संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट का भारत का दावा अब स्थायी रूप से डंप हो गया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हफ्ते संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र के संबोधन भाषण में इसका सबूत दे दिया । संयुक्त राष्ट्र महासभा में वीटो पावर मुक्त स्थायी सदस्यता के भारतीय दावे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने सात साल के कार्यकाल में स्थायी डंपिंग की मुहर लगा दी । नरेंद्र मोदी पहले और एकमात्र प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने कई दशकों से चले आ रहे इस भारतीय दावे का जिक्र तक नहीं किया । 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण पूरी तरह आर्थिक, व्यापारिक और कारोबारी सुधारों पर केंद्रित रहा । भारत के स्थायी सीट के दावे को कौन कहे संयुक्त राष्ट्र सुधार का नाम भी नहीं लिया ।

नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय न्यूयार्क में दो दिन पहले से डटे हुए थे । विदेश मंत्री एस. जयशंकर और विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला प्रधानमंत्री के पहले ही न्यूयार्क पहुंच चुके थे । महासभा सत्र के निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र को संबोधित करना तय था । उसके पूर्व प्रधानमंत्री का अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन से वाशिंगटन में उनके कार्यालय में ‘गर्मजोशी’ से मुलाकात के अलावे जिन विश्व नेताओं से उनका मिलना-जुलना हुआ, उनमें किन्हीं के भी साथ संयुक्त राष्ट्र में अपने दावे पर कोई चर्चा नहीं हुई । कोरोना के चलते दो वर्ष के अंतराल के बाद विश्व नेतागण संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में भाग लेने अमेरिका पहुंचे थे । संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकी हमले के बाद से स्थायी अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है । इस बार उसमें कोरोना जुड़ गया । दोनों ही चर्चाओं में भारत ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक से अराजक अंदरूनी हालात और उससे भारत में बिगड़े क्षेत्रीय संतुलन के अलावे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संबोधन समेत अपने विभिन्न संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रमों में कोरोना बचाव टीकाकरण को व्यापार पर फोकस किया । प्रधानमंत्री ने कोरोना टीका बनाने के लिए दुनिया भर की कंपनियों को आमंत्रित किया और कोवेक्सीन निर्यात पर जोर दिया । नरेंद्र मोदी की संयुक्त राष्ट्र मंच पर ‘उपलब्धियां’ गिनने-गिनाने लायक हैं । उनमें सबसे पहला ये है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में शामिल होने के लिए अमेरिका वे जब भी गए अपनी छवि एक कारोबारी प्रधानमंत्री के रूप में पेश की । नरेंद्र मोदी का सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण एजेंडा था अमेरिका के खरबपति-अरबपति कंपनियों के संचालकों(सीईओ) से मिलना । दुनियाभर में कारोबार करनेवाले धनकुबेरों को निवेश के लिये न्योता देना प्रधानमंत्री के संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में सम्मिलित होने के कार्यक्रम का मुख्य हिस्सा था । नरेंद्र मोदी से पहले कांग्रेस या गैर-कांग्रेस सरकारों के अब तक जितने प्रधानमंत्री हुए, किसी ने भी इस विश्व मंच पर भारतीय प्रधानमंत्री की ऐसी तस्वीर पेश नहीं की । नरेंद्र मोदी की विश्व नेताओं से मुलाकात महज औपचारिकता जैसी साबित हुई । इनसे पहले जितने प्रधानमंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने न्यूयार्क गए, सबों की अमेरिकी राष्ट्रपति समेत अन्य राष्ट्राध्यक्षों से मुलाकात संयुक्त राष्ट्र सुधारों और मुख्य रूप से स्थायी सीट के भारतीय दावे पर समर्थन जुटाने पर केंद्रित रही । प्रायः प्रधानमंत्री से पहले ही विदेशमंत्री और विदेश सचिव न्यूयार्क पहुंचते थे । संयुक्त राष्ट्र स्थित भारत के प्रतिनिधि भारतीय दावे पर सदस्यों का समर्थन जुटाने के लिए पहले से ही लाबीइंग जारी रखते थे, जिसमें योगदान विदेश मंत्री और विदेश सचिव करते थे ।

उसी का एक हिस्सा था ग्रुप-4, जो पूर्व भाजपा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की देन है । संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के दावे को मजबूती प्रदान करने के लिए जर्मनी, जापान, ब्राजील के साथ मिलकर ग्रुप-4 बनाने की पहल 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की। नरेंद्र मोदी को यह बात अवश्य मालूम होगी और यह भी अच्छी तरह पता होगा कि 2004 में कांग्रेस गठजोड़ प्रधानमंत्री बननेवाले मनमोहन सिंह ने ग्रुप-4 को संयुक्त राष्ट्र सुधार अभियान चलानेवाला सबसे जोरदार अंतरराष्ट्रीय मंच बना दिया । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने 10 वर्षों के कार्यकाल में भारत के इस दावे को जितना आगे ले गए, उनके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उतना ही पीछे ले जाकर स्थायी सीट के दावे को डंप कर दिया । मनमोहन सिंह ने ब्रिक्स ग्रुप-20 जैसे व्यापारिक गुटों में भी संयुक्त राष्ट्र सुधार टॉप एजेंडे में रखा और संयुक्त राष्ट्र में सबसे ज्यादा सदस्यता वाले अफ्रीकी देशों की ओर से सबसे मजबूत दक्षिण अफ्रीका को भी स्थायी सदस्यता की दावेदारी में शामिल कर लिया ।

नरेंद्र मोदी ठीक ने उसका उल्टा किया । आगे भी व अपने पूर्ववर्तियों के किये-कराय पर पानी फेरने के बजाए कम-से-कम उसे जीवित रखेंगे, इसकी उम्मीद कम लगती है। इस बार का संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र दो ऐसे गुटों के कूटनीतिक भितरघात वाले दांव-पेंचों में फंसा रहा, जिसमें शामिल देशों में कौन किसका हितैषी है और किसका दुश्मन यह अंदाजा लगाना मुश्किल है । ये दोनों गुट हैं - ऑक्सस(न्ज़-) और चार देशों का गुट ‘क्वाड’ । ‘ऑकस’ में तीन देश हैं - ऑस्ट्रेलिया, इंगलैंड और अमेरिका । ‘क्वाड’ गुट के चार देशों में ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के अलावे जापान तथा भारत भी है । ऑक्सस गुट का सिरमौर इंगलैंड क्वाड में शामिल नहीं है और इसमें भारत तथा जापान को शामिल नहीं किया गया है । ऑक्स के बारे में रिपोर्ट है कि यह अफगानिस्तान संकट के बाद से एसिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते चीन के दबाव के कारण आपसी सुरक्षा हितों को ध्यान में रखकर बनाया गया है । लेकिन दोनों में शामिल अमेरिका और ऑस्ट्रलिया अपने सुरक्षा हित भारत तथा जापान से साझा नहीं करना चाहते । चीन का भारत और जापान से हमेशा जमीनी तथा समुद्री सीमा को लेकर तनाव बना रहता है ।

जो बाइडन तीसरे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं, जिनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘पंप एंड शो’ वाली गर्मजोशी मुलाकात हुई । लेकिन जो बाइडन ने नरेंद्र मोदी के वाशिंगटन पहुंचने से पहले ही ऑक्सस गुट के इंगलैंड के प्रधानमंत्री बोरिस जॉन्सन से 21 सितंबर को मुलाकात कर डाली । संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र शुरू होने से एक हफ्ता पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन और इंगलैंड के प्रधानमंत्री ने ‘ऑकस’ गठन का सुयंत्रित रूप से एलान 15 सितंबर को किया । 24 सितंबर को तय क्वाड गुट की शिखर बैठक से एक दिन पहले अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय की प्रेस सचिव जेन साको ने संवाददाता सम्मेलन में जापान और अमेरिका को ऑकस गुट में शामिल करने से इन्कार कर दिया । ऑक्सस को चीन की तरह फ्रांस से भी रंजिश है ।

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मोरिसन से तो नरेंद्र मोदी भी मिले । विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने इस स्थिति पर सफाई दी कि ‘ऑकस’ का ‘क्वाड’ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा । लेकिन यह बात उजागर हो गयी कि दोनों गुटों में तालमेल नहीं है और अंदर-अंदर साथ न खानेवाली खिचड़ी पक रही है । यही वास्तविकता है संयुक्त राष्ट्र के सेट-अप की । संयुक्त राष्ट्र स्थापना का 77वां वर्ष है और भारत अपनी आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है । इतने वर्षों में भी भारत की हैसियत उन्हीं देशों की तरह है, जो संयुक्त राष्ट्र गठन के समय आजाद नहीं थे । भारत को विश्व की आर्थिक-सैनिक महाशक्तियों में गिनती के नरेंद्र मोदी के एकतरफा प्रचार आंधी में यह सचाई उड़ नहीं पा रही है कि भारत और ग्रुप-4 के देश संयुक्त राष्ट्र में गठन के समय से ही स्थायी सीट पर दादागिरी से कब्जा जमानेवाले सुपर पावर पी-5 देश आज भी अन्य सदस्यों को अपनी पंगत में नहीं बैठने देना चाहते । वीटो पावर वाले ये पी-5 हैं - इंगलैंड, अमेरिका, सोवियत संघ, चीन और फ्रांस ।

इस बार सामंत और रैयत जैसा संयुक्त राष्ट्र का भेदभाव गुटबाजी में भी सामने आया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय मूल की अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला होरिस से भी मिले, लेकिन स्थायी सीट चर्चा में नहीं आयी ।

लेकिन इस क्वाड और ऑक्सस गुट को देखकर शायद विदेश मंत्री एस. जयशंकर को ग्रुप-4 को ऑक्सीजन देकर जीवित रखने की याद आयी । नरेंद्र मोदी और जो बाइडेन की भेंट से पहले ग्रुप-4 की विदेशमंत्रियों की बैठक तो हुई । लेकिन प्रधानमंत्री की व्यापार, कारोबार, निवेश की पंप एंड शो में स्थायी सीट का दावा स्ट्रेचर पर ही ऑक्सीजन लेता रहा ।

नरेंद्र मोदी ने 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा को 26 जनवरी समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया । फिर संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के समय न्यूयार्क में भी मोदी ओबामा से मिले । उसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप से नरेंद्र मोदी की ऐसी ‘दोस्ती’ हुई, कि गुजरात में आयोजित एनआरआई निवेशकों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में करोड़ों रूपये ट्रंप के स्वागत-सम्मान में फूंक दिये । जनवरी, 2021 में राष्ट्रपति बने जो बाइडेन से भी मोदी की अब वैसी ही ‘दोस्ती’ जो जाएगी । मगर संयुक्त राष्ट्र स्थायी सीट के दावे पर समर्थन मांगने वाली दोस्ती ये नहीं है । नरेंद्र मोदी को भूलना नहीं चाहिए कि ये वही अमेरिका है, जिसने 2002 में गुजरात दंगे के दौरान वहां के मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें अमेरिका आने से मना कर दिया था ।