भाजपा गठजोड़ सरकार ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर जता दिया कि उसके लिए फिलस्तीन से ज्यादा इजराइल से दोस्ती मायने रखती है । भारत की एकमात्र यही राष्ट्रीय पार्टी है, जिसकी हमेशा से इजराइल से करीबी रही । भारत की फिलस्तीनियों से हमेशा हमदर्दी रही । एक पूरी तरह आजाद फिलस्तीन देखने के पक्षधर भारतीय लोग परंपरागत रूप से रहे हैं। लेकिन भाजपा को जब से सत्ता में आने का अवसर मिला है, उसी समय से भारत के लोगों पर इजराइल से नजदीकी और फिलस्तीन से दूरी थोपने का सिलसिला जारी है ।

भारत सरकार के हालिया कदम से विश्व मंच पर हुई भारत की फजीहत कूटनीतिक हलकों में चर्चित है फिलस्तीन की जिस जमीन गाजा पट्टी इलाके पर इजराइल ने कब्जा जमा रखा है, वहां काफी दिनों बाद जबर्दस्त हिंसा भड़की । ऐसी की अमेरिका जैसे इजराइल समर्थक देश के लिए भी कुछ तय करना कठिन हो गया । 11 दिनों तक चली इजराइल-फिलस्तीन लड़ाई में आखिर संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले अमेरिका की ही अगुवाई में 21 मई को युद्धविराम हुआ ।

दुनियाभर में इस हिंसा का निंदा हुई । अगर उपलब्ध रिपोर्टों पर ही यकीन किया जाए तो गाजा में 254 फिलस्तीनी और 13 इजराइली मारे गए । तय हुआ कि तुरंत संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक बुलाकर हिंसा के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं की जांच के लिए आयोग गठित करने का प्रस्ताव पारित किया जाए । आम तौर पर ऐसी हिंसक वारदातों की निंदा तो सुर्खियां बटोरने के लिए लगभग सभी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश कर देते हैं पर वोटिंग के समय उन्हें खासकर इजराइल के मामले में अमेरिका की तरह ही इजराइल से अपनी दोस्ती ज्यादा अहमियत देने लायक लगती है । गैर-भाजपा शासनकालों में हमेशा इस नीति का पालन किया गया कि भारत के लिए फिलस्तीन के संघर्ष में साथ देना इजराइल से ज्यादा महत्व रखती है । इसका सबूत संयुक्त राष्ट्र महासभा की तार्किक बैठक में 2013 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देकर गए । 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र से पहले नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए और विदेशमंत्री के रूप में दिवंगत सुषमा स्वराज ने भाजपा का इजराइल प्रेम प्रदर्शित करना शुरू कर दिया ।

उसी कड़ी में हालिया घटना देखिए । हालत ये हो गयी कि फिलस्तीन के विदेशमंत्री रियाद अल-मलिकी ने इस पर कड़ा विरोध पत्र भारत के विदेशमंत्री एस. जयशंकर को लिखा । हुआ यों कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के जेनेवा हेडक्वार्टर में 27 मई को आयोजित बैठक में फिलस्तीनी हिंसा की जांच के लिए आयोग गठित करने के प्रस्ताव पर वोटिंग में भारत ने हिस्सा नहीं लिया । 24 देशों ने इसके समर्थन में वोट डाला और 9 देशों ने विरोध किया, प्रस्ताव पास हो गया । भारत उन 14 देशों में शामिल हो गया, जिन्होंने वोटिंग से खुद को अलग रखा । भारत को अपना परंपरागत दोस्त और मददगार माननेवाले फिलस्तीन के लोगों ने भारत के इस रवैए को पसंद नहीं किया । फिलस्तीन नेशनल ऑथोरिटी के विदेशमंत्री रियाद अल-मलिकी ने कड़े शब्दों में भारत के विदेशमंत्री को लिखे गए पत्र में कहा - ‘इस निर्णायक मोड़ पर भारत ने शांति, न्याय और फिलस्तीन समेत सभी लोगों के मानवाधिकार के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ चलने का अवसर हाथ से गवां दिया । फिलस्तीन को हमेशा मजबूत सहयोग समर्थन देनेवाले भारत के अचानक बदले रवैए से हमें धक्का लगा । भारत जैसा देश अचानक हमारा साथ छोड़कर इजराइल का पक्ष लेगा । ऐसी उम्मीद नहीं थी । 30 मई को यह पत्र लिखा गया ।

भारत को अपने इस कदम से क्या मिला यह तो कहना मुश्किल है । लेकिन भाजपा भी इससे असहज महसूस कर रही है । फिलस्तीन ने भारत को इजराइल के खिलाफ वोट से अलग रहने पर अफसोस जताया । लेकिन इजराइल ने भी भारत का शुक्रिया नहीं किया । इसका मतलब इजराइल को यह उम्मीद थी कि 9 देशों की तरह भारत भी प्रस्ताव के विरोध में वोट डालता ।

27 मई की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद बैठक से पहले भी भारत की किरकिरी हुई । जब फिलस्तीनी हिंसा अपने उफान पर थी और युद्धविराम के प्रयास चल रहे थे, उसी दौरान 16 मई को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टी. एस. तिरूमूर्ति ने अपने वक्तव्य में कहा - “फिलस्तीन के प्रति अपने मजबूत समर्थन पर भारत कायम है और दो देशों के सिद्धांत वाले समाधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दुहराया है ।” उसके बाद 20 मई को संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने ‘स्ट्रांग सपोर्ट टु दि जस्ट फेलीस्टीनियन काउज’(फिलस्तीन को मजबूत समर्थन) शब्द हटा दिए । फिर 21 मई को युद्धविराम पर और 27 मई की संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद बैठक में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने इजराइल से नाराजगी न मोल लेनेवाले कूटनीतिक बयान दिए - ‘हिंसा रोकने और स्थायी शांति के प्रयासों का भारत समर्थन करता है । भारत इस बात का पक्षधरर है कि दोनों देशों का अस्तित्व रहे और दोनों एक-दूसरे की सीमाओं को मान्यता देते हुए अगल-बगल रहें ।

इजराइल से नजदीकी पर तो कोई ऊंगली उठायी ही नहीं जा सकती । लेकिन फिलस्तीन के प्रति हमदर्दी पर नरेंद्र मोदी सरकार को बार-बार सफाई देनी पड़ती है । भाजपा गठजोड़ सरकार की इजराइल से करीबी अभी पसोपेस में है । क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कश्मीर मुद्दे पर समर्थन खोजना पड़ रहा है । इजराइल एकमात्र देश है, जिसने कश्मीर के कायापलट कदम को भारत का अंदरूनी मामला बताया । दुनिया के अन्य कोई भी देश कश्मीर को अपना ‘अभिन्न अंग’ कहने के भारतीय दावे को सही नहीं मानते । कश्मीर को फिलस्तीन जैसी ही विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय समस्या मानी जाती है । अगस्त, 2019 में कश्मीर का ‘विशेष संवैधानिक’ दर्जा प्राप्त राज्य के रूप में अस्तित्व समाप्त करके केंद्र शासित क्षेत्र बनाने के बाद से भारत सरकार ने तीन बार यूरोपीय संघ देशों के राजनयिकों को कश्मीर दौरे के लिए आमंत्रित किया । लेकिन राजनयिकों की यात्रा रिपोर्ट पर विचार नहीं किया गया ।

यहूदी देश इजराइल की धार्मिक विचारधारा भाजपा के संचालक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से कितना मेल खाती है, इसका सही आकलन तो लंबी बहस का विषय है । लेकिन इस्लाम और अरब के मुस्लिम देशों के प्रति यहूदी और आरएसएस की सोच में समानता नजर आती है । फिलस्तीन समेत अरब देशों की जमीन पर 1967 के अरब-इजराइल युद्ध के समय से इजराइल का कब्जा है । अरब देश कश्मीर मसले की तुलना फिलस्तीन से करते हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सात साल के शासनकाल में अरब देशों से रिश्ते बनाए हैं । मगर इजराइल भाजपा की कमजोरी मानी जाती है और इस देश से आरएसएस की नजदीकी धर्मनिरपेक्ष भारत समेत मुस्लिम देशों को भी खटकती है । क्योंकि इससे भारत की परंपरागत विदेश नीति काफी हद तक प्रभावित हुई है ।

2017 में इजराइल की यात्रा पर जानेवाले भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, नरेंद्र मोदी । वे भारत-इजराइल रिश्ते की 25वीं वर्षगांठ मनाने गए । लेकिन अरब-इजराइल युद्ध की 50वीं सालगिरह पर फिलस्तीन भी जाना नरेंद्र मोदी के एजेंडे में नहीं था ।

उसके पहले 2015 में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के इजराइल दौरे का कार्यक्रम बनाते समय फिलस्तीन को शामिल न किए जाने पर प्रणव मुखर्जी ने एतराज कर दिया ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से गाढ़ी दोस्ती स्थापित की । नेतन्याहू इजराइल के सबसे लंबे समय तक सत्ता में बने रहनेवाले प्रधानमंत्री हैं ।

संयोग से अभी फिलस्तीन को लेकर उठे बवाल के बाद बेंजामिन नेतन्याहू को 12 वर्षों में पहली बार सत्ता पर संकट झेलना पड़ रहा है। उन्होंने दो वर्षों में चार चुनावों का सामना किया है ।

लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आनेवाले नरेंद्र मोदी पहले भाजपा प्रधानमंत्री हैं । अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बहुमत जुटाकर भाजपा की सरकार जब बनी, उस समय भी इजराइल से नजदीकी को काफी तवज्जो दी गयी । उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी 1999 में पहली विदेश यात्रा पर इजराइल गए ।

इजराइल जानेवाले वे भारत के पहले गृहमंत्री थे । फिर उसके बाद रक्षा मंत्री जसवंत सिंह भी इजराइल जानेवाले भारत के पहले रक्षा मंत्री थे । कांग्रेस शासनकाल में भाजपा अध्यक्ष के रूप में नितिन गडकरी भी इजराइल हो आए थे ।

इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की एक और सोच नरेंद्र मोदी से मिलती है कि मीडिया/आंदोलन की आजादी पर पाबंदी रखी जाए ।

नेतन्याहू 6 जून को गठजोड़ सरकार में अपनी कुर्सी बचाने में जुटे थे और उधर फिलस्तीनियों के घर उजाडने के खिलाफ प्रदर्शन करनेवाले एक्टिविस्टों की गिरफ्तारी जारी थी । उसकी रिपोर्ट दिखानेवाले अरब देशों में सबसे लोकप्रिय टीवी न्यूज अल-जाजीरा के जानेमाने पत्रकार गिबारा बनेटी को पहले ही हिरासत में ले लिया गया ।