केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की इसराइल यात्रा को लेकर विभिन्न स्तरों पर विमर्श छिड़ा हुआ है। इसराइल ऐसा देश, जिससे फिलस्तीन के साथ लड़ाई के चलते लगभग हर देश का अंदरूनी और वैदेशिक संबंध विवादास्पद बना हुआ है। भारत-इसराइल रिश्ता भी देश के अंदर और बाहर विवाद के घेरे में है। फिलस्तीनी आजादी का समर्थक होने के बावजूद यहूदी देश इसराइल से कूटनीतिक के साथ-साथ रक्षात्मक और अन्य मामलों में भी नजदीकी बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गत सितंबर के अंतिम सप्ताह में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र में भाग लेने जब न्यूयार्क गये तो अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बाद जिस एक राष्ट्राध्यक्ष से वो गर्मजोशी से मिले, वे थे—इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू। उतना ही नहीं, भारत के प्रधानमंत्री न्यूयार्क में रह रहे प्रभावशाली यहूदी नेताओं से मिले। अमरीका के ऐसे ही एक प्रभावशाली संगठन ने नरेंद्र मोदी को उनकी शानदार जीत पर बधाई भी मई में भेजी थी। नरेंद्र मोदी अपने यहां निवेश के लिए आमंत्रित करने के मकसद से जिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीईओ से मिले, उनमें भी ज्यादा यहूदी थे। लेकिन फिलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास से नरेंद्र मोदी की पूर्व निर्धारित समय के बावजूद संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय या उसके बाहर कहीं भी भेंट नहीं हुई। इसका कोई कारण न्यूयार्क से भारत नहीं पहुँचा।

प्रधानमंत्री जब स्वदेश लौटे तो इतनी जानकारी अवश्य मिली कि भारत ने इसराइली सैनिकों के हमले से तहस-नहस हुई फिलस्तीनी बस्तियों के पुनर्निर्माण के लिए 80 लाख डॉलर की सहायता भेजी। इसराइल-फिलस्तीन झगड़ा खत्म करने के लिए अमरीका और पश्चिमी देशों के इशारे पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से आयोजित काहिरा अंतरराष्ट्रीय शांति सम्मेलन में भाग लेने भारतीय विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (पश्चिम एशिया व उत्तरी अफ्रीका) संदीप कुमार गये थे। नार्वे और मिस्र की मेजबानी में 75 देशों का वह सम्मेलन मुख्य रूप से इसराइली हमले में बर्बाद हुई गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण पर ही आयोजित था। उसमें इसराइल को आमंत्रित नहीं किया गया था।

इसराइल से नजदीकी बढ़ाने में पहल भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने वर्ष 2000 में ही की थी। गृहमंत्री और उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी अपनी पहली विदेश यात्रा पर इसराइल गये। विदेश मंत्री जसवंत सिंह उसके पहले इसराइल हो आए थे। किसी भारतीय गृहमंत्री और विदेश मंत्री का वो पहला इसराइल दौरा था। 1999 के कारगिल युद्ध के मद्देनजर भाजपा गठजोड़ सरकार के दोनों महत्वपूर्ण मंत्री मुख्य रूप से इस्लामी आतंकवाद के देश के अंदर और बाहर बढ़े खतरे पर काबू पाने इसराइल से मदद मांगने गये। आज भी वही स्थिति है। चीन और पाकिस्तान ने सीमावर्ती इलाकों में लगातार तनाव पैदा कर रखा है। 2007 से रूस के बाद भारत का सबसे बड़ा रक्षा और सुरक्षात्मक हार्डवेयर सप्लायर इसराइल है। इसमें बाहरी और आंतरिक सुरक्षा के लिए हथियार समेत तमाम रक्षा तकनीक शामिल हैं।

इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जोसेफ कोहेन अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में तीन दिन दिल्ली रहकर रक्षा सहयोग को मजबूती प्रदान कर चुके हैं। जून, 2000 में लालकृष्ण आडवाणी के बाद इसराइल जाने वाले भारत के दूसरे गृहमंत्री हैं राजनाथ सिंह। इतने वर्षों में कांग्रेस सरकारों के कोई गृहमंत्री इसराइल नहीं गये। इसलिए राजनाथ सिंह का दौरा मायने रखता है।

इसराइल से 1992 में राजनयिक संबंध कांग्रेसी प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने कायम किया, जब इसराइल और फिलस्तीन के बीच समझौते के आसार बने। लेकिन इसराइल से नजदीकी वास्तव में भाजपा शासनकाल में ही बढ़ी है। नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के सिलसिले में जितने दिन न्यूयार्क में रहे, उन्होंने न तो फिलस्तीन का नाम लिया, न ही फिलस्तीनियों के हक की चर्चा की। नरेंद्र मोदी ने इसराइल का जिक्र गैर राजनीतिक संदर्भ में भी किया। प्रभावशाली यहूदी संगठनों से मुलाकात के दौरान और उसके बाद प्रधानमंत्री ने भारतीय और यहूदी समाज के 2000 वर्ष पुराने रिश्ते का बार-बार उल्लेख किया।

नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने अमरीका जाकर कहा—“भारत को गर्व है कि यहूदी समुदाय 2000 वर्षों से भारतीय समाज का अभिन्न अंग होना स्वीकार है, जहां उनके साथ कभी भेदभावपूर्ण रवैया नहीं अपनाया गया।” इतने वर्षों से भारत में रहते आए यहूदियों पर पहली बार इतिहास लिखा गया है। ‘यहूदी और भारतीय कला परियोजना’ शीर्षक से यह किताब गत सप्ताह रिलीज हुई है। इसके लेखक हैं—डा. केनेथ रॉबिन्स और रब्बी मार्विन टोकेयरा।

ब्रिटेन और स्वीडन की संसद ने फिलस्तीन को राष्ट्र का दर्जा दे दिया। इसराइल के विदेशमंत्री एविग्डोर लीबरमैन ने इसे ठुकरा दिया। उन देशों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला लेकिन भारत को फर्क पड़ता है। भारत और इसराइल ने आतंकवाद से लड़ने के लिए संयुक्त कार्यदल बनाया हुआ है। दोनों देशों के विदेश मंत्रालय की वार्षिक बैठक में यही असली मुद्दा होता है। इसराइल में उसकी भी समीक्षा बैठक होनी है।

इसराइल जाने से पहले राजनाथ सिंह अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठन इंटरपोल सम्मेलन में भाग लेने गये थे, जहां आतंकवाद ही चर्चा का बिंदु था। वे अपने इसराइली काउंटर पार्ट से वहां भी मिले। 2009 में दूसरी बार भाजपा को हटाकर सत्ता में आने के बावजूद कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वैदेशिक नीतियों में इसराइल को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। लेकिन वाजपेयी सरकार ने इसराइल से जितना रिश्ता बनाया था, उसे कायम रखा। भाजपा की मदद से ही इस संबंध में कोई आंच न आने दी।