नगा ‘डील’ पर बेनतीजा वार्ता चला रहे पूव खुफिया प्रमुख आर. एन. रवि का नगालैंड का राज्यपाल बना दिया गया । नगालैंड ही नहीं, समूचे पूर्वोत्तर और देश का सबसे पुराना पेचीदा संकट है, नगा समस्या ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आर. एन. रवि नगा ‘डील’ को समझौते में बदलने के लिए विद्रोही नगा नेताओं से गुप्त वार्ता चला रहे हैं । प्रधानमंत्री की मौजूदगी में दिल्ली में तीन अगस्त, 2015 को हुई इस डील के चार साल पूरे हो रहे हैं। उस अवसर पर तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी मौजूद थे ।

भारत सरकार और नगा नेताओं के बीच हुई उस ‘डील’ कागजात पर ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’ की मांग करनेवाले नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम(एनएससीएन- आई-एम-आईसाक मुइवा) सुप्रीमो आइसाक चिशी तथा टी. मुइवा ने हस्ताक्षर किए । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेहद उत्साहित होकर उसे ‘ऐतिहासिक समझौता’ बताया और दावा किया कि 18 साल से लटके नगा संकट का स्थायी ‘समाधान’ हो गया ।

नरेंद्र मोदी ने 18 साल इसलिए कहा, क्योंकि 1997 में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री इन्द्रकुमार गुजरात के प्रयासों से एनएससीएन(आई-एम) के साथ ‘संघर्षविराम सहमति’ बनी । उसका पूर्वोत्तर समेत पूरे देश में स्वागत हुआ क्योंकि आजादी के समय से चली आ रही बेकाबू नगा हिंसा पर थोड़ा विराम लगा । उसे शांति की दिशा में बहुत बड़ा कदम माना गया, क्योंकि उसके बाद से शांति वार्ता का मार्ग खुला ।

वार्ताओं के दौर से ऐसा नतीजा नहीं निकला कि अंतिम रूप से समझौता हो । भारत सरकार की जिस नगा गुट से वार्ता चलती रही, वे स्वयं को ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम सरकार’ के प्रमुख मानते हैं । अपनी भूमिगत नगालिम सरकार के स्वयंभू प्रधानमंत्री टी. मुइवा ने हमेशा इस वार्ता को दो देशों की(भारत-नगा) वार्ता कहा ।

इस कड़ी में दूसरा इजाफा 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम सरकार’ के खुद को स्वयंभू ‘राष्ट्रपति माननेवाले खपलांग गुट से ‘संघर्षविराम सहमति’ करके किया । वार्ता जारी रही, लेकिन उसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 10 साल के कार्यकाल में भी वार्ता का ठोस परिणाम सामने नहीं आया । इतना पता चलता रहा कि नगा वार्ता जारी है । प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और गृह मंत्रालय से अधिकारियों की भी नगा विद्रोही नेताओं से मुलाकातों की जानकारी मिल जाती थी । 1997 से लेकर 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले तक की जानकारी सरकारी है कि 70 दौर की नगा वार्ता बेनतीजा रही ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस ‘डील’ को ऐतिहासिक समझौता और नगा संकट का स्थायी हल बताया, उसके विषय में अभी तक संशय बरकरार है । तीन अगस्त को इस ‘सस्पेंस’ के चार साल पूरे हो जाएंगे । भारत सरकार के वार्ताकार आर. एन. रवि पूर्व खुफिया प्रमुख रह चुके हैं । इस अवधि में नगा गुटों से मिलने-जुलने या वार्ता करने का क्या नतीजा निकला, वे किस मुकाम तक पहुंचे उसे गोपनीय बनाए रखा । नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद ही पुराने झंझटिया मुद्दों के समाधान में तत्परता दिखायी । उसमें नगा झमेले को प्रधानमंत्री ने पहले नंबर पर रखा । इसके लिए मनमोहन सिंह शासनकाल के वार्ताकार आर. एस. पांडे की जगह भाजपा गठजोड़ सरकार ने आर. एन. रवि को नगा वार्ताकार बनाया । साल भर बाद 2015 में सीधे ‘स्थायी हल’ का दावा प्रचारित कर दिया गया । लेकिन देश के लोगों को यह पता नहीं चला कि आखिर समाधान क्या निकला । सिर्फ इतनी ही जानकारी बाहर आयी कि इस समझौते को ‘फ्रेमवर्क एग्रीमेंट’ बताया गया । इस एग्रीमेंट के लिए एनएससीएन(आई-एम) सुप्रीमो मुइवा और आईसाक चिशी को दिल्ली लाए जाने से पहले एनएससीएन के खपलांग गुट से संघर्षविराम रद्द हो चुका था । यह समझौता अटल बिहारी वाजपेयी शासन में हुआ था । खपलांग गुट से समझौता रद्द होने का खामियाजा भारतीय सैनिकों को तुरंत भुगतना पड़ा । चार जून, 2015 को मणिपुर के चंदेल जिले में म्यांमार से लगी सोमा के पास खपलांग गुट के हमले में 18 जवान मारे गए ।

उसके बाद एनएससीएन(मुइवा) और अन्य नगा गुटों के साथ क्या डील चल रहा है, यह सूचना गुप्त रखी गयी । लेकिन भारतीय सेना ने म्यांमार सेना के साथ मिलकर खपलांग गुट और अन्य नगा ठिकानों का सफाया अभियान चलाया, इसकी जानकारी मिली । ‘ऑपरेशन सनसाईन’ के नाम से इसका दूसरा चरण जून, 2019 में पूरा हुआ । उसी समय पता चला कि एनएससीएन के खपलांग गुट से म्यांमार सरकार का अप्रील, 2012 से संघर्षविराम चल रहा है । खपलांग गुट के ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम राष्ट्र’ में म्यांमार के भी जिले हैं। और इस गुट को भी मुइवा गुट की तरह पूर्वोत्तर के तमाम नगा आबादी वाले इलाकों को मिलाकर ‘ग्रेटर नगालिम’ चाहिए ।

आर. एन. रवि को क्या सोचकर नगालैंड का ‘राज्यपाल’ बनाया गया, इस संबंध में अभी तुरंत अनुमान लगाना कठिन है । मगर चार साल की वार्ता में आर. एन. रवि को नगालैंड की जनता समेत नगा विद्रोही गुटों को विश्वास में लेने में सफलता नहीं मिली है । हो सकता है, आर. एन. रवि नगा गुटों से उनके ठिकानों पर गुप्त मुलाकातें करते रहे हों, लेकिन नगालैंड के मतदाताओं ने उसे समस्या का हल नहीं माना ।

नगा गुट भारतीय संविधान को नहीं मानते, उनका राष्ट्रीय झंडा तिरंगा नहीं है । उनकी अपनी पुलिस सेना है । संघर्षविराम सहमति के अन्तर्गत भारत की सेना और ‘नगालिम’ की सेना एक-दूसरे पर हमले नहीं करेगी । नगालिम के सैनिक और नेताओं को हथियार लेकर चलने की छूट है ।

लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद फरवरी, 2019 में आर. एन. रवि नगालैंड पहुंचे । नगा विद्रोहियों के सबसे बड़े जनमंच ‘हो हो’ नेताओं ने आर. एन. रवि से मिलने से इन्कार कर दिया । यह नगाओं की सबसे प्रभावशाली सिविल सोसाइटी मंच है, जिसकी चुनाव समेत हर राजनीतिक, सामाजिक मामलों में मुख्य भूमिका होती है । नगा छात्र संघ और नगा मदर्स एसोसिएसन ने भी भारत सरकार के वार्ताकार से मिलने से मना कर दिया । फरवरी, 2018 में नगालैंड विधान सभा चुनाव के समय इन्हीं संगठनों ने भारत सरकार को अल्टिमेटम दिया - ‘नगा संकट का हल नहीं तो चुनाव नहीं ।’ भाजपा समेत सत्तारूढ़ क्षेत्रीय दल मुख्यमंत्री नेफियू रियो इसके पक्ष में थे ।

25 मार्च, 2019 का आर. एन. रवि दीमापुर स्थित ठिकाने पर एनएससीएन नेता मुइवा से मिलने पहुंचे । चार साल में वो पहली बैठक थी । उसके बारे में भी आर. एन. रवि ने कुछ भी बोलने से परहेज किया । नगालैंड के अखबार ‘दीमापुर पोस्ट’ से पता चला कि नगा नताओं ने अपना अलग संविधान(येझाबो) और ‘विशिष्ट संस्कृति’ की पहचान अलग झंडे से समझौता करने से इन्कार कर दिया । ‘नगाध्वज’ उनकी भावनाओं से जुड़ी है । तीन अगस्त, 2015 समझौते के समय एनएससीएन सुप्रीमो आइसाक चिशी दिल्ली में अपोलो अस्पताल में भर्ती थे । 2016 में उनकी मौत के बाद आइसाक चिशी का पार्थिव शरीर अपने ‘नगा झंडे’ में लिपटाकर रखा गया । शोकसभा में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल और उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार आर. एन. रवि पहुंचे । ‘क्षेत्रीयता’ और ‘संप्रभुता’ के बीच समन्वय स्थापित नहीं हो पा रहा है ।

ऐसे ‘राष्ट्रवादी’ नगा नेताओं को ‘अलग संविधान, अलग झंडा’ छोड़ने को राजी करने में कहां तक सफलता मिलती है, यह तो वक्त बताएगा । पहले की तरह नगा विद्रोही गुट के ठिकाने पर जाकर उनलोगों को विश्वास में लेना अब राज्यपाल आर. एन. रवि के लिए संभव नहीं हो पाएगा ।

25 मार्च, 2019 को आर. एन. रवि को बेनतीजा बैठक के दो दिन बाद एनएससीएन(मुइवा) ने अपना 40वां ‘गणतंत्र दिवस’ मनाया । नगा सेना ने अपने हथियार और झंडे के साथ परेड किया ।नगालैंड में लोकसभा चुनाव एक ही सीट पर होने के कारण कोई मुद्दा नहीं बनता । संघर्षविराम के बावजूद छिटफुट हिंसा जारी है । अरूणाचल प्रदेश विधान सभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ ही हुआ । चुनाव के समय 21 मई को विधायक तिरोंग अबोह को उनके पुत्र और सुरक्षाकर्मी समेत 10 लोगों के साथ तिराप जिले में मार दिया गया । हमले का तरीका देखकर सुरक्षा बलों को एनएससीएन(मुइवा) पर संदेह है । सरकार, प्रशासन, सेना और अर्द्धसैनिक बलों की बदौलत चल रहा है । गृह मंत्रालय के हालिया रिपोर्ट के अनुसार नगालैंड देश का एकमात्र राज्य है, जहां पुलिसकर्मी आवंटित संख्या से ज्यादा है । बाकी राज्यों में पुलिसकर्मियों की कमी है । 11 अप्रील को नगालैंड में लोकसभा सीट के लिए हुए मतदान के बाद दो नगा गुटों से गृह मंत्रालय ने संघर्षविराम की अवधि बढ़ायी ।