गत 11 अप्रैल को जब एक पाकिस्तानी राजनयिक मोहम्मद अरशद चीमा को नेपाल पुलिस ने 16 किलोग्राम आरडीएक्स के साथ पत्नी समेत पकड़ा और 24 घंटे के अंदर उसे देश छोड़ने का आदेश दिया, उसी दिन दार्जिलिंग में सुभाष घीसिंग पर कातिलाना हमले की जांच कर रहे विशेष जांच दल ने जानकारी दी कि गोरखा आंदोलनकारियों को नेपाल की मदद से माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी (एमसीसी) और नगा विद्रोहियों द्वारा हथियार तथा उनके इस्तेमाल का प्रशिक्षण मिलता है।

नेपाल स्थित पाकिस्तानी दूतावास के लिए यह कोई नई बात नहीं है। ऐसी घटनाएं पहले भी सामने आ चुकी हैं, जो नेपाल के पाकिस्तान से दिन-ब-दिन मजबूत होते रिश्ते की परिचायक हैं और अब यह कहना बेमानी होगा कि पाकिस्तान नेपाली जमीन का इस्तेमाल भारत के लिए नहीं कर रहा है। दिसंबर 1999 में विमान अपहरण के कुछ ही दिनों बाद काठमांडू में अहमद सबूर को विस्फोटक और बड़ी मात्रा में जाली भारतीय नोट के साथ पकड़ा गया था। अरशद चीमा के जिस निजी मकान से आरडीएक्स बरामद हुआ, उसी के निकट 1998 में एक नेपाली राजनीतिज्ञ मिर्जा दिलशाद बेग को कुछ अज्ञात हमलावरों ने गोली मार दी थी। उनके मकान से 20 किलो आरडीएक्स बरामद हुआ था। बेग के बारे में कहा जाता है कि वे दुबई स्थित माफिया सरगना दाऊद इब्राहीम के करीबी थे, जिसके गिरोह की मुंबई में सक्रियता और पाकिस्तान से सांठगांठ किसी से छिपी नहीं है।

रिपोर्ट है कि अरशद चीमा ने दूतावास को छोड़कर एक निजी मकान में रहना पसंद किया था। उसका कार्यकाल समाप्त हो गया था और वह पाकिस्तान लौट रहा था। जिस मकान में अरशद चीमा रहता था, वह उसके एक रिश्तेदार का है, जिसका पश्चिमी नेपाल के पोखरा में एक इंजीनियरिंग संस्थान है। विदित हो कि पश्चिमी नेपाल एमसीसी का प्रभाव क्षेत्र है और माना जाता है कि वहां उसकी समानांतर सरकार चल रही है। राजनयिक ने उस निजी मकान से सुरक्षाकर्मी हटा दिए थे।

यह वह समय था, जब श्री वाजपेयी ईरान में भारतीय मैत्री की नींव मजबूत कर रहे थे, जबकि ईरान से नजदीकी बढ़ाने के लिए पाकिस्तान ने काफी मेहनत की है। एक साल के अंदर जनरल परवेज मुशर्रफ दो बार तेहरान हो आए हैं। उसी समय 23 देशों के सैनिक अधिकारियों का दल कश्मीर में भारत सरकार की ओर से घोषित एकतरफा संघर्षविराम का जायजा ले रहा था, जिसमें ब्रिटेन व अमेरिका के भी ब्रिगेडियर शामिल थे। उस दल की मौजूदगी में ही पाकिस्तान स्थित 15 संगठनों की जेहादी कौंसिल ने भारत सरकार से बातचीत की पेशकश कर दी। उसी वक्त अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें कहा गया है कि अगले 15 वर्षों में भारत व पाकिस्तान के संबंध और खराब होंगे। इशारा नेपाल की ओर है। रिपोर्ट में उस गैस पाइप लाइन की योजना पर भी उंगली उठाई गई है, जिसके बारे में भारत और ईरान के बीच बातचीत हुई है।

नेपाल में भारत विरोध का सिलसिला तो पुराना है। हमेशा चुनाव के समय बिहार, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल की नेपाल से लगने वाली सीमाएं सील कर दी जाती हैं, क्योंकि गड़बड़ी पैदा करने वाले नेपाल से ही लाए जाते हैं। पाकिस्तान के जरिए अब यह विरोध जरा बदले हुए अंदाज में फल-फूल रहा है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी का धन मुख्य रूप से नशीली दवाओं की तस्करी से आता है, जिसका नेपाल सबसे बड़ा बाजार है, जिसके जरिए दुनिया भर में आपूर्ति होती है और यह नेपाल की भी आय का एक बड़ा स्रोत है।

इस बीच एमसीसी ने पश्चिमी और पूर्वी नेपाल में कई बार पुलिस चौकियों पर हमले किए तथा सौ के लगभग पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी। उसके बावजूद महाराज वीरेंद्र को एमसीसी के खिलाफ शाही सेना के इस्तेमाल में हिचकिचाहट हो रही है। प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला अप्रैल के प्रथम सप्ताह में सेना की मदद के लिए जब शाही स्वीकृति लेने के प्रयास में जुटे थे, उसी समय नरेश के करीबी माने जाने वाले सांसद रमेशनाथ पांडेय की एमसीसी प्रमुख पुष्पकमल दहल से गुपचुप मुलाकात आखिर क्या मायने रखती है? अब कोइराला के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ रही है, जबकि इनको विश्वास मत हासिल किए अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं। एक महीने के अंदर इनके दो मंत्री इस्तीफा दे चुके हैं। सत्तारूढ़ नेपाली कांग्रेस के कुछ नेताओं को शक है कि महाराजा वीरेंद्र एमसीसी का अप्रत्यक्ष रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं। यह स्थिति भारत के लिए भी खतरे की घंटी है, क्योंकि दार्जिलिंग में गोरखा आंदोलनकारियों के पीछे एमसीसी मुख्य ताकत है।

अगर एमसीसी का लक्ष्य सिर्फ पूर्ण जनतांत्रिक व्यवस्था लाने तक सीमित हो, तब तो भारत से विरोध का तुक नहीं बनता, क्योंकि 1990 में हुई जनतंत्र बहाली में भारत का भी योगदान है। मगर यहां मामला है पाकिस्तान व चीन के इशारे पर चलने का, जो जाहिर है कि राजशाही खत्म करने के बहाने कुछ और इरादा लिए हुए हैं। इस त्रिगुट को और मजबूत करने के लिए चीनी प्रधानमंत्री शीघ्र ही काठमांडू व इस्लामाबाद जा रहे हैं। नरेश वीरेंद्र खुद पहले ही चीन हो आए हैं।

पंजाब से उखड़ने के बाद भारत में अलगाववाद जिंदा रखने और दंगे-फसाद कराने के लिए आईएसआई ने कश्मीर, गुजरात व महाराष्ट्र में पैर जमाए। फिर बांग्लादेश को जरिया बनाया और अब नेपाल में इसका इतना मजबूत गढ़ बन चुका है कि धीरे-धीरे नेपाल की पाकिस्तान से नजदीकी तथा भारत से दूरी बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान से नेपाल की नजदीकी बढ़ना भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि पूर्वी भारत के कई जिलों की सीमाएं सीधे नेपाल से मिलती हैं। इधर उत्तर-पूर्वी राज्यों और पूर्वी बंगाल में भी आईएसआई के विस्तृत संजाल की लगातार रिपोर्ट मिल रही है। मध्य बिहार और झारखंड में सक्रिय माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर का नेपाल के माओवादियों से गहरे संपर्क का भी मामला प्रकाश में आया है। इन दोनों गुटों को करीब लाने का श्रेय आईएसआई को है, जिसने बिहार में अपना शिकंजा मजबूत किया है।

आंध्रप्रदेश में बीहड़ों में रहकर रक्तपात मचाने वाले नक्सली गुट पीडब्ल्यूजी (पीपुल्स वार ग्रुप) के एमसीसी से छनने के पक्के सबूत पुलिस को मिल चुके हैं। बिहार, आंध्र व नेपाल तीनों जगह के माओवादी कम्युनिस्टों का धर्मगुरु चीन है। आजकल इनका अड्डा हो गया है दार्जिलिंग। नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला कई बार सफाई दे चुके हैं कि वे अपने यहां पाकिस्तान को भारत विरोधी गतिविधियां चलाने की इजाजत नहीं देंगे। प्रश्न है कि उसके बावजूद पाकिस्तान न केवल नेपाल का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर रहा है, बल्कि नेपाल में ही अस्थिरता पैदा करने के प्रयास में जुटा है और इसमें उसे कामयाबी भी मिल रही है। इसमें दो बातें हैं, या तो नेपाल सरकार इस तरह पाकिस्तान की गिरफ्त में आ चुकी है कि उससे निजात पाना कठिन हो रहा है, या फिर पाकिस्तान से घनिष्ठता रखने में नेपाल को फायदा नजर आ रहा है।

जिस पाकिस्तानी टीवी ने जनवरी में ऋतिक रोशन का मामला उछालकर नेपाल में भारतीयों के खिलाफ हिंसा भड़काई, आज उसे इतने चैनल दिखाने की छूट मिली हुई है, जितने नेपालियों के पास नहीं हैं। इसका मतलब बवाल के समय इस पर लगाया गया प्रतिबंध दिखावा था और इधर ऋतिक रोशन को नेपाल आने का न्योता दिया गया है। उस टीवी संचालक की अरशद चीमा से गाढ़ी दोस्ती थी।

नेपाल में पाकिस्तान की गहरी पैठ होने के अब कई ठोस सबूत सामने आ चुके हैं, जिनमें सबसे जबरदस्त है दिसंबर 1999 में काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर इंडियन एयर लाइंस के विमान का पाक समर्थित अफगान उग्रवादियों द्वारा अपहरण। वैसे तो अपहरण के समय ही इस संदेह की पुष्टि हो गई थी कि यह काम नेपाली सुरक्षा कर्मियों की मिलीभगत के बगैर संभव नहीं था, मगर पिछले वर्ष जून में जब जांच के बाद स्पष्ट हो गया कि इसकी योजना मुंबई में आईएसआई ने छह महीने पहले बनाई थी तो कोइरालाजी सफाई देने दिल्ली आ गए। तनाव इतना बढ़ गया कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र को काठमांडू जाकर स्थिति की समीक्षा करनी पड़ी। मगर नेपाल के जरिए भारत विरोधी गतिविधियां बंद नहीं हुईं, सिर्फ उसका तरीका बदल गया। दार्जिलिंग में उत्पन्न मौजूदा हालात से इसका जायजा मिल रहा है, जो नेपाल के प्रभाव में काफी समय से है और अब उसका फायदा पाकिस्तान भी उठा रहा है।

इसमें अब दो राय नहीं कि नेपाल को किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से फायदा पहुंच रहा है, क्योंकि पाकिस्तान के पास रक्षा और खुफिया एजेंसियों के लिए धन की कमी नहीं है। उसमें चीन का सहयोग सोने में सुहागा साबित हो रहा है। राजशाही को जड़ से मिटाने पर आमादा माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इन दिनों नेपाल सरकार की नाक में दम कर रखा है। 1996 में इस संगठन की स्थापना इस संकल्प को लेकर हुई थी कि हिंसा की बदौलत ही नेपाल से राजशाही खत्म की जा सकती है। चीन की बदौलत यह संगठन अस्तित्व में आया और आज नेपाल नरेश वीरेंद्र को चीन से दोस्ती करनी पड़ रही है। माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी (एमसीसी) की पाकिस्तान से भी उतनी ही मित्रता है, जितनी चीन से।