पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार और केंद्र की भाजपा नोत गठजोड़ सरकार के बीच बढ़ती तकरार को संघीय व्यवस्था पर सवालिया निशान जैसा रंग दिया जा रहा है । लेकिन ये मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच पूरी तरह से राजनीतिक खंगाल रार है, जो हालिया विधान सभा चुनाव में भाजपा की निर्णायक हार से उपजा है ।
राज्य के मुख्य सचिव अलपन बंद्यापाध्याय की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति और उसके जवाब में बंद्योपाध्याय की सेवानिवृत्ति के साथ ही दीदी द्वारा उन्हें अपना मुख्य सलाहकार बनाया जाना दरअसल वास्तव में रसूख की लड़ाई है । क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं जिस चुनाव प्रचार अभियान की कमान संभाले हुए थे और पार्टी तथा सत्ता स्तर पर सारी ताकत झोंकने के बावजूद भाजपा ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल नहीं कर पायी । भीड़ जुटाने और रैलियां आयोजित करने में सारे कोरोना प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाने की अनुमति देने पर चुनाव आयोग पर सवाल उठते रहे । कोरोना को हराने के लिए पूरे देश की जनता से परहेज और प्रोटोकॉल का पालन करने की बार-बार ‘मन की बात’ कहनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक जीत की लड़ाई का वायरस डाल दिया । परहेज के अंतर्गत मास्क पहनने और दो गज दूरी बनाए रखने के लिए लॉकडाउन का एलान करनेवाले प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों और पार्टी नेताओं के साथ मिलकर न तो खुद कोरोना का ख्याल रखा, न रैली जुटान को करने दिया ।
भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने दीदी का तीसरी बार सत्ता में आना स्वीकार नहीं किया । इसलिए दीदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बंगाल आने के दौरान दीदी द्वारा प्रोटोकॉल का पालन न किया जाना विवाद का कारण बना । मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय के बहाने केंद्र ने अपनी प्रभुसत्ता की धौंस दिखानी चाही । उसकी काट में पश्चिम बंगाल सरकार ने मामले को पंगा मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया ।
कुल 294 सीटों में से 76 सीटों पर कब्जा करके भाजपा एक प्रभावी और सरकार पर दबाव बनानेवाले मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा सकती थी । लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़़ भाजपा ने संघीय शासन व्यवस्था में अपनी पार्टी के वर्चस्व को ज्यादा महत्त्व दिया और राज्य में कानून व व्यवस्था के लिए अपनी अलग समानान्तर व्यवस्था कायम करने की नीति अपनायी । जीते हुए भाजपा विधायकों के लिए ममता बनर्जी के शपथ ग्रहण के बाद 11 मई को केंद्र ने सीआईएसएफ(केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल) यह कहकर केंद्र सरकार ने मुहैया कराया कि विधायकों की जान पर खतरा है । किसी एक पार्टी के सभी विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा प्रदान करने का ऐसा अप्रत्याशित कदम पहले नहीं देखा गया । एक खुफिया अधिकारी के अनुसार, पंजाब में उग्रवाद के दौरान भी किसी पार्टी के सभी राजनीतिज्ञों को एकतरफा सुरक्षा मुहया नहीं करायी गयी ।
चुनाव से पहले राज्य में राजनीतिक हिंसा उफान पर थी और चुनाव के दौरान भी इसमें कमी नहीं आयी । दीदी और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ में कानून व व्यवस्था को लेकर काफी समय से ठनी हुई थी ।
अपने विधायकों को केंद्रीय सुरक्षा मुहैया कराने का आदेश संघीय सरकार ने ज्योंही निर्गत किया कि उसके तुरंत बाद दीदी ने मुख्य सचिव को सेवा विस्तार देने का पत्र प्रधानमंत्री को लिखा । उसके एक हफ्ते के अंदर सीबीआई ने बंगाल की बहुप्रचारित नारदा स्टिंग केस की 2014 की फाईल खोलकर कार्रवाई शुरू कर दी । टकराव होना ही था, क्योंकि इसमें तृणमूल कांग्रेस सरकार के दो मंत्रियों, एक विधायक को सीबीआई ने गिरफ्तार किया । 17 मई की इस घटना के बाद जमानत का दबाव बनाने के लिए मुख्यमंत्री का अपने समर्थको के साथ 6 घंटे के धरने के बाद केंद्र सरकार अपनी राजनीतिक बदले की लड़ाई को दूसरा रंग देने लगी । निचली अदालत से कलकता हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तूल पकड़ती गयी ।
यह तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा था कि मई बीतते-बीतते ‘यास’ चक्रवाती तूफान ने एक नए अप्रत्याशित घमासान की नींव रख दी ।
ओडिशा और बंगाल में ‘यास’ तूफान से मची तबाही का जायजा लेने के लिए प्रधानमंत्री ने अपने दौरे में ओडिशा से लौटते हुए बंगाल में रूकने का कार्यक्रम रखा ।
पश्चिम बंगाल के कलाईकुंडा एयरबेस पर निर्धारित ‘यास’ समीक्षा बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दीदी से मिलने के लिए लगभग आधा घंटा इंतजार करना पड़ा । दीदी पहुंची पर अपनी कुर्सी पर बैठी नहीं । प्रधानमंत्री के हाथ में ‘यास’ तूफान से नुकसान की भरपाई के लिए 20,000 करोड़ के राहत पैकेज का ज्ञापन सौंपा और निकल गयी । उनके मुख्य सचिव भी दीदी के साथ आए और साथ ही चले गए ।
दीदी के नरेंद्र मोदी से मिलने समय पर नहीं पहुंचने के पीछे कथित रूप से कारण यह बताया गया कि वहां प्रधानमंत्री के पास शुभेन्दु अधिकारी मौजूद थे । चुनाव में जीते भाजपा विधायकों में से सिर्फ शुभेन्दु अधिकारी का ही कलाईकुंडा एयरबेस पर होना सुनियोजित बताया गया । क्योंकि शुभेन्दु अधिकारी ने नंदीग्राम सीट से दीदी को कड़ी मशक्कत करके हराया । खुद प्रधानमंत्री के लिए नंदीग्राम प्रतिष्ठा की सीट थी । नंदीग्राम में दीदी के गिरने का जिक्र नरेंद्र मोदी अपनी हर चुनाव रैली में करते थे ।
मुख्यमंत्री के साथ-साथ मुख्य सचिव भी प्रधानमंत्री की अगवानी करने नहीं पहुंचे । 28 मई को पीएम-सीएम मीटिंग कलाईकुंडा में तय थी और 24 मई को ही मुख्य सचिव को तीन महीने का सेवा बिस्तार मिला था । केंद्र ने अपना गरल मुख्य सचिव पर निकाला जो संघीय सरकार और राज्य सरकार के बीच राजनीतिक रसूख की लड़ाई साबित हुई ।
दीदी सरकार और मोदी सरकार के बीच वार/पलटवार का ताबड़तोड़ सिलसिला इस तरह चला, मानो दोनों पक्ष एक-दूसरे की चुनौती का जवाब देने के लिए पहले से तैयार हों ।
28 मई को प्रधानमंत्री की ‘यास’ समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री की तरह उन्हीं के साथ 15-20 मिनट देर से पहुंचने के कारण मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय का तबादला तुरंत कर दिया गया । उन्हें गृह मंत्रालय में अटैच करके डीओपीटी(कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग) को रिपोर्ट करने का निर्देश मिला । उसके बाद ही दीदी और मोदी यानो कि केंद्र व राज्य आमने-सामने आ गए । अलपन बंद्योपाध्याय की ओर से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं मोर्चा संभाल लिया ।
मुख्यमंत्री ने बंद्योपाध्याय को रिलीव नहीं किया और मुख्य सचिव ने 31 मई को रिटायरमेंट ले लिया । अलपन बंद्योपाध्याय को तुरंत अपना मुख्य सलाहकार बनाकर दीदी ने केंद्र पर निशाना साधा । दीदी ने एलान किया कि तीन महीने का सेवा विस्तार लेने से इन्कार करने के बाद अलपन बंद्योपाध्याय मुख्यमंत्री के मुख्य सलाहकार नियुक्त कर दिये गए । उसके पहले दीदी ने मोदी को बंद्योपाध्याय के विषय में पुनर्विचार करने को पत्र लिखा और साफ कह दिया कि वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अपने मुख्य सचिव को रिलीव नहीं करेंगी । मुख्य सलाहकार बनने के बाद बंद्योपाध्याय मुख्यमंत्री के साथ कोविड-19 और यास तूफान के राहत कार्यों की समीक्षा बैठक में शामिल हुए और उसी दिन रात को केंद्र ने बंद्योपाध्याय को दूसरा मेमो जारी किया कि उन्होंने डीओपीटी निर्देश का अनुपालन क्यों नहीं किया ।
उसके जवाब में दीदी ने ऐसे सवाल उठा दिए और मोदी को ‘क्रूर’ ‘हृदयहीन’ बताने समेत ऐसी बाते कह डाली, जिसका सीधा ताल्लुक केंद्र-राज्य रिश्ते से है । उसका जवाब खंगालने में केंद्र को कई हथकंडे अपनाने पड़े । दीदी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि राज्य सरकार से मशविरा किए बगैर केंद्र किसी आईएएस, आईपीएस अधिकारी को दिल्ली नहीं बुला सकता ।
डीओपीटी और गृह मंत्रालय दोनों ने आपदा प्रबंधन कानून का सहारा लेकर दीदी के मुख्य सलाहकार बने रिटायर मुख्य सचिव को दीदी की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपेक्षा करने के ‘अपराध’ में रूलबुक का हवाला दिया । आपदा ‘यास’ की प्रधानमंत्री के साथ बैठक में राज्यपाल जगदीप धनखड़ की मौजूदगी पर भी दीदी ने 28 मई को ही सवाल उठाकर कहा कि वो ‘पीएम-सीएम’ बैठक थी, उसमें शुभेन्दु अधिकारी और राज्यपाल क्यों थे ।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण(एनडीएमए) के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं । सूत्रों के अनुसार आपदा प्रबंधन एक्ट की धारा 51(बी) के तहत पीएम बैठक में देर से आने और सीएम के साथ तुरंत निकल जाने के लिए अलपन बंद्योपाध्याय को एक जून को कारण बताओ नोटिस दी गयी कि उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाय । इस ‘अपराध’ में एक से दो साल सजा का प्रावधान आपदा प्रबंधन एक्ट में है । बंद्योपाध्याय को दीदी ने अपना मुख्य सलाहकार बनाने के बाद उन्हें ‘दमखम’ वाला ‘दबंग’ अधिकारी बताया । दीदी ने आरोप लगाया कि आईएएस-आईपीएस को केंद्र ‘बंधुआ मजदूर’ समझता है । उसके पहले दिसंबर 2020 में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हावड़ा में हुए हमले के बाद केंद्र ने तीन आईपीएस अधिकारियों को दिल्ली तलब किया । दीदी ने उन्हें रिलीव नहीं किया । राज्यपाल ने कहा कि ‘नौकरशाही मुख्यमंत्री की गिरफ्त में है ।’
चुनाव पूर्व और बाद बंगाल का सारा महकमा विवादों से पटा है । नारदा स्टिंग केस में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार दीदी के दो मंत्रियों, एक विधायक और पूर्व कोलकता मेयर को निचली अदालत ने जमानत दी, जिस पर कलकता हाईकोर्ट ने रोक लगा दी । कार्यवाहक चीफ जस्टिस राजेश बिंदल ने सुनवाई के लिए पांच जजों की पीठ बनायी, उनमें भी आपस में मतभेद हो गया । मुख्यमंत्री ने कहा कि सीबीआई को किसी कार्रवाई की अनुमति देने का अधिकार राज्यपाल को नहीं है ।