राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मणिपुर में जिस उत्सव का उद्घाटन किया, उसमें दक्षिण पूर्व एसियाई देशों (एसियान) और पश्चिम एसिया के राजदूत मौजूद थे ।

भारत सरकार के प्रचार प्रसार विभागों ने इसे ‘मणिपुर उत्सव’ कह के प्रचारित किया है, जिसमें मणिपुर की जनता की भागीदारी नहीं है । मणिपुर सरकार का नेतृत्व भाजपा मुख्यमंत्री एन. वीरेन सिंह के हाथ में है । इस उत्सव का आयोजन मणिपुर-म्यांमार सीमा के रास्ते एसियान देशों से व्यापारिक संबंध बढ़ाने के लिए भारत सरकार ने किया है, जिसके लिए नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनने के समय से ही प्रयत्नशील हैं । मणिपुर की जनता की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, क्योंकि मणिपुर का भारत से ही कोई लगाव या जुड़ाव नहीं है । भारत सरकार बाजाप्ता अधिकारपूर्वक अपने व्यापारिक हित में मणिपुर का इस्तेमाल करना चाहती है, क्योंकि मणिपुर-म्यांमार सीमा एसियान का प्रवेश द्वार है । लेकिन मणिपुर के लोगों को इतना विश्वास में नहीं लिया गया कि यहां के लोग भी भारतीय संघीय व्यवस्था में अन्य राज्यों की तरह खुद को भारत का नागरिक मानें । मणिपुर को सेना और अर्द्धसैनिक बलों की बदौलत भारतीय संघ का अंग बने रहने के लिए मजबूर किया गया है, जैसा शेष भारत के राज्यों के साथ नहीं हो रहा है ।

आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट(आफ्प्सा) मणिपुर में 1980 से लगातार लागू है । इसके अंतर्गत सेना और अर्द्धसैनिक बलों को मनमानी करने की कानूनी छूट मिली हुई है । सेना के जवानों को किसी व्यक्ति को गोली मारने और बिना मुकदमा चलाए जेल में यातनाएं देने या फर्जी मुठभेड़ दिखाकर गोली मार देने का अधिकार प्राप्त है । भारतीय संघ में आफ्प्सा की बदौलत मणिपुर को भारतीय संघ में रखने का विरोध उग्रवाद माना जाता है और सेना तथा अर्द्धसैनिक बलों का किसी पर संदेह होना ही पर्याप्त है । उसकी किसी अदालत में सुनवाई या किसी जांच एजेंसी से जांच नहीं होने दी जाती ।

भारत सरकार सेना की हर ज्यादती की अनदेखी करके उग्रवाद पर काबू पाने के लिए आप्प्सा लागू रखना जरूरी बताती है और अन्य राज्यों की तरह नागरिकों के साथ पुलिस या सेना के जुल्म की तरह जांच कराने से कतराती है ।

गत 14 जुलाई, 2017 को मणिपुर के 250 फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए 1500 से ज्यादा लोगों की हत्या के आरोपों की सीबीआई जांच का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया । सेना, असम राइफल्स और उसके दबाब में मणिपुर पुलिस पर न्यायेत्तर हत्याओं और फर्जी मुठभेड़ों से पीड़ित परिवार के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी थी । सुप्रीम कोर्ट जज एम बी लोकुर और यू यू ललित की पीठ ने सीबीआई निदेशक से कहा कि इन कथित हत्याओं के केस की जांच के लिए पांच अधिकारियों की टीम गठित करें । पीड़ित परिवारों ने अपनी याचिका में 2000 से 2012 के बीच हुई 1528 फर्जी मुठभेड़ हत्याओं का जिक्र किया है ।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से बचाव में कहा कि सभी सैनिक अभियानों में सेना पर अविश्वास नहीं किया जा सकता है, सभी न्यायिक जांच उसके खिलाफ नहीं हो सकते हैं । तीन सदस्यीय सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कथित फर्जी मुठभेड़ों के मामले में कार्रवाई नहीं करने को लेकर मणिपुर सरकार की भी खिंचाई की और कहा कि क्या उसे कुछ करना नहीं चाहिए था ।

अर्द्धसैनिक बलों और सेना की गोलियों के शिकार मृतकों के परिवारजन की अगर भारत सरकार के पास सुनवाई होती तो वे सुप्रीम कोर्ट क्यों जाते । सुप्रीम कोर्ट अगर आदेश नहीं देती तो सीबीआई यह जांच ठुकरा देती ।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इन पीड़ितों की मदद करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि उसके पास लाइसेंसि दोषियों को सजा देने का अधिकार नहीं है । सुप्रीम कोर्ट ने इस बात के लिए भी अफसोस जाहिर किया कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग(एनएचआरसी) दंडित करने की शक्तियों के अभाव में बिना दांतों का शेर बनकर रह गया है । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनएचआरसी ने अपनी यह व्यथा शपथपत्र में बतायी हे । शीर्ष कोर्ट ने केंद्र की सलाह दी कि एनएचआरसी को जल्द-से-जल्द शक्तियां दी जाएं ।

नवंबर मध्य तक यह रिपोर्ट नहीं थी कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद इस दिशा में कोई पहल की या नहीं । सीबीआई द्वारा जांच शुरू करने की भी कोई सूचना नहीं है । क्योंकि सीबीआई ऐसे मामले में कुछ बोलेगी नहीं और भारत सरकार की यह जांच एजेंसी सूचना अधिकार के दायरे से बाहर है ।

भारत सरकार की सेना को मणिपुर के लोग अपने देश की फौज नहीं मानते । सेना ने 20 अप्रैल की सुनवाई में ही सुप्रीम कोर्ट से कहा कि कश्मीर, मणिपुर जैसे उग्रवाद प्रभावित राज्यों की न्यायिक जांच में पक्षपात होता है, जिसने उसकी छवि खराब कर दी है ।

फर्जी मुठभेड़ से पीड़ित परिवारों ने 2012 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और 2013 में शीर्ष कोर्ट ने ही एक जांच आयोग गठित किया । आयोग के सदस्य रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज संतोष हेगड़े, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे एम लिंगदोह और रिटायर आपीस अधिकारी अजय कुमार सिंह ने अपनी जांच रिपोर्ट में कहा कि आफ्प्सा से उग्रवाद पर काबू पाने में कोई असर नहीं पड़ रहा है ।

सेना को तो जहां तैनात होगी वहां भारत सरकार के अनुकूल काम करेगी । लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार ने मार्च में मणिपुर चुनाव वैसे ही जीता, जैसे कांग्रेस जीत रही थी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के लिए वोट लिया, मिला नहीं है । सेना की बदौलत चुनाव तो जीता, मगर विश्वास नहीं । अब बंदूक के साए में ही मणिपुर को उपनिवेश की तरह व्यापारिक रास्ते के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है । आफ्प्सा के प्रावधान ब्रिटिश उपनिवेश काल के कानूनों से मिलते-जुलते हैं । 1958 में यह कानून उपद्रवग्रस्त क्षेत्र में लागू करने के लिए बना था । इसमें भारतीय प्रावधान यह जोड़ा गया था कि छह महीने के अंदर हालात की समीक्षा के बाद इसकी अवधि बढ़ायी जाए । 37 वर्षों में समीक्षा की जरूरत पर विचार नहीं हुआ और मणिपुर ‘उपद्रवग्रस्त’ ही है । उग्रवाद को जनता का समर्थन प्राप्त है, जो शेष भारत को ‘मेनलैंड इंडिया’ कहती है । उग्रवाद पर काबू पाने के नाम पर मणिपुर की जनता औपनिवेशिक शासन झेलने को मजबूर है । ऐसी जनता खुद को भारत का अंग कैसे माने, जो नागरिक अधिकार से वंचित है ।

21 नवंबर को राष्ट्रपति रामनाथ गोविंद मणिपुर उत्सव का उद्घाटन करने इंफाल पहुंचे । उसके एक महीना पहले ‘नगा शांति डील’ के लिए केंद्र के वार्ताकार आर. एन. रवि एन एस सी एन(मुइवा) के हेडक्वार्टर दीमापुर(नगालैंड) में नगा वार्ता पर आगे बात करने पहुंचे थे । लेकिन इस ‘रहस्यमय’ डील के बारे में कुछ भी बोलने से परहेज किया, जो सीधे मणिपुर से जुड़ा है। दिल्ली में तीन अगस्त, 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र की मौजूदगी में ‘नगा डील’ हुआ । नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड(एन एस सी एन) के संचालक एन. मुइवा ने इस ‘डील’ पर हस्ताक्षर किए, जिनका जन्मस्थान मणिपुर है । आर एन रवि मणिपुर कभी नहीं गए, न ही वहां की सरकार या किसी अन्य उग्रवादी गुट से बात की ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘नगा डील’ पर चुनाव प्रचार के दौरान मणिपुर के लोगों को अंधेरे में रखा और आज तक इसके मजमून को संस्पेंस बनाकर रखा गया है । भारत सरकार उस ‘डील’ का खुलासा नहीं करना चाहती जो सबसे ज्यादा मणिपुर से जुड़ा है । ऐसे अविश्वास और संदेह के माहौल में भारत सरकार मणिपुर को वो ‘सब कुछ’ दे रही है, जिसके विषय में वहां के लोग जानते नहीं ।

मणिपुर में हुआ क्या, नीतियां वही रही जो 15 साल से चली आ रही कांग्रेस सरकार की थी । जनहित में आफ्प्सा को निरस्त करने के लिए 16 साल से आमरण अनशन कर रही सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने अनशन तोड़कर चुनाव के जरिए इसके खिलाफ लड़ने की ठानी । उसने मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा, हार गयी । मणिपुर में हथियार और पैसे के बल पर वोट डलवाए जाते हैं, वोट मिलते नहीं । हथियार सुरक्षा बलों के होते हैं, जो उग्रवादियों का भय दिखाकर तने रहते हैं । 60 सीटों वाली विधान सभा में घुसने के लिए 54 करोड़पति मैदान में थे ।

2000 में इंफाल के मालोम बस स्टॉप पर असम राइफल्स ने अंधाधुंध फायरिंग करके 10 बेकसूरों की जान ले ली । मृतकों में बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी थी । उसके विरोध में इरोम शर्मिला आप्प्सा निरस्त करने की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गयी । हिंसा उपजाने वाली माटी पर मणिपुर की मांओं के समर्थन से शांति की पहल भारत सरकार को अच्छी नहीं लगी । किसी भी सरकार ने 16 साल में इरोम को वार्ता के लायक नहीं समझा ।

क्योंकि भारत सरकार को मणिपुर की ऐसे एकमात्र ‘उपद्रवग्रस्त’ राज्य के रूप में राष्ट्रीय मानचित्र पर पहचान बनाये रखनी है जहां उग्रवादी हिंसा पर काबू पाने के लिए आप्प्सा लागू रखना जरूरी है । 2004 में एक सामाजिक कार्यकर्ता मनोरमा देवी को उग्रवादी गुट से संबद्ध बताकर जवानों ने बलात्कार के बाद चोथड़ों में ही हत्या कर दहशत पैदा करने छोड़ दिया । उसके विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया । भारी दबाव में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज जस्टिस बी पी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में जांच कमिटी गठित की गयी । 2005 में सौपी गयी जांच रिपोर्ट में जस्टिस रेड्डी ने साफ कहा कि जो कानून जनता के बीच सुरक्षा के बजाय दहशत और आतंक का प्रतीक बना हुआ है, उसे लागू रखने का क्या औचित्य है ।

एक पखवाड़ा गुजरा, मणिपुर एनआईटी में बिहारी छात्रों पर हमले की रिपोर्ट आयी थी । पहले भी बिहार, उत्तर प्रदेश के छात्रों पर हमले हुए थे । भारत सरकार की राजधानी दिल्ली में मण्पुरी छात्र-छात्राओं पर ‘मेनलैंड इंडिया’ के लोग फब्बतियां कसते हैं, जिढ़ाते हैं, दोयम दर्जे जैसा सलूक करते हैं ।

वैसे तो समूचा पूर्वोत्तर ही भारत से खुद अलग-थलग मानता है । रेल और सड़क संपर्क से लोगों के दिल नहीं जुड़ रहे हैं। पर्यटन, व्यापारिक संपर्क जुड़ रहा है, जो सुरक्षा बलों की बदौलत ही चल सकता है ।

मणिपुर कदाचित पूर्वोत्तर का भी सबसे उपेक्षित राज्य है । आज राष्ट्रपति इंफाल जाकर कह आए कि मणिपुर-म्यांमार-थाइलैंड मार्ग खुलने पर पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा । 1997 में प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजराल ने एनएससीएन से संघर्षविराम समझौता किया था, जिसका मजमून आज तक सार्वजनिक नहीं हुआ । 2001 में एनएससीएन के खपलांग गुट से भी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संघर्षविराम किया और थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में मुइवा से मिले । मुइवा के कहने पर संघर्षविराम का दायरा मणिपुर तक बढ़ाया गया, तो समूच मणिपुर में आग लग गयी । सबसे बड़े नगा समुदाय मेइती ने विद्रोह कर दिया, 18 लोग मारे गए । राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा । 2003 में उसी मुइवा से समझौता करके अटल बिहारी वाजपेयी ने नगालैंड विधान सभा में सात सीटें जीतकर भाजपा का खाता खोला । आज उसी मुइवा से हुए डील पर मणिपुर की जनता को अंधेरे में रखा गया है । राष्ट्रपति के भाषण में मणिपुर-म्यांमार-थाइलैंड मार्ग पर बल दिया गया । नगालैंड में भी ‘नगाडील’ को लेकर असंतोष है, इसका असर फरवरी - मार्च, 2018 में होनेवाले चुनाव पर पड़ेगा । भाजपा समर्थक नगा पीपुल्स फ्रंट मुख्यमंत्री टी. आर. जेलियांग के लिए अपनी जनता को सफाई देना कठिन हो रहा है । वे स्वयं अंधेरे में हं । जेलियांग 4 नवंबर को केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह से मिले । राजनाथ सिंह इंफाल जाकर सफाई दे आए है कि नगा डील में मणिपुर का नाम नहीं है । नगा डील से पहले खपलांग गुट से संघर्ष विरोम समझौता रद्द कर दिया गया, जिसका मणिपुर में सबसे ज्यादा ‘से’ है ।

‘लुइ इस्ट’ नीति के अंतर्गत मणिपुर के रास्ते एसियाई देशों से व्यापार बढ़ाने की शुरूआत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की थी । नरेंद्र मोदी ने उसमें पश्चिम एसिया भी जोड़ दिया । मणिपुर उत्सव उद्घाटन समारोह के दिन 21 नवंबर को पश्चिम एसियाई देशों के राजदूत भी थे ।

मणिपुर में मुइवा समर्थक गुट युनाइटेड नगा कौंसिल से चुनाव से पहले फरवरी, 2017 में ही प्रधानमंत्री ने चुनावी समझौता कर लिया । बाद में बात नहीं बनी तो 139 दिनों की आर्थिक नाकेबंदी से मुख्यमंत्री वीरेन सिंह बड़ी मुश्किल से उठायी । कांग्रेस सरकार को भी 2011 में चुनाव के समय ऐसे ही नाकेबंदी झेलनी पड़ी थी ।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अरूणाचल प्रदेश होते हुए मणिपुर गए । अरूणाचल प्रदेश को चीन भारत का अंग नहीं मानता । उसने राष्ट्रपति के दौरे पर एतराज जताया । मणिपुर के लोग खुद को भारत का अंग नहीं मानते । कश्मीर का दिल जीतने के लिए जब पत्थरबाजी करनेवालों के खिलाफ मामला वापस लिया जा सकता है, तो मणिपुर के जरिए व्यापार बढ़ाने से पहले वहां के लोगों का दिल जीतने वाला कदम क्यों नहीं ।