पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव के बाद हुई व्यापक हिंसक वारदातों की जांच रिपोर्ट में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि यहां ‘कानून का शासन’ नहीं ‘शासक का कानून’ चल रहा है । कलकता हाईकोर्ट के निर्देश पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी) ने हाईकोर्ट को सौंपी गयी अपनी फाइनल जांच रिपोर्ट में राज्य की तृणमूल कांग्रेस सरकार के मंत्रियों और नेताओं को दोषी पाया है । आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चुनाव वाद कथित हिंसा में पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़़ तृणमूल कांग्रेस के मंत्री और नेता शामिल थे, जिसमें बड़े पैमाने पर हत्या, बलात्कार, घर उजाड़ने और भयादोहन से हजारों नागरिकों की जिंदगी तबाह हो गयी । ऐसी हिंसक वारदातें मई के पहले सप्ताह में चुनाव परिणाम आने के बाद काफी समय तक जारी रही ।
एनएचआरसी ने कई वारदातों को काफी गंभीर बताते हुए इनकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) से और राज्य के बाहर की फास्ट-ट्रैक कोट में कराने की सिफारिश हाईकोर्ट से की है । मानवाधिकार आयोग ने जांच के बाद सामने आए तथ्यों पर आगे की कार्रवाई के लिए विशेष जांच दल गठित करने की भी अनुशंसा की है, जिसकी मॉनिटरिंग कोर्ट करे ।
कलकता हाईकोर्ट को 13 जुलाई को सौंपी गयी रिपोर्ट में एनएचआरसी ने 123 राजनीतिक नेताओं का नाम अभियुक्तों और संदिग्धों की सूची में डाला है, जिनमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) के चुनाव एजेंट समेत उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के कई नेता शामिल हैं । आयोग ने उन्हें ‘शातिर अपराधी’/गुंडे का नाम दिया है और कहा है कि व्यापक हिंसा के बावजूद अभी तक बहुत ‘कम’ गिरफ्तारियां हुई हैं । रिपोर्ट के अनुसार हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई के बजाए राज्य सरकार आंख मदे रही ।
हाईकोर्ट में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग चुनाव बाद हिंसा जांच रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद उसकी कुछ बातें 15 जुलाई को मीडिया में आयी । इससे बिल्कुल बेखबर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 15 जुलाई को ही चुनाव आयोग को कहा कि बंगाल सात विधान सभा सीटों और दो राज्यसभा सीटों के लिए उपचुनाव कराने को तैयार है । दीदी(मुख्यमंत्री) के लिए और उनकी पार्टी के लिए बंगाल में हिंसा कोई समस्या नहीं है । तृणमूल कांग्रेस सांसदों के छह-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने 14 जुलाई को चुनाव आयोग से दिल्ली में मुलाकात करके यह उपचुनाव कोविड-19 संक्रमितों के कम हो जाने के कारण जल्द-से-जल्द कराने की मांग की । विधान सभा चुनाव बाद हिंसा को लेकर चल रहे मामलों को पश्चिम बंगाल सरकार ने कोई तवज्जो नहीं दी ।
बंगाल में चुनाव बाद हिंसा को लेकर घमासान नयी विधान सभा गठित होने के समय ही भड़क उठा । राज्य सरकार के उदासीन रवैए के मद्देनजर कलकता हाईकोर्ट ने 18 जून को ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष से कहा कि चुनाव बाद हिंसा में बेघर और बेवा हुए लोगों की शिकायतों की जांच के लिए कमिटी गठित करें । इस आदेश के बाद एनएचआरसी ने सात-सदस्यीय कमिटी बनायी और कमिटी ने पश्चिम बंगाल का दौरा करके जांच की अंतरिम रिपोर्ट हाईकोर्ट को 30 जून को सौंपी ।
2 जुलाई को दीदी के खिलाफ दो संवैधानिक मंचों पर एक साथ हमला हुआ । नवगठित विधान सभा सत्र के पहले सत्र के पहले दिन हिंसा पर विवाद उछला 2 जुलाई को ही हाईकोर्ट ने एनएचआरसी की अंतरिम जांच रिपोर्ट पर राज्य सरकार को फटकार लगायी । कलकता हाईकोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस राजेश बिंदल की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने पुलिस को उन तमाम मामलों में मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया जिसकी रिपोर्ट या तो पुलिस को मिली या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने रख गए अथवा किसी अन्य ऑथोरिटी/आयोग को इसकी सूचना दी गयी । धारा 164 पीसी के अंतर्गत तमाम प्रभावित लोगों के बयान कानून के अनुसार तुरंत दर्ज किए जाएं । चुनाव बाद हिंसा में घायलों की चिकित्सा और उनके राशन की व्यवस्था की जाए । हाईकोर्ट पीठ ने राज्य-सरकार को हिंसा से संबंधित सारे कागजात सुरक्षित रखने के आदेश दिए । मुख्य सचिव को हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि 02/05/2021 से लेकर अभी तक पुलिस की स्पेशल ब्रांच, खुफिया ब्रांच, कंट्रोल रूम और स्थानीय पुलिस के बीच हुए सारे वार्तालापों के कागजात अधिकारियों के हस्ताक्षर, मुहर के बाद सील बंद करके सुरक्षित रखे जाएं । हाईकोर्ट के पांच जजों ने 2 जुलाई के आदेश में राज्य सरकार से हिंसक घटनाओं की जांच कर रहे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम के साथ सहयोग करने कहा ।
2 जुलाई को ही दिल्ली से कोलकाता तक दो और बड़ी बातें सामने आयी । इसस एक ही साथ दीदी ने और भाजपा के बंगाल चैप्टर ने असहज महसूस किया । कोलकाता में जिस समय हाईकोर्ट जज राज्य सरकार को लंबा आदेश जारी कर रहे थे, उसी समय विधान सभा में भाजपा विधायकों ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को अपना अभिभाषण बीच में ही रोकने को मजबूर कर दिया ।
भाजपा विधायकों ने राज्यपाल के अभिभाषण में चुनाव बाद हिंसा का जिक्र नहीं होने के कारण हंगामा मचाया और राज्यपाल का बीच में अभिभाषण रोककर निकल जाना पड़ा । भाजपा विधायकों का नेतृत्व सदन में विपक्षी नेता शुभेन्दु अधिकारी कर रहे थे, जिन्होंने नंदीग्राम सीट से ममता बनर्जी को हराया है। वैसे राज्यपाल और मुख्यमंत्री में हिंसा समेत सरकार, प्रशासन के मामले में हमेशा ठनी रहती है । लेकिन विधान सभा सत्र शुरू होने के पहले दिन राज्यपाल को अपने अभिभाषण में वही पढ़ना होता है, जो राज्य सरकार तैयार करके दे । राज्यपाल जगदीप धनखड़ के नजदीकी सूत्रों के अनुसार वे खुद भी चाहते थे कि अभिभाषण में चुनाव बाद हिंसा का जिक्र हो, मगर राज्य सरकार इसके सख्त खिलाफ थी ।
दिल्ली से दो जुलाई को ही रिपोर्ट मिली कि तृणमूल कांग्रेस सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भारत के अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता के इस्तीफे की मांग की ।
तृणमूल सांसदों के अनुसार शुभेन्दु अधिकारी के खिलाफ कई मामलों की जांच सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय कर रहा है, ऐसे में सोलिसिटर जनरल से अधिकारी का मिलना इस पद की गरिमा को कलंकित करता है । तुषार मेहता ने बार-बार सफाई दी कि वे अधिकारी से नहीं मिले ।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा कलकता हाईकोर्ट को अंतरिम रिपोर्ट सौंपे जाने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने हिंसा के मामले को गंभीरता से लिया ।
सुप्रीम कोर्ट जज विनीत सरण और दिनेश महेश्वरी की पीठ ने एक जुलाई को एक याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली, जिसमें चुनाव बाद बेकाबू हिंसा के कारण राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए केंद्र को निर्देश देने का अनुरोध किया गया है ।
चुनाव के पहले बंगाल का राजनीतिक हाल-चाल गड़बड़ था, जिसमें भाजपा ने तृणमूल को निर्मूल करने के लिए तृणमूल के नेताओं, कार्यकर्ताओं को फोड़कर उन्हें भाजपा के टिकट पर खड़ा किया । उनमें से ज्यादातर उम्मीदवार हार गए । चुनाव परिणाम भाजपा की उम्मीदों के खिलाफ जाने के बाद पासा पलट गया औरर तृणमूल से भाजपा में गए कार्यकर्ताओं की ‘घर वापसी’ शुरू हो गयी । सबसे बड़ा झटका भाजपा को अपने अखिल भारतीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय के निकलने से लगा । मुकुल रॉय दीदी के दाहिने हाथ माने जाते थे, जिन्हें भाजपा ने 2019 लोकसभा चुनाव से दो साल पहले फोड़ा । भेड़िया धसान की तरह दीदी ‘घर वापसी’ नहीं होने दे रही हैं ।
लेकिन इसके साथ-साथ चुनाव परिणाम आते ही हिंसा का तांडव मचा, जिससे आम जनता का हाल-चाल खराब हो गया । मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार जनजातीय समुदाय की महिलाओं को ज्यादा निशाना बनाया गया है । जांच के दौरान दौरा करने गए आयोग की टीम के सदस्यों को खदेड़ने के प्रयास किए गए । एनएचआरसी ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को भी फाइनल रिपोर्ट 18 जुलाई को सौंपी । आयोग के एक सदस्य के अनुसार अगर कार्रवाई नहीं की गयी तो राष्ट्रपति के पास रिपोर्ट भेजी जाएगी ।
दीदी मानवाधिकार आयोग को भाजपा के इशारे पर पूर्वाग्रह से ग्रसित बता चुकी हैं । क्योंकि आयोग की रिपोर्ट पर हाईकोर्ट ने कोलकाता पुलिस के उपायुक्त(दक्षिण उपनगर क्षेत्र) को मानवाधिकार आयोग को सुरक्षा नहीं देने के कारण कारण बातों नोटिस जारी किया । उस इलाके में आयोग टीम पर हमला हुआ । हाईकोर्ट ने भाजपा नेता अभिजित सरकार के शव का दुबारा परीक्षण करने का भी निर्देश दिया, जो चुनाव बाद कथित हिंसा में मारे गए ।
दीदी को हालचाल ठीक नहीं होने के अन्य कारण भी हैं । फिलहाल नंदीग्राम से जीते शुभेन्दु अधिकारी को रास्ते से हटाने और स्वयं विधायक बनने की चिंता है । दीदी को हरानेवाले शुभेन्दु अधिकारी के निर्वाचन को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी तो जज कथित रूप से भाजपा से पुराने संपर्क वाले निकल आए । दीदी की याचिका सुनवाई के लिए हाईकोर्ट ने जज कौशिक चंदा के पास सूचीबद्ध की । भाजपा के पुराने संपर्क के आरोप के कारण चंदा ने खुद को इस सुनवाई से अलग कर लिया । 14 जुलाई को हिंसा को लेकर मचे उफान के बीच खबर आयी कि हाईकोर्ट प्रशासन ने जज शम्पा सरकार को दीदी की याचिका सुनवाई के लिए दी । उसके जवाब में शुभेन्दु अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका बंगाल से बाहर भेजने की अर्जी दायर कर दी । दीदी ने चुनाव आयोग से जल्द उपचुनाव कराने का अनुरोध किया, क्योंकि पांच नवंबर से पहले उन्हें विधायक बनना है । उनके लिए वैसे राज्यमंत्री शोभनदेव चट्टोपध्याय भवानीपुर सीट खाली कर चुके हैं ।