पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़़ तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) और केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार में ठनने की स्थिति है, जब कोलकाता नगर निगम समेत 107 नगरपालिकाओं के चुनाव होने वाले हैं । मुख्यरूप से कानून और व्यवस्था को लेकर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ बेहद चिंतित हैं । इसलिए राज्यपाल पहले राज्य चुनाव आयुक्त सौरभ दास से मिले और उनसे नगरपालिका चुनाव को हिंसामुक्त सुनिश्चित करने के लिए सारे जरूरी कदम उठाने कहा । लेकिन राज्यपाल न उतने से इत्मीनान महसूस नहीं किया और 6 मार्च को उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से भी मुलाकात की । पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने केंद्रीय गृहमंत्री को बताया कि राज्य में कानून और व्यवस्था की हालत बहुत गंभीर है । जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बने सात महीने हुए हैं । कानून व व्यवस्था समेत राज्य के हालात ठीक-ठाक नहीं चल रहे हैं, जिसमें दीदीराज की राज्यपाल से सीधी तनातनी भी शामिल है । दीदीराज के लिए असामान्य हालात कोई नयी बात नहीं है । मगर जगदीप धनखड़ को राज्यपाल बनने के बाद से लगातार टकराव का सामना करना पड़ रहा है । अभी चुनाव के मद्देनजर राज्यपाल ज्यादा चिंतित हैं, जबकि राज्य सरकार इसे राज्यपाल के अधिकारक्षेत्र का महकमा नहीं मानती ।
दीदी के 2011 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से और उसके पहले भी पश्चिम बंगाल में कोई पंचायत या नगरपालिका चुनाव बिना हिंसा तथा तनाव के नहीं हुआ । सभी दलों के लिए कोलकाता नगर निगम चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न है । लेकिन तृणमूल कांग्रेस के लिए और भी ज्यादा है । क्योंकि कोलकाता नगर निगम में ही 2010 में भारी जीत दर्ज करके दीदी ने तृणमूल कांग्रेस का पहला चुनावी वर्चस्व स्थापित किया ।
अभी स्थिति तनावपूर्ण होने के अन्य कारण भी हैं । राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) और नागरिकता संशोधन कानून(सीएए) को लेकर केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार के बीच मतभेद उफान पर है । दीदी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियां मेल नहीं खाती । भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने 2016 पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव और 2014 लोकसभा चुनाव के समय से ही तृणमूल को ‘निर्मूल’ करने का अभियान चला रखा । उसमें भाजपा को सफलता मिली और 2019 आम चुनाव में भाजपा की लोकसभा सीटें 2 से बढ़कर 18 हो गयीं । तृणमूल सिमटकर 22 पर आ गयी । 2019 आम चुनाव के बाद अमित शाह भाजपा अध्यक्ष पद छोड़कर गृहमंत्री हो गए ।
अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने गत हफ्ते एक मार्च को कोलकाता में रैली की । उसके बाद से तनाव बढ़ता ही गया है । पुलिस रिपोर्ट के अनुसार रैली में भाजपा कार्यकर्ता ‘देश क गद्दारों को, गोली मारो सालों को’ जैसे उकसाने वाले नारे लगाते देखे गए । आईपीसी की धारा 153ए, 505, 506 और 34 के अन्तर्गत दंगा तथा हिंसा भड़काने वाले मामलों में उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया । राज्यपाल के केंद्रीय गृहमंत्री से मुलाकात के समय तक ‘गोली मारो साले को’ नारे लगाने के सिलसिले में छह भाजपा कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा चुका था । अमित शाह की कोलकाता रैली के समय दिल्ली में हुई हिंसा को लेकर पूरे देश में उफान मचा हुआ था । केंद्रीय गृहमंत्री की रैली के अगले दिन दो मार्च को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में नगरपालिका चुनाव और 2021 विधान सभा चुनाव का प्रचार अभियान छेड़ते हुए दिल्ली हिंसा को ‘राज्यपोषित’ बताया । दीदी ने ‘बांग्लार गोर्बो ममता’(बंगाल की गर्व ममता) जन-अभियान के अंतर्गत राज्यव्यापी विरोध कार्यक्रम भी घोषित कर दिया । दीदी ने भाजपा केंद्रीय नेतृत्व पर पूरे देश में 2002 गुजरात टाईप दंगे की कोशिश का आरोप लगाया और दिल्ली हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र की प्रतिकूल टिप्पणी का भी हवाला दिया । विदित हो कि 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह थे । उसके पहले 6 दिसंबर, 2019 को बाबा साहब अंबेडकर की पुण्यतिथि पर दीदी ने एनआरसी के खिलाफ आजादी की दूसरी लड़ाई छेड़ने का एलान किया । एक मार्च, 2019 को अमित शाह की कोलकाता रैली एनआरसी और सीएए को उचित ठहराने वाले चुनाव अभियान पर केंद्रित थी ।
दीदी आत्मविश्वास से लवरेज हैं । क्योंकि हालिया तीन विधान सभा सीटों के उपचुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने सीधे भाजपा को हराया है । 2016 विधान सभा चुनाव में भी भाजपा को 2014 आम चुनाव में मिली जीत के हिसाब से सफलता नहीं मिली ।
ऐसे ही माहौल में राज्य में नगरपालिका चुनाव की तैयारी है, जो 2021 में होनेवाले विधान सभा चुनाव का सेमी फाइनल माना जा रहा है । भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों का अभियान एक जैसा है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं कमान संभाल रखी है । बंगाल के सभी भाजपाा सांसदों से बारी-बारी से एक-एक करके मिलकर प्रधानमंत्री चुनाव फीडबैक और स्थिति की जानकारो ले रहे हैं । राज्यपाल जगदीप धनखड़ की केंद्रीय गृहमंत्री से मुलाकात के एक दिन पहले पांच मार्च को प्रधानमंत्री, अलीपुरद्वार लोकसभा सीट से जीते जॉन बारला और बांकुरा से जीते सुभाष सरकार से मिले । दोनों ही सांसदों ने मुलाकात के बाद संवाददाताओं को बताया कि प्रधानमंत्री ने नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी पर फोकस किया । प्रधानमंत्री विधान सभा चुनाव से पहले जानना चाहते थे कि इन कानूनों में किए गए बदलाव पर लोग किस प्रकार प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं । बकौल सांसद प्रधानमंत्री को बताया गया कि विरोध सिर्फ तृणमूल कांग्रेस तक सीमित है, लोग विरोध नहीं कर रहे हैं ।
दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो दीदी(ममता बनर्जी) ने सात मार्च से व्यापक जनसंपर्क अभियान शुरू कर दिया है । राज्य सरकार नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को नकार चुकी है । इसके खिलाफ अन्य गैर-भाजपा शासित राज्यों की तरह बंगाल विधान सभा से प्रस्ताव पारित हो चुका है ।
राज्य निर्वाचन आयोग मार्च के अंतिम सप्ताह में नगरपालिका चुनाव की अधिसूचना जारी करेगा । कोलकाता नगर निगम और 107 नगरपालिकाओं के चुनाव अध्य अप्रील में होंगे । अमित शाह की कोलकाता रैली के अगले दिन से शुरू दीदी का चरणबद्ध जन-जन संपर्क अभियान 10 मई तक चलेगा । अभी यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि उस दौरान चुनाव अधिसूचना जारी होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं का ‘दीदी के बोलो’ और ‘बांग्लार गोर्बा ममता’ अभियान जारी रहेगा या नहीं । दीदी की चुनाव आयोग से पहले के नगरपालिका चुनावों में भी ठनती रही है ।
राज्य चुनाव आयोग को पहले कानून व व्यवस्था को लेकर राज्यपाल की चिंता का ख्याल रखना है । दो मार्च को दीदी का जन-जन संपर्क अभियान शुरू हुआ और तीन मार्च को राज्यपाल ने राज्य चुनाव आयुक्त सौरभ दास से कानून व व्यवस्था के हालात पर विमर्श किया । राज्यपाल ने 2018 पंचायत चुनाव में हिंसा का जिक्र किया और राज्य चुनाव आयुक्त को कहा कि संविधान की धारा 24(3) के अंतर्गत बताएं कि हिंसा रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं । और चार मार्च को दीदी ने दिल्ली हिंसा को ‘राज्यपोषित’ बताकर राज्यव्यापी विरोध तथा दिल्ली के हिंसा प्रभावितों के लिए फंड ऊगाही अभियान शुरू कर दिया । कानून व व्यवथा पर भी केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए दीदी ने विरोध अभियान रैली में कहा कि ‘दिल्ली में जो कुछ हुआ वो राज्यपोषित था, क्योंकि उसे सांप्रदायिक रंग दिया गया और केंद्र सरकार के नियंत्रण वाली दिल्ली पुलिस को कार्रवाई की इजाजत नहीं थो । जबकि केंद्र के पास सीआरपो, सीआईएसएफ सब है, हमारे पास तो सिर्फ राज्य पुलिस है ।’
2018 में पंचायत चुनाव का मामला कोलकाता हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गया, जिसका जिक्र राज्यपाल ने गत हफ्ते राज्य चुनाव आयोग से मुलाकात में किया । चुनाव के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राज्य सरकार और चुनाव आयोग दोनों की निष्पक्षता पर ऊंगलियां उठी । भाजपा कार्यकर्ता सुप्रीम कोर्ट तक गए । 2013 में भी पंचायत चुनाव के दौरान राज्य चुनाव आयुक्त मीरा पांडे जब ममता बनर्जी के अनुसार काम करने को तैयार नहीं हुई तो दीदी मीरा पांडे को हटाने पर अड़ गयी । वो मामला भी कोलकाता हाईकोर्ट तक गया ।
2016 विधान सभा चुनाव के दौरान केंद्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा 40 पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के तबादला आदेश पर दीदी बिफर उठी ।
अभी भाजपा नेता जैसी भूमिका में राज्यपाल जगदीप धनखड़ स्वयं हैं । 19 जुलाई, 2019 से कार्यभार ग्रहण करने के समय से ही राज्यपाल का राज्य सरकार से तालमेल ठीक नहीं चल रहा है ।
पश्चिम बंगाल राज्य अनुसूचित जाति(एससी), जनजाति बिल(एसटी), 2019 और पश्चिम बंगाल भीड़ हिंसा रोक बिल दिसंबर से राज्यपाल से मंजूरी के लिए लंबित है । चार मार्च को ही राज्यपाल ने मुख्य सचिव राजीव सिन्हा से कानून व व्यवस्था समेत इस पर भी चर्चा की। हालिया विधान सभा सत्र के दौरान दो दिन विधान सभा काम-काज नहीं होने के कारण स्थगित रहो, क्योंकि राज्यपाल ने दोनों बिलों पर राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा ।
दिसंबर में ही जादवपुर यूनिवर्सिटी कैंपस की एक अप्रत्याशित घटना में छात्र संगठनों ने राज्यपाल को कानून व व्यवस्था बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराकर उन्हें राज्यपाल और चांसलर(कुलाधिपति) पद से हटाने की मांग कर डाली । दो छात्र संगठनों ने राज्यपाल के नाम लिखे खुले पत्र में कहा - ‘आपको चांसलर पद से हटाया जाता है । आप 19 सितंबर, 2019 को कैंपस में बिना बुलाए शरारती तत्वों के साथ आए, जिन्होंने बम फेंका, महिलाओं के साथ बदसलूकी किया और यूनिवर्सिटी के विभिन्न विभागों में तोड़फोड़ की । फिर 23 दिसंबर को भी आपने कैंपस में घुसकर एनआरसी, सीएए और एससीएसटी बिल पर छात्रों से सवाल पूछे ।’