भारत और नेपाल के बीच खटास पैदा करने की पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई की लगातार बढ़ती कोशिशों का एक ताजा नमूना है बॉलीवुड स्टार ऋतिक रोशन का मामला, जिसमें पाकिस्तान की भूमिका का पता बड़ी बारीकी से विश्लेषण करने पर चलता है।
बड़े ही नियोजित ढंग से ऋतिक रोशन द्वारा नेपाल के बारे में की गई कथित टिप्पणी को मुद्दा बनाकर नेपाल में भारत विरोधी भावनाओं को सुलगाने की साजिश ऐसे समय में रची गई, जब भारत-नेपाल संबंध सुधरने के आसार बन रहे थे। इस घटना का दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंध पर भी असर पड़ा है। मनीषा कोइराला की फिल्म दिखाए जाने के खिलाफ कहीं-कहीं लोगों ने गुस्से का इजहार किया है।
अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि ऋतिक रोशन ने नेपाल के बारे में कुछ कहा अथवा नहीं और अगर कहा तो क्या कहा, लेकिन इसी बहाने नेपाल में रह रहे भारतीयों के खिलाफ खूनी हमले की योजना का जो समय चुना गया, वह भारत व नेपाल दोनों के लिए खास अर्थ रखता है। 28 दिसंबर को ही रोशन ने चुनौती दी कि कोई इसे साबित करे और उसी दिन अचानक यह बात सामने आई कि जिस टीवी यूनिट ने पहली बार ऋतिक का मामला उछाला, उसका संचालक एक आईएसआई का आदमी है, जो उसके बाद से लापता है। पांच दिनों तक लगातार हुए विरोधी दंगे के दौरान पूरे नेपाल में भारतीय टेलीविजन का प्रसारण बंद रहा, जिसके चलते ऋतिक रोशन द्वारा किया गया खंडन वहां के दर्शकों तक पहुंच नहीं पाया।
यह घटना अचानक नहीं हुई। उसके पीछे कई ऐसी बातें जुड़ी हैं, जिनका सीधा प्रभाव भारत-नेपाल संबंध के साथ-साथ नेपाल के राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ा है। दिसंबर 1999 में इसी अवधि में भारतीय विमान 814 का पाकिस्तान के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अपहरण किया गया था और इस बात के पक्के सबूत मिल गए थे कि नेपाली सुरक्षा अधिकारियों की मिलीभगत से पाकिस्तान व अफगानी उग्रवादियों ने अपहरण किया था। भारत को अपने यात्रियों की जान बचाने के लिए कश्मीर की जेल में बंद पाकिस्तानी कट्टरपंथी मौलाना मसूद अजहर को रिहा करना पड़ा, जो फिर से कश्मीर भेजने के लिए जेहादियों का नया जत्था तैयार करने में जुटा है।
पिछले वर्ष के मध्य में नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला भारत से संबंध सुधारने के प्रयास में दिल्ली आए, क्योंकि भारत ने अपहरण की घटना के बाद नेपाल से किसी विमान के यहां आने और भारत से नेपाल उड़ान पर रोक लगा दी थी। इसमें मुंबई के माफिया सरगना छोटा शकील का नाम आ रहा है, जो दुबई स्थित दाऊद इब्राहीम के कहने पर आईएसआई के लिए काम करता है। अपहरण की योजना भी मुंबई में ही बनी थी और छोटा शकील की ऋतिक रोशन के पिता राकेश रोशन से पुरानी खुंदक है, जिसका फायदा पाकिस्तान ने उठाया।
दिसंबर 2000 में दोनों देशों के संबंधों को एक नया रूप देने और 1950 की महाकाली संधि के पुनर्नवीकरण की चर्चा जोरों पर थी। ठीक उसी समय आईएसआई ने सोची-समझी रणनीति के तहत यह सारा कुछ कराया। यही समय था जब भारत ने रमजान संघर्ष विराम की एकतरफा घोषणा करके सिर्फ हिंसा में विश्वास रखने वाले पाक समर्थित कश्मीरी उग्रवादियों को शांति की पटरी पर लाने की मुहिम छेड़ी थी। विदेशमंत्री जसवंत सिंह और रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस ने पाकिस्तान की इस नई चाल पर अफसोस जताया है। नए वर्ष का पहला दिन तो 'नेपाल बंद' के रूप में गुजरा, जिसमें भारी हिंसा की सूचना है और भारत को शक है कि यह आईएसआई की करतूत है। 1990 में जनतंत्र बहाली के बाद से नेपाल की यह 64वीं आम हड़ताल थी। महाराजा वीरेंद्र के पिता महेंद्र ने विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला की सरकार को बर्खास्त करने के बाद 30 वर्षों तक किसी को चूं तक नहीं करने दी। वह अपने ढंग की अजीब दलविहीन व्यवस्था थी, जिसमें बंद-हड़ताल वगैरह के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था।
नेपाल विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र है जिसके हिन्दू बहुल भारत से सामान्य संबंध नहीं हैं, जबकि महाकाली संधि के सातवें अनुच्छेद में भारत व नेपाल के लोगों के लिए निर्बाध आवाजाही और एक-दूसरे की भूमि पर बसने का भी प्रावधान है। सीमावर्ती इलाकों में नेपाल प्रशासन की शह पर जिस तरह से भारत विरोधी गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं, उसके मद्देनजर अब भारत सरकार को इस अनुच्छेद के औचित्य पर विचार करना ही होगा।
अवकाश बिताने केरल गए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 28 दिसंबर को श्री कोइराला से फोन पर बात करके भारतीयों के खिलाफ हमले पर चिंता जताई और उसी दिन कोइराला के प्रबल विरोधी कृष्णप्रसाद भट्टराई ने कोइराला को अपदस्थ करने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी शुरू कर दी। हालांकि अविश्वास प्रस्ताव गिर गया। बंद का आयोजन श्री कोइराला के इस्तीफे के लिए किया गया। कानून व व्यवस्था की हालत खराब होने का मुद्दा बनाकर ही विमान अपहरण के थोड़े दिनों बाद श्री गिरिजाप्रसाद कोइराला ने भी अविश्वास प्रस्ताव लाकर श्री भट्टराई की सरकार गिराई थी।
आईएसआई का मुख्य उद्देश्य है नेपाल की जमीन का भारत के खिलाफ इस्तेमाल करना और यह तभी संभव है, जब भारत व नेपाल के संबंध अच्छे न हों। यह स्वाभाविक है कि जब नेपाल के जरिए भारत विरोधी गतिविधियां जारी रहेंगी तो फिर दोनों देशों के संबंध अच्छे कैसे रह सकते हैं। इस काम में पाकिस्तान को चीन से भी पूरा सहयोग मिल रहा है, जिससे नेपाल की भारत की आजादी के समय से ही नजदीकी रही है। नेपाल में माओवादी कम्युनिस्टों का उदय चीन के सहयोग से हुआ, जिनकी भारत विरोधी हिंसक गतिविधियां आज नेपाल के लिए समस्या बनी हुई हैं।
नेपाल में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की घुसपैठ की शुरुआत का समय 1996 माना जा रहा है, जब तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री शेखबहादुर देउबा पाकिस्तान की यात्रा पर गए। किसी भी नेपाली प्रधानमंत्री की वह पहली इस्लामाबाद यात्रा थी। उसी समय एक उच्चस्तरीय नेपाली प्रतिनिधिमंडल चीन भी गया। रिपोर्ट है कि पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फारूक अहमद लेघारी और प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो से देउबा की बंद कमरे में बातचीत हुई। उसके बाद से आईएसआई एजेंटों ने अपने जाल फैलाने शुरू किए और आज नेपाल के भारत से लगने वाले सीमावर्ती इलाके में चप्पे-चप्पे पर पाकिस्तानी जासूस भारत व नेपाल दोनों को अंदर से कमजोर करने का अभियान चला रहे हैं।
भारतीय सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक उत्तरप्रदेश के सोनौली, महाराजगंज, गोरखपुर, गोंडा, बहराइच, आजमगढ़ और बिहार के रक्सौल, मधुबनी, वाल्मीकि नगर, पश्चिम चंपारण इलाकों में जगह-जगह आईएसआई के ठिकाने बने हुए हैं। पिछले वर्ष मई में एक महिला पत्रकार रुचि सिंह को दिल्ली पुलिस ने पकड़ा, जो कथित रूप से कुछ सैनिक अधिकारियों के जरिए आईएसआई के लिए नेपाल गुप्त सूचनाएं भेजती थी। हाल में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्रावास में भी आईएसआई की घुसपैठ की बात प्रकाश में आई और विश्वविद्यालय कैंपस में तनाव का वातावरण रहा। बिहार और उत्तरप्रदेश के सीमावर्ती जिलों में रहने वाले मुस्लिमों से रिश्तेदारी का इस्तेमाल पाकिस्तान भारत में तोड़फोड़ को बढ़ावा देने के लिए कर रहा है। इस काम में अफगानिस्तान की सीमा की तरह आईएसआई को मस्जिदों और मदरसों के जरिए अपने मकसद को अंजाम देने में आसानी हुई है। केंद्र सरकार ने बिहार व उत्तरप्रदेश सरकारों को सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। इस बीच गृह मंत्रालय मस्जिदों और मदरसों पर नजर रखने के लिए भी एक विशेष सुरक्षा कमांडो को अंतिम रूप देने में लगा हुआ है।
कायदे से देखा जाए तो भारत और नेपाल के बीच अच्छे संबंध कभी रहे ही नहीं। पं. जवाहरलाल नेहरू जब प्रधानमंत्री बने तो नेपाल के तत्कालीन महाराजा त्रिभुवन ने अपने देश की हालत को देखते हुए उनसे आग्रह किया कि भारत एक प्रकार से नेपाल को अपना एक अंग समझे, क्योंकि महाराजा अपनी रक्षा और विदेश विभाग की जिम्मेदारी भारत को देना चाहते थे, लेकिन महाराजा महेंद्र को चीन से गठजोड़ करने में ज्यादा हित नजर आया और आज भी नेपाल अपनी रक्षा के लिए चीन पर निर्भर है। इसका जिक्र अभी हाल में वरिष्ठ भाजपा नेता के.आर. मलकानी ने किया, जिसको लेकर बवेला मचा। इतना ही नहीं, दुनिया के गरीब देशों में से एक गिना जाने वाला नेपाल चीनी सामानों का सबसे बड़ा बाजार है। महाराजा त्रिभुवन के नाम पर बने काठमांडू के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को दरअसल आईएसआई का अड्डा कहा जाना चाहिए। जो नेपाल स्वाभाविक रूप से भारत का सबसे नजदीकी मित्र हो सकता है, उसकी चीन पर निर्भरता का सीधा तात्पर्य है पाकिस्तान का नेपाल में प्रवेश और इस महाद्वीप में मौजूद ध्रुवीकरण का ही परिणाम है नेपाल में भारत विरोध।
यह वाकई बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि नेपाल में जनतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन करने वाली नेपाली कांग्रेस के जिन नेताओं ने भारतीय जमीन का इस्तेमाल किया, वे आज आईएसआई के इशारे पर चल रहे माओवादी कम्युनिस्टों के बहकावे में आ गए हैं, जबकि माओवादी भी भारत के नक्सलवाद से प्रेरित हुए हैं।
पाकिस्तान ने नेपाल की अमूमन बांग्लादेश वाली हालत कर दी है। किसी भी वैसी सरकार का वहां टिकना असंभव हो गया है, जो भारत से संबंध सुधारने की कोशिश करे। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भी अब आईएसआई की गिरफ्त से निकलने का प्रयास कर रही हैं। इस बीच पाकिस्तानी दूतावास के एक वरिष्ठ अधिकारी को जासूसी के आरोप में उन्होंने ढाका छोड़ने का आदेश दिया है। नेपाल के प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला जून 2000 में भारत को यह आश्वस्त करने दिल्ली आए थे कि नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियों की इजाजत नहीं दी जाएगी और वे भारत से अपने संबंध को काफी महत्व देते हैं। उसके पहले भी वे आश्वासन देते रहे, जिसकी सच्चाई का जायजा लेने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र स्वयं काठमांडू गए। कोइराला के 10 महीने के कार्यकाल में माओवादी ने चुन-चुनकर भारतीयों को निशाना बनाया।
नेपाल के इन कम्युनिस्टों को जोड़तोड़ की कला में महारत हासिल है। इनकी इसी कला का फायदा आईएसआई उठा रही है। पहले कम्युनिस्टों ने राजशाही समर्थक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी को तोड़ा और उसकी मदद से नेपाली कांग्रेस में फूट डाली ताकि वहां कोई सरकार ज्यादा दिन तक टिक नहीं सके। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में हुए दंगे में भारतीय मूल के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ रहे नेपाल सद्भावना पार्टी के कई कार्यालयों पर हमले हुए, जिसके नेता गजेंद्र नारायण सिंह ने भारतीयों का प्रतिनिधित्व संसद में बढ़ाने के लिए काफी संघर्ष किया है। माओवादी कम्युनिस्टों के भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय अल्फा उग्रवादियों के साथ-साथ लिट्टे से भी गहरे संपर्क हैं, जिसकी उपज है नेपाल में भारतीय शैली की पढ़ाई वाले स्कूलों पर हमला। लिट्टे की तर्ज पर ये भी अपने स्वार्थवश हिंसा के लिए बच्चों का इस्तेमाल करते हैं। कोइराला ने संबंध सुधारने की कोशिश की थी, जिनकी अब अपनी ही कुर्सी खतरे में है।