाती से असम के लोगों को जबरन अशांत और उपद्रवग्रस्त क्षेत्र वाली शांति झेलनी पड़ रही है । असम की पहचान हो गयी हिंसा, खूनखराबा और स्वायत्तता, स्वतंत्रता तथा स्वाधीन असम की मांग । सबकी जड़ में था बाहरी लोगों को भगाने का अभियान और सब बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान पर ही केंद्रित था । 1979-1985 का असम छात्र आंदोलन, उसी से उपजा युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम(उल्फा) का ‘स्वाधीन असोम’ आंदोलन में सैकड़ों बेकसूरों की जान जा चुकी है । असम आंदोलन से उपजे छात्र नेता 1985 में सत्ता में आने के बाद राजनीतिक रोटी सेंकने में लग गए । उल्फा नेता सरकार से हिंसा और शांति को लेकर टकराव तथा समझौता वार्ता में उलझे रहे । समस्या जटिल होती चली गयी । असम के मूल वाशिंदों का असंतोष बढ़ता गया और असम में असमियों की ही पहचान पर संकट खड़ा हो गया । अभी बेहद तनावपूर्ण माहौल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से नागरिक रजिस्टर का पहला मसौदा प्रकाशित किया गया है । साल समाप्त होने के अंतिम दिन आधी रात के वक्त एनआरसी(राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) का पहला मसौदा जारी किया गया है । ये मसौदा तैयार करने के लिए असम की भाजपा सरकार को चार महीना पहले ही आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट(आफ्प्सा) लागू करके पूरे राज्य को ‘उपद्रवग्रस्त क्षेत्र’ घोषित करना पड़ा । क्योंकि असली और नकली नागरिकों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए दस्तावेजों व कागजातों की जांच के दौरान तनाव की आशंका थी । असम की भाजपा सरकार के खिलाफ जन-जन में चर्चा का विषय था कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने में राजनीति की जा रही है । भारत सरकार के नागरिक रजिस्टर कार्यालय पर पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर असली नागरिक का रजिस्टर तैयार करने का आरोप लगने लगा । इस आरोप का कारण मजहबी था और यह आशंका प्रचारित हुई कि नागरिक आवेदनों की जांच में बांग्लादेश से आए हिन्दू घुसपैठियों के नाम रखने और मुस्लिमों के नाम हटाए जाने का संदेह है । असम देश का पहला राज्य है जिसके पास एनआरसी है । 1951 में इसे सबसे पहली बार तैयार किया गया था । अभी तो पहला मसौदा जारी हुआ है, उसमें 3.29 करोड़ आवेदनों में से 1.9 करोड़ लोगों को ही देश का नागरिक माना गया । दो करोड़ दावों की जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मसौदा प्रकाशित करने कहा था । 38 लाख लोगों के कागजात संदिग्ध पाए गए ।

राज्य सरकार और केंद्र सरकार समझ रही है कि दस्तावेज की जांच कठिन है । मुश्किल ये आ रही है कि किस दस्तावेज को सही और किसे गलत माना जाए । सरकार इसे टालने के लिए सुप्रीम कोर्ट से समय मांगना चाहती थी, जब नहीं मिला तो अब राज्य सरकार अपनी राजनीति कर रही है। असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने 31 दिसंबर को राज्य की जनता को समझाया कि यह केवल ‘असली नागरिकों’ का पहला मसौदा है और इसमें जिनका नाम छूटा है, वो अंतिम मसौदे में शामिल कर लिए जाएंगे । मुख्यमंत्री ने यह कहकर श्रेय लेना चाहा कि असम पहला राज्य है, जहां 1951 के बाद से एनआरसी तैयार हुआ है ताकि विभाजन के बाद हुई घुसपैठ के मद्देनजर ‘असली नागरिक’ की पहचान की जा सके । इससे असम देश का पहला राज्य बन जाएगा, जहां रजिस्टर में राज्य में रह रहे असली नागरिकों की पहचान दर्ज होगी ।

जबकि वास्तविकता ये है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में मई, 2005 में असम सरकार, केंद्र सरकार और ऑल असम स्टूडेंटस यूनियन के बीच हुई त्रिपक्षीय वार्ता के बाद यह काम शुरू हुआ । असम के कई नागरिक संगठनों ने साथ मिलकर दो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर करके असली नागरिकों की पहचान कराने का आग्रह किया । 13 जुलाई, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने ड्राफ्ट एनआरसी(राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) प्रकाशित करने की समय-सीमा 31 दिसंबर तय कर दी। इसके लिए न तो भारत के रजिस्टार जनरल तैयार थे, न केंद्र सरकार और असम सरकार को इस काम में तेजी लाने में कोई दिलचस्पी थी । कम-से-कम और सात महीना समय लेने के लिए अर्जी तो सुप्रीम कोर्ट में रजिस्टार जनरल ने दायर की, मगर केंद्र सरकार भी उसमें एक पक्षकार हो गयी । 30 नवंबर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर अर्जी खारिज कर दी कि इससे कार्यपालिका की अक्षमता जाहिर होती है । सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार के अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित तय समय-सीमा पर ही उंगली उठा दी और कहा कि ‘यह कार्यपालिका के अधिकारक्षेत्र का अनुचित अतिक्रमण है ।’ पूरे प्रकरण की 2013 से निगरानी कर रही सुप्रीम कोर्ट पीठ के जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर. एफ. नरीमन ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका की अक्षमता पर गंभीर रूख अपनाया है । तीन साल से शीर्ष कोर्ट की नजर नागरिक पहचान रजिस्टर तैयार करने की प्रक्रिया पर है । फिर अटोर्नी जनरल ने कानून और व्यवस्था के हालात बिगड़ने का हवाला देकर रजिस्टार जनरल की समय-सीमा बढ़ाने के आग्रह पर जोर दिया । लेकिन शीर्ष कोर्ट ने ठुकरा दी । जजों ने 30 नवंबर को सुनवाई के दौरान अपनी निगरानी के आंकड़े प्रस्तुत किए, जिसकी जानकारी शायद अटोर्नी जनरल को भी नहीं थी । वे सिर्फ सरकार की ओर से समय-सीमा बढ़ाने के लिए पेश हुए । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अर्जी ठुकराते हुए कहा कि 47 लाख दावों में से 29 लाख व्यक्तियों के दस्तावेज जांच अभी भी लंबित है और यह पहले से ही निर्धारित है कि उसमें से सही नाम दूसरे एनआरसी ड्राफ्ट में प्रकाशित होने हैं । एनआरसी के राज्य कोऑर्डिनेटर प्रतीक हजेला ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकारा कि 38 लाख व्यक्तियों की पहचान संदिग्ध है और 31 दिसंबर या उससे पहले जांच पूरी कर लेने का भरोसा दिलाया । अब तो 20 फरवरी को अगली सुनवाई के दिन ही पता चलेगा कि इनके दस्तावेजों की जांच पूरी हुई या नहीं ।

लेकिन एनआरसी पहला मसौदा प्रकाशित होने के बाद जिन लोगों का नाम नहीं आया उनमें ज्यादातर मुसलमान हैं । घुसपैठिया वोट पर सबसे ज्यादा प्रभाव रखनेवाले ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नेता बदरूद्दीन अजमल का नाम नहीं है । असली नागरिक तय करने के लिए प्रखंड, पंचायत और ग्रामीण स्तर पर सेवा केंद्र खोले गए, जहां दस्तावेजों की जांच होने दी । उसमें पुश्तैनी पेड़, पंचायत सचिव प्रमाण पत्र और विवाहित महिलाओं के पति के आधार तथा पुरखों के असमवासी होने के दावे को आधार माना गया । गुवाहाटी हाईकोर्ट ने पंचायत सचिव के प्रमाण पत्र और पारिवारिक पेड़ को असली नागरिक का प्रमाण नहीं माना ।

गुवाहाटी के सबसे पुराने अखबार ‘असम ट्रिब्यून’ से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार जिन जिलों में प्रायः दंगे-फसाद होते रहे हैं, वहां एक भी गांव में हिन्दू या आदिवासी का नाम नहीं छूटा, मगर मुसलमान का छूट गया । 1983 का नेली हत्याकांड कभी भूलनेवाला नहीं है, जिसमें मारे गए 1800(अपुष्ट आंकड़ा 3000) लोगों में सबके सब बांग्लादेश से आए मुसलमान थे । आज तक उसकी जांच नहीं हुई । वहां के मूल निवासी अब्दुल खालिक ने 1951 के एनआरसी की प्रति प्रस्तुत की, जिसमें उसके पिता का नाम है । उसका नाम नहीं आया । जिन छह गांवों में नेली हत्याकांड का तांडव मचा, उसी में से एक अलिसिंगा का रहनेवाला है, अब्दुल खालिक । लेकिन हिन्दू आदिवासी गणक वोरो और कोनवर का नाम छपा । मुस्लिम वोट नियंत्रित करनेवाले बदरूद्दीन अजमल के 18 विधायकों के समर्थन से कांग्रेस ने सरकार बनायी थी ।

1985 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ असम छात्र नेताओं का समझौता घुसपैठियों के खिलाफ हिंसक आंदोलन बंद करने के लिए हुआ । 2005 में असम के कांग्रेसी मुख्यमंत्री तरूण गोगोई, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और असम छात्र संघ के बीच 1951 एनआरसी को अपडेट करने के लिए हुई सहमति कागज तक ही सीमित रही ।

बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिए सबसे ज्यादा होहल्ला मचानेवाली भाजपा ने 2016 में असम विधान सभा चुनाव के समय यही मुद्दा बनाया । 2014 लोकसभा चुनाव में भी भाजपा इसी वायदे पर अच्छी खासी सीटें जीतकर वायदा भूल गयी । 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीधी मॉनीटरिंग के समय कांग्रेस सत्ता में थी, जिस पर घुसपैठिया वोट राजनीति का आरोप भाजपा लगाती थी । 2015 के ही मई में आवेदन प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन उसकी जांच लटकी रही ।

अप्रैल, 2016 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद से घुसपैठियों में हिन्दू अल्पसंख्यकों की असली नागरिकता पहचान अंदर-अंदर शुरू हुई । सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सितंबर, 2017 में सेना को चौकस करके आफ्प्सा लागू किया गया । ऐसा पहली बार हुआ, जब राज्य सरकार ने अपने स्तर से पूरे राज्य में यह ‘उपद्रवग्रस्त क्षेत्र नियंत्रण’ एक्ट लगाया ।

कांग्रेस ने मुस्लिम घुसपैठिया की राजनीति की, भाजपा हिन्दू घुसपैठिया की राजनीति कर रही है । यह आरोप लगाकर आंदोलन करनेवालों को जेल में डाल दिया गया । कृषक मुक्ति संग्राम समिति अध्यक्ष अखिल गोगोई को 15 सितंबर को गिरफ्तार किया गया और पहला एनआरसी मसौदा छपने से दो दिन पहले रिहा किया गया ।

नागरिकता को लेकर सितंबर में ही अरूणाचल प्रदेश में भी सुप्रीम कोर्ट आदेश का अनुपालन करने में केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर दिए । वहां आबादी संतुलन बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी क्षेत्र से 1960 के दशक में आए चकमा और हेजोंग शरणार्थियों के कारण बिगड़ा । चकमा बौद्ध हैं हेजोंग हिन्दू, जिन्हें पूर्वी पाकिस्तान(आज का बांग्लादेश) से भारत भगाया गया । इन्हें सरकार नागरिक बनाना चाहती है ।